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Geebat Hamare Muashare (Society) ki Ek bahut badi bimari. (Part 11)

Kisi Ki Burai karna Kaisa Gunah hai?
Geebat se Hamare Muashare me Failai Buraiyan.
ग़ीबत मुआशरे की मुहलिक बीमारी 11
                  ख़ुतबाते हरम

    एक रिवायत में है कि रसूले अकरम सल्ल° ने दरयाफ़्त फ़रमाया: *"क्या तुम जानते हो अल्लाह के नज़दीक सबसे बड़ा रिबा क्या है? सहाबा ने अर्ज़ की: अल्लाह और उसका रसूल ज़्यादा जानते हैं। तो आप सल्ल° ने फ़रमाया: बेशक सबसे बड़ा रिबा अल्लाह के नज़दीक किसी मुसलमान की इज़्ज़त को हलाल समझ लेना है। फिर आपने इस आयत की तिलावत फ़रमाई: "जो लोग मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को बगैर किसी जुर्म के तकलीफ़ पहुँचाएं वह बड़े ही बुहतान तराज़ और खुल्लम-खुल्ला गुनाहगार हैं।"
(अल् अहज़ाबः33/58, मुस्नद अहमद अबी यअला अलमूसली, हदीस नं 4689, व शुअबुल ईमान लिल बैहिकी:6711 )

       रसूले अकरम सल्ल° ने अपने सहाबए किराम की ऐसी ज़बरदस्त तरबीयत फ़रमाई कि आपने साफ़ ख़बरदार कर दिया: *"कोई शख़्स मेरे किसी सहाबी की कोई बात मुझे न पहुँचाए, मै चाहता हूँ कि मैं तुम्हारी तरफ़ निकलूं तो मेरा सीना साफ़ हो ( किसी के मुतअल्लिक मेरे दिल में कदूरत न हो।)"
(सुनन अबी दाऊदः 4860, व जामिउत्तिर्मिजी: 3896 )

     सलफ़े सालिहीन का उस्लूब यह होता था कि वह ख़ैरख़्वाही फ़रमाते थे, नसीहत करते थे, फ़ज़ीहत नहीं करते थे, ऐबचीनी से एहतिराज़ फ़रमाते थे। हज़रत उमर रज़ि° ने फ़रमाया: "तुम अल्लाह के ज़िक्र को मामूल बनाओ क्योंकि यह बाइसे शिफ़ा है और लोगो की बुराई से बचो क्योंकि यह बीमारी है।"
( अस्समतु लिइब्ने अबी अद्दुन्या:स॰204)

   सलफ़े सालिहीन से मन्कूल है कि ग़ीबत ज़िनाकारी से ज़्यादा घिनावना गुनाह है, पूछा गया: वह कैसे? उन्होंने जवाब दिया: *" हो सकता है आदमी ज़िना (illegal Sex) करे और फिर तौबा करे तो शायद अल्लाह उसकी तौबा क़बूल करके मुआफ़ कर दे, मगर ग़ीबत करने वाले को उस वक़्त तक मुआफ़ नहीं किया जाता जब तक कि वह उस शख़्स से मुआफ़ी न माँग ले जिसकी उसने ग़ीबत की है।"
(अस्समतु लिइब्ने अबी अद् दुनिया सः164, व कन्जुल उम्मालः 3/589 )

     हज़रत क़तादा रह० ने फ़रमाया: "हमे बयान किया गया है कि अज़ाबे क़ब्र की तीन तिहायाँ हैं: एक तिहाई ग़ीबत, एक तिहाई पेशाब करने में बेएहतियाती और एक तिहाई चुग़लख़ोरी की वजह से है।"
(अस्समतु लिइब्ने अबी अद्दुन्या: स 299 )

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