जब सोशल मीडिया रिश्तों में दूरी पैदा कर दे.
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| सोशल मीडिया का असर: औरत अपने शौहर से क्यों दूर हो रही है? |
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| सोशल मीडिया का असर: औरत अपने शौहर से क्यों दूर हो रही है? |
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| Liberalism and Womens Right. |
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| दस्तक, दिल और दर-ए-हया: औरत के वक़ार की एक दास्तान. |
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| From love to destruction – the chilling reality behind the Bhagwa Love Trap. |
| रिश्तों की सच्चाई: क्यों मिट रहा है मोहब्बत और बढ़ रहा है फ़ासला? |
एक ज़माना था जब मां की बस एक नज़र बता देती थी कि हम ग़लत कर रहे हैं।
उस नज़र में मोहब्बत भी होती थी और तरबियत की आगाही भी।
आज मां “Mom” बन चुकी हैं—
बहुत नरम, बहुत मुलायम, इतनी कि वो ज़रूरी सख़्ती भी भूलती जा रही हैं।
हम कहते हैं:
“Mom बहुत soft हो गई हैं…”
पहले शाम ढलती नहीं थी और दिल अब्बू की आहट ढूंढने लगता था।
उनका दरवाज़े से अंदर आना घर में बरकत, सुकून और अपनापन ले आता था।
आज हम Dad कहते हैं—
फूफी के आने पर बेहतरीन बिस्तर, बढ़िया बर्तन और सबसे अच्छा सलीका निकाला जाता था।
घर में बताया जाता था:
“ये तुम्हारे अब्बू की बहन हैं… घर इनका भी है।”
आज “Phuphi Problems, Family Politics” जैसे सोशल मीडिया के जुमले हमारी सोच में ज़हर बनकर उतर चुके हैं।
तालीम वो थी जो इंसान के अख़्लाक़, आदतों और किरदार में चमकती दिखाई देती थी।
इल्म से ज्यादा काग़ज़ को अहमियत दी जाने लगी।
सीवी भर गए…
लेकिन दिल और दिमाग खाली रह गए।
इसलिए आज इंसान कहता है:
“नौकरी मिल गई, सुकून नहीं मिलता…”
क्योंकि सुकून डिग्री से नहीं,
असली तालीम से मिलता है।
कभी मोहल्ला एक परिवार की तरह होता था।
किसी के घर में कुछ पक्का—साझा।
फल—साझा।
खुशी—साझा।
ग़म—साझा।
आज हम Privacy और Personal Space के नाम पर दीवारें खड़ी कर चुके हैं।
इतना कि पड़ोसी भूखे मर जाए,
बच्चे बेचने पर मजबूर हो जाएँ,
और हमें खबर ही न हो।
क्या यही तरक़्क़ी है?
नहीं… यह इंसानियत का ज़वाल है।
कभी ईद और त्यौहार मां-बाप, रिश्तेदारों और पूरे ख़ानदान के साथ मनाते थे।
वो दिन सिर्फ त्योहार नहीं—
मोहब्बत, बरकत और खुलुुुश का दिन होता था।
आज ईद Malls, Outings, Friends Hangouts, Shopping Reels तक सीमित हो चुकी है।
परिवार पीछे छूट रहा है—
और हम सोचते हैं कि हम “Independent” हो गए।
असल में…
हम सिर्फ अकेले हो गए हैं।
पहले शादी घर के बुज़ुर्ग तय करते थे।
उनकी दुआओं में बरकत होती थी।
रिश्ते उम्र भर चलते थे।
आज “My Choice, Love Marriage, Runaway Couples” जैसे ट्रेंड रिवायत और बरकत दोनों को खा गए।
शादी सिर्फ दो लोगों का फैसला नहीं—
दो परिवारों की दुआ और दो दिलों की ज़िम्मेदारी है।
जब फैसले हवाओं में लिए जाएँ,
तो रिश्ते ज़मीन पर टिक नहीं पाते।
बुज़ुर्ग घर की रूह होते थे।
उनकी मौजूदगी घर में दुआ, बरकत और अमन भरती थी।
आज लोग कहते हैं:
“वक्त नहीं है…”
मगर असल में वक्त नहीं,
दिल छोटा हो गया है।
बुज़ुर्गों को बोझ समझने वाली सोच ही असली बोझ है इस समाज पर।
हमने घर बदले,
फर्नीचर बदला,
मॉडर्न लाइफ बदली…
लेकिन दिल नहीं बदला।
ज़िंदगी बहुत छोटी है।
रिश्ते बहुत नाज़ुक हैं।
और मोहब्बत…
वो सबसे कीमती चीज़ है।
अपने आस-पास देखें—
कहीं कोई टूटा हुआ है,
कहीं कोई भूखा है,
कहीं कोई तन्हा है।
बस एक मुस्कुराहट, एक सलाम, एक कदम बढ़ाना—
ज़िंदगी की असल फ़ज़ीलत इसी में है कि हम दिलों को टूटने से बचाएँ,
कदमों को ऐसे रास्तों पर ले जाएँ जहाँ किसी की रूह को ठेस न पहुँचे।
इंसान की कीमत उसके लिबास से नहीं,
बल्कि उसके अंदाज़-ए-ख़लूस, उसके लफ़्ज़ों की नरमी
और उसके दिल की सफ़ाई से पहचानी जाती है।
मोहब्बत में भी एक अदब होता है,
रिश्तों में भी एक हया होती है,
और इंसाफ़ में भी एक ख़ामोश रोशनी—
जो हर उस दिल पर उतरती है
जहाँ नफ़रत की जगह रहमत पलती हो।
किसी को छोटा समझकर कभी फ़ख़्र न करो,
क्योंकि ख़ुदा ने हर दिल को
अपनी मेहर के साये और इज़्ज़त के रंग से पैदा किया है।
ज़िंदगी की राहें तब ही आसान होती हैं
जब हम किसी के लिए मुश्किलें नहीं,
बल्कि आसानियाँ छोड़ कर जाएँ।
ज़िंदगी की असल खूबसूरती इसी में है कि हम दूसरों के लिए आसानी पैदा करें, न कि मुश्किलें।
किसी को छोटा समझकर कभी खुश न हों, क्योंकि हर दिल को खुदा ने अपनी रहमत और फितरत के साथ बनाया है।
मोहब्बत, लिहाज़ और इंसाफ—ये तीन बातें हर रिश्ते को जिंदा रखती हैं।
جدیدیت کا فریب ,ماں کی عظمت, خاندانی نظام کی اہمیت, اسلام میں عورت کا مقام , نسلوں کی تربیت , لبرل ازم کا دھوکہ ,
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