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Parda o Imaan: Jazbaat se Istiqamat tak ka Safar.

Parda Karne Ki ibtida Kaise Kare?

पर्दा औरत की इज़्ज़त और हिफ़ाज़त का ज़रिया है।
पर्दा इंसान को अंदरूनी मज़बूती और बाहरी तहज़ीब दोनों देता है।
पर्दा और हिकमत-ए-अमली, दोनों मिलकर इंसान को मज़बूत शख़्सियत बख़्शते हैं।
इस्लामी तालीमात में पर्दा और हिकमत, दोनों को ज़िंदगी का अहम हिस्सा क़रार दिया गया है।
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पर्दा सिर्फ़ ज़ाहिरी परदा नहीं, बल्कि इस्तिक़ामत और हिकमत का पैग़ाम है।
जज़्बात को क़ाबू में रखकर अमली ज़िंदगी में हिकमत अपनाना असल कामयाबी है। इस्तिक़ामत का सफ़र जज़्बात से शुरू होकर हिकमत पर ख़त्म होता है।

 पर्दा और हिकमते-अमली: जज़्बात से इस्तिकामत तक का सफ़र 

"पर्दा एक गुलामी है जो मर्दो द्वारा औरतों पर थोपा गया है, इस गुलामी से आज़ाद होना ही सबसे बड़ी जीत है।"
कुछ इस तरह के कवाएद तैयार कर के मुस्लिम खवातीन् को शरई पर्दे के खिलाफ बगावत के लिए तैयार किया जाता है। लड़कियो का ब्रेन वॉश किया जाता है।  ज़ेहन साजि की जाती है। 

अगर आपके दिल में यह ख़याल करवट ले रहा है कि आपको 'पर्दा' (Hijab) शुरू करना चाहिए, तो यह यक़ीनन अल्लाह की तरफ़ से एक बेहतरीन तौफ़ीक़ है। लेकिन मेरी मुख़्लिसाना राय यही है कि इस सफ़र का आग़ाज़ महज़ जज़्बात की रौ में बहकर न करें, बल्कि एक पुख़्ता 'हिकमते-अमली' (Strategy) के तहत क़दम उठाएं। अकसर हम किसी रूहानी बयान, कोई मुतासिर-कुन तहरीर, या सोशल मीडिया पर कोई वीडियो क्लिप देखकर, या कभी-कभार किसी निजी हादसे के असर में आकर फ़ौरी तौर पर बड़े फ़ैसले ले लेते हैं। याद रखिए, पर्दा महज़ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक 'लाइफ़ स्टाइल' है जिसे पूरी ज़िंदगी निभाना होता है।

 जज़्बाती फ़ैसले बनाम दानिशमंदाना इस्तिकामत.

जब आप बिना सोचे-समझे, सिर्फ़ एक वक्ती जोश में आकर पर्दा शुरू करती हैं, तो अकसर वह जोश जल्दी ठंडा पड़ जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि आप ठंडे दिमाग़ से बैठें और अपनी ज़िंदगी के हालात का जायज़ा लें। यह सोचें कि पर्दा करने के दौरान आपको किन अमली दुश्वारियों का सामना करना पड़ सकता है और दूसरों को आपसे क्या तवक्को होगी। आप समाज में एक तन्हा फ़र्द नहीं हैं, आपसे बहुत से रिश्ते जुड़े हुए हैं—वालिदैन, शौहर, ससुराल और दोस्त-अहबाब। एक बेहतरीन स्ट्रेटेजी वही है जो इन तमाम रिश्तों के दरमियान तवाज़ुन (balance) रखते हुए आपको अपने रब के क़रीब ले जाए।

 पर्दे को अपनी शख़्सियत का हिस्सा बनाएं.

इस्लाम फ़ितरत का दीन है और फ़ितरत 'तदरीज' (gradual steps) पसंद करती है। अगर आपकी गुज़िश्ता ज़िंदगी ऐसी रही है कि दुपट्टा लापरवाही से कंधों पर झूलता रहा है, तो अचानक, एक ही दिन में 'डायरेक्ट' नक़ाब या हिजाब पर आ जाना एक बहुत बड़ा जंप है। इस मक़ाम पर एक लम्हे के लिए रुकें और ख़ुद से सवाल करें:
 "क्या मैं मुस्तक़िल ऐसे जी सकूंगी?"
 "कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ दिन बाद मैं इस सख़्ती से बेज़ार होकर पर्दा ही छोड़ दूं?"

बेहतर यही है कि आप पर्दे को धीरे-धीरे अपनी 'शख्सियत' (personality) का ख़ासा बनाएं। छलांग लगाकर सीधे आखिरी सीढ़ी पर पहुँचने के बजाय, पहले बुनियादी लेवल्स को अपनी सांसों की तरह ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं। ख़ुद को पर्दे के हर दर्जे का आदी करें। जब आप पहले दर्जे पर मज़बूत हो जाएंगी, तो आप देखेंगी कि अगला दर्जा तय करना आपके लिए बोझ नहीं, बल्कि ज़रूरत बन जाएगा। फिर एक वक़्त ऐसा आएगा कि अगर आप छोड़ना भी चाहें, तो पर्दा आपसे नहीं छूटेगा, वह आपकी रूह से चिमट जाएगा।

 'ज़रूरत' बनाम 'दिखावा': रूहानी सुकून 

इस्तिकामत का फल यह होता है कि पर्दा एक 'बोझ' के बजाय एक 'नागुज़ीर ज़रूरत' बन जाता है। एक वक़्त गुज़रने के बाद ऐसा महसूस होने लगता है कि मौत तो आ सकती है, लेकिन अल्लाह न करे कि वह लम्हा आए जब मैं पर्दे के बग़ैर किसी के सामने आऊं। यह वो मक़ाम है जहां 'तलब और तड़प' अल्लाह की बारगाह में क़बूलियत का दर्जा पाती है। अल्लाह से यही दुआ करनी चाहिए कि वह हमें उस लेवल की इस्तिकामत अता करे।

साथ ही, दीन में 'ग़ुलू' से बचना भी ज़रूरी है। जहां ज़रूरत हो, वहां शरीयत ने गुंजाइश रखी है। जैसे डॉक्टर से चेकअप करवाते वक़्त या शिनाख़्त (identification) के लिए चेहरा खोलना—यह सब ज़रूरत के तहत जायज़ है. इसे दीन से दूरी नहीं, बल्कि दीन की समझ कहा जाएगा।

मुआशरे और ज्वाइंट फैमिली में हिकमत.

अकसर ख़्वातीन को ज्वाइंट फैमिली या ससुराल में पर्दे को लेकर मसाइल  का सामना करना पड़ता है। अगर आप मुकम्मल पर्दा करने का इरादा रखती हैं, लेकिन हालात साज़गार नहीं हैं, तो 'फ़साद' बरपा करने के बजाय 'हिकमत' से काम लें।
दुपट्टे का सही इस्तेमाल: कोशिश करें कि दुपट्टे को फैला कर लें। अगर नक़ाब मुमकिन नहीं, तो दुपट्टे की 'बुक्कल' (बगल-गीरी/wrapping style) इस तरह मारें कि आपके चेहरे के नक़्श-ओ-निगार छुप जाएं।

सादा लिबास: पर्दे का मक़सद 'ज़ीनत' को छुपाना है, न कि पर्दे को ही ज़ीनत बना लेना। ज़रूरी नहीं कि बाक़ायदा नक़ाब पहनकर ही यह साबित किया जाए कि आप पर्दा कर रही हैं। आप अपने ओढ़ने का अंदाज़ ऐसा रख सकती हैं कि किसी को महसूस भी न हो कि आपने बाक़ायदा पर्दा शुरू कर दिया है, और आपका मक़सद भी पूरा हो जाए.
 तकब्बुर से परहेज़ और दीन की सहूलत.
एक बहुत अहम नुक्ता यह है कि पर्दा करके कभी भी अपने अंदर 'तकब्बुर'  न आने दें।
   जिसने सिर्फ़ 'सतर' (Satr) छुपाया है, वह भी पर्दे के एक लेवल पर है।
   जिसने सर पर दुपट्टा लिया है, वह भी एक दर्जे पर है।
   और जो मुकम्मल हिजाब में है, वह भी अपनी जगह है।

फ़िक्री बग़ावत के जाल और हया की हिफ़ाज़त.
 आज के दौर में 'आज़ादी' और 'हुक़ूक़-ए-निस्वां' (Women's Rights) के ख़ूबसूरत नारों में लपेटकर आपके ज़ेहन में 'दीन' और 'फ़ितरत' के ख़िलाफ़ एक ख़ामोश ज़हर घोला जा रहा है। अक्सर आपको यह कहकर उकसाया जाता है कि पर्दा 'क़ैद' है, घर 'पिंजरा' है और हया 'पिछड़ापन' है, जबकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल बरअक्स है। यह एक सोची-समझी 'ब्रेनवॉशिंग' है जिसके ज़रिए आपको यह यकीन कराया जाता है कि जो पाबंदियाँ आपकी इज़्ज़त और आबरू की मुहाफ़िज़ हैं, वही आपकी 'ग़ुलामी' की ज़ंजीरें हैं.

जब एक औरत को यह समझाया जाता है कि अपनी ज़ीनत को छुपाना उसे दुनिया से काट देता है, तो दरअसल उसे उस 'बाज़ार' में खड़ा करने की साज़िश की जा रही होती है जहाँ उसकी हैसियत एक 'इंसान' से ज़्यादा एक 'नुमाइश' की चीज़ बनकर रह जाए। यह 'ज़ेहनी ग़ुलामी'  की इंतेहा है कि औरत अपने ख़ालिक़ के हुक्म को छोड़कर उन लोगों के मयार पर अपनी ज़िंदगी ढालने लगे जो उसे सिर्फ़ एक 'दिल बहलाने का सामान' समझते हैं। याद रखिए, शैतान और उसके पैरोकारों की पहली चाल यही थी कि उन्होंने इंसान का लिबास उतरवाया था; आज भी वही चाल 'मॉडर्निटी' (modernity) के नाम पर चली जा रही है।

हिकमत का तक़ाज़ा यह है कि आप इन खोखले नारों के पीछे छुपे मक़सद को पहचानें। 
पर्दा आपको समाज से काटता नहीं, बल्कि समाज की 'गंदी नज़रों' और 'हवस' (lust) से महफ़ूज़ रखकर आपको एक बा-वक़ार मक़ाम देता है। सच्चा सुकून और आज़ादी अल्लाह की हदों को तोड़ने में नहीं, बल्कि उसकी अमान में रहने में है। अपनी अक़्ल और रूह को इन फ़रेबों से पाक रखें और अपनी हया को अपनी ताक़त समझें, न कि कमज़ोरी।

मुस्लिम शह्ज़ादियो के नाम एक पैगाम.
मेरी प्यारी बहन,
ज़रा एक पल ठहरिए और अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि आप कितनी क़ीमती हैं...
क्या आप जानती हैं? 
आप उस नायाब मोती की तरह हैं जिसे बनाने वाले ने बड़ी फ़ुर्सत और मोहब्बत से तराशा है। और मोती की क़ीमत बाज़ार में नुमाइश  बनने में नहीं, बल्कि सीप की आग़ोश में महफ़ूज़ रहने में होती है।

आज दुनिया आपको "आज़ादी" का ख़्वाब दिखाकर उस मक़ाम से नीचे उतारना चाहती है, जहाँ आपका रब आपको 'मलिका' बनाकर बिठाना चाहता है। यह जो हया की चादर है ना, यह कोई दीवार नहीं जो आपको दुनिया की रंगीनियों से रोक दे, बल्कि यह वो रेशमी ग़िलाफ़ है जो सिर्फ़ ख़ास और अनमोल चीज़ों पर ही चढ़ाया जाता है। 

दुनिया की नज़र में 'खुल जाना' शायद आज़ादी हो, लेकिन हक़ीक़त में अपनी पाकीज़गी को सिर्फ़ अपने रब और अपने महरम के लिए संजो कर रखना ही असल 'वकार' है। आप कोई आम चीज़ नहीं कि हर गुज़रने वाली नज़र आप पर उठे... आप तो वो 'रूहानी अमानत' हैं जिसका हक़ सिर्फ़ इज़्ज़त और एहतराम है।

मेरी गुज़ारिश बस इतनी है... अपनी इस क़ीमत को पहचानिए। आप ख़ूबसूरत हैं, बहुत ख़ूबसूरत! लेकिन आपकी यह ख़ूबसूरती तब और निखर जाती है जब इसमें हया की शबनम मिल जाए।
ख़ुश रहिए, महफ़ूज़ रहिए, और बा-हया रहिए!

दीन आसानियों का नाम है। मर्द फ़ितरतन अपनी बहन-बेटियों को हया में देखकर ख़ुश होते हैं। अगर आपको हिकमत से पर्दा करना और अपनी आने वाली नस्लों (टीनएजर्स बच्चियों) को करवाना आ गया, तो समझिए आप जीत गईं.

ख़ुलासा (Conclusion):
बस जीतने के लिए सही हिकमते-अमली और 'सबर' की ज़रूरत है। जज़्बात के बजाय शऊर के साथ उठाया गया क़दम ही मंज़िल तक पहुँचाता है। अल्लाह पाक हम सबको अपनी हिफ़्ज़-ओ-अमान में रखे और हया को हमारा ज़ेवर बनाए। ख़ैर होगी, इन्शाअल्लाह।

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