Javed Akhtar Shocks Stage — Liberal Brigade Left Speechless.
Mufti Shamail vs Javed Akhtar: Liberals Exposed, Restless & Rattled.
Does God Exist: Mufti Saheb vs Liberal Brigade Debate.
देसी लिबरलिज्म का मकड़जाल: एनजीओ का फंड, बॉलीवुड का नैरेटिव और इल्मी खोखलापन!
शोले के डायलॉग और मंतिक के पैमाने: जब ‘लिबेरल्स ढोंग' स्टेज पर किरची-किरची हुआ!
देसी इल्हाद की इल्मी हकीकत: जावेद अख्तर बनाम मुफ्ती शमाइल.
The high‑voltage debate between Mufti Shamail Nadwi and Javed Akhtar has left the liberal brigade visibly restless and rattled. Their discomfort was evident as the Mufti’s sharp arguments dismantled Akhtar’s points, exposing the fragile narrative of liberal circles. Social media amplified this moment, showing how liberals were unmasked and forced into defensive reactions. The clash has become a viral symbol of liberal unease, sparking heated discussions across platforms.
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| जावेद अखतर ने स्टेज पर लिबरल्स कि नाक कटवा दी. |
इनका लिबरलिज्म सिर्फ 'मजहब दुश्मनी' तक महदूद है। जहां बात अपने फायदे की आएगी, वहां ये सांप बनकर बिलों में छुप जाएंगे,और जहां कमजोर का शिकार करना होगा, वहां जहर उगलेंगे। लेकिन इस बार मुकालमे की मेज पर इनके तर्क नहीं, बल्कि इनका गुरूर टूटा है।
हमने बचपन से, और खास तौर पर जब से सोशल मीडिया ने होश संभाला है, एक ही रट सुनी है, एक ही कवायेद दोहराई गई है और एक ही ”इल्मी तकब्बुर“ का सामना किया है कि:
”मजहब तो वो मानता है जिसने किताबें न पढ़ी हों, जिसने साइंस न जानी हो, जो कुएं का मेंढक हो। हम तो मुलहिद (नास्तिक) इसलिए हुए हैं क्योंकि हमने लाइब्रेरियां छान मारी हैं, हमने कायनात के राज पा लिए हैं, और अब हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि खुदा का वजूद नहीं। “
यह जुमला हमारे देसी मुलहिदीन का ”कलमा“ और उनका सबसे बड़ा ”ब्रांड स्लोगन“ है। हमें यह यकीन दिलाया गया कि इल्हाद (Atheism) दरअसल ”इंटेलेक्चुअल एलीट“ का क्लब है जहां सिर्फ वो दाखिल हो सकता है जिसकी अक्ल आसमान को छू रही हो।
साइंसी नावाकफियत का एतराफ और इल्हाद का खोखलापन.
लेकिन फिर, हिंदुस्तान के एक स्टेज पर एक वाकिया हुआ, और इस ”इल्मी दबदबे“ का गुब्बारा इतनी जोर से फटा कि इसकी आवाज दूर-दूर तक सुनी गई।
जनाब जावेद अख्तर साहब, जो बर-ए-सगीर में इल्हाद और रोशन-ख्याली के ”गॉडफादर“ समझे जाते हैं, तशरीफ लाए। तवक्को तो ये थी कि जब ये ”दानिश का पहाड़“ बोलेगा तो इल्म के दरिया बहेंगे, क्वांटम फिजिक्स के हवाले दिए जाएंगे, और मंतिक (Logic) के ऐसे पेचीदा असूल बयान होंगे कि सामने बैठा मौलवी पसीने से शराबोर हो जाएगा। लेकिन हुआ क्या?
गुफ्तगू के आगाज में ही जावेद साहब ने बड़े मासूमियाना अंदाज में अपनी ”साइंसी नाख्वांदगी“ का एतराफ नामा पेश कर दिया।
उन्होंने फरमाया कि वो साइंस से नाबलद हैं।
यह जुमला बजाहिर तो आजिजी लगता है, लेकिन दर-हकीकत यह उस पूरे कवायेद की ”खुदकुशी“ थी जो इल्हाद ने साइंस की बुनियाद पर खड़ा कर रखा है।
अगर आप साइंस नहीं जानते, कायनात के कवानीन (Fine Tuning) नहीं समझते, डीएनए की पेचीदगी से वाकिफ नहीं, तो फिर आपने खुदा का इंकार किस बुनियाद पर किया?
क्या सिर्फ इस बुनियाद पर कि ”मुझे दुनिया में दुख और तकलीफ नजर आती है?“ यह तो जज्बातियत है, इल्म नहीं।
अक़ल का जनाजा और फिल्मी शोहरत.
असल ”ट्रेजेडी कॉमेडी“ तो तब शुरू हुई जब मंतिक (Logic) के मैदान में बात आई। मुफ्ती शमाइल ने जब खालिस मंतकी दलायल पेश किए, तो जावेद साहब का रद्दे-अमल ऐसा था जैसे कोई शायर किसी रियाजी (Maths) के पर्चे को देख रहा हो।
मंतिक का बुनियादी असूल है: ”अगर अलिफ, बे है, और बे, जीम है, तो अलिफ, जीम है“ (Syllogism)। लेकिन जावेद साहब हर मंतकी दलील का जवाब एक ”फिल्मि मुकालमे“, एक ”शायराना महफिल“ या एक ”अवामी मिसाल“ से देने की कोशिश करते रहे। वो यह भूल गए कि मुकालमा ”मुशायरा“ नहीं होता जहां ”वाह-वाह“ से बात बन जाए, और न ही यह फिल्म का ”स्क्रीनप्ले“ है जहां आप विलेन/हिरो को अपनी मर्जी का डायलॉग बोलने पर मजबूर कर सकें। वह कोइ रेख्ता कि महफिल नहि है जहाँ चाहने वाले हि होंगे और बिना किसि ना इत्तेफाक़ि के तलिया बजायेंगे.
जमालियाती इल्हाद: शोले का क्लाइमेक्स या कायनाती हकीकत?
जावेद साहब की इस परफॉर्मेंस ने एक बहुत बड़े राज से पर्दा उठा दिया है। वो राज ये है कि हमारे खित्ते का ”देसी इल्हाद“ दरअसल रसल या डॉकिन्स के दलायल पर खड़ा नहीं है, बल्कि यह ”गालिब, मनटो, अस्मत चुग्ताइ“ और ”फैज“ की शायरी व ”बॉलीवुड, बाहरि इंफ्लुएंस“ की रोमानियत पर खड़ा है।
यह ”इल्मी इल्हाद“ नहीं, यह ”जमालियाती इल्हाद“ (Aesthetic Atheism) है। इसमें ”दलील“ नहीं, सिर्फ ”अदाएं“ हैं। इन्हें खुदा से मसला नहीं, इन्हें ”मौलवी के हुलिए“ से मसला है। इन्हें कायनात की तखलीक के सवालात ने परेशान नहीं किया, बल्कि इन्हें ”मजहबी पाबंदियों“ ने तंग किया है।
इस मुकालमे ने साबित कर दिया कि ”किताबें पढ़ना“ और ”किताबें समझना“ दो अलग चीजें हैं। खुदा का इंकार या इकरार एक संजीदा तरीन कायनाती मसला है, यह ”शोले“ फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं कि जहां आप जज्बाती डायलॉग बोलकर तालियां बजवा लें। जावेद साहब ने स्टेज पर जो किया, वो मंतिक का जनाजा था जिसे उन्होंने बड़े ”तमतराक“ से उठाया।
सांपों की फितरत और बिलों से निकलता जहर: जब दलील का सामना हुआ तो 'दानिशवर' भीगी बिल्ली बन गए!
हमने अक्सर देखा है कि हमारे मुआशरे का 'कथित' लिबरल तबका बिल्कुल उन जहरीले सांपों की तरह है जो साल भर तो खामोशी से बिलों में दुबके रहते हैं, लेकिन जैसे ही मजहब की तौहीन या रिवायत पर हमले का मौका मिलता है, ये फुंकारते हुए बाहर निकल आते हैं। जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल के दरमियान होने वाले मुकालमे ने यह साफ कर दिया कि इन 'सांपों' के पास जहर तो बहुत है, मगर इनकी रीढ़ की हड्डी बिल्कुल गायब है। यह वह तबका है जो खुद को 'इंटेलेक्चुअल' कहता है, मगर हकीकत में इनकी डोरियां कहीं और से हिलती हैं।
एनजीओ का चंदा और आयातित एजेंडा: मकड़ी के जाले जैसा कमजोर वजूद.
यह देसी लिबरल तबका अंदर से इतना ही खोखला और कमजोर है जितना मकड़ी का जाला। इनका इल्हाद और इनकी रोशन-ख्याली दरअसल बाहरी फंड्स, एनजीओ के अजेंडे और बॉलीवुड के उस मखसूस नैरेटिव पर खड़ी है जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी जड़ों से नफरत सिखाना है।
इन्हें साइस या फलसफियाना गहराई से कोई लेना-देना नहीं, इनका कुल असासा (Asset) चंद अंग्रेजी इस्तलाहात और विदेशी अखबारों के कॉलम हैं। जब तक मंच इनके हक में सजा हो, ये शेर बनते हैं, लेकिन जैसे ही कोई मुफ्ती शमाइल जैसा शख्स खालिस मंतिक और दलील के साथ सामने आता है, तो इनका 'मुतालआ का बुत' ज़मिन पर बिखर जाता है।
मजहबी दुश्मनी या इल्मी बेचारगी?
जावेद साहब का स्टेज पर यह कहना कि "मैं साइंस से नाबलद हूं", दरअसल उस पूरी जमात का एतराफ-ए-शिकस्त था जो साइंस का नाम लेकर मजहब का मजाक उड़ाती है। इनकी मजहबी दुश्मनी किसी तहकीक का नतीजा नहीं, बल्कि एक खास किस्म की नफ्सियाती बीमारी है। इन्हें खुदा से उतनी तकलीफ नहीं जितनी मजहब की दी हुई अख्लाकी पाबंदियों से है। ये चाहते हैं कि मुआशरा इनकी मर्जी के मुताबिक चले, जहां कोई टोकने वाला न हो। इनका इल्हाद एक 'फैशनेबल नकाब' है जिसे पहनकर ये खुद को मॉडर्न और दूसरों को जाहिल साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं।
पहचानिए इन 'आस्तीन के सांपों' को!
अब वक्त आ गया है कि इस 'देसी लिबरल' गिरोह की असलियत को बेनकाब किया जाए। ये लोग जो बॉलीवुड के गानों और रोमानवी शायरी के पीछे छुपकर मजहब की बुनियादों पर वार करते हैं, असल में इल्मी तौर पर दिवालिया हो चुके हैं।
इनका काम सिर्फ जहर फैलाना और मुआशरे में अफरा-तफरी पैदा करना है। लेकिन याद रखिए, जिस कश्ती में ये सवार हैं, उसका पेंदा सुराखों से भरा है। ये बाहरी बैसाखियों के सहारे कब तक चलेंगे?
जावेद अख्तर साहब ने तो स्टेज पर हाथ खड़े कर दिए, अब उन छोटे प्यादों की बारी है जो अपनी प्रोफाइल पर 'Atheist' लिखकर खुद को आसमान की मखलूक समझते हैं।
जावेद अखतर ने स्टेज पर लिबरल्स कि नाक कटवा दी,लिबरल-ब्रिगेड का वार.
सोशल मीडिया का सर्कस देखिए! जावेद साहब स्टेज पर "मैं साइंस नहि जानता" बोलकर अपनी 'इल्मी पैंट' उतार चुके, लेकिन लिबरल-मुल्हिद ब्रिगेड ने न अपने 'गॉडफादर' का मुँह काला किया,न लॉजिक की लाश पर मर्सिया पढ़ा। बस! मुफ्ती शमाइल साहब पर टूट पड़े है-
मुफ्ती साहब ने तो बस नाक में चेन डालकर घुमाया - "अगर A से B, B से C, तो A से C!" - और लिबरल्स की पूरी इमारत 'धड़ाम!' गिर गई। अब ये 'ट्रोल आर्मी' मीम्स उछाल रही: "मुफ्ती का चेहरा 😂", "शमाइल का स्टाइल 😡" उसका लहजा कट्टर था, वो इस्लामिक स्टेट का एजेंट है"। लिबरल-ब्रिगेड! अपनी बहस हार गए तो 'किरदार कुशि' करोगे?
जो 'इंटेलेक्चुअल एलीट' होने का ढोंग रचते थे, वो अब 'व्हाट्सएप फॉरवर्ड' वाले बन गए। मुफ्ती साहब ने नाको चने चबवा दी, चेन काट दी,और लिबरल्स को नंगा कर दिया। अब तो बस 'ब्लॉक-रिपोर्ट-म्यूट' का सहारा! हकीकत का आईना देख ले, 'शोले' का क्लाइमेक्स खत्म हो चुका! 😂
अब वक्त आ गया है कि हमारे वो दोस्त जो साइंस और फल्सफा का नाम लेकर मजहब का मजाक उड़ाते थे, अपना नज़रिया थोपने मे कोइ कसर नहि छोड्ते थे. वो जरा अपने गिरेबान में झांकें। आपके ”आइकॉन“ ने तो हाथ खड़े कर दिए,अब आप तय करें कि आप उनके कश्ती में सवार होना चाह्ते है या नहीं? आप कब तक उनके फैन बॉय बनेंगे?
ऐ अल्लाह! पूरी उम्मत-ए-मुसलिमा को सलामती,अमान और रहमत अता फरमा।
माँ,बहन और बेटी को पर्दे की हिफ़ाज़त,हया की पाकीज़गी और ईमान की रोशनी से नवाज़ दे। उनके दिलों को सच्चाई,उनके चेहरों को नूर और उनके अमल को नेक बना।
या रब्ब! हमें गुनाहों से बचा, हमारी ज़िन्दगी को तौहीद और इबादत से रौशन कर दे। आमीन या रब्ब-उल-आलमीन।







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