The Modern Liberal’s Arsenal: Books, Mics & Silver Screens.
Liberals dropped swords—picked up screens!
Books, mics & movies: the new liberal weapons.
Forget swords/canons—liberals fight with stories, speeches & screens!
Today’s liberal doesn’t fight with steel/weapons but with ideas. Books, microphones, and silver screens have become their weapons of influence—reshaping culture, controlling narratives, and spreading ideological fitna across society.
From books to blockbusters, liberals wage war not with swords but with stories. Discover how media, microphones, and movies fuel the modern fitna of liberalism.
खबरदार! क्या आप भी मोदी विरोध के नाम पर अपना ईमान लिबरल्स के हाथों बेच रहे हैं? जानिये कैसे ध्रुव राठी और जावेद अख्तर जैसे लोग आपकी नस्लों में नास्तिकता का ज़हर घोल रहे हैं।
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| जावेद अख्तर vs मुफ्ती यासिर: इल्म की दलील के सामने क्यों फेल हुई शायराना लफ्फाज़ी? |
बंदूक एक को मारती है, नज़रिया नस्लों को! 🔫 एक तरफ संघी डंडा, दूसरी तरफ लिबरल (कुफ्रर) का मीठा ज़हर। आखिर मुसलमान कब तक दूसरों का 'वोट बैंक' और 'मोहरा' बना रहेगा?
"They no longer wield swords, but something far more powerful—ideas, voices, and screens. Today’s liberalism spreads through books, microphones and cinema, shaping minds and rewriting narratives. The battlefield isn’t the street—it’s the culture itself."
जो मुसलमान ध्रुव राठी, अशोक पांडे या कुणाल कामरा को मोदी, बिजेपि या संघ विरोधी की वजह से देखते है वे राठी को देखने के बजाए मुफ्ती साहेब का यह डिबेट देखे। मोदी योगी का विरोध एक सियासी मसला है, अगर कल को उसके समान विचारधारा वालि दूसरी पार्टी की हुकूमत होगी तो यह राठी अपनी विचारधारा के वजह से उसका समर्थन करेंगे, वे मोदी, BJP का विरोध अपने नज़रिए की वजह के करते है नाकि मुसलमानो की वजह से। यह सब नास्तिक है जो किसी भी धर्म को नही मानते. भारत मे बड़ी आबादी हिंदुओ की है इसलिए वे मोदी का विरोध करके मुसलमानो को अपने खेमे मे रख कर सेकुलर बनते है, इसी तरह पाकिसतान मे भी लेफ्ट वाले ऐसे ही करते है,वहा उलेमा को कठमुल्ला कहकर जलील करते है यह लिबरल्स वाले का BJP विरोधि करने का मतलब सियासी है नाकि वह मुसलमानो का हमदर्द। लेफ्ट हर जगह बडि आबादि और मजहब का विरोध करता है, चाहे वह किसी भी धर्म या उससे जुडा हो। क्योंके वह धर्म को अफीम मानता है।
इसलिए यह डिबेट सुने, अब राठी भी सकते मे आगया है क्योंके उसका मोदी विरोधी वाला कार्ड मुसलमान खरीदना बंद कर देंगे।
क्या लिबरलिज़्म मुसलमानों का मुहाफिज़ है?
आज के दौर में सोशल मीडिया और सियासी बहसों का बाज़ार गर्म है। भारतीय मुसलमान, जो मौजूदा हुकूमत की पॉलिसियों से खौफज़दा है, अक्सर हर उस आवाज़ को अपना मसीहा मान लेता है जो हुकूमत के खिलाफ उठती है। ध्रुव राठी (Dhruv Rathee), कुणाल कामरा (Kunal Kamra) या रवीश कुमार जैसे नाम इसी कतार में आते हैं।
मगर सवाल यह है कि क्या महज़ मोदी-योगी की मुखालिफत (opposition) करना ही मुसलमानों का हमदर्द होने की दलील है?
हाल ही में मुफ्ती शमायिल नदवि के मुनाज़रे ने जिस तरह इन 'लिबरल्स' के दोहरे रवैये की कलई खोली है, उसने एक नई बहस छेड़ दी है।
नज़रियाती कशमकश: हमदर्दी या सियासी इस्तेमाल?
यह समझना बेहद ज़रूरी है कि ध्रुव राठी या कुणाल कामरा जैसे लोग किसी मज़हब के पैरोकार नहीं हैं, बल्कि यह 'नस्तिक' (Atheist) ज़हनियत रखते हैं। इनके लिए मज़हब, कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के उस कॉल के मुताबिक, "अफीम" की तरह है। यह लोग सिर्फ BJP या किसि भि धार्मिक विचारो का विरोध करते हैं क्योंकि उनका कथित 'लिबरल और सेक्युलर' ढांचा उन्हें इसकी इजाज़त देता है।
मुफ्ती साहेब का वह डिबेट और चैलेंज इस बात का सबूत है कि जब बात इस्लाम के बुनियादी अकाइद (Beliefs) की आती है—जैसे खुदा का वजूद—तो यह लिबरल्स अपनी असली जगह पर आ जाते हैं. राठी और कामरा का विरोध 'इस्लाम की मोहब्बत' में नहीं, बल्कि अपनी 'लेफ्टिस्ट आइडियोलॉजी' को बचाने के लिए है। अगर कल को हुकूमत बदल जाए, तो यही लोग अपनी उसी विचारधारा के तहत किसी भी मज़हबी हुकूमत के खिलाफ खड़े होंगे।
शरहद पार का मंज़र: पाकिस्तान के लिबरल्स का हाल.
जो लोग यह समझते हैं कि लिबरल्स या लेफ्टिस्ट (Leftists) सिर्फ भारत में मुसलमानों के साथ हैं, उन्हें पाकिस्तान के हालात पर नज़र डालनी चाहिए। वहां परवेज़ हुदभोय,आसमा सिराजि और नदीम एफ. पराचा (Nadeem F. Paracha) जैसे मशहूर लिबरल इंटेलेक्चुअल्स (Intellectuals) का रवैया देखें। पाकिस्तान में तो कोई मोदी या योगी नहीं है, फिर वहां यह तबका किसके खिलाफ है? वहा यह नज़रियाति तबका और फिक्रि गिरोह क्या कर रहा है?
वहां ये लिबरल्स उलेमा-ए-कराम और मदरसों को निशाना बनाते हैं, उन्हें 'कठमुल्ला' कहकर जलील करते हैं और इस्लाम को तरक्की की राह में रुकावट बताते हैं।
यह साबित करता है कि 'लेफ्ट' (Left) की लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि मज़हब (Religion) के उस उसूल से है जो इंसान को खुदा से जोड़ता है। भारत में वे मोदी का विरोध करके मुसलमानों को अपने 'खेमे' (Camp) में रखते हैं ताकि उनकी सेक्युलर दुकान चलती रहे.
ध्रुव राठी का 'एंटी-मोदी कार्ड' और खौफ.
मुफ्ती शमायिल नदवि और दीगर संजीदा उलेमा ने जब से इन लिबरल्स के अकीदे (Faith) पर सवाल उठाए हैं, राठी जैसे यू-ट्यूबर्स (YouTubers) सकते में हैं। उन्हें डर है कि अगर मुसलमान यह समझ गया कि "हमारा और इनका रास्ता अलग है", तो उनका सबसे बड़ा 'व्यूअर बेस' (Viewer Base) हाथ से निकल जाएगा। उनका 'मोदी विरोधी कार्ड' अब एक्सपायर होने की कगार पर है क्योंकि मुसलमान अब यह समझने लगा है कि सियासी मुखालिफत एक अलग चीज़ है और अक़ीदे का समझौता एक अलग चीज़।
सियासी मुखालिफत बनाम नज़रियाती यलगार: संघ और लिबरल्स का फर्क.
मुसलमानों के लिए आज का दौर 'दो पाटों के बीच पिसने' जैसा है। एक तरफ संघ (Sangh/BJP) की 'भगवा सियासत' है और दूसरी तरफ 'लिबरल्स' (Liberals) की 'मीठी छुरी'। मगर इन दोनों में फर्क ज़मीन और आसमान का है। एक आपके 'वजूद' (existence) का दुश्मन है तो दूसरा आपके 'अकीदे' (faith) का। और याद रहे, जान का जाना ईमान के जाने से बहुत छोटा नुकसान है।
संघ/बीजेपी: एक खुला सियासी हरीफ. (Political Adversary)
बीजेपी या संघ परिवार का मामला बिल्कुल साफ और शफ्फ है। वे जो हैं, वही दिखते हैं। उनकी दुश्मनी 'सियासी' (Political) और 'तहज़ीबी' (Cultural) गलबा हासिल करने की है। वे चाहते हैं कि भारत पर उनकी सियासी पकड़ मजबूत हो।
नुकसान की हद: उनका हमला आपकी मस्जिदों पर हो सकता है, आपके खान-पान पर हो सकता है, या आपकी नागरिकता (citizenship) पर। यह सब यकीनन तकलीफदेह है, मगर यह 'ज़ाहिरी' (external) है।
ईमान पर असर: कोई भी संघी आपको यह नहीं कहेगा कि "कुरान में यह आयत गलत है" या "इस्लाम के फलां उसूल को बदल दो"। वे आपको 'दबाना' चाहते हैं, 'बदलना' नहीं। उनका डर दिखाकर कोई आपका ईमान नहीं छीन सकता। बल्कि तारीख गवाह है कि जब-जब ज़ाहिरी जुल्म बढ़ता है, मुसलमान अपने दीन से और मजबूती से चिपक जाता है।
लिबरल्स/ इलहाद: ईमान और अकीदे के 'बातिनी' दुश्मन.
असल खतरा यहां है। लिबरल्स का मसला सियासत से ज्यादा 'नज़रिए' (Ideology) का है। यह वो गिरोह है जो आपको बीजेपी के डर का इंजेक्शन लगाकर अपनी गोद में बिठाता है, और फिर धीरे-धीरे आपके दिमाग से 'इस्लाम' निकालकर उसमें 'लिबरलिज़्म' का कचरा भरता है।
1. डर का कारोबार (The Business of Fear):
लिबरल्स की पूरी दुकान 'मोदी के खौफ' पर चलती है। वे मुसलमानों को यकीन दिलाते हैं कि "अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी, हमारी हां में हां नहीं मिलाई, तो तुम फासीवाद (Fascism) के शिकार हो जाओगे।" यह एक ब्लैकमेलिंग है। वे कहते हैं, "हम तुम्हें मोदी से बचाएंगे, बदले में तुम्हें हमारे 'उसूल' मानने होंगे।"
2. ज़हनी गुलामी और अंधी तकलीद:
लिबरल्स चाहते हैं कि मुसलमान नमाज तो पढ़े, मगर जब बात 'समलैंगिकता' (LGBTQ) का वो रूप जो हया के खिलाफ हो), या 'खुदा के वजूद' की आए, तो मुसलमान वही बोले जो लिबरल आका चाहते हैं।
वे मुसल्मानो को समझाते हैं कि मज़हब एक 'निजी' (Private) मामला है, इसे घर में रखो। वे चाहते हैं कि आप दिखने में मुसलमान रहें, मगर सोचने में 'नास्तिक' (Atheist) हो जाएं। यह फिक्री पस्ती (Intellectual Degradation) है।
3. मीठा ज़हर:
बीजेपी अगर कड़वी गोली है, तो लिबरलिज़्म 'शहद में लिपटा ज़हर' है। लिबरल्स आपके अकीदे पर वहां हमला करते हैं जहां आपको महसूस भी नहीं होता। वे कहते हैं, "देखो हम तुम्हारे हक के लिए लड़ रहे हैं," और इसी आड़ में वे आपके बच्चों को यह सिखा जाते हैं कि "शराब पीना, लिव-इन में रहना या मज़हब का मज़ाक उड़ाना 'आज़ादी' है।"
सियासत बनाम अकीदा.
इस फर्क को एक जुमले में यूं समझिए:
"संघी चाहता है कि मुसलमान भारत में 'दोयम दर्जे' (Second Class) का शहरी बनकर रहे, लेकिन लिबरल चाहता है कि मुसलमान इस्लाम छोड़कर 'ज़हनी तौर पर' उनका गुलाम बन जाए।"
संघी आपकी 'पहचान' (Identity) को मिटाना चाहता है, जबकि लिबरल आपके 'ईमान' (Faith) को मिटाना चाहता है।
मुसलमानों को यह समझना होगा कि मोदी का विरोध करने के लिए अपना ईमान लिबरल्स के कदमों में रखने की ज़रूरत नहीं है। हम बीजेपी की सियासी मुखालिफत करेंगे क्योंकि यह हमारा हक है,लेकिन इसके लिए हम उन लिबरल्स या वामपंथियों (Leftists) को अपना रहनुमा नहीं बनाएंगे जो खुद खुदा के बागी हैं।
लिबरल्स की हमदर्दी एक सियासी चाल है। वे आपको 'वोट बैंक' और 'भीड़' से ज्यादा कुछ नहीं समझते। जिस दिन आप अपने दीन पर मजबूती से खड़े होकर लिबरल आइडियोलॉजी को ठुकरा देंगे, उस दिन आप देखेंगे कि ये 'सेक्युलर' दोस्त भी आपके खिलाफ वही ज़बान बोलेंगे जो आज संघि गिरोह बोलते हैं।
एक संघी आपको 'जय श्री राम' कहने पर मजबूर कर सकता है, मगर वह आपको यह यकीन नहीं दिला सकता कि (नऊज़ुबिल्लाह) "खुदा का वजूद नहीं है।" यह काम लिबरल करता है। जावेद अख्तर जैसे लोग आपके दिल में शक के बीज बोते हैं। वे कहते हैं, "तुम जाहिल हो, मज़हब अफीम है, तरक्की के लिए दीन को छोड़ना होगा।"
लिबरल्स का आलमी नेटवर्क (International Network)
यह कोई अकेला जावेद अख्तर नहीं है। यह एक पूरा आलमी नेटवर्क है। अमरीका से लेकर यूरोप तक, अरबों डॉलर की फंडिंग इसी एजेंडे पर खर्च होती है कि मुसलमानों को उनके दीन से बेगाना कर दिया जाए। यह नेटवर्क इन तरीकों से काम करता है:
NGOs और मीडिया: ये इदारों को फंड करते हैं जो 'आज़ादी' और 'मानवाधिकार' के नाम पर इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगेंडा करते हैं।
शकोक-ओ-शुबहात फैलाना (Spreading Doubts): ये आपके नबी की शान में गुस्ताखी करेंगे, कुरान पर सवाल उठाएंगे और फिर कहेंगे, "हम तो सिर्फ सवाल पूछ रहे हैं।"
अंदरूनी दुश्मन पैदा करना: ये मुसलमानों के बीच से ही कुछ 'मुनाफिक़' और 'मुल्लहिद' चेहरे तैयार करते हैं जो इन्हीं की ज़बान बोलते हैं, ताकि मुस्लिम नौजवान गुमराह हों।
फिक्री यलगार: एटम बम से ज्यादा मोहलिक (Lethal) हथियार
दुनिया में हथियारों की दौड़ लगी है, मगर सबसे खतरनाक जंग वह नहीं जो सरहदों पर लड़ी जाती है, बल्कि वह है जो इंसानी ज़हनों (Minds) के अंदर लड़ी जाती है। जैसा कि- एक बंदूक की गोली की हद मुकर्रर है—वह एक वक्त में सिर्फ एक शख्स को मार सकती है। उसका दायरा एक जिस्म तक महदूद है। मगर एक 'नज़रिया' (Ideology) वह हथियार है जो एक साथ लाखों को कत्ल करता है और यह कत्ल सिर्फ जिस्मों का नहीं, बल्कि रूहों का होता है।
1. बंदूक बनाम नज़रिया: नुकसान का पैमाना
जब किसी को गोली मारी जाती है, तो वह मर जाता है। अगर वह हक पर था, तो उसे शहादत मिल गई। उसका नुकसान सिर्फ दुनिया का हुआ, आखिरत (Hereafter) महफूज है। लेकिन जब किसी के दिमाग में एक 'गलत नज़रिया' डाल दिया जाता है, तो वह जिंदा लाश बन जाता है।
लिबरल्स का दिया हुआ 'नास्तिकता' (Atheism) और 'बे-दीनी' का नज़रिया उस शख्स की दुनिया भी बर्बाद करता है और आखिरत भी। सबसे खौफनाक बात यह है कि बंदूक से मरने वाला अपने साथ अपनी मौत ले जाता है, लेकिन गलत नज़रिए से मरने वाला अपने पीछे अपनी 'नस्लों' (Generations) को भी उसी गुमराही में धकेल जाता है। यह एक ऐसा जहर है जो बाप से बेटे और बेटे से पोते तक सफर करता है।
2. लिबरलिज़्म: परमाणु बम से ज्यादा खतरनाक
परमाणु बम (Nuclear Bomb) एक शहर को तबाह करता है, उसका असर दशकों तक रहता है। लेकिन 'लिबरल आइडियोलॉजी' तहज़ीबों (Civilizations) को तबाह करती है और उसका असर सदियों तक रहता है।
संघी या दक्षिणपंथी ताकतें आपके जिस्म या आपकी मस्जिद को निशाना बना सकती हैं, जो कि एक 'माद्दी' (Physical) नुकसान है। लेकिन लिबरल्स का यह इंटरनेशनल नेटवर्क आपके 'यकीन' (Belief) पर हमला करता है। वे तालिम (Education), मीडिया और फिल्मों के जरिए धीमे जहर की तरह यह बात फैलाते हैं कि "मज़हब अक्ल का दुश्मन है" या "आज़ादी का मतलब हर हराम काम करना है".
3. ज़हनी गुलामी का 'सॉफ्ट वार'
आज का लिबरल हाथ में तलवार लेकर नहीं आता। वह हाथ में 'किताब', 'माइक' और 'सिल्वर स्क्रीन' लेकर आता है।
नस्लों में सफर: एक बार जब किसी नौजवान के दिमाग में यह बात बैठ गई कि "कुरान पुराने ज़माने की बात है" (नऊज़ुबिल्लाह), तो उसकी आने वाली सात पुश्तें इस्लाम से दूर हो जाती हैं।
एक जिस्मानी कातिल (Physical Killer) आपकी नस्ल खत्म कर सकता है, लेकिन एक फिक्री कातिल (Ideological Killer) आपकी नस्ल को 'मुर्तद' (Apostate) बना देता है।
मीठा हमला: यह हमला इतना बारीक होता है कि शिकार को पता ही नहीं चलता कि वह शिकार हो रहा है। वह समझता है कि वह 'मॉडर्न' हो रहा है, जबकि असल में वह अपनी जड़ों से कटकर 'ज़हनी गुलाम' बन रहा होता है।
आगाज या अंजाम?
यह समझना लाज़िम है कि मुसलमानों के लिए असली खतरा वह नहीं है जो डंडा/बंदुक लेकर सामने खड़ा है, बल्कि वह है जो मुस्कुराहट के साथ आपके ड्राइंग रूम में टीवी और मोबाइल के जरिए बैठा है। एक बंदूकधारी से बचना आसान है, आप छुप सकते हैं या मुकाबला कर सकते हैं। लेकिन उस 'फिक्री वायरस' से बचना बहुत मुश्किल है जो हवा में घुला हुआ है।
लिबरल्स की यह 'फिक्री जंग' (Ideological War) दरअसल शैतानी मिशन का ज़दिद शक्ल है। हमें अपने बच्चों को सिर्फ पुलिस और फौज के डंडे से नहीं, बल्कि इन लिबरल्स के 'लफ्ज़ों के जाल' से बचाना है। क्योंकि जो कौम अपना नज़रिया खो देती है, तारीख गवाह है कि वह नक्शे से भी मिट जाती है।
हकीकी रहनुमा कौन?
आज का मुसलमान एक अजब दोराहे पर खड़ा है। जहाँ एक तरफ ज़ाहिरी दुश्मन का खौफ है, वहीं दूसरी तरफ 'लिबरलिज़्म' के रूप में एक बातिनी (छुपा हुआ) खतरा है।
मुसलमानों को चाहिए कि वे अपनी सियासी और फिक्री रहनुमाई के लिए उन लोगों की तरफ देखें जो उनकी जड़ों से जुड़े हैं। उलेमा, जैसे मुफ्ती यासिर नदीम, जो न सिर्फ ज़दीद (Modern) और कदीम (Traditional) उलूम पर दस्तरस रखते हैं, बल्कि जो 'लॉजिक' और 'दलील' के साथ बात करते हैं, वही असली मॉडल हो सकते हैं।
एक नास्तिक (Atheist) या लिबरल, चाहे वह कितना ही मीठा बोले, आखिरकार वह आपकी दीनि शिनाख्त को मिटाकर आपको एक 'बे-दीन' इलहाद ढांचे में ढालना चाहता है। मोदी का विरोध करना एक सियासी ज़रूरत हो सकती है, लेकिन इसके लिए अपने ईमान और अक्ल को मुल्लहिद के हवाले कर देना, एक बहुत बड़ी फिक्री गुमराही है।
संघी आपकी 'ज़मीन' और 'वजूद' का दुश्मन है, जबकि लिबरल आपके 'ईमान' और 'पहचान' का सौदागर है। मुफ्ती यासिर नदीम अल वाजिदी जैसी आवाज़ों ने इस फरेब का पर्दा फाश कर दिया है। अपनी सियासी जंग लड़िए, मगर अपना ईमान और ज़हन उन लोगों के हवाले मत कीजिए जो खुदा और उसके रसूल के बागी हैं। खौफ की बुनियाद पर की गई 'अंधी तकलीद' हमें ज़हनी गुलामी की अंधेरी खाइयों में धकेल देगी। अपनी जड़ों की तरफ लौटिए और अकीदे की हिफाज़त को अपनी पहली तरजीह (priority) बनाइए।
जावेद अख़्तर का ज़हर संघि से ज़्यादा खतरनाक इसलिए है क्योंकि डंडे का ज़ख्म भर जाता है,मगर ज़हन में भरा हुआ ज़हर नस्लों को तबाह कर देता है। लिबरल्स आपको सियासी दुश्मन का डर दिखाकर आपकी रूह छीन लेना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि आप एक ऐसे जिस्म बनकर रह जाएं जिसमें ईमान की जान न हो।
इसलिए, सियासी लड़ाई अपनी जगह, लेकिन अपनी नस्लों को बचाने के लिए इस फिक्री और नज़रियाती हमले से होशियार रहना आज का सबसे बड़ा जिहाद है।
ऐ रब्बे-ज़ुल-जलाल! ऐ दिलों के फेरने वाले और ईमान की हिफाज़त फरमाने वाले परवरदिगार! आज उम्मत-ए-मुस्लिमा उस दौर से गुज़र रही है जहाँ ईमान को हाथ में रखना दहकते अंगारे को पकड़ने के मानिंद हो गया है। मौला, हम पर रहम फरमा।
ऐ अल्लाह! हमें इन ज़दीद दौर के 'लिबरल' और 'देहरिया' (Atheist) फितनों से महफूज़ रख, जो अक्ल और आज़ादी के नाम पर हमारे सीनों से ईमान की मिठास चुराने के दरपे हैं। हमारी नस्लों के ज़हनों में जो शक और बे-दीनी के बीज बोए जा रहे हैं, अपनी कुदरत से उन्हें जड़ से मिटा दे। ऐ बारी-तआला! हमें ज़हनी गुलामी और अंधी तकलीद के अंधेरे रास्तों से निकालकर हकीकी इल्म और बसीरत के नूर से सरफ़राज़ फरमा।
ऐ पाक परवरदिगार! उम्मत की मांओं, बहनों और बेटियों की हिफाज़त फरमा। उन्हें हज़रत फातिमा-तुज़-ज़हरा (रज़ी.) की हया और हज़रत आयशा (रज़ी.) के इल्म का वारिस बना। आज के इस 'फहाशी' और 'बे-पर्दगी' के सैलाब में उन्हें हया की ढाल अता कर। उनके दिलों में पर्दे की अज़मत और पाकीज़गी की तड़प पैदा फरमा, ताकि वे ज़दीदियत के नाम पर अपनी अज़मत का सौदा न करें।
या रब! हमें और हमारी आने वाली नस्लों को उन फितनों से बचा जो 'हमदर्दी' का लिबादा ओढ़कर हमें हमारे दीन से बेगाना करना चाहते हैं। हमें हकीकी मसीहा और इमान ओ अक़ीदे के सौदागरो के बीच फर्क करने की सिफत अता कर। ऐ अल्लाह! हमें दोबारा ज़मीन पर एक बावकार और ईमान वाला मुकाम अता फरमा। आमीन, सुम्मा आमीन।







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