इंसानियत का असली अलमिया—आबादी का गिरना, और घरों का सूना होना
हम आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां:
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जापान में स्कूल बंद हो रहे हैं
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कोरिया में क्रैडल्स खाली पड़े हैं
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यूरोप बूढ़ों के महाद्वीप में तब्दील हो रहा है
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चीन में जन्मदर 70 साल के निचले स्तर पर है
ये महज़ आंकड़े नहीं.
ये उस इंसानी सभ्यता की सांसें हैं जो टूट रही है।
इंसानियत का असली अलमिया सिर्फ़ जंग, भूख या नफ़रत नहीं—बल्कि धीरे-धीरे घटती आबादी, ख़ाली होते घर, और वक़्त से पहले बूढ़ा होता समाज है। आज दुनिया के कई मुल्क—खासतौर पर यूरोप, जापान, साउथ कोरिया और चीन—एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ लोग अमीरी तक पहुँचने से पहले ही बूढ़े हो रहे हैं, जबकि अगली नस्ल पैदा होने से क़तराती जा रही है।
लाइफ़स्टाइल, करियर-रेस, महंगाई, तनहाई, रिश्तों की कमज़ोरी और बच्चे पालने का भारी ख़र्च—इन सब ने मिलकर नई पीढ़ी को शादी और औलाद दोनों से दूर कर दिया है।
दूसरी तरफ़ दुनिया में रिश्तों के मायने बदल रहे हैं, और कई समाजिक रुझान—जैसे कि खानदानी ढांचे से हटकर जीना, या वो लाइफ़स्टाइल अपनाना जिसमें औलाद का हिस्सा कम या न के बराबर होता है—इन मुल्कों की पहले से गिरती आबादी को और भी तेज़ी से नीचे धकेल रहे हैं।
(यहाँ किसी भी इंसानी हक़ या रुझान की नफ़ी नहीं—बल्कि डेमोग्राफिक हक़ीक़त का तटस्थ बयान है।)
यूरोप और दूसरी तरक़्क़ी याफ़्ता दुनिया के पॉलिसी मेकर्स की सबसे बड़ी टेंशन यही है कि आने वाले 20–30 सालों में:
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नौजवान कम और बूढ़े बहुत ज़्यादा होंगे
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काम करने वाले हाथों की कमी बढ़ेगी
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टैक्स देने वाले कम और सरकारी सहारे पर रहने वाले ज़्यादा हो जाएंगे
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फ़ौजी, मेडिकल और टेक्निकल फ़ील्ड में वर्कफ़ोर्स का संकट पैदा होगा
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और सबसे बड़ा डर: ख़ानदानी ढाँचा टूट जाने से समाज की बुनियाद कमज़ोर पड़ जाएगी
दुनिया के कई मुल्क आज अरबों डॉलर सिर्फ़ इसी बात पर लगा रहे हैं कि लोग शादी करें, बच्चे पैदा करें, और घरों में फिर से रौनक लौट आए।
इंसानियत का यह अलमिया खामोश है—लेकिन तेज़ी से बढ़ रहा है:
घर बड़े होते जा रहे हैं, और उनमें रहने वाले लोग कम।
सड़कों पर रौनक बढ़ रही है, लेकिन ख़ानदानों में आवाज़ें घट रही हैं।
इंसान अमीर हो रहा है… मगर अकेला भी।
यही वजह है कि आज दुनिया यह सोचने पर मजबूर है:
अगर इंसानी नस्ल ही कम होती चली गई—तो तरक़्क़ी, टेक्नोलॉजी और अमीरी का फ़ायदा किसे होगा?
तो सवाल है के क्या यूरोप ने वाक़ई अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है?
ये सवाल सिर्फ़ किसी बाहरी तन्क़ीद का नहीं—बल्कि बहुत-से यूरोपीय स्कॉलर्स, डेमोग्राफर्स और सोशल थिंकर्स का अपना अन्दरूनी ऐतराफ़ है।
यूरोप ने सदियों की जंगों और तबाही के बाद एक आज़ाद, फ़लाही और इंसान-परस्त समाज बनाने की कोशिश की मगर वक़्त के साथ हद से बढ़ा हुआ इंडिविजुअलिज़्म, बे-लगाम लिबरलिज़्म, और बतमिजि, बेहयायि को “फ़्रीडम” का नाम देकर जिस तरह अपनाया गया… उसने समाज की रूह से ले कर ख़ानदान की बुनियाद तक हर चीज़ को कमज़ोर कर दिया।
हद से ज़्यादा इंडिविजुअलिज़्म—रिश्तों का बोझ या ज़िम्मेदारी?
यूरोप ने फ़र्द को इतनी तरजीह दी कि रिश्ते, ख़ानदान और औलाद—सब “चॉइस” बनकर रह गए।
नतीजा:
लोग शादी से भाग रहे हैं.
बच्चे पालना एक बोझ समझा जा रहा है.
नस्ल बढ़ना एक समाजिक अहमियत नहीं—बल्कि एक “निजी प्रॉब्लम” बन गई है.
इंसान आज़ाद हुआ—मगर तन्हा भी।
बे-तरतीब लिबरलिज़्म—जहाँ हदें टूटें और मायने धुँधले पड़ जाएँ
लिबरलिज़्म ने दीं—हक़ूक़, इज़्ज़त, बराबरी।
लेकिन जब हर हद को “रेस्ट्रिक्शन” और हर क़ीमती रिवायत को “पुरानी बात” कहकर तोड़ा गया…
तो समाज का ताना-बाना ही उधड़ने लगा।
जो चीज़ें इंसानियत को सँभालती थीं—
वफ़ादारी, जिम्मेदारी, क़ुर्बानी, शर्म-ओ-हया, पारिवारिक मज़बूती.
उन्हें एक-एक कर के “पुरानी सोच” में फेंक दिया गया।
बेहयाई और सेक्स की बाजारियत—आज़ादी या तिजारत?
यूरोप में सेक्स इंडस्ट्री, पोर्न, मुफ़्त मिक्स-कल्चर, और रिश्तों की बदलती कैटेगोरीज़ ने एक ऐसा माहौल बना दिया जिसके नैतिक और मानसिक असर अब खुद यूरोप में बहस का विषय हैं।
जवानी का मज़ा सब चाहते हैं—मगर ज़िम्मेदारी कोई नहीं।
लतें बढ़ रही हैं, रिश्ते टूट रहे हैं, और बच्चे… पैदा ही नहीं हो रहे।
यूरोपीय पॉलिसी-मेकर्स का बेशक़ीनी से भरा डर.
आज यूरोपीय सरकारें खुद मान रही हैं कि:
आबादी खतरनाक हद तक गिर रही है.
नौजवान कम, बुज़ुर्ग ज़्यादा हो रहे हैं
इमिग्रेशन के बग़ैर अर्थव्यवस्था चलाना नामुमकिन हो गया है.
खानदान टूट चुका है, और समाज में अपनापन घट रहा है.
कई यूरोपीय थिंक टैंक साफ़ कहते हैं: “हमने फ़्रीडम तो पा ली… लेकिन समाज खो दिया।”
असल मुद्दा—तरक़्क़ी इंसानियत को बचाए, मिटाए नहीं
आज़ादी अच्छी है…
लेकिन जब आज़ादी इंसान को रिश्तों से काट दे,
जब फ़्रीडम इंसान को वफ़ादारी से डराए,
जब मॉडर्निज़्म इंसानियत से मोहब्बत ही छीन ले…
तो वह समाज आगे नहीं बढ़ता—अन्दर से खोखला हो जाता है।
यूरोप ने गलती की या नहीं—ये बहस अलग है,
मगर यह सच है कि: जो समाज सिर्फ़ फ़र्द (Individualism) की आज़ादी पर खड़ा हो, मगर ख़ानदान की मज़बूती पर नहीं—वह लम्बे वक़्त तक स्थिर नहीं रह सकता।
यह दुनिया के लिए भी एक सबक है: तरक़्क़ी ज़रूरी है—
लेकिन इंसानियत, हया, रिश्ता, और ख़ानदान उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं।
अगर ये खो जाएँ- तो फिर समाज बचेगा ही किसके लिए?
वो दौर जब मर्द अकेला कमाता था, और ममता फलती-फूलती थी.
गरीबी थी… मगर बांझपन नहीं था.
हमारे दादा–परदादा के दौर में:
मर्द कमाता था, औरत पालती थी।
दोनों की जिम्मेदारियाँ वज़ाहत के साथ तय थीं।
और इसी तालमेल की वजह से:
✔ घर भी आबाद
✔ बच्चे भी खुशहाल
✔ और समाज भी मजबूत
फिर आया वो इंकलाब जिसने दुनिया की दिशा बदल दी
"फ़ेमिनिज़्म ने औरत से कहा — “कमाई तुम्हारी आज़ादी है”
वो आवाज़ उठी:
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"घर गुलामी है"
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"बच्चा बोझ है"
"मातृत्व पिछड़ापन है"
"कमाना ताक़त है"
औरत को दफ्तर की चकाचौंध दिखाई गई,
मगर उन इमारतों के भीतर का दमघोंटू सच छुपा लिया गया।
जब औरत ने खुद कमाई की तो एक सख्त हकीकत सामने आई
वो समझ गई कि:
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तनख्वाह पाना आसान नहीं
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इज्ज़त के साथ नौकरी मिलना मुश्किल
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बॉस की झिड़कियाँ पेट काटकर सहनी पड़ती हैं
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कमाई के लिए अपने अरमान कुर्बान करने पड़ते हैं
अब गुलामी किसकी थी… और आज़ादी किसकी?
सच्चाई ने उसका पीछा कर लिया।
यहीं से कहानी पलटती है।
"आधुनिक औरत का फैसला — “बच्चे पैदा ही नहीं करने!”
औरत ने जब दफ्तर का बोझ महसूस किया तो:
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पहले अपने शौक छोड़े
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फिर रिश्ते छोड़े
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और अंत में…
मातृत्व छोड़ दिया
यानी कि पहले नंबर पर क़ुर्बानी बच्चे की।
क्यों?
✔ बच्चा वक्त मांगता है
✔ बच्चा ऊर्जा मांगता है
✔ बच्चा करियर रोकता है
✔ बच्चा आज़ादी सीमित करता है
फिर आधुनिक (Liberal, Modern, Empowered, Educated) औरत ने हिसाब लगाया—
कमाई vs ममता
और कमाई जीत गई।
यहीं से शुरू हुआ Demographic Suicide।
क्या ममता वाकई जब्ली (Biological) है? या मर्द की जिम्मेदारी ने उसे ज़िंदा रखा था?
“माय बॉडी माय चॉइस” का असली मतलब
आज की औरत लड़ रही है:
अगर ममता इतनी ही फितरी होती,
तो क्या औरत अपने ही बच्चे को मिटाने के “हक़” के लिए अदालतों में जाती?
क्योंकि जब दोनों कमाते हैं, तो दोनों को बच्चों का बोझ "घाटा" लगता है।
और अब उस "ममता" के मिथक पर भी रोशनी डाल लें—
अगर ममता इतनी ही जब्ली, इतनी ही तेज़, इतनी ही अटूट होती, तो आधुनिक औरत "अबॉर्शन राइट्स" के लिए अदालतों में क्यों लड़ रही है?
"माय बॉडी माय चॉइस" का मतलब क्या है?
ये दरअसल एक बगावत है? ममता के खिलाफ।
ये एलान है कि औरत के लिए उसका करियर, उसकी आज़ादी, उसकी सुंदरता— उस अजन्मे बच्चे से ज्यादा अहम है।
अगर ममता जैविक रूप से इतनी जबर्दस्त होती,
तो कोई औरत अपने ही बच्चे को खत्म करने के "हक" के लिए न लड़ती।
सच यही है:
औरत के अंदर की "माँ" को ज़िंदा रखने वाला असल में मर्द का साया था।
वो कहता था:
"तुम सिर्फ बच्चे को जन्म दो… उसका खर्च, उसकी छत, उसका भविष्य मेरी जिम्मेदारी है।"
जैसे ही ये साया हटा— ममता बुझने लगी।
उसकी जगह एक "कैलकुलेटेड बिज़नेस-वुमन" पैदा हुई,
जो फ़ैसला करती है कि बच्चा एक नुकसान वाला सौदा है।
असल हकीकत — मर्द की कमाई ही औरत की ममता का सहारा थी.
जब मर्द कहता था:
“तुम बच्चे को जन्म दो, उसकी रोटी मेरी जिम्मेदारी।” तो औरत का दिल भी ममता से भर जाता था।
मगर जैसे ही कहा गया कि: “तुम कमाओ, तुम खिलाओ, तुम निभाओ।” सबसे पहले खत्म हुई ममता।
क्या असल में मर्द ही इंसानियत का असली खामोश मुहाफ़िज़ है?
ये सवाल चुभने वाला है? मगर जवाब वही है जो आंकड़े बताते हैं।
अगर मर्द पहले ही कह देता— “मैं क्यों कमाऊं?
तो:
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पाँच बच्चों का घर नहीं बनता
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दुनिया आधी आबादी से भी कम रह जाती
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सभ्यताएँ मिट जातीं
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इंसानियत का सिलसिला टूट जाता
दरअसल, मर्द की ख़ामोशी अक्सर उसके बोझों, ज़िम्मेदारियों और एहसासात का आईना होती है। वह बहुत कुछ सहकर भी कम ही कहता है। घर, रिश्तों और समाज की सुरक्षा के लिए वह चुपचाप कंधे आगे करता है। उसकी यह ख़ामोशियाँ कभी कमज़ोरी नहीं होतीं—यह उसके सब्र, वफ़ादारी और फ़ितरी हिम्मत का सुबूत होती हैं।
मगर याद रहे… इंसानियत की हिफ़ाज़त किसी एक gender की नहीं—ये दोनों की साझी ज़िम्मेदारी है। मर्द का हिस्सा बस इतना है कि वह बिना शोर किए अपना फ़र्ज़ निभाता चला जाता है.
क्योंकि औरत जितना जल्दी बोझ छोड़ देती है, मर्द उतना ही ज्यादा बोझ उठाता है।
आज का दुनिया-भर का अलार्म — Birth Rate जमीन में धंस रही है.
ये इंसानियत की धीमी मौत है।
इस्लाह और हिदायत — हल क्या है?
फितरत के खिलाफ जंग बंद हो
औरत और मर्द दोनों अपनी-अपनी फितरी जिम्मेदारियों को समझें।
मर्द की जिम्मेदारी को "ज़ालिमाना" कहना बंद हो.
वही जिम्मेदारी तो है जिसने दुनिया को आबाद रखा।
ममता, घर और बच्चों की अहमियत फिर से समझी जाए.
क्योंकि समाज की मजबूती दौलत से नहीं—अगली नस्ल से होती है।
परिवार को फिर से इज़्ज़त और तरजीह दी जाए.
खुशहाल घर ही खुशहाल समाज की नींव है।
"Birth Rate Crisis के पीछे असल वजहें"
"Family System पर नजरिया"
"DINK Culture का मनोवैज्ञानिक"
"Gender Roles की फितरी हकीकत"
लिबेरलिज्म, आर्थिक दबाव और बदलते gender roles के कारण दुनिया “Demographic Suicide” का सामना कर रही है। जब औरत कमाने लगी तो मातृत्व बोझ लगा, जन्मदर गिर गई, और समाज वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि मर्द की कमाई और जिम्मेदारी ने ही औरत की ममता को सहारा दिया था। आज का असली हल फितरी किरदारों की वापसी और परिवार की अहमियत को पुनर्जीवित करना है।
आखिरकार—दुनिया को फिर वही खामोश मजदूर बचाएगा, जिसे मर्द कहा जाता है.
अगर इंसानियत को उजड़ने से बचाना है,
तो इसी मर्द की जिम्मेदारियों को फिर से समझना होगा,
और औरत को उसकी फितरी नेमत—ममता—की इज़्ज़त देनी होगी।
वरना दुनिया की आबादी किताबों में रह जाएगी…और घरों में सिर्फ़ खामोशी।
आखिर में अलामा इक़बाल के उस पैग़ाम से सबक लेते है.
यूरोप की चमक-दमक, उसकी तरक़्क़ी और बाहरी रौनक—सब दिखती तो है, मगर अंदर कहीं न कहीं वह रूह की मजबूती, अख़लाक़ की गहराई और इंसानियत की बुनियाद से दूर होती जा रही है।
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुदकुशी करेगी,
जो शाख़-ए-नाज़ुक पर बनेगा आशियाना, नापायदार होगा।
इक़बाल ने इससे बहुत पहले आगाह कर दिया था, जब उन्होंने कहा था कि यूरोप की तहज़ीब देखने में भले मज़बूत लगे, मगर उसकी नींव कमज़ोर है—क्योंकि वह रूहानी क़द्रों से खाली है।
क्योंकि तहज़ीब का असली क़िला इमारतों से नहीं,
दिलों की पाकी, रिश्तों की मजबूती और इंसानी फ़ितरत की हिफ़ाज़त से बनता है।
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