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Delhi Bomb Blast and the Politics of Muslim Identity.

Delhi Bomb Blast Aur Muslim Pahchan Ki Siyasat.

Delhi Bomb Blast and the Politics of Muslim Identity.
Delhi Bomb Blast: Muslim Identity and Political Narratives.
Delhi Bomb Blast 2025 (if time‑sensitive).
Political Narratives after Terror Attacks.
मुसलमान होना अब सिर्फ़ एक मज़हबी पहचान नहीं, एक इम्तेहान है — हर रोज़, हर मोड़ पर।
कही भी कोई विस्फोट होता है तो उसमे सिर्फ मुसलमान, उर्दू नाम वाला ही क्यो आता है? 
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झूठे इल्ज़ामात और इंसाफ़ का ख़ून
इस मुल्क में मुसलमान बनकर जीना कोई आम बात नहीं। ये वो सफ़र है जहाँ हर रोज़ अपनी पहचान को साबित करना पड़ता है। सोशल मीडिया की नफ़रत भरी टिप्पणियाँ, सियासत की तंग सोच और समाज की खामोशी — सब कुछ इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि मुसलमान आज भी अपने ही वतन में ग़ैर महसूस करता है। मगर याद रखिए, हर तकलीफ़ के पीछे सब्र का सवाब छुपा है — और यही मुसलमान की असली ताक़त है।
जैसा के पहले से होता आया है और इस बार हुआ वैसा ही। 
जैसे ही खबर आई सभी को पता होगया के अब क्या होने वाला है? 
एक तरफ तिर कमान लेकर तैयार पुरे मीडिया लॉबी मुसलमानों के खिलाफ बनाये हुए माहौल मे पेट्रोल डालने के लिए  पूरी तरह से आतुर है। ऐसे माहौल मे सिर्फ इंतेजार रहता है किसी उर्दू नाम वाले का। जैसे ही किसी अरबी नाम वाले शख्स का पता चलता है वैसे ही मीडिया और सोशल मीडिया पर पूरे मुस्लिम समाज को इसमे घसीटने की भरपूर कोशिश होती है। यह नैरेटिव यूरोप मे तैयार हुआ फिर रफ्ता रफ्ता पूरी दुनिया मे अब हिंदुस्तान मे दिख रहा है जब से एक खास पहचान के पार्टी हुकूमत मे आई है तभी से। वे ऐसे ही दंगे करने के मिजाज मे रहते है बस कोई वजह मील जाए। अब लाल किले के पास धमाका हुआ फिर ऐसे खूबसूरत मौके को वे कैसे छोड़ते? 
सवाल होने लगा के दुनिया मे कही भी कोई धमाका, हमला होता है तो उसमे सिर्फ मुसलमान का ही नाम क्यो आता है? 
कही भी कोई विस्फोट होता है तो उसमे सिर्फ मुसलमान, उर्दू नाम वाला ही क्यो आता है? 
इसी तरह मीडिया वाले भी मौलाना आतंकी, दाढ़ी वाला, एक टीचर के रूप मे आतंकी, कहकर यह साबित कर रहे थे के यह मुसलमान सिर्फ अनपढ़ ही कोई दहशत गर्दी वाला काम नही करते है बल्कि एक पढ़ा लिख, डॉक्टर, टीचर कोई भी आतंकवादि हो सकता है। 
ऐसा लगता है जैसे...... इस बारे मे जागरूक अभियान चलाया जा रहा हो के यह उर्दू नाम वाले टीचर, इंजीनियर, डॉक्टर किसी भी पेशे से क्यु न हो आतंकी सोच सभी के अंदर होता है, वे सब  आतंकवादि पेशे से ताल्लुक़ रखता है। 
कुछ ऐसा है भारत का मीडिया जो दिन रात सिर्फ मुस्लिम पहचान को दहशत गर्द से जोड़ने मे लगा हुआ है।

दहशतगर्दी, दोग़लापन और मुसलमान: झूठे इल्ज़ामात का बोझ कौन उठाए?
दुनिया के किसी भी कोने में जब कोई बम धमाका या दहशतगर्दी की कार्रवाई होती है, तो मीडिया और ताक़तवर लॉबी की पहली उंगली मुसलमानों की तरफ़ उठती है। यह एक ऐसा चलन बन गया है कि इल्ज़ाम लगाने के लिए किसी सुबूत का इंतज़ार नहीं किया जाता। दिल्ली के तारीख़ी (ऐतिहासिक) लाल क़िले पर हुए बम धमाके का वाक़िआ भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जहाँ बिना किसी ठोस तहक़ीक़ात के फ़ौरन मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराकर उन्हें बदनाम करने की मुहिम शुरू कर दी गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या दहशतगर्दी का रिश्ता वाक़ई किसी मज़हब से है, या यह सिर्फ़ मुसलमानों को निशाना बनाने का एक बहाना है?

 झूठे इल्ज़ामात और इंसाफ़ का ख़ून

यह एक कड़वी हक़ीक़त है कि दहशतगर्दी के कई मामलों में मुसलमानों पर लगाए गए इल्ज़ामात बाद में झूठे और बनावटी साबित हुए। ख़ुद भारत की नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने कई बार अपनी तहक़ीक़ात में यह नतीजा निकाला कि जिन मुस्लिम नौजवानों को सालों तक जेलों में क़ैद रखा गया, वे बेगुनाह थे। इन बेगुनाहों की ज़िंदगी के क़ीमती साल कौन लौटाएगा? 
उनकी और उनके ख़ानदान की जो रुस्वाई हुई, उसका ज़िम्मेदार कौन है? 
यह सिलसिला बताता है कि एक सोची-समझी साज़िश के तहत मुसलमानों को दहशतगर्द साबित करने की कोशिश की जाती है। उम्मीद है कि भविष्य में भी ऐसे झूठे मामले बेनक़ाब होते रहेंगे।

दिल्ली धमाका और नफ़रत का तांडव: मीडिया का एकतरफ़ा खेल

हाल ही में दिल्ली में लाल क़िले के पास हुआ बम धमाका, जिसमें 9 लोगों की जान चली गई, इस नफ़रती खेल का ताज़ा तरीन नमूना है. धमाके की ख़बर आते ही, तहक़ीक़ात पूरी होने से पहले ही, हिंदुत्ववादी लॉबी, मीडिया चैनल्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने अपना फ़ैसला सुना दिया।

मीडिया ट्रायल: कुछ मीडिया घरानों और पत्रकारों ने इसे फ़ौरन "जिहादी हमला" क़रार दिया और शक के दायरे में आए कश्मीरी नौजवानों और डॉक्टरों को "इस्लामी दहशतगर्द" बताकर पेश करना शुरू कर दिया। एक न्यूज़ एंकर की तस्वीरें वायरल हुईं जिसमें वह घटनास्थल पर रिपोर्टिंग के बजाय असंवेदनशील तरीके से पोज़ देते नज़र आए, जैसे यह कोई पिकनिक स्पॉट हो।
सोशल मीडिया पर नफ़रत: हिंदुत्ववादी तंज़ीमों (संगठनों) और उनके नेताओं ने सोशल मीडिया पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर दिया। यह साबित करने की कोशिश की गई कि हर मुसलमान पाकिस्तान का हमदर्द और मुल्क का दुश्मन है, जो कि हिंदू संगठनों का एक पुराना हथकंडा रहा है।
तारीख़ी साज़िश: यह पहली बार नहीं है। आरएसएस (RSS) के एक साबिक (पूर्व) सदस्य यशवंत शिंदे ने ख़ुद अपने हलफ़नामे (affidavit) में यह ख़ुलासा किया था कि संघ परिवार ने पूरे भारत में बम धमाके करवाए और उनका इल्ज़ाम मुसलमानों पर डाला, ताकि बीजेपी को सियासी फ़ायदा मिल सके। 2006 के मालेगांव और 2007 की मक्का मस्जिद धमाकों में भी पहले मुसलमानों को पकड़ा गया, लेकिन बाद में सुबूतों ने दिखाया कि इन धमाकों के पीछे हिंदू इंतेहा-पसंद तंज़ीमों का हाथ था।

क्या क़ानून सबके लिए बराबर है?

जब बात इंसाफ़ और क़ानून की हो, तो दोहरे मयार (दोहरे मापदंड) साफ़ नज़र आते हैं.
प्रज्ञा ठाकुर का मामला: NIA ने प्रज्ञा ठाकुर को मालेगांव और हैदराबाद बम धमाकों में दहशतगर्द क़रार दिया और सज़ा की सिफ़ारिश की। लेकिन वही हुकूमत, जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़रा से शुबहे (संदेह) पर भी आसमान सर पर उठा लेती है, एक साबित-शुदा दहशतगर्द का डिफ़ेंस करती है। क्या यह इसलिए है कि वह एक इंतेहा-पसंद हिंदू है?
मॉब लिंचिंग: गाय के नाम पर जब बेगुनाह और मासूम मुसलमानों को सरेआम क़त्ल कर दिया जाता है, तो इंतेहा-पसंद हिंदू इसे दहशतगर्दी क्यों नहीं कहते? उन क़ातिलों को दहशतगर्द क्यों नहीं माना जाता?
बिलक़ीस बानो के मुजरिम: जिन लोगों ने बिलक़ीस बानो के साथ इज़्तिमाई ज़्यादती (सामूहिक बलात्कार) की, जेल से रिहा होने पर उनका इस्तक़बाल किया गया, उन्हें हार पहनाए गए और केक काटे गए। क्या किसी ने पूछा कि ऐसा करने वालों का मज़हब क्या था?

 इल्ज़ाम का अजीब (तर्क)
अगर एक मुजरिम के नाम या मज़हब की वजह से पूरे गिरोह को बदनाम करना सही है, तो निर्भया केस में शामिल एक मुजरिम का नाम राम सिंह था। तो क्या इस बुनियाद पर "राम" नाम वाले तमाम इंसानों को बलात्कारी मान लिया जाएगा? 
यह एक बेतुकी और घटिया सोच है, लेकिन यही सोच मुसलमानों के ख़िलाफ़ बेधड़क इस्तेमाल की जाती है। अगर भारत का पहला दहशतगर्द कोई था, तो वह नाथूराम गोडसे था, जिसने मुल्क के बापू का सीना गोलियों से छलनी कर दिया। आज उसी क़ातिल को कुछ लोग अपना आइडियल मानते हैं।

दहशतगर्दी का कोई मज़हब नहीं होता.

हम दहशतगर्दी के सख़्त ख़िलाफ़ हैं और हमेशा रहेंगे, लेकिन हम उन लोगों के भी उतने ही ख़िलाफ़ हैं जो दहशतगर्दी से लड़ने की आड़ में सिर्फ़ मुसलमानों को निशाना बनाते हैं और अपनी नफ़रत को हवा देते हैं। जब यति नरसिंहानंद जैसा इंतेहा-पसंद शख़्स डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे अज़ीम साइंसदां और वतन-परस्त इंसान को सिर्फ़ इसलिए दहशतगर्द कह देता है कि वह मुसलमान थे, तो नफ़रत का असली चेहरा सामने आ जाता है।

अगर एक दहशतगर्द का मज़हब मायने रखता है, तो एक बलात्कारी का मज़हब क्यों नहीं? 
दोग़लापन और दोहरे मयार को ख़त्म करना होगा। इंसाफ़ का तक़ाज़ा यही है कि मुजरिम को सिर्फ़ मुजरिम की नज़र से देखा जाए, उसके मज़हब की नज़र से नहीं।

लाल क़िला धमाका: सोशल मीडिया पर नफ़रती नैरेटिव की टाइमलाइन

दिल्ली के लाल क़िले के पास हुए बम धमाके के बाद सोशल मीडिया और मीडिया पर एक ख़ास क़िस्म का नैरेटिव बनाया गया जिसका मक़सद मुसलमानों को निशाना बनाना और उन्हें बदनाम करना था। जो कुछ इस तरह से है। जैसा होते आया है और बहुत से लोगो ने सोचा भी के क्या होगा, कैसे होगा और फिर वही हुआ? 
सोशल मीडिया ट्रायल और मुस्लिम पहचान। 

 पहला मरहला: धमाके के फ़ौरन बाद (शुरुआती 1-2 घंटे)
अफ़रातफ़री और अटकलें: धमाके की ख़बर आते ही सोशल मीडिया, ख़ास तौर पर ट्विटर और व्हाट्सएप पर, घटनास्थल की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने लगीं । शुरुआत में ये सिर्फ़ अफ़रातफ़री और अटकलों पर आधारित थीं।
नैरेटिव की बुनियाद: इसी दौरान, असमाजिक तत्व्  शिद्दत पसंद विचारधारा वाले हैंडल्स ने बिना किसी सुबूत के इसे "इस्लामी दहशतगर्दी" और "जिहादी हमला" कहना शुरू कर दिया। यह लोग पहले से ही तैयार रहते है अपना तिर कमान लेकर। 
#DelhiUnderAttack और #RedFortBlast जैसे हैशटैग के साथ इसे एक मज़हबी रंग देने की कोशिश शुरू हो गई।

 दूसरा मरहला: अगले 24 घंटे (जांच की शुरुआत और मीडिया ट्रायल)
मीडिया का एकतरफ़ा रुख: मेनस्ट्रीम मीडिया के कई चैनलों ने पुलिस की जांच का इंतज़ार किए बिना इसे "आतंकी हमला" घोषित कर दिया। कुछ न्यूज़ एंकर्स ने अपनी रिपोर्टिंग में सीधे तौर पर मुस्लिम संगठनों या कश्मीरी अलगाववादियों की तरफ़ इशारा करना शुरू कर दिया। 
संदिग्धों का मुस्लिम होना: जैसे ही जांच एजेंसियों ने कुछ संदिग्धों को हिरासत में लिया, जिनमें कुछ कश्मीरी डॉक्टर भी शामिल थे, मुस्लिम विरोधी लॉबी ने इसे एक मौक़े के तौर पर इस्तेमाल किया। सोशल मीडिया पर यह ख़बर फैला दी गई कि "पढ़े-लिखे मुसलमान भी दहशतगर्द होते हैं" । 
नेताओं और इन्फ्लुएंसर्स का ज़हर: कट्टर पंथी तंज़ीमों के नेताओं और उनसे जुड़े इन्फ्लुएंसर्स ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रती भाषण और पोस्ट डालने शुरू कर दिए। उन्होंने इसे "तुष्टिकरण की सियासत" का नतीजा बताया और सरकार से सख़्त कार्रवाई की मांग की, जिसका असल निशाना मुसलमान थे।

 तीसरा मरहला: 48 घंटे बाद (काउंटर-नैरेटिव और हक़ीक़त की तलाश)
जवाबी कार्रवाई: मुस्लिम दानिश्वरों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस एकतरफ़ा नैरेटिव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू की। #TerrorismHasNoReligion और #StopBlamingMuslims जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
पुराने मामलों का हवाला: लोगों ने सोशल मीडिया पर मालेगांव, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों की याद दिलाई, जिनमें पहले मुसलमानों को फंसाया गया था, लेकिन बाद में असल मुजरिम हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े लोग निकले। 

आधिकारिक बयानों का इंतज़ार: एक बड़ा तबक़ा ऐसा भी था जो लोगों से अपील कर रहा था कि वे किसी नतीजे पर न पहुंचें और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट का इंतज़ार करें। उन्होंने मीडिया ट्रायल की भी जमकर मुख़ालफ़त की। 

 चौथा मरहला:  (नैरेटिव की लड़ाई)
नफ़रत का स्थायी होना: भले ही जवाबी नैरेटिव ने कुछ हद तक असर दिखाया, लेकिन शुरुआती 48 घंटों में बोया गया नफ़रत का बीज अपना काम कर चुका था। आम लोगों के ज़हन में यह बात बिठा दी गई कि धमाके के पीछे मुसलमानों का ही हाथ है।
साज़िश की थ्योरी: मुस्लिम विरोधी इकोसिस्टम ने यह भी प्रचारित किया कि काउंटर-नैरेटिव असल में "आतंकियों के हमदर्दों" और "टुकड़े-टुकड़े गैंग" द्वारा चलाया जा रहा है ताकि जांच को भटकाया जा सके।

यह टाइमलाइन दिखाती है कि कैसे किसी भी आतंकी घटना के बाद एक सोची-समझी साज़िश के तहत मुसलमानों को बदनाम करने की पूरी मशीनरी काम पर लग जाती है, जिसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज को बांटना और सियासी फ़ायदा उठाना होता है।

वैसे इंतेहापसंदो के मुताबिक: अगर मुसलमान आतंकवादि है तो गाये के नाम पर किये जा रहे क़त्ल का और मुसलमानों के मॉब लिंच का जिम्मेदार कौन है? 
क्या उसके नाम और धर्म से उसे भी आतंकवादि कहा जा सकता है। क्या उस पूरे तबके को और धर्म के अनुनायि को दहशत गर्द कह सकते है? 
मेरा मानना है के कोई भी शख्स उसकी खूबियों और खामियों के बिना पर उसे तसलिम करना चाहिए या उसपर तनकिद करना चाहिए। 
किसी जात, धर्म, मजहब, जेंडर को देख कर सीधे उस पहचान से ताल्लुक़ रखने वाले पुरे तबके को उसका जिम्मेदार नही बना सकते है। 
अरे जो भी करे क्या उसने अपने और समाज, समुदाय से पूछ कर या उसके तरफ से आया था क्या? नही न तो फिर कैसे उसका पुरा गिरोह इसके लिए जिम्मेदार होगा? 
किसी को पता नही के किसने क्या किया और करने वाला है मगर जब कुछ होता है तो पुरा मुसलमान इसके लिए जिम्मेदार होता है एक खास तबका और नैरेटिव के नज़र मे।

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