Digital Conspiracy Against Muslim World on Twitter.
Twitter Exposé: Freedom or Hidden Agenda?
Twitter Exposé: Digital Plot Against Muslim World.
| डिजिटल दुनिया में जो दिखता है, वह असल में होता नहीं है। |
एक्स (Twitter) का महा-खुलासा: कैसे 'फ्रीडम' और 'हक' के नाम पर मुस्लिम दुनिया के खिलाफ रची जा रही है डिजिटल साजिश?
एलन मस्क की सोशल मीडिया साइट "एक्स" (पूर्व में ट्विटर) पर हाल ही में आए एक 'ग्लिच' या कहें 'गलती से हुए अपडेट' ने इंटरनेट की दुनिया में एक डिजिटल परमाणु धमाका कर दिया है। इस अपडेट ने न सिर्फ बोट्स (Bots) की लॉबी को बेनकाब किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि मुस्लिम दुनिया, इस्लामी अकीदे और मुस्लिम ख्वातीन के खिलाफ जो नफरत और "इल्हाद" की आंधी चल रही है, उसका रिमोट कंट्रोल कहीं और है।
उस बड़े खेल का पर्दाफाश जो आपकी सोच, आपके दीन और आपके मुल्क को निशाना बना रहा है।
1. लोकेशन फीचर का सच: अपने ही मुल्क के गद्दार या विदेशी एजेंट?
एलन मस्क के प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर आए सिर्फ दो मामूली अपडेट्स ने बरसों से चल रही अंतरराष्ट्रीय साजिशों और उनके "विदेशी आकाओं" (Foreign Masters) की पोल खोलकर रख दी है। इस खुलासे ने साबित कर दिया कि डिजिटल दुनिया में जो दिखता है, वह असल में होता नहीं है।
1. असली लोकेशन (Real Location) का पर्दाफाश:
भले ही यूजर ने अपने बायो (Bio) में "रियाद", "अंकारा" या "तेहरान" "काहिरा" लिख रखा हो, इस अपडेट ने दिखा दिया कि वह अकाउंट हकीकत में तेल अवीव (इजराइल), लंदन या किसी पश्चिमी देश से ऑपरेट हो रहा था। यानी जो "मकामी" (Local) बनकर आपके मुल्क और मजहब को गालियां दे रहा था, वह असल में हजारों मील दूर बैठा एक दुश्मन एजेंट था।
2. 'सब-कॉन्टिनेंट' और नेटवर्क की पहचान:
दूसरा अपडेट यह था कि आप जिसे फॉलो कर रहे हैं या जो अकाउंट्स एक-दूसरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश (Amplify) कर रहे हैं, उनका नेटवर्क कहाँ से जुड़ा है। इससे पता चला कि मुस्लिम दुनिया में फितना फैलाने वाले, हुक्मरानों के खिलाफ बगावत उकसाने वाले और ख्वातीन को गुमराह करने वाले अकाउंट्स का सर्वर और कंट्रोल रूम एक ही जगह था।
जो लोग खुद को "सच्चा देशभक्त" बताते थे, वे हजारों मील दूर बैठकर फितना फैला रहे थे।
हैरत की बात यह थी कि मुस्लिम मुल्कों में आपसी लड़ाई करवाने वाले 99% अकाउंट्स का ताल्लुक इजराइली खुफिया यूनिट 8200 से निकला, जो साइबर वॉरफेयर में माहिर है।
भारत मे जो सरकार से सवाल पुछ्ने के बहाने यहाँ के असल पह्चान, तह्जिब को निचा दिखाने, सेकुलर के नाम पर मुसल्मानो का साथ देने का धोंग करने और हिंदुओ को निचा दिखा कर खुद को नाम् निहाद आज़ाद खयाल बनकर बैठने वाले का भि सच सामने आगया है. इस से यह पता चलता है के वह अलप्संख्यक के नाम पर मुसलमानो से साथ ले लेते है यह सब उस्के मन्सुबे का हिस्सा होता है, ताकि यह दिखा सके के हम कम्ज़ोरो के साथ है, मगर इस से मुसलमानो को मिला कुछ नहि, बल्कि मुसलमान जेल जाते है और वे लोग बैठ कर मजे करते है, वे नेता बनकर हमे वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करते है. वे चुनाव जित् कर लाल बत्ति वाले मे गाडि मे घुमते है दुसरि तरफ मुसलमान जेल के हवा खाते है, उमर खालिद, सरजिल इमाम कितने नाम बताये?
यह साफ हो गया कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला गुस्सा 'हकीकत' नहीं, बल्कि एक "मैन्युफैक्चर्ड" (Manufactured/गढ़ा हुआ) एजेंडा था। इन अपडेट्स ने झूठ के उस साम्राज्य को नंगा कर दिया है जो डॉलर और पाउंड के दम पर हमारे मुल्कों को जलाने की साजिश रच रहा था।
2. इल्हाद (Atheism) का यलगार और फेक नैरेटिव
इस खुलासे ने मुस्लिम दुनिया में फैल रहे "इल्हाद" (नास्तिकता) के एजेंडे की भी पोल खोल दी है। सोशल मीडिया पर ऐसे हजारों अकाउंट्स हैं जो अरबी या उर्दू में इस्लामी शिक्षाओं का मजाक उड़ाते हैं और नौजवानों को दीन से दूर करने के लिए विचार्धारा के नैरेटिव का सहारा लेते हैं।
हकीकत यह है कि:
ये अकाउंट्स किसी "मुस्लिम नौजवान" के नहीं होते जो सवाल पूछ रहा है, बल्कि यह एक ऑर्गेनाइज्ड गैंग है।
इनका मकसद मुस्लिम नौजवानों के जेहन में अपने मजहब और अपने निज़ाम के खिलाफ शक पैदा करना है।
यूरोप और अमेरिका में बैठे ये "पेड एजेंट्स" (Paid Agents) खुद को "मजलूम" बताकर सहानुभूति बटोरते हैं, जबकि असल में यह एक मनोवैज्ञानिक जंग (Psychological War) है।
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| NGOs और ट्रस्ट: समाज सेवा या जासूसी का अड्डा? |
3. मुस्लिम ख्वातीन: आजादी के नाम पर फरेब.
सबसे खतरनाक खेल मुस्लिम ख्वातीन के साथ खेला जा रहा है। "वुमन राइट्स", "फेमिनिज्म" और "आजादी" के झूठे ख्वाब दिखाकर उन्हें इस्लाम के फरायज और पारिवारिक निजाम से बगावत करने पर उकसाया जाता है।
क्या आपने कभी गौर किया है कि अचानक किसी मुस्लिम मुल्क में, जहाँ कल तक सब कुछ शांत था, रातों-रात हजारों महिलाएं सड़कों पर कैसे उतर आती हैं?
कैसे एक छोटा सा मुद्दा अचानक एक "बगावत" की शक्ल ले लेता है?
NGOs और ट्रस्ट: समाज सेवा या जासूसी का अड्डा?
यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश (Well-planned International Conspiracy) है, जिसका मकसद औरतों के कंधों पर बंदूक रखकर मुस्लिम हुकूमतों और इस्लामी निजाम को निशाना बनाना है।
उस "सॉफ्ट वॉर" (Soft War) का सच, जिसमें विदेशी डॉलर और मीडिया के जोर पर आपके घर की इज्जत को मोहरा बनाया जा रहा है।
फेक प्रोफाइल्स: 'आयशा', 'फातिमा' या 'सना' नाम के अकाउंट्स से पर्दा और हया के खिलाफ मुहिम चलाई जाती है। लोकेशन चेक करने पर पता चलता है कि ये अकाउंट्स किसी मुस्लिम महिला के नहीं, बल्कि किसी पश्चिमी देश या इजराइल में बैठे किसी मर्द के हैं।
सबसे पहले यह खेल "इन्सानियत की सेवा" के नाम पर शुरू होता है। अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी एजेंसियां मुस्लिम मुल्कों में अपनी शाखाएं (Branches) खोलती हैं।
फंडिंग का जाल: "महिला सशक्तिकरण" और "शिक्षा" के नाम पर करोड़ों डॉलर की फंडिंग भेजी जाती है।
स्लीपर सेल्स: छोटे-छोटे ट्रस्ट और इदारे (Institutions) बनाए जाते हैं जो जाहिरि तौर पर तो सिलाई-कढ़ाई या तालीम का काम करते हैं, लेकिन परदे के पीछे इनका असल काम औरतों की जेहन-साजी (Brainwashing) करना होता है। ये इदारे धीरे-धीरे ख्वातीन के दिमाग में यह बात बिठाते हैं कि उनका अपना मुल्क, उनका अपना मजहब और उनके अपने मर्द उन पर जुल्म कर रहे हैं।
ट्रस्ट का जाल: मानवाधिकार (Human Rights) के नाम पर कई विदेशी फंडिंग वाली NGOs और ट्रस्ट्स इस नैरेटिव को हवा देते हैं। इनका मकसद मुस्लिम समाज की बुनियादी ईंट यानी 'परिवार' को तोड़ना है।
ये दिखाते हैं कि मुस्लिम औरत कितनी "मजलूम" है और उसे अपने बाप, भाई या शौहर के खिलाफ बगावत कर देनी चाहिए। जबकि हकीकत में यह समाज को अंदर से खोखला करने की साजिश है।
4. बगावत की आग: ईरान और अरब मुल्कों का हाल.
जब विदेशी आकाओं को लगता है कि किसी मुस्लिम मुल्क की हुकूमत को गिराना या कमजोर करना है, तो वे एक इशारा करते हैं।
अचानक वही NGOs, जो कल तक खामोश थे, हजारों औरतों को एक साथ एक ही वक्त पर सड़कों पर ले आते हैं।
उनके हाथों में एक जैसे बैनर, एक जैसे नारे और एक जैसी तख्तियां होती हैं—जो यह साबित करता है कि यह गुस्सा कुदरती नहीं, बल्कि स्पॉन्सर्ड (Sponsored) है।
इन प्रदर्शनों के लिए बसों का इंतजाम, खाने-पीने का बंदोबस्त और मीडिया कवरेज का पूरा खर्च वही "अनजान हाथ" (Hidden Hands) उठाते हैं।
विदेशी मीडिया और सोशल मीडिया का यलगार.
जैसे ही ये महिलाएं सड़कों पर आती हैं, पश्चिमी मीडिया (BBC, CNN, और अन्य) का पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है।
विक्टिम कार्ड: टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया पर 24 घंटे एक ही रट लगाई जाती है—"देखिए, यह हुकूमत अपनी ही बेटियों पर कितना जुल्म कर रही है।"
जो पुलिस या फौज मुल्क में अमन कायम रखने की कोशिश करती है, उसे "जालिम" और "कातिल" बनाकर पेश किया जाता है।
इस पूरे नैरेटिव को ऐसे बुना जाता है कि देखने वाले को लगे कि ये प्रदर्शनकारी महिलाएं बिल्कुल बेबस हैं और विदेशी ताकतें ही उनकी असली "खैर-ख्वाह" (Sympathizers/Saviors) हैं।
हमदर्दी का नाटक और 'एजेंट्स' का किरदार.
इस साजिश का सबसे खतरनाक पहलू वो "एजेंट्स" हैं जो आपकी अपनी जुबान बोलते हैं।
ये लोग लंदन, पेरिस या न्यूयॉर्क में बैठे होते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसे पेश आते हैं जैसे वे आपके पड़ोसी हों।
अरबी, फारसी या उर्दू बोलने वाले ये ट्रेंड एजेंट्स (Trained Agents) वीडियो और पोस्ट्स के जरिए ख्वातीन को यकीन दिलाते हैं कि "इस्लाम और शरिया कानून तुम्हें कैद कर रहा है, बगावत करो तो तुम्हें असली हक मिलेगा।"
हकीकत यह है कि इन्हें हर एक टवीट और हर एक भड़काऊ वीडियो के लिए मोटी रकम मिलती है। इनका मकसद आपकी आजादी नहीं, बल्कि आपके मुल्क को सीरिया, लीबिया या इराक की तरह आग में झोंकना है।
घर भी बर्बाद, मुल्क भी बर्बाद
ईरान हो या अरब मुल्क, जहाँ-जहाँ यह खेल खेला गया, वहां अंजाम क्या हुआ?
वह "आजादी" तो कभी नहीं मिली जिसका वादा किया गया था, लेकिन मुल्क की अर्थव्यवस्था (Economy) और सुरक्षा (Security) तबाह हो गई।
ये विदेशी ताकतें सिर्फ तब तक साथ देती हैं जब तक हुकूमत गिर नहीं जाती। उसके बाद, उन्हीं महिलाओं को बे यारो - मददगार छोड़ दिया जाता है, और मुल्क खाना जंगि (Civil War) की आग में जलने लगता है।
बाहरी रिमोट कंट्रोल: यूके (UK) और यूरोप में बैठे लोग खुद को ईरान या अरब का स्थानीय नागरिक बताकर सड़कों पर उतरने और सरकार गिराने की अपील करते हैं।
मकसद सिर्फ एक है—मुस्लिम मुल्कों में स्थिरता (Stability) को खत्म करना और उन्हें सीरिया या इराक जैसा बना देना।
सबक: अपनी आँखें खुली रखें- हक़ीक़त को पहचाने.
यह वाकया हमारे लिए एक चेतावनी (Eye-opener) है। सोशल मीडिया पर जो शोर-शराबा, जो नफरत, और जो "इस्लाम विरोधी" माहौल हमें दिखता है, वह हकीकत नहीं बल्कि एक मुहिम और मनसुबा (Simulation) है।
दुश्मन अब तलवार से नहीं, बल्कि कीबोर्ड और फेक आईडी से हमला कर रहा है।
उसका मकसद आपकी पहचान, आपके दीन और आपके मुल्क की अमन व चैन को खत्म करना है।
इसलिए, अगली बार जब आप इंटरनेट पर कोई भड़काऊ पोस्ट देखें, तो याद रखें हो सकता है कि 'समीर' या 'सारा' के नाम के पीछे कोई विदेशी एजेंसी बैठी हो जो आपको मोहरा बना रही है।
मुस्लिम ख्वातीन को यह समझना होगा कि जो विदेशी ताकतें फलस्तीन, कश्मीर और शाम (सीरिया) में हमारी बहनों के कत्ल पर खामोश रहती हैं, वे अचानक आपके "हक" के लिए इतनी फिक्रमंद क्यों हो गईं?
यह हमदर्दी नहीं, यह एक सियासी चाल है। अपनी ख्वातीन को पहचानें, अपने निजाम पर भरोसा रखें और इन रंग-बिरंगे एनजीओ और सोशल मीडिया के फरेब से अपने घर और मुल्क को महफूज रखें।
ट्विट्टर के नये अपडेट ने बेनकाब कर दिया ही उन चेहरों को जो यूरोप और इसराइल मे बैठ कर मुस्लिम हुकमराँ और इस्लामी शयार् के खिलाफ अवाम को उकसाते है, वे इसे उस मुल्क और खितते के अवाम का गुस्सा और नाराजगी के तौर पर दिखाते थे, लेकिन मालूम हुआ के यह अवाम की नाराजगी नही बल्कि दुष्मनाँन ए इस्लाम का गुस्सा है।
अवाम की नाराजगी हो सकती है इसमे कोई शक नही लेकिन वह हुकमरां के खिलाफ होगी निज़ाम के खिलाफ नही।
और इतना बडी भी गुस्सा नही जिस तरह से से पूरे मुल्क का मसला बताया जाता था।
जिस तरह से खवातीन को मजलुम के तौर पर और हुकमराँ को ज़ालिम और ज़ाबिर, औरतो का दुश्मन, खवातीन का मुखालिफ् के तौर पर दिखाया जाता था महज वह एक प्रोपगंडे का हिस्सा था जैसे उस्मानिया हुकूमत के खिलाफ अरबो मे क़ौम प्ररस्ति का ज़हर डाला अंग्रेजी खुफिया कमांडर ने, अरबो को खुदमुखतार और आज़ाद मुल्क का ख्वाब दिखाया ताकि इससे तुर्को के खिलाफ अरब को इस्तेमाल करके उसे तबाह कर दिया जाए, इसमे वे कामयाब भी हुए लेकिन अरबो को क्या हासिल हुआ?
फ्रांस और बर्तानीया ने अरबो को धोका दिया फिर फिलिस्तीन को यहूदियों के हवाले कर दिया गया और इसराइल नाम का एक कील अरबो के सीने पे ठोक दिया गया।
वह अब उनके गले की हड्डी बन गयी है, उनको वह आज़ादी जो उस्मानिया हुकूमत से चाहिए थी वही गुलामी इसराइल के हाथो मिल गयी, वे एक से निजात पाकर दूसरे के गुलाम हो गए।
अंग्रेजो को तो मुसलमानो के अंदर फुट डाल कर काम लेना था, क्योंके सभी एक रहते तो मजबूत होते, मुसलमानो को आपस मे कैसे लडाया जाए, इस्लाम के नाम पर सब एक थे इसलिए नस्ल के नाम पर लडाया गया, एक तुर्क तो दूसरा अरब।
वही काम खवातीन् से लेना चाहते है, के दिखा सके के उसके अंदर ही खुद औरतों के साथ ना इंसाफी होता है, क्या वह मुसलमान नही है? अगर है तो ऐसा क्यो?
यही जेहन साजि करने का पर्दाफाश एक अपडेट ने कर दिया है।
इससे खौफ खा कर खुद एलोन मुस्क ने इस फीचर को इसराइल वाले यूजर पर बंद कर दिया है।







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