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Quran Ki Adhuri Aayato Ka Galat Meaning Samjha kar Nafrat Failana. (Part 49)

Quran Ki Adhuri Aayato ka Galat Matlab Nikal kar Logo ke bich Nafrat Failana.
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम*
*अस्सलामुअलैकुम वरह् मतुल्लाही वबरकातुहु
    क्या इस्लाम आतंकवाद की शिक्षा देता है?
*सभी मुस्लिम और गैर मुस्लिम भाइयो से अपील है कि इस पोस्ट को ज़रूर पढ़े ये एक महत्वपूर्ण जानकारी है जो आपको दी जा रही है
*नोट यह पोस्ट किसी को नीचा दिखाने या किसी का अपमान करने के लिए नही है ।
*पार्ट नंबर 49
पवित्र कुरआन की वे चौबीस आयतें
21 पैम्फलेट में लिखी 21वें क्रम की आयत है;
   *किताब वाले जो न अल्लाह पर 'ईमान' लाते हैं न अन्तिम दिन पर, न उसे हराम करते हैं जिसे अल्लाह और उसके रसूल' ने हराम ठहराया है, और न सच्चे‘दीन' को अपना दीन' बनाते हैं, उनसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित (अपमानित) होकर अपने हाथों से 'जिज़या' देने लगे (कुरआन, सूरा-9, आयत- 29)
  इस्लाम के अनुसार तौरात, जूबूर (Old Testament), इंजील (New Testament) और कुरआन मजीद अल्लाह की भेजी हुई किताबें हैं, इसलिए इन किताबों पर अलग-अलग ईमान लानेवाले क्रमश: यहूदी, ईसाई और मुसलमान ‘किताब वाले' या‘अहले-किताब' कहलाए। यहाँ इस आयत में किताब वाले से मतलब यहूदियों और ईसाइयों से है।*
*ईश्वरीय पुस्तकें रहस्यमयी होती हैं इसलिए इस आयत को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि इसमें यहूदियों और ईसाइयों को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने के लिए लड़ाई का आदेश है।     लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि इस्लाम में किसी भी प्रकार की ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं है। कुरआन में अल्लाह मना करता है कि किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया जाए। देखिए;-
  ऐ पैग़म्बर ! अगर ये लोग तुमसे झगड़ने लगे, तो कहना कि मैं और मेरी पैरवी करने वाले तो खुदा के फ़रमांबरदार हो चुके और‘अहले-किताब' और अनपढ़ लोगों से कहो कि क्या तुम भी (खुदा के फ़रमांबरदार बनते और) इस्लाम लाते हो? अगर ये लोग इस्लाम ले आये तो बेशक हिदायत पा लें और अगर (तुम्हारा कहा) न मानें, तो तुम्हारा काम सिर्फ खुदा का पैग़ाम पहुँचा देना है। और खुदा (अपने) बन्दों को देख रहा है। (कुरआन, सूरा-3, आयत- 20)*
          *और अगर तुम्हारा परवरदिगार (यानी अल्लाह) चाहता, तो जितने लोग ज़मीन पर हैं, सब के सब ईमान ले आते, तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो कि वे मोमिन (यानी मुसलमान हो जाएं।” (कुरआन, सूरा-10, आयत- 99)*
*इस्लाम के प्रचार-प्रसार में किसी तरह की ज़ोर-ज़बरदस्ती न करने की इन आयतों के बावजूद इस आयत में किताबवालों से लड़ने का फ़रमान आने के कारण वही हैं, जो पैम्फलेट में लिखी 8वें, 9वें व 20वें क्रम की आयतों के लिए मैंने दिए हैं। आयत में जिज़या नाम का टैक्स गैर मुसलमानों से उनकी जान-माल की रक्षा के बदले लिया जाता था। इसके अलावा उन्हें कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था।*
*जबकि मुसलमानों के लिए भी ज़कात देना ज़रूरी था लेकिन आज तो सरकार ने बात-बात पर टैक्स लगा रखा है।*
*HAMARI DUAA* ⬇⬇⬇
*इस पोस्ट को हमारे सभी गैर मुस्लिम भाइयो ओर दोस्तो की इस्लाह ओर आपसी भाईचारे के लिए शेयर करे ताकि हमारे भाइयो को जो गलतफहमियां है उनको दूर किया जा सके अल्लाह आपको जज़ाये खैर दे आमीन।
WAY OF JANNAH INSTITUTE RAJSTHAN

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