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Muslim Duniya Ke Pas EU, NATO Kyo Nahi?

No EU. No NATO. No G7. Just silence. Why can’t the Muslim world unite?

The Missing Civil Network: Why Muslim Unity Still Struggles.
Why the Muslim World Lacks a Union Like EU or NATO?
What Stops Muslim Nations from Building Their Own EU?
Muslim World Without EU or NATO: A Silent Crisis.
Why Western Nations Mobilize Faster Than Muslim States?
The Strategic Gap Holding Muslim Nations Back.
Imagine a Muslim Union as strong as the EU. Why doesn’t it exist yet?
The West calls, millions march. The Muslim world? Still waiting for a signal.
Unity is power. The Muslim world has neither EU nor NATO. That’s the tragedy.
Unlike Europe’s EU or NATO, the Muslim world has no strong alliance or civil network. Discover why unity remains elusive and what this means for global power balance.
 ईरान और वेनेज़ुएला: अमरीकी ताक़त का इम्तिहान, सलीबी यलग़ार और मुस्लिम दुनिया की ख़ामोशी.
जंग अब सिर्फ़ मैदान में नहीं, दिमाग़ों और स्क्रीन पर लड़ी जाती है.
और जो क़ौमें अपना नैरेटिव खो देती हैं, उनका मुक़द्दर दूसरे लिखते हैं।
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Muslim World’s Biggest Weakness: No Powerful Alliance.
मुस्लिम दुनिया के पास न कोई यूरोपियन यूनियन है, न नाटो जैसा इत्तिहाद, न G7 जैसा असरदार ब्लॉक। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक ये है कि उसके पास वो हिकमत और सिविल नेटवर्क भी मौजूद नहीं जैसे मग़रिब में एक इशारे पर सड़कों पर उतर आता है। 
अमरीका एक ऐसे मोड़ पर जहाँ हर रास्ता दलदल है.
आज की आलमी सियासत एक ऐसे नाज़ुक दौर में दाख़िल हो चुकी है जहाँ अमरीका की फ़ौजी ताक़त भी उसे फ़ैसला कुन बढ़त दिलाने में नाकाम नज़र आती है। न तो बमबारी से मसले हल हो रहे हैं और न ही पीछे हटने का कोई बाइज़्ज़त रास्ता बाक़ी बचा है।
 जनवरी 2026 का आग़ाज़ वॉशिंगटन के लिए एक ऐसे स्ट्रेटेजिक तातिल का पैग़ाम है जिसमें हर क़दम आगे बढ़ने के बजाय और गहराई में ले जाता दिखता है।

वेनेज़ुएला: अपहरण, दावा-ए-फ़तह और ज़मीनी हक़ीक़त की तौहीन.
3 जनवरी 2026 को अमरीकी स्पेशल फ़ोर्सेज़ द्वारा वेनेज़ुएला के सदर निकोलस मादुरो का ख़ुफ़िया अपहरण और न्यूयॉर्क तबदीली, वॉशिंगटन की उस सोच की नुमाइंदगी करता है जिसमें समझा गया कि सर काटने से जिस्म खुद-ब-खुद गिर जाएगा।
मगर हुआ इसके बिल्कुल बरअक्स। 
मादुरो की गैरमौजूदगी में डेल्सी रोड्रीगेज़ ने अबूरी सदर के तौर पर हलफ़ उठा लिया और उनके भाई जॉर्ज रोड्रीगेज़ ने मजलिस-ए-क़ौमी पर अपनी गिरफ़्त मज़बूत कर ली। अमरीका के लिए ये सबसे बड़ी स्ट्रेटेजिक शिकस्त है कि जिस निज़ाम को तोड़ने निकला था, वही पहले से ज़्यादा मुस्तहकम होकर सामने खड़ा है।

अमरीकी प्रॉक्सी का ख़्वाब और रोड्रीगेज़ हुकूमत की बेनियाज़ी.
वॉशिंगटन ने अगरचे डेल्सी रोड्रीगेज़ से आरज़ी मुफ़ाहमत की, मगर ये किसी भी सूरत में अमरीकी प्रॉक्सी कंट्रोल में तब्दील न हो सकी। रोड्रीगेज़ ख़ानदान उसी चाविस्टा हल्क़े से ताल्लुक़ रखता है जिसे अमरीका जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता था।
तेल के ज़ख़ाइर पर अमरीकी कंपनियों की बेरोक-टोक रसाई से साफ़ इनकार ने ये साबित कर दिया कि वेनेज़ुएला अब भी अपनी ख़ुदमुख़्तारी के तसव्वुर से चिपका हुआ है।

मारिया कोरिना माचाडो: नोबेल से नाकामी तक.
अमरीका की मंज़ूर-ए-नज़र शख़्सियत मारिया कोरिना माचाडो को नोबेल अमन इनाम दिलवाना भी ज़मीनी हक़ीक़त को तब्दील न कर सका। न फ़ौज ने साथ दिया, न अवाम ने।
 यहां तक कि खुद ट्रम्प को मानना पड़ा कि माचाडो एक सियासी तजुर्बा साबित हुईं जो बुरी तरह नाकाम रहा।

तेल, पूंजी और डर: अमरीकी कंपनियों की पसपाई
एक्सॉन मोबिल, शेवरॉन और कोनोको फिलिप्स जैसी दिग्गज कंपनियों का पीछे हटना इस बात का ऐलान है कि सिर्फ़ झंडा बदल देने से निज़ाम नहीं बदलता। 
सोशलिस्ट क़वानीन, भारी निवेश, हेवी सॉर क्रूड और आलमी बाज़ार में कम क़ीमतों ने वेनेज़ुएला को अमरीकी पूंजी के लिए ज़हरीला बना दिया है।

ईरान: बमबारी के बाद भी क़ायम निज़ाम
जून 2025 में “ऑपरेशन राइज़िंग लॉयन” के तहत ईरान की जौहरी तनसीबात पर हमले हुए। नुकसान हुआ, मगर मक़सद हासिल न हुआ। न हुकूमत गिरी, न पॉलिसी बदली।
दिसंबर 2025 के आख़िर में महंगाई और करंसी क्रैश के नाम पर मोसाद, अमेरिका ने खामेनयि के ख़िलाफ़ एहतिजाज ज़रूर हुए, मगर पासदाराने इंक़लाब और बसीज की वफ़ादारी ने निज़ाम को थामे रखा। 
अमरीकी और इस्राइली धमकियों ने ईरानी क़ौमियत को और भड़का दिया। जिसकि वजह वहा के अवाम हुकुमत के साना बसाना खडि हो गयि, और सरकार के हिमायत मे बहुत बडे मुजाहिरे हुए.

ईरान पर ज़मीनी हमला: वियतनाम से भी बदतर ख़्वाब
ईरान कोई इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान नहीं। 9 करोड़ आबादी, पहाड़ी जुग़राफ़िया, मिसाइल टेक्नोलॉजी और आबनाए-हुरमुज़ को बंद करने की सलाहियत — ये सब मिलकर अमरीका के लिए क़यामत का मंजर पेश करते हैं।
लाखों फ़ौजियों की ज़रूरत, अरबों डॉलर का ख़र्च और अंदरूनी बग़ावत — अमरीकी अवाम न इसकी इजाज़त देगी, न मआशी निज़ाम इसे झेल पाएगा।

अमरीका के अंदर बग़ावत: MAGA और डेमोक्रेट्स एक सफ़ में.

इतिहास में पहली बार MAGA ग्रुप और डेमोक्रेट्स ईरान के ख़िलाफ़ जंग पर मुत्तहिद नज़र आते हैं। बर्नी सैंडर्स, एलिज़ाबेथ वॉरेन, रो खन्ना, थॉमस मैसी और टकर कार्लसन — सबका पैग़ाम एक है: “अब और जंग नहीं।”
नायब सदर जे.डी. वांस भी इसी सोच की नुमाइंदगी कर रहे हैं।

इस्राइल, नेतन्याहू और सलीबी दबाव.
इस्राइल के अंदर सियासी दबाव में घिरे नेतन्याहू ईरान पर आख़िरी वार का क्रेडिट चाहता हैं। AIPAC और दूसरी ज़ियोनी लॉबियां अमरीकी कांग्रेस में ये नैरेटिव फैला रही हैं कि ईरान पर हमला न करना इस्राइल के वजूद से ग़द्दारी है।
ये वही पुरानी सलीबी यलग़ार है जो हर दौर में किसी न किसी बहाने मुस्लिम दुनिया को निशाना बनाती रही है।

मुस्लिम दुनिया की ग़फ़लत और तारीख़ का बेरहम इम्तिहान.
सबसे अफ़सोसनाक पहलू मुस्लिम दुनिया की ख़ामोशी है। 
  न कोई मुत्तहिद सियासी आवाज़, न कोई इज्तेमाइ स्ट्रेटेजी। हर मुल्क अपनी कुर्सी और अपने मफ़ाद में मसरुफ है, जबकि आग एक-एक कर सबको घेरे में ले रही है।

 हक़ीक़त ये है कि मुस्लिम दुनिया आज भी ख़ामोशी की गहरी क़ब्र में दबी हुई है। न कोई मुत्तहिद सियासी आवाज़, न कोई साझा फ़िक्री निज़ाम, और न ही ऐसा कोई लश्कर-ए-कलम जो ज़ुल्म के सामने दीवार बन सके। अरब हुक्मरान हों या ग़ैर-अरब मुस्लिम क़यादत, सब अपनी-अपनी कुर्सियों की हिफ़ाज़त में इस क़दर मग़्न हैं कि उन्हें ये नज़र ही नहीं आता कि आग उनके महलों की बुनियाद तक पहुँच चुकी है।

मुस्लिम दुनिया के पास न कोई यूरोपियन यूनियन है, न नाटो जैसा इत्तिहाद, न G7 जैसा असरदार ब्लॉक। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक ये है कि उसके पास वो हिकमत और सिविल नेटवर्क भी मौजूद नहीं जो मग़रिब में एक इशारे पर सड़कों पर उतर आता है। 
मग़रिब में NGOs, थिंक टैंक्स, मीडिया हाउस, यूनिवर्सिटीज़ और “ह्यूमन राइट्स” के झंडाबरदार एक स्विच दबते ही हुकूमतों के पीछे खड़े हो जाते हैं, उनकी जंगों को नैतिक जामा पहनाते हैं और मुख़ालिफ़ आवाज़ों को कुचल देते हैं।
इसके बरअक्स मुस्लिम दुनिया में न कोई ऐसा आलमी नेटवर्क है जो मग़रिबी तशद्दुद, पाबंदियों, बमबारी और तानाशाही के ख़िलाफ़ मुत्तहिद होकर खड़ा हो सके। न कोई साझा प्लेटफ़ॉर्म, न कोई असरदार नैरेटिव।
 यहाँ तक कि जब फ़लस्तीन जलती है, सीरिया खून में नहाता है, या ईरान और दूसरे मुल्क निशाने पर आते हैं, तो अरब हुक्मरानों की ज़बानें सियासि बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ पातीं।

अरब हुकूमतों की सबसे बड़ी नाकामी ये है कि उन्होंने अपनी अवाम को सिर्फ़ ख़ामोश तमाशाई बनने की तालीम दी है, सवाल करने वाला ज़ेहन पैदा नहीं किया। नतीजा ये है कि मुस्लिम दुनिया आज भी मग़रिबी मीडिया के बनाए हुए नैरेटिव के क़ैदी है और अपने ज़ख़्मों की तशरीह भी दूसरों की ज़बान से सुनती है।

ऐसे अंधेरे में BRICS एक नई उम्मीद है। ये कोई इस्लामी इत्तिहाद नहीं, मगर ये उस एक्तरफा निज़ाम को चैलेंज करता है जिसने सदियो से मुस्लिम दुनिया को दबाकर रखा है। BRICS कम-अज़-कम ये इशारा देता है कि दुनिया सिर्फ़ वॉशिंगटन, ब्रसेल्स और लंदन के इशारों पर नहीं चलेगी।

लेकिन सवाल ये है:
क्या मुस्लिम और ख़ास तौर पर अरब हुक्मरान इस मौके को समझेंगे?
या फिर ये भी एक और मौक़ा होगा जो ख़ामोशी, डर और खुदग़रज़ी की भेंट चढ़ जाएगा?

तारीख़ माफ़ नहीं करती।
और जो क़ौमें अपनी आवाज़ खो देती हैं, उन्हें दूसरों की जंगों में ईंधन बना दिया जाता है।

ईरान और वेनेज़ुएला ट्रम्प प्रशासन के गले की वो छचोंदर बन चुके हैं जिसे न निगला जा सकता है, न उगला। अगर ईरान के ख़िलाफ़ कोई बड़ी फ़ौजी मुहिम छेड़ी गई, तो ये सिर्फ़ मिडिल ईस्ट नहीं, बल्कि खुद अमरीका के लिए भी अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ से कहीं बड़ा अलमिया साबित होगी।
तारीख़ गवाह है —
सल्तनतें तलवार से नहीं, ग़ुरूर से गिरती हैं।

लीबिया, इराक़, सीरिया, वेनेज़ुएला और क्यूबा — ये महज़ मुल्कों के नाम नहीं, बल्कि ज़िंदा सबक़ हैं। हर जगह कहानी एक ही रही: 
पहले नैरेटिव तैयार किया गया, फिर अवाम को गुमराह किया गया, उसके बाद “आज़ादी”, “इंसानी हुक़ूक़” और “जम्हूरियत” के नाम पर तबाही उतारी गई। सवाल ये है कि क्या मुस्लिम दुनिया ने इनमें से किसी एक तजुर्बे से भी कुछ सीखा?

लीबिया में गद्दाफि गिरा, मगर मुल्क भी उसके साथ दफ़न हो गया।
इराक़ में सद्दाम गया, मगर खुद मुुुखतारि भी चली गई।
सीरिया को बचाने की क़ीमत लहू से चुकानी पड़ी।
वेनेज़ुएला और क्यूबा पर बम नहीं बरसे, मगर पाबंदियों ने वही काम किया जो बम करते हैं।

हर जगह एक चीज़ मुश्तरका थी: मग़रिबी नैरेटिव।

आज की जंग सिर्फ़ टैंकों और मिसाइलों से नहीं लड़ी जाती, बल्कि डेटा, प्लेटफ़ॉर्म और स्क्रीन से लड़ी जाती है। जैसे ही जंग का आग़ाज़ होता है, स्टारलिंक सैटेलाइट ज़मीन पर उतर आते हैं, फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और दूसरी टेक कंपनियाँ अचानक “ख़ामोश” और “चुनिंदा” हो जाती हैं। कौन सा वीडियो दिखेगा, कौन सी तस्वीर ग़ायब होगी, कौन सी आवाज़ दबेगी — ये सब पहले तय होता है।

यही नाटो का सॉफ़्ट स्लिपर सेल है —
बिना बारुद बिना टैंक, मगर उतना ही जानलेवा।

मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी ग़लती ये रही कि उसने जंग को सिर्फ़ फ़ौजी मसला समझा, जबकि दुश्मन ने उसे ज़ेहनी, मीडिया और टेक्नोलॉजी की जंग बना दिया। हमारे पास न कोई साझा मीडिया नैरेटिव है, न कोई आलमी डिजिटल नेटवर्क, न कोई ऐसा प्लेटफ़ॉर्म जो एक साथ खड़ा होकर मग़रिबी झूठ को चैलेंज कर सके।

अब सवाल ये नहीं कि दुश्मन क्या कर रहा है।
सवाल ये है कि हम क्या कर रहे हैं?

क्या हम अपनी ग़लतियों की इस्लाह करेंगे?
क्या हम दूसरों की तबाही से सबक़ लेंगे?
या फिर हर बार की तरह ख़ामोश रहकर अगला नंबर आने का इंतज़ार करेंगे?

ख़ामोशी अब बेगुनाही नहीं,
ख़ामोशी साझेदारी बन चुकी है।

अगर आज आवाज़ न उठी, नैरेटिव न बना, और ज़ेहनी ग़ुलामी से इंकार न किया गया —
तो कल तारीख़ हमें भी उन्हीं सफ़हों में दर्ज करेगी
जहाँ क़ौमें मिटती नहीं, मिटा दी जाती हैं।

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Muslim World Crisis: 57 Muslim Mumalik Ke Pas Koi Alliance Kyo Nahi?

Divided Muslim World: 57 Nations at U.S. Puppetry.

Muslim World in Crisis: From Fragmented Alliances to the Call for a New Global Order.
From Washington’s Puppetry to BRICS Revolution: Muslim World’s Defining Moment.
The Shocking Truth Behind Muslim Alliances: 57 Countries Trapped in Global Power Games.
57 Muslim Nations: Puppets of America or Architects of a New World Order?
The Muslim world, split across 57 countries, faces a defining choice in the era of shifting alliances. As global power tilts toward BRICS, the question remains: will Muslim nations continue under American influence or embrace a new world order? the urgency of unity, sovereignty, and the future of geopolitics.
बँटी हुई मुस्लिम दुनिया: गठबंधनों के दौर में 57 देशों की बेबसी और नए विश्व व्यवस्था की ज़रूरत.
The Shocking Truth Behind Muslim, 57 Muslim Nations, Global Power Games,
Is the Muslim World Ready to Break Free? 57 Nations Face Historic Choice.
ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है.

इतिहास से वर्तमान तक-
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान को सिर्फ़ एक नया राजनीतिक ढांचा नहीं दिया, बल्कि उसने पश्चिमी वर्चस्व को खुली चुनौती भी पेश की। 
आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने शाह पहलवी के पश्चिमीकरण और अमेरिका-परस्त नीतियों के ख़िलाफ़ जो तेवर दिखाए, वही तेवर आज आयतुल्लाह ख़ामेनेई के नेतृत्व में किसी न किसी रूप में जारी हैं। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज का दौर कहीं ज़्यादा जटिल, खतरनाक और वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा ईरान: दबाव, प्रतिबंध और आंतरिक चुनौतियाँ

आज ईरान अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने आम ईरानी नागरिक की ज़िंदगी मुश्किल बना दी है। महंगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष बढ़ा है।
इन हालात में बाहरी ताक़तें आंतरिक असंतोष को हथियार बनाकर ईरानी राज्य को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं। तथाकथित “कलर रिवॉल्यूशन” की रणनीतियाँ—सोशल मीडिया, आर्थिक दबाव और नैरेटिव वॉर—ईरान के ख़िलाफ़ खुलकर इस्तेमाल हो रही हैं.

पश्चिम और यूरोप का दोहरा क़िरदार.

पश्चिम, ख़ासकर अमेरिका और यूरोप, मानवाधिकार और लोकतंत्र की बातें करता है, लेकिन ईरान के मामले में उसका रवैया पूरी तरह दोहरा नज़र आता है।
एक तरफ़ वे कहते हैं कि उन्हें ईरानी जनता की चिंता है, दूसरी तरफ़ वही देश ऐसे प्रतिबंध लगाते हैं जिनका सबसे ज़्यादा असर आम जनता पर पड़ता है, न कि सत्ता के केंद्र पर।

यूरोप कूटनीति की भाषा बोलता है, लेकिन व्यवहार में वह अमेरिकी लाइन से बाहर जाने का साहस नहीं दिखा पाता। परमाणु समझौते (JCPOA) का टूटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ यूरोप ने वादे किए, लेकिन निभाने में नाकाम रहा।

अरब देशों की मौक़ापरस्ती और दिखावटी एकजुटता.

मुस्लिम दुनिया आज पहले से कहीं ज़्यादा बंटी हुई है। न कोई साझा रणनीति है, न कोई सामूहिक नेतृत्व।

जब अमेरिका या इसराइल ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक क़दम उठाते हैं, तब अरब और मुस्लिम देश बयान जारी कर निंदा ज़रूर करते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका रवैया पूरी तरह अलग होता है।

कई अरब देशों के इसराइल से मज़बूत राजनयिक और सुरक्षा संबंध हैं। अमेरिका के सैन्य अड्डे इन्हीं देशों की ज़मीन पर मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह निंदा असली होती है या सिर्फ़ “चेहरा बचाने” की कोशिश?

इसराइल की साज़िश और क्षेत्रीय अस्थिरता.

ईरान को क्षेत्रीय ख़तरे के रूप में पेश करना इसराइल की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा रहा है। परमाणु कार्यक्रम को बहाना बनाकर ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना, प्रतिबंधों को सही ठहराना और सैन्य कार्रवाई के लिए माहौल बनाना—यह सब उसी साज़िश का हिस्सा है।

इसराइल जानता है कि एक मज़बूत और स्वतंत्र ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए चुनौती है। इसलिए वह अमेरिका और पश्चिम को लगातार टकराव की ओर धकेलता है।

अमेरिका-ईरान टकराव और मुस्लिम देशों की दुविधा.

अगर अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध होता है, तो मुस्लिम देशों के सामने सबसे बड़ी दुविधा खड़ी होगी।

एक तरफ़ वे अमेरिका से अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते नहीं तोड़ना चाहेंगे, दूसरी तरफ़ मुस्लिम जनता के सामने अपनी शाख भी बचानी होगी।

इतिहास बताता है कि ज़्यादातर मामलों में ये देश खुलकर विरोध नहीं कर पाएंगे। सैन्य अड्डों के इस्तेमाल से इनकार करना उनके लिए आसान नहीं होगा, ख़ासकर ट्रंप जैसे नेताओं के दौर में, जहाँ कूटनीति से ज़्यादा “एक्शन” को तरजीह दी जाती है।

संख्या बहुत, ताक़त शून्य.

आज की मुस्लिम दुनिया एक कड़वी हक़ीक़त से जूझ रही है। 57 मुस्लिम देश होने के बावजूद न कोई साझा सोच है, न कोई संयुक्त रणनीति और न ही फ़ैसले लेने की मज़बूत सामूहिक व्यवस्था। यह सिर्फ़ कमजोरी नहीं, बल्कि मुस्लिम अभिजात वर्ग की खुली ग़द्दारी और नाकामी को उजागर करता है।
जिस दौर में अमेरिका और यूरोप नए औपनिवेशिक साम्राज्यवाद को नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं, उस दौर में मुस्लिम देशों का बिखरा रहना इस बात का संकेत है कि वे दबाव के आगे समर्पण कर चुके हैं। न एकता बची है, न संप्रभुता।

यूरोप और पश्चिम: गठबंधन ताक़त कैसे बनते हैं?
यूरोप और पश्चिमी दुनिया की असली ताक़त उनके हथियारों में नहीं, बल्कि गठबंधनों में है।
  • NATO सैन्य दबाव का औज़ार है

  • EU आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम है

  • G7 वैश्विक नीतियों को दिशा देने वाला मंच है

इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये पश्चिमी देश न सिर्फ़ आपस में जुड़े रहते हैं, बल्कि विकासशील और कमजोर देशों पर अपनी शर्तें भी थोपते हैं—चाहे वो अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या सुरक्षा नीतियाँ।

यही कारण है कि पश्चिमी देश अलग-अलग दिखते हुए भी संकट के समय एक ब्लॉक बन जाते हैं।

OIC और GCC: नाम बड़े, असर शून्य.
इसके उलट मुस्लिम दुनिया के पास मौजूद संगठन.
  • OIC (इस्लामिक सहयोग संगठन)
  • GCC (खाड़ी सहयोग परिषद)

सिर्फ़ काग़ज़ी संस्थाएँ बनकर रह गई हैं।
न OIC के पास कोई ठोस राजनीतिक शक्ति है, न कोई सामूहिक सुरक्षा ढांचा। न ही GCC तेल और धन के बावजूद मुस्लिम दुनिया को जोड़ने में सफल हो पाया।

इन मंचों से न तो कोई निर्णायक राजनीतिक फ़ैसला निकलता है, न कोई साझा आर्थिक या सांस्कृतिक रणनीति बनती है। न व्यापार के लिए खुला नेटवर्क, न परिवहन की साझा व्यवस्था, न मुद्रा सहयोग—कुछ भी नहीं।

57 देश, फिर भी कोई एलायंस नहीं.
यह सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुस्लिम दुनिया के पास:
  • विशाल जनसंख्या
  • अपार प्राकृतिक संसाधन
  • ऊर्जा का नियंत्रण
  • रणनीतिक भू-स्थान

सब कुछ मौजूद है, तो फिर कोई मज़बूत मुस्लिम एलायंस क्यों नहीं?
कोई साझा करेंसी नहीं, कोई संयुक्त बैंकिंग सिस्टम नहीं, कोई रक्षा गठबंधन नहीं। हर देश अलग-अलग पश्चिम की ओर देख रहा है, जैसे सुरक्षा और तरक्की की चाबी वहीं रखी हो।
यही बिखराव मुस्लिम दुनिया को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाता जा रहा है।

BRICS और नया विश्व व्यवस्था: एक मौका.

इसी पृष्ठभूमि में BRICS का उभार बेहद अहम हो जाता है। यह मंच अमेरिका के एकध्रुवीय दबदबे को चुनौती देता है और एक मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रखता है।

नई विकास बैंक, डॉलर के विकल्प की चर्चा और दक्षिण-दुनिया सहयोग—ये सब संकेत हैं कि दुनिया बदल रही है।
लेकिन अफ़सोस, मुस्लिम देश इस बदलाव में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ़ दर्शक बने हुए हैं।

सऊदी–पाकिस्तान–तुर्किये गठबंधन: देर से सही, सही क़दम.

हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक सहयोग और उसमें तुर्किये के शामिल होने की ख़बरें उम्मीद की किरण ज़रूर हैं।

यह गठबंधन:

  • सैन्य सहयोग
  • रक्षा उद्योग
  • कूटनीतिक समन्वय
जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम दुनिया को नई दिशा दे सकता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि यह पहल बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। अगर ऐसे गठबंधन 20–30 साल पहले बने होते, तो आज मुस्लिम दुनिया की स्थिति बिल्कुल अलग होती।

या तो एकता, या फिर इतिहास में गुमनामी

आज मुस्लिम दुनिया दोराहे पर खड़ी है।
या तो वह पश्चिमी साम्राज्यवाद के आगे झुकी रहे, बयानबाज़ी और मौक़ापरस्ती करती रहे—
या फिर साझा सोच, साझा रणनीति और साझा गठबंधनों के ज़रिये अपनी संप्रभुता को फिर से हासिल करे।
अगर 57 देश मिलकर भी एक मज़बूत राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक ब्लॉक नहीं बना सके, तो इतिहास यही लिखेगा कि यह सिर्फ़ बाहरी साज़िश नहीं थी—
यह अंदरूनी कमज़ोरी और नेतृत्व की नाकामी थी।

ईरान: एक मुल्क नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़ा एक नया निज़ाम.

ईरान आज सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा प्रतीक है जो अमेरिकी वर्चस्व पर टिकी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम दुनिया इस चुनौती में उसके साथ खड़ी हो पाएगी?
जब तक मुस्लिम देशों की नीतियाँ मौक़ापरस्ती, डर और दोहरे मानदंडों से बाहर नहीं आतीं, तब तक न तो असली एकता संभव है और न ही संप्रभुता।
 तारिख गवाह रहेगा कि एक-एक करके सबने साम्राज्यवादी दबाव के आगे घुटने टेक दिए—बिना किसी साझा प्रतिरोध के।

ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है—ऐसा निज़ाम जो अमेरिकी वर्चस्व, पश्चिमी शर्तों और ज़ायोनिस्ट एजेंडे को खुलकर चुनौती देता है। यही वजह है कि यूरोप और अमेरिका दोनों को ईरान कभी स्वीकार्य नहीं रहा।

ईरान की सबसे बड़ी “ग़लती” यह है कि वह न तो इसराइल के सामने झुकता है और न ही वॉशिंगटन की मुख़बिरी करता है। 
पश्चिम जिस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को “नियम-आधारित व्यवस्था” कहता है, दरअसल वह उनके बनाए हुए मानकों का ढांचा है—जहाँ वही तय करते हैं कि कौन लोकतांत्रिक है, कौन ख़तरा है और कौन दुश्मन। ईरान इस ढांचे में फ़िट नहीं बैठता, इसलिए उसे अस्वीकार्य घोषित कर दिया गया।

यूरोप और अमेरिका को ऐसा ईरान चाहिए था जो शाह पहलवी के दौर की तरह पश्चिम-परस्त हो—जो इसराइल को बिना सवाल किए स्वीकार करे, अपने परमाणु कार्यक्रम से हाथ खींच ले और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को त्याग दे। पहलवी शासन उनके लिए इसलिए सुविधाजनक था क्योंकि वह न सिर्फ़ अमेरिकी हितों का संरक्षक था, बल्कि क्षेत्र में ज़ायोनिस्ट हितों की भी रक्षा करता था।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने इस पूरी व्यवस्था को पलट दिया। पहली बार मध्य-पूर्व में एक ऐसा राज्य उभरा जिसने कहा कि वह न तो अमेरिका के आदेशों पर चलेगा और न ही इसराइल के अस्तित्व को वैधता देगा।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी सिर्फ़ ऊर्जा या तकनीक का मुद्दा नहीं है; यह ख़ुदमुख़्तारी और संप्रभुता का प्रतीक है। पश्चिम चाहता है कि तकनीक सिर्फ़ उन्हीं देशों के पास हो जो उनकी लाइन पर चलते हों। जो देश स्वतंत्र नीति अपनाता है, उसके लिए वही तकनीक “ख़तरा” बन जाती है। यही दोहरा मापदंड ईरान के मामले में साफ़ दिखाई देता है।

ज़ायोनिस्ट लॉबी के लिए ईरान इसलिए भी असहज है क्योंकि वह सिर्फ़ विरोध नहीं करता, बल्कि क्षेत्रीय नैरेटिव को चुनौती देता है। फ़िलिस्तीन के सवाल पर उसका रुख़ नैतिक और राजनीतिक—दोनों स्तरों पर पश्चिमी चुप्पी को बेनक़ाब करता है। इसराइल की सुरक्षा-केन्द्रित सोच के लिए ऐसा वैचारिक प्रतिरोध किसी सैन्य चुनौती से कम नहीं।
यही कारण है कि आज भी पश्चिम ईरान में शासन परिवर्तन का सपना देखता है। कभी प्रतिबंधों के ज़रिये, कभी आंतरिक असंतोष को हवा देकर और कभी पहलवी परिवार जैसे प्रतीकों को दोबारा सामने लाकर। उद्देश्य साफ़ है—ईरान को फिर से उस ढांचे में लाना जहाँ वह इसराइल को स्वीकार करे, अमेरिकी शर्तों पर चले और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दे।

लेकिन ईरान का महत्व इसी में है कि वह झुकने से इनकार करता है। वह यह संदेश देता है कि दुनिया सिर्फ़ एक ध्रुव पर नहीं चल सकती। इसी वजह से ईरान आज केवल एक देश नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़े नए विश्व दृष्टिकोण का प्रतिनिधि बन चुका है—और यही बात पश्चिम को सबसे ज़्यादा बेचैन करती है।

इस पूरे परिदृश्य में शाह पहलवी के वारिस की हालिया घोषणाएँ पश्चिमी मंसूबों को और ज़्यादा बेनक़ाब करती हैं। उसने खुले तौर पर यह संकेत दिया है कि अगर उसे सत्ता मिलती है तो वह इसराइल को तुरंत तस्लीम करेगा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ख़त्म कर देगा और अमेरिका के इशारों पर चलने वाली सरकार बनाएगा।
यह साफ़ संदेश है कि बदले में पश्चिम ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटा देगा, लेकिन इसकी क़ीमत ईरान को अपनी ख़ुदमुख़्तारी, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी। ऐसा शासन ईरान का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अमेरिका की कठपुतली होगा—जो वॉशिंगटन और यूरोप के हितों की रखवाली करेगा, न कि ईरानी अवाम के।
असल में यह कोई “लोकतांत्रिक विकल्प” नहीं, बल्कि ईरान को दोबारा उसी दौर में ले जाने की कोशिश है जहाँ पहलवी सत्ता पश्चिम के दरबार में बैठकर हुक्म बजाती थी। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान सिर्फ़ एक देश नहीं रहेगा, बल्कि हमेशा के लिए यूरोपीय और अमेरिकी एजेंडे का ग़ुलाम बन जाएगा.
57 Muslim nations stand divided—will they remain American puppets or rise with BRICS into a new world order?

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Do Qibla Ki Siyasat: Muslim Hukmran Aur Awam Al-Quds

Kya Muslim Duniya Ka Asal Qibla Al-Quds Hai Ya White House? Haqeeqat Ka Inkishaaf!

Arab Leaders Exposed: Palestine Support or White House Politics? The Double Standard Revealed!
मुस्लिम हुक्मरानों का दोहरा चेहरा: क़ुद्स की नारेबाज़ी, वाशिंगटन की पैरवी
अक़्सा की हिफ़ाज़त या अमन के काग़ज़? जॉर्डन–इस्राइल तर्ज़-ए-तअल्लुक़ात.
The Arab world often speaks loudly for Palestine, yet many governments quietly align with global powers. This double standard raises tough questions about loyalty, justice, and the future of the Muslim ummah. Explore the hidden truths behind Arab politics and Palestine’s struggle.
Arab politics White House influence.
Truth about Arab Palestine stance.
Arab leaders and Palestine conflict.
Palestine vs Arab governments.
Who ruled the world, Palestine, Gaza, Abraham Accords, Muslim World, Arab Spring, Egypt Spring, Sisi govts, Islamic Rulers,
Arab Palestine double standard.
यह बहस सिर्फ सियासत नहीं, उम्मत की रूह की पुकार है: हुक्मरानों का क़िब्ला अक्सर व्हाइट हाउस साबित होता है, जबकि अवाम का क़िब्ला मस्जिद-ए-अक़्सा और फ़िलिस्तीन की हिफ़ाज़त है। इस फासले ने मुस्लिम दुनिया की शाख, ताअल्लुक़ात और अक़ीदती अहद को कमज़ोर किया, और यही दोहरापन आज की तबाही की जड़ है। 

मुस्लिम हुक्मरानों का दोहरा क़िब्ला: अवाम अल-क़ुद्स की, हुकूमतें व्हाइट हाउस की.

मुस्लिम दुनिया के हुक्मरानों की ताज़ा सियासत में एक कड़वा सच उभरता है: अवाम फ़िलिस्तीन के साथ खड़ी है, मगर हुकूमतें वाशिंगटन और तेल-अवीव के दरबार में पैर ज़्यादा जमाती दिखती हैं। अब्राहम अकोर्ड्स, इज़राइल-जॉर्डन मुआहिदा, और मिस्र में 2013 की तख्था-पलट—ये तीनों मिसालें दिखाती हैं कि कैसे कूटनीतिक “वाक़ेअत” ने उम्मत की तवक़्क़ोआत को गिरवी रख दिया।

- व्हाइट हाउस बनाम मस्जिद-ए-अक़्सा  
  अवाम का रुख़ अल-क़ुद्स और फ़िलिस्तीन की हिमायत है, जबकि कई हुकूमतें ताल्लुक़ात-ए-ख़ारिज़ा में वॉशिंगटन-मरकज़ि मंसूबों को तरजीह देती हैं, जिसका खुला इज़हार 2020 के अब्राहम अकोर्ड्स और उससे पैदा होने वाले रिश्तों के जाल में नज़र आता है।

- UAE की इज़राइल से नार्मलाइज़ेशन  
  UAE–इज़राइल इत्तिफ़ाक वाइट हाउस में दस्तख़्त होकर जनवरी 2021 में नाफ़िज़ हुआ, जिस से अरब-इस्राइल नार्मलाइज़ेशन की रफ़्तार तेज़ हुई और पूर्व-ख़फ़िया ताल्लुक़ात को खुला फ्रेम मिल गया—यही वह मोड़ है जहाँ अवामी जज़्बात और हुकूमती मंसूबों में खाई और गहरी दिखी।

- जॉर्डन की अल-अक़्सा में वक़्फ़ी भूमिका और अमन-मुआहिदा  
  1994 के शांति मुआहिदे में जॉर्डन के “ख़ुसूसी किरदार” को तस्लीम किया गया, मगर असल इख़्तियारात इस्राइली सेक्योरिटी सुपरविज़न के साये में हैं—यानी अल-अक़्सा की हिफ़ाज़त का दावा काग़ज़ पर मजबूरियों के साथ बंधा है, और यही सियासी तनाज़ुर अवाम-हुकूमत फासले को बढ़ाता है।

- मिस्र: हक़ीक़त-ए-क़ुर्सी  
  3 जुलाई 2013 को जनरल अब्दुल फ़तह अल-सीसी ने मोहम्मद मुर्सी को हटाकर इंतेज़ामी दौर का नक़्शा पेश किया, ऐडली मंसूर को आर्बिटरी सदर बनाया और सियासी ढांचे को फ़ौजी निगरानी में रीडिज़ाइन किया—यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने अरब बहार के मिस्री सफ़े को पलट दिया।

- तख्ता पलट के बाद बाहरी सहारा  
  रियाज़, अबूधाबी और कुवैत से अरबों डॉलर की फ़ौरी मालियाती मदद आई; रिसर्च बताती है कि खाड़ी हमीदीन की तेजी से ताईद और फंडिंग-डिपॉज़िट्स ने सीसी निज़ाम की सांसें खोलीं—इस सिलसिले में अमेरिका-इस्राइल-खाड़ी की सपोर्ट को भी तनाज़ुर में बयान किया गया है। 

“जनता के नाम” और “आतंक के ख़िलाफ़” 
  ब्रिटैनिका के ताज़ा तज्ज़िए और दस्तावेज़ी हवाले बताते हैं कि सड़कों के “मंडेट” और “आतंक से जंग” की तर्ज़ ने तख्ता पलट के बाद क़ानूनी-नैरेटिव को मज़बूत किया—मगर नतीजा सख़्त पकड़, मुखालिफ़ आवाज़ों पर शिकंजा, और अवाम-हुक्मरान दरम्यान भरोसे की खाई।

 मुल्क-दर-मुल्क का क़िब्ला अव्वल वाशिंग्टन

- पाकिस्तान  
  कूटनीतिक बयानों में फ़िलिस्तीन-हमायत की धुन रहती है, मगर क़ौमी माअशियात की गिरफ़्त—IMF वग़ैरह—बाहरी इशारों पर इबारत लिखवाती है; यही इक्तेसादी इनहिसार सियासी आज़ादी को महदुद करके अवामी जज़्बात से फासला पैदा करता है।

- तुर्किये  
  नाटो रुक्नियत और मग़रिबी तवाज़ुनात तुर्की की बाहरी पॉलिसी को बांधते हैं; ग़ज़ा के इम्तिहान में सख़्त अमली क़दमात की जगह बयानात और मीडिया-डिप्लोमेसी का पलड़ा भारी दिखता है—यानी क़ियादत का दावेदारी बयान से आगे जाकर लागत मांगती है।

- UAE  
  अब्राहम अकोर्ड्स ने UAE–इज़राइल ताल्लुक़ात को धोके भर की ख़ामोश समझदारियों से निकालकर औपचारिक भागीदारी में बदला—तिजारत, सफ़ारत, और टेलिफ़ोनी–उड़ानों का खुलना नई मैपिंग की दलील बना, जो अवाम के फ़िलिस्तीनी दर्द से टकराती है।

- जॉर्डन  
  हरम-ए-क़ुद्स में जॉर्डन वक़्फ़ की दिन-ब-दिन इदारा-साज़ी बनी रही, मगर अमन-मुआहिदा के तहत इस्राइली सिक्योरिटी सुपर्विज़न ने असल तहफ़्फ़ुज़ात को सीमित रखा—इसी दोहरे तर्ज़ के कारण अवामी नज़र में हिफ़ाज़ती दावे कमजोर महसूस होते हैं। 

- सऊदी अरब  
  2013 की मिस्री तख्ता पलट पर फ़ौरन हिमायत और बाद-अज़ां मालियाती बैकिंग ने रियाज़ की रिजनल प्रायॉरिटीज़ को वाज़ेह किया—हिफ़ाज़त-ए-हरमैन के दावे के साथ रियल-पॉलिटिक का यह मेल अवाम की तवक़्क़ोआत से टकराता है।

- ईरान  
  फ़िलिस्तीन पर बुलंद बयानात के बावजूद, मैदान-ए-अमल में स्ट्रैटेजिक सेल्फ-इंटरेस्ट हावी रहता है; रिजनल प्रॉक्सी–हिसाब–किताब ने वसीअ-उम्मती मक़सदात को अक्सर क़ौमी अजेंडे के पीछे धकेला।

 मिस्र में सीसी की हुकूमत.
- 3 जुलाई 2013: फ़ौज के सरबराह अल-सीसी ने मुर्सी की बरतरफ़ी, शूरा कौंसिल की तहलील और इंतेज़ामी नक़्शा एलान किया; ऐडली मंसूर को आर्बिटरी सदर बनाया गया, जब कि मुर्सी को हिरासत में रखा गया।

- खाड़ी सपोर्ट: सऊदी, UAE, कुवैत से लगभग 12 अरब डॉलर के पैकेज और लंबी मियाद के डिपॉज़िट्स—केंद्री बैंकी रिकार्ड और तज्ज़िया मिस्र की न्यू-लिक्विडिटी का अहम सोर्स बताते हैं।

- बाहरी बैकिंग का सियासी असर: रियाज़ और अबूधाबी की फ़ौरन हिमायत, और वॉशिंगटन–तेल-अवीव की रज़ामंदी ने “आर्ब स्प्रिंग” के मिस्री मोर्चे को पलट दिया, जिससे “क़ानून-ओ-कायदा” के नाम पर सख़्त गिरफ़्त का दौर शुरू हुआ। 

- शख्सियत-साज़ी: BBC और मगरिबि लेफ्ट मिडिया सीसी को “आयरन ग्रिप” वाले हाकिम के तौर पर बयान करते हैं—इस्तिहकाम की कीमत सियासी आज़ादियों की सिकुड़न और मुख़ालिफ़ आवाज़ों की दमनकारी पॉलिसी बनी।

- नैरेटिव का रंग: ब्रिटैनिका के मुताबिक़ “आतंक से जंग” और “जनता का मंडेट” जैसी तर्ज़ों ने क़ू के बाद क़ानूनी-नैरेटिव को शह दी.

 नुक्ता-ए-नज़र 
- “क़िब्ला-ए-अव्वल व्हाइट हाउस” का मतलब यह कि पॉलिसी-बनाने में अवामी रुज्हानात पर बाहरी हमायत, फंडिंग और सेक्योरिटी-मैट्रिक्स हावी हो जाते हैं—नार्मलाइज़ेशन और अमन-मुआहिदे इसी जंगल में रास्ते बनाते हैं।
“अवाम मस्जिद-ए-अक़्सा के साथ” का मफ़हूम यह कि स्ट्रीट-सेंटिमेंट और दुआ-ए-क़िब्ला फ़िलिस्तीन की मज़हबी-सियासी हिफ़ाज़त से वाबस्ता है, मगर हुक्मरानों के तआवुनी डाँचे अक्सर इसके बरअक्स कदम रखते हैं। 

- “हुकूमत इस्राइल के साथ” की तश्कील UAE–इज़राइल इत्तिफ़ाक़ात, मिस्र–इस्राइल इत्तिफ़ाक़ात और जॉर्डन–इस्राइल अमन–मुआहिदे की मौजूदगी से वाज़ेह होती है—यानी नज़्म-ओ-नसक़ की मजबूरियाँ अवामी तवक़्क़ोआत से टकराती हैं।

इस्लामी दुनिया की सियासत आज ऐसी मोड़ पर है जहाँ हुक्मरान का सज्दा वाशिंगटन की जानिब जाता है, मगर आवाम का दिल अब भी मस्जिद-ए-अक़्सा की तरफ़ झुका हुआ है।  
फ़िलिस्तीन के बच्चों पर बम गिरते हैं, और अरब-अज्म के हुक्मरान मौशिक़ि का लुत्फ लेते हुए अपने "दोस्त मुल्कों" को शाबाशी भेजते हैं।

पाकिस्तान: जो कभी उम्मत की उम्मीद कहलाता था, आज IMF की रस्सी से बंधा है। हुकूमतों की जुबाँ उम्मत के लिए नरम और अमेरिका के लिए सख़्त होनी चाहिए थी, मगर अब उल्टा मंज़र है।  

तुर्किये: सुल्तानियत का नकाब पहनकर नाटो की रिहर्सल करता है। जब ग़ज़ा सुलगती है, अंकारा केवल बयान जारी करता है। उम्मत को लाइक्स और ट्वीटों से नहीं, अमल से रहनुमाई चाहिए।  

UAE: ने तो खामोशी से मुस्कराते हुए तिलक लगा लिया — इज़राइल से हाथ मिलाकर उम्मत की हड्डियों पर सेतु बना लिया। उनकी बहार अब तेल के नहीं, शर्म के कुओं से फूटती है।  

जॉर्डन: का हाल ऐसा कि मस्जिद-ए-अक़्सा की चौकीदारी का दावा करता है, मगर हर समझौते में यहूदी राज़ को सज़दा करता है। उनकी खामोशी बाज़ार में बिक चुकी है।
  
सऊदी अरब: हरमैन की सरज़मीं होते हुए भी "विजन 2030" के नाम पर मगरिबि लिबास पहन चुका है। अंग्रेज़ी बोलने वाले शेख़ अब उम्मत की बजाए निवेश और कन्सर्ट्स के राज़दान बन गए हैं।  

ईरान: जो फ़िलिस्तीन का सबसे बड़ा हमदर्द कहा जाता है, दरअसल अपने नफ़्स और सियासी अजेंडे का असिर है। उसकी लफ़्ज़ी जंग ज़्यादा और अमली मदद कम है। 
 
मिस्र के फ़तह अल-सीसी:  अरब बहार की क़ब्र खोदने वाला आदमी। उसने अपने ही अवाम पर टैंक्स चलाए और फिर अमरीकी मुआवज़े से कुरसी को थामा। उसकी सियासत में उम्मत का लहू महज़ फुटनोट है।  

 नतीजतन इशारा
जब तक अवाम का क़िब्ला और हुक्मरानों की कूटनीति के क़िब्ले में यह बुनियादी फासला रहेगा, उम्मत का तवाज़ुन मुज़्तरिब और तावान ख़तरे में रहेगा—इत्तिहाद की ज़मीन बयान से नहीं, बेबाक और अमली इस्लामी उसूलों पर मुश्तमिल पॉलिसी से तैयार होगी। 
मुस्लिम हुकमरानो को यह समझना होगा कि असल ताक़त न दौलत से आती है, न सियासत के खेल से। असल ताक़त आती है इमान, इंसाफ़ और इत्तेहाद से। जब हुक्मरान अपना रुख़ अल-अक़्सा और कुरआन की रोशनी की तरफ़ मोड़ेंगे, तभी उम्मत को इज़्ज़त और सुकून मिलेगा। वरना अगर क़िब्ला व्हाइट हाउस की तरफ़ रहेगा, तो अवाम हमेशा बेचैन और मजबूर रहेगी। यह वक़्त है कि मुस्लिम हुक्मरान अपनी सियासत को अपनी रूहानी ज़िम्मेदारी के साथ जोड़ें और उम्मत को यक़ीन और अमन का रास्ता दिखाएँ।

या अल्लाह, मुस्लिम उम्मत को इत्तेहाद और इमान की रोशनी अता फ़रमा। हुक्मरानों को इंसाफ़ और अदल की राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। उम्मत के लिए अमन, इज़्ज़त और तरक़्क़ी का दरवाज़ा खोल दे। आमीन।

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Fall of Fatimid Rule & Rise of Salahuddin Ayyubi.

From Fatimid Decline to Salahuddin’s Glory.

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ज़वाल से उरूज तक: फ़ातिमी से अय्यूबी का सफ़र.
"ज़वाल और उरूज—दोनों इंसानियत को याद दिलाते हैं कि हक़ और सब्र ही असली जीत है।" सलाहुद्दीन अय्यूबी का उरूज, इमान और हिम्मत से नई तारीख़ लिखी जाती है।

 फ़ातिमी हुकूमत  का ज़वाल और सलाहुद्दीन अय्यूबी का उरूज: तारीख़ का एक नया मोड़

फ़ातिमी हुकूमत , जो कभी शुमाली अफ़्रीक़ा (North Africa), मिस्र और शाम (Syria) पर अपनी शान-ओ-शौकत का सिक्का जमाए हुए थी, आख़िरकार 1171 ईसवी में अपने अंजाम को पहुंची  यह एक अज़ीम-उश-शान शिया सल्तनत थी, लेकिन वक्त की गर्दिश और सियासी कमज़ोरियों ने इसकी बुनियादों को खोखला कर दिया था। इसके ज़वाल के पीछे तवील अरसे से जारी अंदरूनी साज़िशें, फ़ौजी कमज़ोरियां और सलीबी जंगों (Crusades) का बढ़ता हुआ दबाव कारफ़रमा था.

 फ़ातिमी सल्तनत के बिखरने के असबाब
फ़ातिमी हुकूमत का खात्मा रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह एक तवील सिलसिले का नतीजा था। जब सलीबी ताक़तें बैत-उल-मुक़द्दस की तरफ बढ़ रही थीं, उस वक्त काहिरा के तख्त पर वो मज़बूती नहीं रही थी जो कभी अल-मुइज़्ज़ या अल-अज़ीज़ के दौर में हुआ करती थी।

 1. यरुशलम का सुकूत और दिफ़ाई नाकामी
1099 ईसवी में जब पहली सलीबी जंग अपने उरूज पर थी, फ़ातिमी हुकूमत यरुशलम (Jerusalem) का मुअस्सिर दिफ़ा करने में नाकाम रही। यह एक बहुत बड़ा धक्का था, जिसके नतीजे में न सिर्फ़ यरुशलम, बल्कि फ़िलिस्तीन और शाम के कई साहिली इलाक़े सलीबियों के क़ब्ज़े में चले गए. यह वाक़या फ़ातिमी ताक़त के बिखरने की एक वाज़ेह अलामत बन गया था।

 2. सियासी बोहरान और अंदरूनी इख़्तिलाफ़
बारहवीं सदी के वस्त तक आते-आते फ़ातिमी हुक्मरान महज़ कठपुतली बनकर रह गए थे, और असल ताक़त उनके वज़ीरों के हाथ में आ चुकी थी। अंदरूनी साज़िशों ने रियासत को इतना कमज़ोर कर दिया था कि कभी यह बग़दाद की अब्बासी ख़िलाफ़त के लिए ख़तरा थी, लेकिन अब खुद अपने वजूद के लिए जूझ रही थी।

 सलाहुद्दीन अय्यूबी की आमद और नया सियासी मंज़रनामा

इस नाज़ुक दौर में, जब मिस्र सियासी तौर पर कमजोर था, वहां एक नई क़ियादत का ज़हूर हुआ। यह दौर था नुरुद्दीन ज़ंगी का, जो शाम से सलीबियों के ख़िलाफ़ जिहाद का परचम बुलंद किए हुए थे। उनका मक़सद मिस्र को सलीबी असर से बचाना और दोबारा इस्लमिक दायरे में लाना था।

 शेरकोह और सलाहुद्दीन का किरदार
नुरुद्दीन ज़ंगी ने अपने क़ाबिल सिपहसालार शेरकोह और उनके भतीजे सलाहुद्दीन अय्यूबी को मिस्र भेजा। इन दोनों का मक़सद मिस्र के वज़ीरों की आपसी रंजिशों का फ़ायदा उठाकर वहां इस्लामी इत्तेहाद क़ायम करना था। शेरकोह की वफ़ात के बाद, सलाहुद्दीन को वज़ारत का ओहदा मिला। यह वो मौक़ा था जहां से तारीख़ ने एक नया मोड़ लिया।

 फ़ातिमी हुकुमत का ख़ात्मा और ख़ुत्बे की तब्दीली

सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपनी हिकमत-ए-अमली और सियासी बसीरत से धीरे-धीरे मिस्र में अपनी पकड़ मज़बूत की।

-आख़िरी हुकमरान का इंतक़ाल: 1171 ईसवी में जब आख़िरी फ़ातिमी हुकमरा अल-आज़िद (Al-Adid) का इंतक़ाल हुआ, तो यह फ़ातिमी दौर का रस्मी तौर पर ख़ात्मा साबित हुआ।

अब्बासी ख़ुत्बे की बहाली: सलाहुद्दीन ने इंतेहाई होशियारी से काम लेते हुए मिस्र की मस्जिदों में जुमे के ख़ुत्बे में फ़ातिमी हुकुमत के बजाय बग़दाद के अब्बासी हुकमरान का नाम शामिल करवा दिया। यह इस बात का ऐलान था कि मिस्र अब मज़हबी तौर पर दोबारा बग़दाद और सियासी तौर पर नुरुद्दीन ज़ंगी की रियासत के ज़ेरे-असर आ चुका है.

 अय्यूबी सल्तनत का क़याम: एक नई ताक़त का जहूर

नुरुद्दीन ज़ंगी के इंतक़ाल के बाद हालात ने फिर करवट ली। सलाहुद्दीन, जो अब तक ज़ंगी सल्तनत के वफ़ादार थे, ने महसूस किया कि सलीबियों का मुक़ाबला करने के लिए मिस्र और शाम का एक मज़बूत मरकज़ पर मुत्तहिद होना ज़रूरी है।

 1. इत्तेहाद की कामयाबी
सलाहुद्दीन ने बिखरी हुई मुस्लिम रियासतों को एक झंडे तले जमा किया। उन्होंने दमिश्क़, हलब और मिस्र को मिलाकर एक ऐसी ताक़तवर अय्यूबी सल्तनत (Ayyubi Empire) की बुनियाद रखी, जिसने सलीबी रियासतों के गिर्द घेरा तंग कर दिया।

 2. सलीबियों के लिए नई चुनौती
अय्यूबी सल्तनत के क़याम ने सलीबियों के लिए एक नई और दुश्वारगुज़ार रुकावट खड़ी कर दी। वो ताक़त जो पहले मिस्र और शाम के दरमियान बँटी हुई थी, अब एक मुट्ठी बनकर उभरी। इसी इत्तेहाद का नतीजा था कि आगे चलकर हत्तीन की जंग में मुसलमानों को अज़ीम फ़तह नसीब हुई।

 मुख़्तसर जायज़ा (Conclusion)

फ़ातिमी ख़िलाफ़त का ज़वाल और सलाहुद्दीन का उरूज महज़ एक हुकूमत का बदलना नहीं था, बल्कि यह मशरिक़-ए-वुस्ता (Middle East) के सियासी और मज़हबी नक़्शे की अज़-सरे-नौ तश्कील थी। इस तब्दीली ने सलीबी जंगों का रुख़ पूरी तरह मोड़ दिया। जिस मिस्र को सलीबी एक आसान निवाला समझ रहे थे, वही उनके ख़िलाफ़ इस्लामी मुक़ामात (Resistance) का सबसे मज़बूत क़िला बन गया। सलाहुद्दीन की क़ियादत ने उम्मत को यह पैग़ाम दिया कि इत्तेहाद और मज़बूत इरादों से ही तारीख़ का रुख बदला जा सकता है.
फ़ातिमी हुकूमत का ज़वाल, सबक़ देता है कि ताक़त हमेशा के लिये नहीं होती।

सलाहुद्दीन अय्यूबी के मशहूर ज़ेरे-अक़वाल जो हमे तारिकि मे रौशनि दिखाता है.

"मुल्कों को तलवार से नहीं, इंसाफ़ से फ़तह किया जाता है।"

"हक़ की राह में सब्र सबसे बड़ी जंग है।"

"इंसान की असली जीत उसके अख़लाक़ और रहमदिल दिल में है।"

"जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए कोई ताक़त रुकावट नहीं बन सकती।"

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Musalman Galib Rahenge Chahe Israel aur Europe Jitni Bomb Giraye. Palestine lives

Gaza aur Palestine me Europe Nasal Kushi kaise kar raha hai?

Kaha Gaye Duniya ke Human rights, Womens Rights aur peace Community wale?
Israel Kis ke Madad se Palestine.Qatar,Lebnan par Bomb Gira raha hai?

Arabo ne jab Jab Salebi/Sahyuni (Europe) par Bharosa kiya tab Dhoka Mila?

Isreali aggression, UN peace, Arabs betrayel, Europe loyalty, Muslim Ummah and Palestine.

ہم ہی غالب رہیں گے-
غزہ لہو لہو ہے اور جگر پارہ پارہ.... کیوں کہ وہاں گرائے جانے والے ہر بم کے چھرّے ہمارے دل میں پوست ہو رہے ہیں.... ادھر ہونے والی آتش و آہن کی بارش ہماری روح کو جھلسا رہی ہے.... ہر نیا سورج ہمارے لیے سوز و غم اور حسرت و یاس کا طوفان لے کر آ رہا ہے.... ہر طرف بے یقینی کی کیفیت ہے.... لیکن میں ماضی کے جھروکے میں جھانک رہا ہوں....

مجھے 7 اکتوبر 2001ء کی وہ گھڑی یاد ہے، جب امریکا نے افغانستان پر پہلا بم گرایا.... اس کے بعد اس امت کے لیے ہر دن کسی ڈراؤنے خواب سے کم نہ تھا.... ہر لمحے کسی نہ کسی جگہ سے فضائی حملے، شہادتوں اور سقوط کی خبر آتی تھی.... ایسے تباہ کن بم گرائے جا رہے تھے کہ جسم مٹی اور فضا میں تحلیل ہو رہے تھے.... چند گھڑیوں قبل جس جگہ درجن بھر لوگ تھے.... بم گرنے کے بعد وہاں ایک انچ کا انسانی چھیتڑا نہ ملتا تھا.... امریکا کی فضائی طاقت کے آگے افغان اسی طرح بے بس تھے جیسے آج اہل غزہ....

ہر سوں بے یقینی تھی.... ہمت ٹوٹتی جاتی تھی.... امت کا مورال مسلسل گر رہا تھا.... 7 دسمبر 2001ء کو طال، بان نے قندھار بھی چھوڑ دیا.... امارت اسلامیہ کی بساط لپٹ گئی.... یوں لگا جیسے ایک حسین خواب تھا ٹوٹ گیا.... اور صبر کا امتحان شروع ہوگیا.... 20 سال ایمان کو ٹٹولا گیا.... عزم کو مانپا گیا.... "وزلزلوا زلزالا شديدا" کی مانند جھنجھوڑا گیا.... استقامت کو جانچا گیا.... یہاں تک کہ 2021ء میں اللہ سبحانہ وتعالیٰ نے 15 اگست کا دن دیکھنا نصیب کیا.... طالبان اس شان سے کابل میں داخل ہوئے کہ ہر غم دھل گیا.... ماضی کی تلخ یادیں کافور ہوگئیں.... ٹھنڈ کا ایک ایسا احساس ملا جو رگوں میں خون کے ساتھ دوڑتا محسوس ہوتا تھا....
اس لیے ہمیں کبیدہ خاطر نہ ہونا چاہیے.... مایوس وہ ہو جس کا خدا نہ ہو.... غزہ پر پریشانی اور غم کے بادل اہل ایمان کی پہلی آزمایش نہیں ہے.... "ولما يأتكم مثل الذين خلوا من قبلكم" کی قرآنی رہنمائی بتاتی ہے کہ انبیا سابقین اور ان کے مصاحبین پر جھنجھوڑ دینے والے ایسے امتحان آئے تھے کہ وہ "متى نصر الله" پکار اٹھے تھے.... اللہ سبحانہ وتعالی نے انہیں بھی تسلی دی تھی کہ "الا ان نصر الله قريب".... جس کے ساتھ ہی ہر بار آسمانی مدد ضرور اتری....

خندق میں جناب رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم اور آپ کے اصحاب پرت در پرت آزمایش میں تھے.... ایک طرف خوف، بھوک اور سردی.... تو دوسری جانب سامنے فولاد میں غرق اتحادی افواج اور پشت پر یہود و اہل نفاق.... پھر اللہ سبحانہ و تعالیٰ نے اپنے لشکر بھیجے.... آندھی، ملائکہ، دہشت اور دشمن کے دلوں و صفوں میں پھوٹ.... وہ اپنا تان توبڑا اٹھاکر فرار ہوگئے.... اہل ایمان کی ایسی نصرت کی گئی کہ عہد رسالت نئے دور میں داخل ہوگیا.... زبان مبارک سے نوید سنائی گئی: "الآن نغزوهم ولا يغزوننا".... اب ہم ان پر چڑھائی کیا کریں گے یہ ہم پر حملہ نہیں کریں.... پھر تین ہی سال میں مکہ مکرمہ فتح ہوگیا اور پانچ سال میں جزیرہ عرب سے ادیان باطلہ کو دیس نکالا دے دیا گیا....
اس لیے یاد رہے کہ "وانتم الاعلون ان كنتم مؤمنين" کا خدائی وعدہ ہر دور کے لیے ہے.... غزہ پر بھی نصرتِ خداوندی ضرور اترے گی.... جنگ کی آزمایش اس امت کے لیے ایمان کی کسوٹی ہے.... اس کے ذریعے اللہ تعالی ناپاکی کو پاکی سے نکال پھینکتے ہیں.... نفاق کو ایمان سے جدا کر دیتے ہیں.... "مروا دیا"، "تباہ کروا دیا"، "اجڑوا دیا" کہنے والے ہر دور میں ہماری صفوں میں موجود رہے ہیں.... 20 سال قبل بھی کچھ لوگوں کو وہی سب کچھ کہا گیا جو آج حماس اور دیگر فلسطینی مزاحمت کاروں کو کہا جا رہا ہے.... لیکن جس طرح دو دہائیوں بعد وہ زبانیں گنگ ہیں.... اسی طرح یہ آوازیں بھی دب مر جائیں گی....
غزہ میں بہائے گئے خونِ ناحق کے اس سمندر میں کفر کی شان و شوکت غرق ہوگی.... نفاق کے علاقائی تخت لرزیں گے.... گریں گے.... صرف فلسطین ہی آزاد نہیں ہوگا، بلکہ امت کو تقسیم کرنے والی ہر جغرافیائی حد برابر ہو جائے گی.... کیوں کہ یہ سرحدیں ریت پر کھنچی اس بے وقعت لکیر کی مانند ہیں جنہیں کمزور سی لہر مٹا دیتی ہے.... پھر خدا کی مشیت کے آگے ذلت کے یہ نقشے کیسے باقی رہ سکتے ہیں.... مسلمانوں کو عروج ضرور ملے گا، کیوں کہ ہمارا ایمان ہے کہ عزت صرف خدا، اس کے رسول اور انہیں ماننے والوں ہی کو سزاوار ہے.... لیکن بیمار دل ان باتوں کو سمجھ نہیں سکتے....

Munib Hussain
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Karbala Ka Jung: Yazeed Bin Muawiya ne Hussain R.Z. ke Qatil se Badla Kyu nahi Liya? Jung-E-Karbala Islamic History.

Karbala Ka Waqya. Yazeed bin Muawiya ne Hussain Razillahu Anahu ke Qatil se Badla Kyu nahi liya?

Karbala Ke Jung ke bad Jung-E-Hurra kyo hua?

Jab Hazrat Ali Razi Allahu Anahu ne Mushriko se Jung ka Elan kiya.

KArbala ki jung, Jung e karbala, Hussain rz aur Yazeed ki fauj, YAdeedi aur Hussaini

یزید بن معاویہ نے سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کے قاتلین سے قصاص کیوں نہ لیا ؟
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یزید بن معاویہ نے خون حسین رضی اللہ عنہ کا قصاص کیوں نہیں لیا ؟
اس سوال سے بڑا سوال یہ ہے کہ واقعہ کربلا کے معاصرین اور قرون مفضلہ کے سلف میں سے کسی نے یزید پر یہ اعتراض کیوں نہیں کیا کہ اس نے خون حسین رضی اللہ عنہ کا قصاص نہیں لیا ؟
بلکہ اعتراض کرنا تو دور کی بات ان میں سے کسی نے قصاص کا مطالبہ بھی نہیں کیا حتی کہ اہل بیت کے گھرانے سے بھی کسی نے قصاص کی کوئی مانگ نہیں کی ۔
بعض اس کا یہ جواب دیتے ہیں کہ یزید ہی قاتل تھا اس لئے یزید سے  قصاص کا مطالبہ نہیں ہوا ۔
لیکن یہ جواب ایک نیا سوال کھڑا کردیتا ہے کہ کیا اس دور کے لوگوں نے بھی یزید کو سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کا قاتل کہا ہے ؟ 
اگر اس جرم میں اسی کا ہاتھ تھا اس وجہ سے اس سے قصاص کا مطالبہ نہیں ہوا تو پھر اس جرم کا الزام بھی تو اسی پر لگنا چاہئے !
اب کوئی یہ نہ کہے کہ  یزید کے ڈر سے کسی نے یہ الزام نہیں لگایا ، کیونکہ جب یزید کو شرابی کہنے سے کچھ لوگ نہیں ڈرے تو یزید کو قاتل حسین (رضی اللہ عنہ )کہنے سے کیا چیز مانع ہوسکتی ہے؟
بہر حال یزید کو قاتل حسین (رضی اللہ عنہ) کہنے پر اس سوال کا جواب دینا ہوگا کہ آخر  اس وقت کے لوگوں نے اس معاملے میں یزید کو مجرم کیوں نہیں گردانا ؟ بالخصوص حرہ کے موقع پر کہ جب اہل مدینہ نے یزید کی بیعت توڑدی اور  یزید پر بہت سارے الزامات لگائے لیکن کسی نے  یزید پر یہ جرم عائد نہیں کیا کہ وہ سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کا قاتل بھی ہے۔
بلکہ ان سب سے بڑھ کر بات یہ ہے کہ سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کے بھائی محمد بن الحنفیہ رحمہ اللہ نے یزید کے جرائم اور اس کے گناہوں کی بابت سوال کیا تو مخالفین نے بہت کچھ کہا لیکن کسی نے یہ نہیں کہا کہ  وہ تو آپ کے بھائی حسین رضی اللہ عنہ کا قاتل ہے!
دوسری طرف صحابہ واہل بیت کی صریح شہادتیں موجود ہیں کہ انہوں نے عراقیوں کو سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کا قاتل قرار دیا ہے۔ اس لئے حق بات یہ ہے کہ یزید قاتل حسین (رضی اللہ عنہ ) نہیں ہے ۔
اب رہا یہ سوال کہ اگر یزید قاتل نہیں ہے تو یزید نے قاتلین حسین رضی اللہ عنہ سے قصاص کیوں نہیں لیا ؟؟؟
تو اس سوال کا درست جواب معلوم کرنے کے لئے  یہ جاننا ضروری ہے کہ قرون مفضلہ میں ہمیں شہداء کی دو قسمیں نظر آتی ہیں پہلی وہ قسم ہے جس میں سلف کے یہاں قصاص کا مطالبہ بھی ہوتا تھا اور قصاص لیا بھی جاتا تھا ، جبکہ اسی دور میں شہداء کی ایک قسم ایسی بھی نظر آتی ہے جن سے متعلق نہ تو قصاص کا مطالبہ ہوتا تھا اور نہ ہی قصاص لیا جاتا ہے اس دور کا یہی طرزعمل تھا ، تفصیل ملاحظہ ہو:
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① شہداء کی پہلی قسم:
وہ شہداء جو حالتِ امن میں شہید کئے گئے یعنی بوقتِ شہادت وہ کسی سے لڑائی کے لئے نہیں نکلے تھے نہ لڑنے والوں کے ساتھ شامل تھے ، نہ میدانِ جنگ کے آس پاس گئے بلکہ وہ اپنے گھروں میں تھے یا عادت ومعمول کے مطابق کسی کام میں مصروف تھے کہ اچانک ان پر حملہ کرکے ان کو ”شہید“ کردیا جاتا ہے۔
اسلامی تاریخ میں اس نوعیت کے جو بھی شہداء تھے ان سب کے خون کا قصاص لیا گیا اور قاتل کو قتل کیا گیا ۔ مثلا:
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➊  خلیفہ دوم سيدنا عمر بن الخطاب رضی اللہ عنہ
آپ کی شہادت حالتِ جنگ میں نہیں ہوئی ہے بلکہ عین حالتِ نماز میں مسجد میں آپ کو شہید کیا گیا ، ظاہر ہے کہ یہاں قصاص لازم ہے ۔
چنانچہ قاتل ابو لؤلؤ کو صحابہ نے مسجد میں ہی دبوچ لیا جس کے بعد اس نے خود کشی کرتے ہوئے خود کو ہی زخمی کرلیا [صحيح البخاري 3700]
اور واقدی کے بقول ”عبداللہ بن عوف زہری“ نے اس کا سر قلم کردیا [الطبقات الكبرى ط دار صادر 3/ 348]
بلکہ عمر رضی اللہ عنہ کے بیٹے عبید اللہ بن عمر کو جب پتہ چلا کہ ابو لؤلؤ کے گھر کے تین مزید لوگ اس قتل کی سازش میں شریک تھے تو انہوں نے ان کے گھر جاکر ان تینوں کو بھی قتل کرڈالا [مصنف عبد الرزاق 5/ 480 وإسناده صحيح]
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➋  خلیفہ سوم سيدنا عثمان بن عفان رضی اللہ عنہ
آپ کی شہادت بھی میدانِ جنگ میں نہیں ہوئی بلکہ آپ تو اپنے گھر میں اپنے بال بچوں کے ساتھ تھے ، کسی سے لڑائی کے لئے نہیں نکلے بلکہ خود پر حملہ کرنے والوں سے بھی مقابلہ نہ کیا بلکہ دوسرے خیر خواہوں کو بھی مقابلہ سے روک دیا حالانکہ آپ خلیفہ تھے [تاريخ خليفة بن خياط ص173وإسناده صحيح]
ظاہر ہے کہ ایسے امن پسند اور لڑائی سے ہاتھ روکنے والے اور وہ بھی خلیفہ اورجنتی صحابی کو ان کے گھر میں داخل ہو کر انتہائی بے دردی سے قتل کردیا جائے تو ایسے قاتلین سے قصاص لینا بہر صورت واجب ہوگا ، اسی لئے صحابہ کرام رضی اللہ عنہم نے قصاص کی مانگ کی بالاخر قاتلین عثمان میں سے ہر شخص یا تو ہلاک ہوا یا قصاصا معاویہ رضی اللہ عنہ نے اسے قتل کیا ۔
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➌  عبد الله بن خباب بن الأرت رحمہ اللہ
ان کو خوارج نے ناحق قتل کردیا تھا[المستدرك للحاكم، ط الهند: 2/ 153 وإسناده صحيح]
یہ مسلمانوں کی کسی بھی لڑائی میں شامل نہیں ہوئے بلکہ ہر طرح کی لڑائی سے خود کو الگ رکھنے والے تھے ، حمید بن ہلال ایک چشم دید گواہ ((اس کا نام نہیں لیا تاکہ خوارج اسے قتل نہ کردیں) کے حوالے سے بیان کرتے ہیں کہ ایک دن یہ اپنی حاملہ بیوی کے ساتھ کہیں جارہے تھے پھر خوارج نے ان سے حدیث رسول سنانے کو کہا تو انہوں نے وہ حدیث سنا دی جس میں اللہ کے نبی صلی اللہ علیہ وسلم نے مسلمانوں کی آپسی لڑائی میں سب سے الگ رہنے کا حکم دیا تھا یہ سن کو خوارج نے ان کو نہر کے کنارے لٹا کر ذبح کردیا اور ان کی بیوی کا پیٹ پھاڑ کر ان کے بچے کو قتل کردیا اور بیوی کو بھی مار ڈالا ۔ [المعجم الكبير للطبراني رقم 3629 وإسناده حسن لغيره والرجل المبهم صاحب حميد]
سیدنا علی رضی اللہ عنہ کو پتہ چلا تو انہوں نے خوارج سے کہا کہ ان کے قاتلین کو ہمارے حوالے کرو تاکہ ہم قصاص لیں کیونکہ انہوں نے ایک بے ضرر انسان کو ناحق قتل کیا ہے ۔ ان لوگوں نے کہا ہم سب نے قتل کیا تو علی رضی اللہ عنہ نے کہا کہ پھرہم ان سب سے جنگ کریں گے۔[مسدد بحوالہ : المطالب العالية 18/ 219 حسن لغيره إلا أحرفا يسيرة]
خوارج کا اس بے ضرر مسلمان کو اس کی بیوی و بچے کے ساتھ قتل کردینا اور پھر علی رضی اللہ عنہ کا قصاص کے لئے  ان قاتلین کو طلب کرنا یہی چیز جنگ نہروان کا سبب بنی ۔
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➍  خلیفہ چہارم سيدنا علی بن ابی طالب رضی اللہ عنہ
آپ کو بھی جب شہید کیا گیا تو آپ حالت جنگ میں نہیں تھے بلکہ نماز کی خاطر مصلی پر جارہے تھے اسی دوران عبدالرحمن ابن ملجم نے آپ پر قاتلانہ حملہ کردیا [مصنف ابن أبي شيبة 21/ 182 وإسناده صحيح]
جس کے کچھ دنوں بعد آپ کی وفات ہوئی رضي الله عنه۔[مقتل علي لابن أبي الدنيا ص82 وإسناده صحيح]
بعد میں حسن رضی اللہ عنہ کے خلیفہ بننے کے بعد ان کے حکم سے قاتل کو بھی قصاصا قتل کیا گیا ۔ [الطبقات الكبرى ط دار صادر 3/ 39 حسن بالشواهد]
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➎  سيدنا خارجہ بن حذافہ رضی اللہ عنہ
آپ عمروبن العاص رضی اللہ عنہ کے حکم سے ان کی جگہ نماز پڑھانے کے لئے مصلی پر جارہے تھے اسی دوران قاتل نے ان پر حملہ کیا جس سے وہ شہید ہوگئے ۔[فتوح مصر والمغرب ص131 وإسناده صحيح]
پھر گورنرمصر عمروبن العاص رضی اللہ عنہ نے اس قاتل کو قصاصا قتل کروایا ۔[تاريخ الطبري 5/ 149 فتوح مصر والمغرب ص131 وإسناده صحيح]
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✿ ◄ ◄ غور کریں ان تمام شہداء کی شہادتوں میں مشترک بات یہ ہے کہ یہ ساری شخصیات بوقت شہادت حالت امن میں تھیں ، یعنی یہ حضرات مسجد یا گھر یا اپنے علاقہ میں تھے ، ان میں سے کوئی بھی شخصیت بوقت شہادت جنگ یا میدانِ جنگ کے آس پاس نہ تھی یہی وجہ ہے کہ ان شہداء میں سے ہر ایک کے خون کا حساب ہوا اور ہر ایک کے قاتل کو قصاصا قتل کیا گیا ۔
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② شہداء کی دوسری قسم:
وہ شہداء جو حالتِ جنگ میں شہید ہوئے یعنی بوقت شہادت وہ کسی گروہ سے لڑنے کے لے نکلے تھے یا لڑنے والوں کے ساتھ تھے ، یا میدان جنگ کے آس پاس تھے اور اسی حالت میں ان کو کسی نے شہید کردیا ۔
اسلامی تاریخ میں اس نوعیت کے جو بھی شہداء گزرے ہیں ان میں سے کسی کے خون کا نہ تو قصاص لیا گیا اور نہ ہی قصاص کی مانگ کی گئ مثلا:
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➊  سيدنا زبیر بن العوام رضی اللہ عنہ
آپ جنگ جمل میں شریک تھے لیکن آخر میں الگ ہوگئے تھے احنف نے راہ چلتے دھوکے سے آپ کو شہید کیا اور اس مردود نے آپ رضی اللہ عنہ کا سر قلم کرکے علی رضی اللہ عنہ کے پاس حاضر کیا ، علی رضی اللہ عنہ نے اس قاتل کو جہنم کی بشارت دی ۔ [الطبقات الکبریٰ لابن سعد:3/ 110 واسنادہ صحیح]
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➋  سيدنا طلحہ بن زبیر رضی اللہ عنہ
آپ نے بھی جنگ جمل میں شرکت کی تھی ، اور آپ کو جس نے قتل کیا تھا ایک روایت سے ظاہر ہوتا ہے کہ علی رضی اللہ عنہ اس سے بھی آگاہ تھے ، [المستدرك للحاكم، ط الهند: 2/ 353 رقم 3348 وإسناده صحيح]
فائدہ:-
اللہ کے نبی صلی اللہ علیہ وسلم نے اپنی زندگی ہی میں زبیر اور طلحہ رضی اللہ عنہما کی شہادت کی پیشین گوئی کی ہے اور انہیں ”شہید“ کہا ہے  [صحيح مسلم 2417]
یہ اس بات کی دلیل ہے کہ زبیر اور طلحہ رضی اللہ عنہما بھی راہ حق میں شہید ہوئے ہیں وہ معاذ اللہ باغی نہیں تھے ورنہ اللہ کے نبی صلی اللہ علیہ وسلم ان کی موت کو ”شہادت“ نہ کہتے ۔
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امام أبو عبد الله شمس الدين القرطبي رحمه الله (المتوفى671) فرماتے ہیں:
« فلو كان ما خرج إليه من الحرب عصيانا لم يكن بالقتل فيه شهيدا... لأن الشهادة لا تكون إلا بقتل في طاعة»
اگر طلحہ رضی اللہ عنہ کا جنگ میں نکلنا نافرمانی پر مبنی ہوتا تو اس میں قتل ہونے پر وہ ”شہید“ نہ کہلاتے ... کیونکہ شہادت صرف نیکی کی راہ میں قتل ہونے سے ملتی ہے۔ ”[الجامع لأحكام القرآن للقرطبي: 16/ 321]
بلکہ مسلمانوں کی کسی بھی باہمی لڑائی میں شہید ہونے والے کسی بھی صحابی کو باغی کہنا قطعا درست نہیں ہے ۔
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➌  کعب بن سور الازدی رحمہ اللہ
آپ کو سیدنا عمر بن الخطاب رضی اللہ عنہ نے بصرہ کا قاضی مقرر کیا تھا ، آپ مسلمانوں کی آپسی لڑائیوں میں الگ تھلک رہنے والے تھے ، اور لوگوں کو اسی چیز کی دعوت دیتے اور آپسی لڑائی میں حصہ لینے سے روکتے تھے ، جنگ جمل کے موقع پر بعض نے ان سے کہا کہ آپ چل کر فریقین کو سمجھائیں تاکہ لوگ آپس میں لڑنے سے باز رہیں یہ صلح و صفائی کی نیت سے میدان جنگ تک چلے گئے اور دونوں فریق کو اللہ کا واسطے دے کر روکنے کی کوشش کرتے رہے اسی حالت میں انہیں بھی شہید کردیا گیا [أخبار القضاة 1/ 281 تاريخ خليفة ص185]
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➍  سيدنا عمار بن یاسر رضی اللہ عنہ
آپ رضی اللہ عنہ کی شہادت جنگ صفین میں ہوئی ہے ۔ [المستدرك للحاكم، ط الهند: 3/ 389 وإسناده صحيح]
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➎  سيدنا حسین بن علی رضی اللہ عنہ
سیدنا حسین رضی اللہ عنہ کی شہادت معرکہ کربلا میں ہوئی ہے ، یہ جنگ قافلہ حسین رضی اللہ عنہ نیز اس میں موجود اہل کوفہ اور عمر بن سعد کے لشکر کے مابین ہوئی اور دونوں طرف کے لوگوں نے ایک دوسرے کو قتل کیا ۔[تاريخ الطبري 3/ 299 واسنادہ صحیح]۔
دونوں طرف کتنے لوگ قتل کئے گئے یہ کسی صحیح سند سے منقول نہیں لیکن اس بابت سب سےقدیم مرجع طبقات ابن سعد ہے جس میں متعدد سندوں سے منقول ہے:
«وقتل مع ‌الحسين. اثنان وسبعون رجلا. وقتل من أصحاب ‌عمر بن سعد. ‌ثمانية ‌وثمانون رجلا»
حسین رضی اللہ عنہ کی طرف سے 72 لوگ اور عمربن سعد کے لشکر سے 88 لوگ قتل کئے گئے [الطبقات الكبرى 1/ 475 وانظر: أنساب الأشراف 3/ 411 تاريخ الطبري 5/ 455]
یہ روایت بتلاتی ہے کہ دونوں طرف کے مقتولین کی تعداد تقریبا برابر تھی مگر یہ تعداد بھی مبالغہ آمیز لگتی ہے فریقین کے مقتولین کی صحیح تعداد کتنی تھی یہ اللہ ہی بہتر جانتا ہے۔
حسین رضی اللہ عنہ کے بارے میں ابن سعد نے نقل کیا:
« يقاتل ‌قتال ‌الفارس ‌الشجاع »
”آپ بہادر شہسوار کی طرح لڑ رہے تھے“ [الطبقات الكبرى 1/ 470]
اہل تشیع یہ دعوی کرتے ہیں کہ سیدنا حسین رضی اللہ عنہ نے تنہا ایک ہزار کی تعداد کو قتل کیا ، بلکہ مسعودی نے تو لکھا ہے کہ:
«قتل بيده ذلك اليوم الفا وثماني مائة مقاتل»
”اس روز آپ (حسین رضی اللہ عنہ ) نے اپنے ہاتھوں (فریق مخالف کے) ایک ہزار آٹھو سو جنگجو قتل کئے “ [ إثبات الوصية للمسعودي : ص178 و وفي نسخة 147]
ان میں سے کوئی بھی بات بسند صحیح ثابت نہیں ہے۔
اس معرکہ میں حسین رضی اللہ عنہ کا کیا طرزعمل تھا یہ اللہ ہی بہترجانتا ہے ۔
ممکن ہے حسین رضی اللہ عنہ نے کسی کو بھی قتل نہ کیا ہو بلکہ فریقین کو لڑائی سے باز رہنے ہی کی تاکید کررہے ہوں اور اسی دوران آپ کو بھی شہید کردیا گیا ، جیسے جنگ جمل میں بصرہ کے قاضی کعب بن سور الازدی رحمہ اللہ لڑنے نہیں بلکہ فریقین کو لڑائی سے روکنے کے لئے گئے تھے مگر انہیں بھی شہید کردیا گیا واللہ اعلم۔
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✿ ◄ ◄دوسری قسم کے ان تمام شہداء میں مشترک بات یہ ہے کہ ان کی شہادتیں حالت حرب وجنگ میں ہوئی ہیں ، خواہ کسی نے لڑائی میں شرکت کی یا کسی اور سبب میدان جنگ تک گئے ۔
عبداللہ بن عمرو رضی اللہ عنہ جنگ صفین میں لڑنے کے لئے نہیں محض اپنے والد کی رعایت میں گئے تھے اگر یہ بھی شہید ہوجاتے تو ان کی شہادت کی بھی یہی نوعیت ہوتی حتی کہ صلح وصفائی کی نیت وکوشش کے ساتھ  بھی کوئی میدان جنگ گیا اور شہید کردیا گیا تو اس کی شہادت بھی اسی قبیل کی ہے جیسے جنگ جمل میں قاضی بصرہ کعب بن سور الازدی رحمہ اللہ کا معاملہ تھا کمامضی ۔
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مؤخر الذکر شہادت میں نہ قصاص کا مطالبہ ہوتا ہے نہ قصاص لیا جاتا ہے سلف کا اسی پرعمل تھا بلکہ قولا بھی ان سے یہی بات ثابت ہےچنانچہ:
● امام سعید بن المسیب (المتوفی94) رحمہ اللہ فرماتے ہیں:
«إذا التقت الفئتان فما كان بينهما من دم أو جراحة، فهو هدر، ألا تسمع إلى قول الله عز وجل: ﴿ وَإِنْ طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا﴾ [الحجرات: 9] فتلا الآية حتى فرغ منها، قال: فكل واحدة من الطائفتين ترى الأخرى باغية»
”اگر دو گروہ آپس میں لڑ پڑیں تو ان کے درمیان جو بھی قتل وخونریزی ہوئی ہے وہ سب ضائع ہے (یعنی اس پر قصاص نہیں ہے ) کیا تم نے اللہ تعالیٰ کا یہ فرمان نہیں سنا: ﴿اور اگر مومنوں کے دو گروہ آپس میں لڑ پڑیں﴾ [الحجرات: 9]۔ پھر سعید ابن المسیب نے پوری آیت پڑھی اور کہا: تو ایسے دونوں گروہوں میں سے ہر ایک دوسرے کو زیادتی کرنے والا سمجھتا ہے۔“ [مصنف عبد الرزاق : 10/ 122 وإسناده صحيح]
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● امام ابن شهاب الزهرى رحمه الله (المتوفى125) فرماتے ہیں:
« أدركت الفتنة الأولى أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فكانت فيها دماء وأموال فلم يقتص فيها من دم ولا مال ولا قرح أصيب بوجه التأويل إلا أن يوجد مال رجل بعينه فيدفع إلى صاحبه
پہلے فتنہ (جمل وصفین) کے وقت صحابہ موجود تھے ، اس میں (دوران جنگ) تاویل کی بنا پر جو قتل ہوئے ان کا قصاص نہیں لیا گیا ، جو مالی نقصانات ہوئے ان کا معاوضہ طلب نہیں کیا گیا اور جو زخم لگائے گئے ان کی دیت نہیں لی گئی البتہ کسی خاص شخص کا کوئی خاص مال صحیح سالم کسی کے پاس پایا گیا تو اسے اس کے مالک کو لوٹا دیا گیا ۔[الأم وإسناده إلي الزهري صحيح بالشاهد ، مطرف تابعه عبدالرزق رقم 18584 ]
● یہی موقف امام شافعی ، امام احمد رحمہم اللہ سے بھی ثابت ہے ۔[الأم للإمام الشافعي 4/ 227 ، السنة للخلال 1/ 152]
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✿ اس پوری تفصیل سے آپ کو نہ صرف اس بات کا جواب ملتا ہے کہ یزید بن معاویہ نے خون حسین رضی اللہ عنہ کا قصاص کیوں نہیں لیا ، بلکہ یہ عقدہ بھی حل ہوجاتا ہے کہ اس دور کے صحابہ وتابعین بلکہ خود افراد اہل بیت میں سے بھی کسی نے قصاص کا کوئی مطالبہ کیوں نہیں کیا ۔
در اصل اس دور میں حالت جنگ میں ہونی والی شہادتوں پر قصاص لینے یا قصاص کی مانگ کرنے کا کوئی آئین ودستور نہ تھا بلکہ جنگ ختم ہوتے ہی وہ سارے معاملات بھی ختم ہوجاتے تھے جو دوان جنگ پیش آئے ، جنگ کی یہی بے رحم سچائی ہے اسی لئے اللہ کے نبی صلی اللہ علیہ وسلم نے آپس میں خانہ جنگی کے وقت الگ تھلگ رہنے اور گھروں میں بیٹھے رہنے یا دور دراز کسی اور علاقے میں نکل جانے کاحکم دیا ہے۔ اور ایسے حالات میں جمہور سلف کا عملا وقولا یہی موقف تھا۔

( ابوالفوزان کفایت اللہ سنابلی حفظہ اللہ )

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Kya Qatar (Arabs) ke Defence System Sirf Iran ke khilaf Israel ki Hifazat ke liye Lage hue hai? Palestine and Qatar

 Does Qatar, Jordan, UAE, Saudi Arabs Air Defense System activate only against Iran for Protecting Israel?

US Betrayal of Arabs: Israel Attacks Qatar and When America Refused to Defend Arab Nations?

US Betrayal of Arabs: Israel Attacks Without American Help........
Why Arab Defense Systems Stay Silent?
America’s Role in Protecting Israel, Spying Iran, Genocide Gaza and attack on Qatar.
Double Standards of Europe,NATO,UK,USA Policies.
History of Arab betrayal: Israel’s attacks on Palestine, Lebanon, Qatar, Syria and US refusal to defend Arabs, proving protection only for Israel.
When did America refuse to defend Arabs against Israel?
History of US betrayal of Arab nations in Israel wars.
Arab defense systems used for Israel not for Arabs.
US military bases in Arab countries spying on Iran.
Israel bombing Gaza, Palestinian, Lebanon, Qatar Syria and US silence.
Why America never stops Israel attacks on Arabs?
US and Arab double standards in Middle East conflicts.
Israel’s attacks and Arab reliance on America exposed.

Key Moments When America Help Israel to Attack Arabs.

  • 1948 War: US Recognized Israel

  • 1967 Six-Day War: No Arab Support

  • 1973 Yom Kippur War: US Armed Israel

  • 1982 Lebanon War: Arab Suffering Ignored

  • 2006 & 2014 Gaza Genocide: US Backed Israel

  • 2023–2025: Israel Strikes Qatar, Syria.

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"क्या क़तर, जोरदन और दूसरे अरब मुमालिक् अपने डिफ़ेंस सिस्टम को ईरान के खिलाफ इस्राएल की दीफ़ा के लिए तैयार रखते है? 

" क्या अमेरिकि फौज अरब देशो मे अरब मुल्को की हीफाजत के लिए है? या इस्राएल की हीफाजत् के लिए,? अरबो को बगैर फौज के कमजोर बनाकर रखने और ईरान कि जासूसी, निगरानि करने के लिए? 

ईरान के मिसाइल को जोरदन , क़तर, UAE और सऊदी अरब मार गिरात है, लेकिन इस्राएल के बोम्बारी से खुद की हीफाज़त नही कर पाता है क़तर?

अमेरिका मध्य पूर्व मे इस्राएल की हीफाजत के लिए है। कब कब ईरान के मिसाइल को इस्राएल की मदद के लिए इंटरसेपट किया है? अरबो की इस्राएल का ईरान के खिलाफ साथ देना और इस्राएल का कतर पर हमला करना... क्या साबित करता है? 

अगर अमेरिका क़तर के सुरक्षा के लिए है.... तो इस्राएल के हमले को रोका क्यो नही? उसे क्यों नही इंटरसेपट किया?
क्या इस्राएल की हीफाजत के लिये, इरान के खिलाफ अरब अपने डेफ़ेंस सिस्टम (हिफजति निजाम) एक्टिव रखते है? 
ईन सवालो का जवाब कब कैसे और किससे मिलेगा?

GAza genocide, Role of USA in Genocide of Palestine.

अरब डिफ़ेंस सिस्टम: ईरान के खिलाफ या इस्राएल की हिफ़ाज़त के लिए?

अरब दुनिया में अक्सर ये तसव्वुर पेश किया जाता है कि अमेरिका और यूरोपीय ताक़तें अरब ममालिक की सुरक्षा और हिफ़ाज़त के लिए मौजूद हैं। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो असल मक़सद साफ़ नज़र आता है कि अमेरिका और उसके गठबंधन (NATO, CENTCOM वग़ैरह) की मौजूदगी दरअसल इस्राएल के दिफ़ा और ईरान पर निगरानी के लिए है, न कि अरब देशों की हिफ़ाज़त के लिए।  हकीकत ये है कि अरब डिफ़ेंस सिस्टम एक दोहरी पॉलिसी पर काम कर रहे हैं—ईरान की निगरानी और इस्राईल के साथ स्ट्रैटेजिक तआवुन। ये जदीद हिफाज़ती निज़ाम सिर्फ जंग से बचाव नहीं, बल्कि सियासी और जियोपॉलिटिकल मक़ासिद भी पूरे कर रहे हैं।

अब्राहम मुआहिदे के बाद इस्राईल और कई अरब ममालिक के दरमियान ताल्लुकात बेहतर हुए हैं। इससे ये सवाल उठता है कि क्या ये डिफ़ेंस सिस्टम इस्राईल की हिफाज़त में भी इस्तेमाल हो रहे हैं, ख़ासकर ईरान के हमलों के जवाब में?  आज अरब ममालिक के डिफ़ेंस सिस्टम दो अहम मक़ासिद के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं: एक तरफ ईरान की निगरानी, और दूसरी तरफ इस्राईल की हिफाज़त में. मगर क़तर का क्या?

डिफ़ेंस सिस्टम किसके लिए तैनात है?

क़तर, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिका और यूरोपीय फौजी ठिकाने मौजूद हैं।
इन ठिकानों पर पैट्रियट मिसाइल सिस्टम, THAAD और राडार सिस्टम लगाए गए हैं।
दिखाने के लिए कहा जाता है कि ये अरब मुल्कों को ईरानी ख़तरे से बचाने के लिए हैं।
मगर हक़ीक़त यह है कि इन सिस्टमों का दायरा और ऑपरेशन सीधे तौर पर इस्राएल की हिफ़ाज़त और ईरान की जासूसी के लिए इस्तेमाल होता है।

ईरान के मिसाइल  में अरब और इस्राएल का फर्क...

ईरान से आने वाले मिसाइल हमलों को कई बार अरब मुल्कों (खासकर सऊदी और यूएई) ने इंटरसेप्ट किया। इरान क दुश्ममनइस्रएल है. इस्रएल इरान पर हम्ला करता है .अपनि हिफजत के लिये इरान जवाब देता है, फिर इस्राएल कि मदद के लिये अरब मुल्क आते है और इरान के हमले को नाकाम कर देते है, इस्राएल जब क़तर पर बोम्बारि किया तब क़तर और दुसरे अरब ने इस्रएल के हम्ले को नकाम क्यो नही किया?  जब इस्राएल की तरफ से ग़ज़ा, लेबनान या यहां तक कि क़तर और सीरिया पर हमले हुए, तो इन अरब सिस्टमों ने खामोशी अख़्तियार की।

अमेरिका की मौजूदगी: किसके लिए?

  • अगर अमेरिका वाकयि अरबों की हिफ़ाज़त के लिए होता, तो इस्राएल के हमलों को भी रोकता।

  • मगर इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने कभी भी अरबों को इस्राएल की बमबारी से नहीं बचाया।

  • अमेरिका के बेस दरअसल तीन कामों के लिए हैं:

इस्राएल की हिफ़ाज़त – ईरान या उसके हामियों से इस्राएल तक पहुँचने से पहले हमलों को रोकना। अरबो  को फ्लिसितिन के बारे मे ध्यान भत्काना और अरबो को कम्जोर बनाकर रखना. अरब कि हिफजत नहि बलकि इस्रएल कि अरबो से हिफाजत.

अरबों को फौजी तौर पर कमजोर रखना – ताकि वे अपनी आज़ादाना पॉलिसी न चला सकें। खुद् मुखतारि के लिये अपनी फौज सब्से जरुरि है, अभी क़तर के पास माल व दौलत होते हुए भि इस्रएल के हम्ले को रोक नहि सका, बल्कि जवाब नही दे सक्ता, क्युंके उसके पास अपनी फौज नही है. 

ईरान की निगरानी और जासूसी – अरब ज़मीनों को ईरान के खिलाफ "फॉरवर्ड बेस" बनाना। 

अमेरिका के पास मध्य पूर्व में 29 से ज़्यादा सैन्य अड्डे हैं, जिनमें क़तर का अल-उदीद एयरबेस, सऊदी अरब का प्रिंस सुल्तान एयरबेस, और यूएई का अल-धफरा एयरबेस शामिल हैं. 

अरब सिस्टम क्यों खामोश रहते हैं?

जब इस्राएल फ़िलिस्तीन, सीरिया, लेबनान या हाल ही में क़तर पर हमला करता है, अरब डिफ़ेंस सिस्टम खामोश रहते हैं।
ये सिस्टम अमेरिकी अफ़सरों और टेक्नीशियनों के कंट्रोल में रहते हैं, जो सिर्फ़ तब इस्तेमाल होते हैं जब "इस्राएल की सुरक्षा" खतरे में आती है।
इसकी वजह यह है कि ये सिस्टम अरब सरकारों के "कंट्रोल" में पूरी तरह नहीं हैं।

तारीख़ी मिसालें

  • 2019: सऊदी अरब पर अरामको के तेल ठिकानों पर मिसाइल हमला हुआ। अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम मौजूद था, लेकिन काम नहीं आया। अमेरिका हर साल अरब देशों में मौजूद अपने बेसों के बावजूद इस्राएल को $3.8 बिलियन से ज़्यादा की सैन्य मदद देता है, जिसमें आयरन डोम जैसे डिफ़ेंस सिस्टम भी शामिल हैं.

  • 2021-2023: यमन से आए मिसाइल कई बार सऊदी और यूएई ने गिराए, लेकिन वही सिस्टम ग़ज़ा पर इस्राएल के हमलों के वक़्त खामोश रहा। अमेरिका दशकों से इस्राएल को अपना सबसे करीबी सहयोगी मानता है। 1948 में इस्राएल की स्थापना से लेकर आज तक, अमेरिका ने उसे सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन दिया है

  • 2024-2025: ईरान से आने वाले ड्रोन और मिसाइल इंटरसेप्ट करने में जॉर्डन और यूएई ने इस्राएल की मदद की। लेकिन उसी दौरान इस्राएल ने क़तर और सीरिया में बमबारी की, किसी अरब सिस्टम ने उसे रोकने की कोशिश तक नहीं की। जब इस्राएल हमले करता है—चाहे वह ग़ज़ा हो, लेबनान या सीरिया, क़तर—तो अक्सर देखा गया है कि अमेरिका की अरब देशों में मौजूद फौज हस्तक्षेप नहीं करती। इसके पीछे कई अहम वजहें हैं:

अरबों को बार-बार यही तजुर्बा हुआ कि जब मामला इस्राएल और उनकी जंग का होता है, तो अमेरिका ने कभी उनका साथ नहीं दिया। उल्टा हमेशा इस्राएल की मदद की. जब अरब मुल्क इस्राएल के हमलों का शिकार हुए, लेकिन अमेरिका ने उन्हें मदद नहीं दी

अरबों को अमेरिका से धोखे ..

1948 – अरब-इस्राएल जंग (पहली अरब जंग)

अरब मुल्क (मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, इराक) फ़िलिस्तीनियों की मदद के लिए उतरे।
अमेरिका ने अरबों की मदद नहीं की, बल्कि इस्राएल को पहचान कर लिया और उसे डिप्लोमैटिक व असलहा सपोर्ट दिया।
अरब हार गए और फ़िलिस्तीन का बड़ा हिस्सा इस्राएल के कब्ज़े में चला गया।

1967 – छह रोज़ा जंग

  • इस्राएल ने अचानक मिस्र, सीरिया और जॉर्डन पर हमला किया।

  • अमेरिका ने अरबों की कोई मदद नहीं की, बल्कि इस्राएल को इंटेलिजेंस और असलहा मुहैया कराया।

  • नतीजा: मिस्र से सिनाई, सीरिया से गोलान हाइट्स और जॉर्डन से बैतुल मुक़द्दस इस्राएल ने छीन लिया।

973 – यौम-किप्पुर जंग (अरब-इस्राएल जंग)

  • मिस्र और सीरिया ने इस्राएल के कब्ज़े वाले इलाक़े वापस लेने की कोशिश की।

  • शुरुआत में अरबों को कामयाबी मिली, लेकिन अमेरिका ने इस्राएल को बड़े पैमाने पर असलहा, फौजी सामान और सीधा हवाई सप्लाई दी।

  • अरबों को अमेरिका की तरफ़ से मदद नहीं, बल्कि धोखा मिला।

  • नतीजा: इस्राएल ने जंग का रुख़ पलट दिया और अरबों की कामयाबी अधूरी रह गई।

1982 – इस्राएल का लेबनान पर हमला

  • इस्राएल ने बेरूत पर बमबारी की और हिज़्बुल्लाह के उभार को रोकने के लिए हमला किया।

  • अमेरिका ने अरब मुल्कों की कोई मदद नहीं की।

  • बल्कि अमेरिका ने इस्राएल की राजनीतिक हिफ़ाज़त की और अरब पनाहगुज़ीनों के नरसंहार (सबरा और शतीला) पर खामोश रहा।

2006 – इस्राएल बनाम लेबनान (हिज़्बुल्लाह जंग)

  • इस्राएल ने लेबनान पर 34 दिन तक हमला किया।

  • अमेरिका और यूरोप ने अरब मुल्कों को न तो डिफ़ेंस सपोर्ट दिया और न ही इस्राएल को रोका।

  • अरब मुल्क अकेले रहे, बल्कि कुछ खाड़ी मुल्कों ने परोक्ष तौर पर इस्राएल की पॉलिसी को सपोर्ट किया। (मरता क्या न करता)

2008, 2012, 2014 – ग़ज़ा पर इस्राएली जंगें

  • इस्राएल ने ग़ज़ा पर बमबारी की, हज़ारों फ़िलिस्तीनी शहीद हुए।

  • अरब मुल्कों को अमेरिका से कोई मदद नहीं मिली, बल्कि अमेरिका ने UNO में इस्राएल के ख़िलाफ़ हर क़रारदाद को वीटो किया। (ब्रिटेन ने इस्रएल को पैदा किया अमेरिका ने उसे जवान किया)

  • अरब सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित रहे।

2021 – ग़ज़ा क़तल ए आम (11 रोज़ा जंग)

  • ग़ज़ा पर इस्राएल का हमला, सैकड़ों शहीद।

  • अरब मुल्कों के पास एडवांस डिफ़ेंस सिस्टम मौजूद थे (यूएई, सऊदी, क़तर, जॉर्डन), लेकिन उन्होंने न फ़िलिस्तीनियों की मदद की और न इस्राएल को रोका।

  • अमेरिका ने इस्राएल को  कथित "आत्मरक्षा का हक़" कहकर खुला सपोर्ट दिया।

2023 – ग़ज़ा नस्ल कुशि

  • ग़ज़ा तबाह हो गया, हज़ारों फ़िलिस्तीनी शहीद हुए।

  • अरब मुल्क खामोश, अमेरिका ने सिर्फ़ इस्राएल की मदद की।

  • यहां तक कि अरब सरज़मीन (जॉर्डन और क़तर) से अमेरिकी सिस्टम ने ईरानी और हिज़्बुल्लाह के ड्रोन इस्राएल की हिफ़ाज़त के लिए गिराए, लेकिन इस्राएल की बमबारी से अरबों को नहीं बचाया। फिलिस्तिनियो का नसल कुशि जारी है अभि तक.

2025 – इस्राएल का क़तर और सीरिया पर हमला

  • इस्राएल ने सीधे तौर पर क़तर और सीरिया में टार्गेट्स पर हमला किया।

  • अमेरिका और अरबों के पास डिफ़ेंस सिस्टम मौजूद था, लेकिन किसी ने इस्राएली बमबारी इंटरसेप्ट नहीं की।

  • इससे साफ़ हुआ कि अमेरिकी और अरब डिफ़ेंस सिस्टम सिर्फ़ इस्राएल की सुरक्षा के लिए ऐक्टिव हैं, इरान कि जासुसि - निगरानि करने के लिये है, न कि अरब मुल्कों की। 

रणनीतिक तटस्थता: अमेरिका अपने फौजी बेस को सीधे इस्राएल के हमलों से जोड़ने से बचता है ताकि वह क्षेत्रीय युद्ध में न उलझे।

कूटनीतिक संतुलन: अमेरिका चाहता है कि अरब देशों से उसके संबंध बने रहें, लेकिन वह इस्राएल की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, रहेगा. अरब देशों में मौजूद अमेरिकी फौज का मक़सद आमतौर पर ईरान के खिलाफ निगरानी और जवाबी कार्रवाई होता है—not to intervene in Israel’s offensives. 

अमेरिका की फौज अरब देशों में मौजूद होते हुए भी इस्राएल के हमलों से उन्हें नहीं बचाती, क्योंकि उसकी रणनीति इस्राएल की हिफाज़त को प्राथमिकता देती है.

असल सच्चाई यह है कि अरब मुल्कों के डिफ़ेंस सिस्टम और वहां मौजूद अमेरिकी फौजें अरबों की हिफ़ाज़त के लिए नहीं बल्कि इस्राएल की सुरक्षा और ईरान की निगरानी के लिए हैं।

यही वजह है कि जब इस्राएल अरब सरज़मीन पर हमला करता है, अमेरिका और अरबों के डिफ़ेंस सिस्टम खामोश रहते हैं। अरब मुल्क अपने पैरों पर खड़े होने की बजाय अमेरिका और इस्राएल की पालिसी के बंधक बने हुए हैं।

अगर अमेरिका वाक़ई क़तर या किसी और अरब देश की हिफाजत के लिए होता, तो इस्राएल की बमबारी को रोकता। लेकिन उसकी खामोशी इस बात का सबूत है कि अरबों के लिए तैनात सिस्टम दरअसल इस्राएल की ढाल हैं, न कि अरबों की हिफ़ाज़त। अरब एक अपाहिज मुल्क है जिसे अमेरिका कि बैसखि कि जरुरत है, सह्युनि चाहते है के अरब हमेशा उस्के मोह्ताज रहे जिससे इस्रएल को खतरा न हो, उसे जब मन करे जिस देश मे हमले करके अपना मनोरंजन करे.

अरबों को हमेशा अमेरिका से धोखा ही मिला:

जब भी इस्राएल ने हमला किया, अमेरिका ने उन्हें न मदद दी, न बचाया। इसके बरक्स, अमेरिका ने हमेशा इस्राएल को असलहा, इंटेलिजेंस और डिप्लोमैटिक मदद  कि फिलिस्तिनियो का नस्ल कुशि करने के लिए, अरबो पर हमले करने के लिये. ताकि इस्राएल से सब कोइ डरा रहे, उसकि जिद माने, कुछ भि कहे इंकार न करे. अरब मुल्क अपने डिफ़ेंस सिस्टम के बावजूद इस्राएल की बमबारी से महफ़ूज़ नहीं हुए क्युंके अरबो कि लाठि अमेरिका है, उस्के बगैर वे चल भि नही सकते एक कदम. अगर अरब अपने फैसले खुद करने लग जाये तो अमेरिका (USA+NATO+EU+UK) उनकि अपाहिज बाद्शहत को गिरा देगा, वे सब युरोप के प्रोप्गंदे मे मारे जायेंगे इस्लिये अरब हुकम्रानो कि अपनि मजबुरी है, या तो वे तख्त व ताज चुने या अपनी मौत. यह सारे फैसले अमेरिका - युरोप करता है.

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