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Western Media aur Palestine: BBC Kaise Bana Israel Ka Mouthpiece Media?

Western Media Kaise Palestine me Israel ke Qatl-E-Aam Ko Chupa Raha hai?

How Western Media Conceals Israel's Mass Killings in Palestine?
How BBC became Mouthpiece of Israel and IDF?
The Silence of Western Media on Israel's Atrocities in Palestine.
Media Bias: Western Coverage of Israel's Violence in Palestine.
Unseen Truths: Western Media and the Palestinian Crisis.
Selective Outrage: Western Media’s Role in Masking Palestinian Suffering.
फ़िलिस्तीन मसला, ग़ज़ा ज़ुल्म, बीबीसी बायस, इज़राइल प्रोपगैंडा, मग़रिबी मीडिया दोहरी नीति, Palestine Gaza Atrocities,
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BBC इस्राएल का माउथपीस.
फ़िलिस्तीन का मसला: मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति और ग़ज़ा के ज़ुल्मों का राज़फ़ाश |
बीबीसी और पश्चिमी मीडिया का प्रोपगैंडा कैसे छिपा रहा है इज़राइल के ज़ुल्म?
BBC की निष्पक्षता और इस्राएल की चाटुकारिता। 
आज हम बात करेंगे दुनिया के सबसे मुहज्जब, ज़दीद, आज़ाद ख्याल, इंसानियत मे यकीन रखने वाले और इंसानी हुकुक का नुमाइंदा कहलाने वाले क़ौम के बारे मे, जिन्होंने जम्हूरियत और इंसानी हुकुक के नाम पर दुनिया मे सबसे ज्यादा इंसानो की खूने बहाई है। सबसे ज्यादा जम्हूरियत और सेकुलर के नाम पर दूसरे ममालिक खासकर मुस्लिम मुल्क पर फौजी हमले किये है, इज़हार ए राय की आज़ादी के नाम पर कुरान को आग लगाए है, अल्लाह के कलाम को आग के हवाले करके आज़ादी और हक का मुजाहिरा किये है। आज वही सह्युनि सलेबी जिसका गहवारा यूरोप है। उसी ने फिलिस्तीन की आवाज़ को, ग़ज़ा के मजलुमो को दहशतगर्द बताकर इजरायली दहशत और हैवानियत, दरिंदगी को आत्म रक्षा का अधिकार बता रहा है। 
फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर इज़राइल के ज़ुल्म: एक दर्दनाक हक़ीक़त.
फ़िलिस्तीन की पवित्र ज़मीन आज इज़राइली ताक़त के ज़ुल्मों का शिकार हो रही है, जहाँ ग़ज़ा की गलियों में बेगुनाहों का ख़ून बहाया जा रहा है। स्कूलों और अस्पतालो पर बमबारी करके हज़ारों मासूम बच्चे और औरतें शहीद हो चुकी हैं, जो इंसानियत के ख़िलाफ़ एक काला बिहिश्ती अमल है। इज़राइल ने ग़ज़ा को एक खुली जेल बना दिया है, जहाँ भोजन, दवा और पानी की किल्लत से लाखों लोग तड़प रहे हैं, और यह सब प्रोपगैंडा के ज़रिए छिपाया जा रहा है।अस्पतालों के नीचे सुरंगें होने का झूठा इल्ज़ाम लगाकर मरीज़ों को निशाना बनाया जाता है, जो साफ़ ज़ालिमाना हरकत है। इन ज़ुल्मों में 64 हज़ार से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके हैं, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, और यह सब दुनिया की नज़रों से ओझल करने की साज़िश है। मग़रिबी मीडिया इन ज़ुल्मों को 'आत्मरक्षा' कहकर सफ़ेदी देता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह एक संगठित नरसंहार है।

ग़ज़ा का सच और मग़रिबी मीडिया का पर्दा
आज दुनिया एक अजीब कशमकश से गुज़र रही है। एक तरफ़ ग़ज़ा की गलियों में इंसानी ज़िंदगियों का क़त्लेआम हो रहा है, तो दूसरी तरफ़ हज़ारों मील दूर टीवी स्टूडियो में बैठकर इस क़त्लेआम को जायज़ ठहराने की कोशिशें की जा रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, बल्कि हमारे दिमाग़ों में भी लड़ी जा रही है—और इस लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार मीडिया है, ख़ासकर पश्चिमी मीडिया। मगरिब् का ज़ियोनिस्ट मीडिया या माफिया जो कहे लेकिन वे इसी तरह से काम कर रहे है। वे फिलिस्तीन के ज़मीन को इस्राएल का घर और देश बताकर इस्राएल के बोम्बारी को सही ठहराते है। 
 लफ़्ज़ों का खेल: जब 'क़त्ल' को 'हादसा' बताया जाए
सबसे पहले हमें मग़रिबी मीडिया के लफ़्ज़ों के चुनाव पर ग़ौर करना होगा। जब इज़राइल बमबारी करता है, तो उसे "आत्मरक्षा" (Self-defense), "जवाबी कार्रवाई" (Retaliation) या "सैन्य अभियान" (Military Operation) कहा जाता है। वहीं, जब फ़िलिस्तीनी मारे जाते हैं, तो ख़बर बनती है, "ग़ज़ा में झड़पों के दौरान 50 लोगों की मौत।"
यहां "किसने मारा" यह सवाल ही ग़ायब कर दिया जाता है। passive voice का इस्तेमाल करके ऐसा दिखाया जाता है जैसे लोग किसी कुदरती आफत में मर गए, किसी ने उन्हें मारा नहीं। वहीं, अगर इज़राइली नागरिक की मौत हो, तो उसे सीधे-सीधे "आतंकी हमला" (Terrorist Attack) कहा जाता है। यह लफ़्ज़ों का वो जादू है, जो ज़ालिम को मज़लूम और मज़लूम को हमलावर बना देता है।
 दोहरा मापदंड: एक ज़ुल्म, दो नज़़रिये
पश्चिमी मीडिया का दोहरा मापदंड तब और साफ़ हो जाता है, जब हम ग़ज़ा के हालात का मुक़ाबला दुनिया के दूसरे संकटों से करते हैं। जब यूक्रेन पर हमला होता है, तो उसे "आक्रामकता" (Aggression) और "मानवाधिकारों का हनन" कहा जाता है, जो कि वो है भी। लेकिन जब ग़ज़ा की घेराबंदी करके वहां के स्कूलों, अस्पतालों और घरों पर बम बरसाए जाते हैं, तो इसे एक "जटिल मुद्दा" (Complex Issue) बताकर टाल दिया जाता है। वही अमेरिका की टेक कंपनी फेसबुक ने कहा था के जो भी रूस के खिलाफ हिंसा की बात करेगा, युक्रेन के समर्थन मे हथियार उठायेगा वह (मार्क जुकरबर्ग) ऐसा करने वाले की हिमायत करेगा, हौसला अफ़ज़ाई करेगा। मगर जैसे ही किरदार बदलता है तो ज़ियोनिस्ट का चेहरा साफ नज़र आने लगता.
यूक्रेन पर रूसी हमले को 'आक्रामकता' कहा जाता है,लेकिन ग़ज़ा में इज़राइली बमबारी को 'जटिल मुद्दा' मार्च 2025 में ग़ज़ा पर बड़े हमले में 412 फ़िलिस्तीनी मारे गए, लेकिन मीडिया ने इसे 'हमास टारगेट पर स्ट्राइक' कहा, बिना मौतों की गंभीरता दिखाए। यह पूर्वाग्रह मुस्लिम और अरबों को 'कम इंसानी' दिखाने की पुरानी प्रवृत्ति को ज़ाहिर करता है।
फिलिस्तीन मे ज़ालिम मजलुम बनता है और उस ज़ालिम को आत्मरक्षा का अधिकार देकर उसे मजलुम (वही रूस के खिलाफ हिंसा का समर्थन करने वाला) बना देता है, दूसरी तरफ फिलिस्तिनियो के ज़मीन पर कब्ज़ा करके, उसी पर 80 साल से बोम्बारी करके फिलिस्तीन को ज़ालिम और दहशतगर्द साबित कर देता है। यह है मगरिब् का असली खेल जिसके लिए लॉबी, मीडिया और नैरेटिव की जरूरत होती है। जिसके बदौलत वह खूनी को मासूम और मजलुम को दहशतगर्द बना देता है। यह सह्युनि का इंफोर्मेशन वार का हिस्सा है। 
 लफ़्ज़ों की दोहरी तलवार: इज़राइली पीड़ा को भावुक बनाना, फ़िलिस्तीनी दर्द को संख्याओं में बदलना. 

फ़िलिस्तीन मसले पर बीबीसी और मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति
बीबीसी ने विदेशी पत्रकारों को ग़ज़ा में जाने से रोका, लेकिन इज़राइल की स्टोरीज़ को प्रमुखता दी है। 
BBC जैसे बड़े मीडिया घराने भी इज़राइली पक्ष को ज़्यादा समय और हमदर्दी देते हैं। फ़िलिस्तीन से बात करने के लिए अक्सर ऐसे लोगों को बुलाया जाता है, जो पश्चिमी सोच से सहमत हों, जबकि इज़राइल का पक्ष रखने के लिए ताक़तवर प्रवक्ता आते हैं, जो आक्रमक तरीके से अपनी बात रखे और राई का पहाड़ बनाये। ग़ज़ा के अंदर से आने वाली सच्ची तस्वीरों और पत्रकारों की रिपोर्टों को यह कहकर सेंसर कर दिया जाता है कि "इनकी पुष्टि नहीं हो सकी है।"
फ़िलिस्तीन का मसला आज दुनिया के सामने एक काला साये की तरह खड़ा है, जहाँ ग़ज़ा की ज़मीन पर ख़ून बह रहा है और मग़रिबी मीडिया के स्टूडियो में उस ख़ून को धोने की कोशिशें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में हम बीबीसी और अन्य पश्चिमी मीडिया घरानों की दोहरी नीति को उजागर करेंगे, जो इज़राइल के नरसंहार को जायज़ ठहराते हुए फ़िलिस्तीनियों की आवाज़ को दबा रहे हैं। यह नीति न सिर्फ़ ख़बरों के लफ़्ज़ों में, बल्कि कवरेज के तौर-तरीक़े में भी साफ़ नज़र आती है, जो आम लोगों को गुमराह करने का काम कर रही है।
मग़रिबी मीडिया, ख़ासकर बीबीसी, अपनी रिपोर्टिंग में लफ़्ज़ों का ऐसा इस्तेमाल करता है जो इज़राइली मौतों को इंसानी त्रासदी के रूप में पेश करता है, जबकि फ़िलिस्तीनी मौतों को महज़ आंकड़ों की तरह।
उदाहरण के तौर पर, इज़राइली पीड़ितों के लिए 'मासुम और पिडित महिला' शब्द का 18 गुना ज़्यादा इस्तेमाल होता है, और 'मर्डर' जैसे भावुक लफ़्ज़ इज़राइलीयों के लिए 220 बार आते हैं, जबकि फ़िलिस्तीनियों के लिए सिर्फ़ एक बार। वहीं, ग़ज़ा में 34 गुना ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मौतें होने के बावजूद, बीबीसी इज़राइली मौतों को प्रति मौत 33 गुना ज़्यादा कवरेज देता है।  यह भाषाई पूर्वाग्रह न सिर्फ़ दर्शकों के दिलों को इज़राइल की तरफ़ झुकाता है, बल्कि फ़िलिस्तीनी दर्द को कमतर आंकता है। इसे बिबिसि का शब्द युद्ध कह सक्ते है.
बीबीसी की रिपोर्टिंग में फ़िलिस्तीनी नज़रिए को लगातार दबाया जाता है, जबकि इज़राइली पक्ष को प्रमुखता दी जाती है। एक साल की विश्लेषण से पता चला कि बीबीसी ने टीवी और रेडियो पर 2,350 इज़राइली इंटरव्यू लिए, लेकिन फ़िलिस्तीनियों के सिर्फ़ 1,085, और प्रस्तुतकर्ता इज़राइली नज़रिए को 11 गुना ज़्यादा व्यक्त करते हैं। इसके अलावा, जेनोसाइड के इल्ज़ामों को 100 से ज़्यादा बार दबा दिया गया,जबकि इज़राइली लीडर्स के जेनोसाइडल बयानों का ज़िक्र ही नहीं किया जाता। अन्य मग़रिबी मीडिया जैसे सीएनएन भी इज़राइली दावों को बिना वेरिफ़िकेशन के दोहराते हैं, जिससे फ़िलिस्तीनी जीवन को कम इंसानी दिखाया जाता है. यह असमानता ख़बरों को प्रोपगैंडा का रूप दे देती है।
आंतरिक विद्रोह: बीबीसी के अपने कर्मचारी दोहरी नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. BBC इस्राएल का माउथपीस:
बीबीसी के अंदर से ही इस दोहरी नीति के ख़िलाफ़ सख़्त आलोचना हो रही है। 100 से ज़्यादा कर्मचारियों ने डायरेक्टर-जनरल को खुला पत्र लिखा, जिसमें बीबीसी को इज़राइली सरकार का 'माउथपीस' कहा गया है। उन्होंने 'ग़ज़ा: डॉक्टर्स अंडर अटैक' जैसे डॉक्यूमेंट्री को ब्लॉक करने की निंदा की, जो इज़राइल की आलोचना करता था। इसके अलावा, 400 से ज़्यादा मीडिया पर्सनल ने बोर्ड मेंबर रॉबी गिब को हटाने की मांग की,क्योंकि उनके कनेक्शन्स इज़राइली पक्ष को बढ़ावा देते हैं। ये कर्मचारी कहते हैं कि यह नीति बीबीसी की निष्पक्षता को नुक़सान पहुँचा रही है और फ़िलिस्तीनियों को डिह्यूमनाइज़ कर रही है।
यह रिपोर्ट साफ़ करती है कि बीबीसी और मग़रिबी मीडिया की दोहरी नीति फ़िलिस्तीन मसले को और जटिल बना रही है, जहाँ इज़राइल को बचावकर्ता दिखाया जाता है और फ़िलिस्तीन को हमलावर।आम लोगों को चाहिए कि वे मुख्यधारा की ख़बरों से परे स्वतंत्र स्रोतों पर भरोसा करें।  अगर मीडिया अपनी निष्पक्षता बहाल न करे, तो दुनिया का भरोसा और टूटेगा।
 तारीख़ को मिटाने की साज़िश
पश्चिमी मीडिया अक्सर इस पूरे मसले को ऐसे पेश करता है, जैसे यह कुछ दिनों पहले शुरू हुआ हो। वो यह नहीं बताते कि यह लड़ाई दशकों पुराने क़ब्ज़े (Occupation), बस्तियों के ग़ैर-क़ानूनी निर्माण और 15 साल से ज़्यादा की नाकाबंदी (Blockade) का नतीजा है। जब आप किसी मसले को उसकी तारीख़ से काटकर दिखाते हैं, तो आप असल में सच को छुपा रहे होते हैं। ग़ज़ा के लोगों को एक खुली जेल में रखकर जब उनकी हर हरकत को नियंत्रित किया जाता है, तो उनके प्रतिरोध को "बिना वजह की हिंसा" कैसे कहा जा सकता है?

 नतीजा: हमें क्या करना चाहिए?
यह समझना ज़रूरी है कि मग़रिबी मीडिया इज़राइल के नरसंहार पर पर्दा डालने और उसे "व्हाइटवॉश" करने का काम बड़ी होशियारी से कर रहा है। वो ख़बरें नहीं रोकते, बल्कि ख़बरों का मतलब बदल देते हैं। वो तस्वीरों को नहीं छिपाते, बल्कि तस्वीरों के पीछे की कहानी को छिपाते हैं। वे इस्राएल का मुखबिर के तौर पर काम करते है। IDF का मुखपत्र BBC जैसे मीडिया है। 
ऐसे में, एक आम इंसान के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हमें मुख्यधारा की मीडिया पर आँख बंद करके भरोसा करने के बजाय, सच्चाई की तलाश करनी होगी। हमें सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पत्रकारों, ज़मीनी हक़ीक़त दिखाने वाले लोगों और उन आवाज़ों को सुनना होगा, जिन्हें दबाया जा रहा है।
क्योंकि जब तक हम ख़बरों के पीछे छिपे प्रोपगैंडा को नहीं समझेंगे, तब तक ग़ज़ा में गिरते बमों का शोर हमारे कानों तक पहुँचने से पहले ही दबा दिया जाएगा। मीडिया एक खास किस्म से काम करता है, वे एक खास  प्रोपगैंडा के तहत न्यूज़ को छापते और छुपाते है। वे लफ्जो के मफहुम को बदल देते है। 

फ़िलिस्तीन के मज़लूमों के लिए दुआएं: अल्लाह से रहमत की पुकार.
ऐ अल्लाह, फ़िलिस्तीन के मज़लूमों पर अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा, उनके दर्द को दूर कर और उनके ज़ुल्मों का बदला ले। ऐ रब्बुल आलमीन, ग़ज़ा के बेगुनाहों को अपनी पनाह दे, उनके घरों को तबाह होने से बचा और उन्हें आज़ादी की दौलत अता कर। फ़िलिस्तीनी बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला,उनकी माँओं के आंसू पोंछ और इज़राइली ज़ुल्मों को ख़त्म कर दे। ऐ मेहरबान, मज़लूम फ़िलिस्तीन की आवाज़ को दुनिया तक पहुँचा, उनकी हिफ़ाज़त फ़रमा और अमन की बहार ला।  अल्लाहुम्मा आमीन, फ़िलिस्तीन को अपनी नेमतों से नवाज़ और उनके दुश्मनों को सबक सिखा।
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