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Sir Syed Ahmad Khan Ko Angrezo ne "Sir" Ka Khitab Kyu Diya tha?

Sir Syed Ahmad Khan: The British Informant?

Unmasking Sir Syed: Colonial Ally or Reformist?
The Man Behind the Title ‘Sir’: Syed Ahmad Khan’s Controversial Legacy.
Was Syed Ahmad Khan a Loyalist to the British Empire?
Exploring the Colonial Connection of Sir Syed Ahmad Khan.
The ‘Sir’ Title and Its Implications: Revisiting Syed Ahmad Khan’s Role.
Did the British reward loyalty or silence dissent? 
सैयद अहमद खान... अंग्रेजो के वफादार या क़ौम के हीरो? 
मिर्जा कादयानी और सैयद अहमद मे फिक्रि यकसानियत।
Discover the story of Syed Ahmad Khan — a man knighted by the British, hailed by some as a reformer, and criticized by others as a colonial informant. #ColonialHistory #SirSyedAhmadKhan #BritishRaj #HiddenTruths, Colonial India history, Indian loyalists to British Empire, Colonial collaboration, British Raj informants, Aligarh Movement controversy, British knighthood India, Syed Ahmad Khan criticism.
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Unmasking Sir Syed: Colonial Ally or Reformist?
जाने एक अंग्रेजी मुखबिर सैयद अहमद खान जिसे फिरंगियों ने "सर" का खीताब दिया। 
सर सैयद अहमद खान की "रौशन ख्याल फिरंगि इस्लाम" के लिए दी गयी खिदमात्। 

मिर्जा क़ादयानी और सर सैयद अहमद दोनो कौन से तीन मसले पर इत्तेफाक रखते थे? 
मिर्जा क़ादयानी और सैयद अहमद ने वह काम किये जो फिरंगियों के खजाने खाली करने के बाद भी वह सब नही हो सकता। 
सैयद अहमद खां जिसे सर सैयद अहमद खान कहा जाता है। 
इन्हे "सर" का खिताब अंग्रेजो से मिला था। इनके काम की तारीफ इसलिए होता है के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनवाया, लेकिन अंग्रेजो ने किस मकसद से बनवाया, इनके विचार क्या थे? 
इनका नजरिया कया था? 
इनका फिक्र कैसा था? 
यह सब बहुत कम ही लोग जानते है। 

यह अंग्रेजो के बनाये हुए एजेंट के तौर पर काम करते थे, यह मुसलमानो को सियासी तौर पर एकजुट न होने देना चाहते थे और इन्होंने हर वह बिल/कानून का परचार किया जिसे अंग्रेजो ने मुसलमानो की दिनी फिक्र को खतम करने की कोशिश की।  इनके कामो से खुश हो कर अंग्रेजो ने इन्हे प्रोमोशन दिया, अवार्ड मिले और ऊँचे ओहदे तक पहुँचे, इनके बेटे को ओक्स्फ़ोरैड और कैंब्रिज मे पढ़ने के लिए वाजिफा तक मिला। 
जो रसाला जारी करते थे उस नज़रिए के वजह से उस वक़्त के उलेमाओ ने इन के खिलाफ फतवा जारी किया था। जिसमे 66 से ज्यादा आलिम का दशतख़्त था। 

फिर वही हुआ, जो इनके फिक्र और नज़रिए के खिलाफ बोले वह दकियानुसी और बुनियादी परस्त कहा जाने लागा, दूसरी तरफ अंग्रेजो इनके कामो से बहुत खुश था, और इन्हे प्रोमोशन मिलता गया। 
अब अगर किसी शख्स को मुआशि तौर पर मदद मिल रहा हो तो फिर उसे मुखबिरी करने मे हर्ज क्या है। वे अंग्रेजो के दरबारी लेखक बन गए। 

जब उनके खिलाफ मुसलमानो ने आवाज़ उठाई तो वे यह कहकर लोगो कों जवाब दिया के
"अगर क़ौम की तरक्की के लिए कुछ लोगो कों जहन्नूम मे भी जाना पड़े तो मुझे कोई ऐतराज नही" 
यह मुसलमानों की तरक्की का सोच रहे थे अंग्रेजो के हाथ बिक कर, मुसलमानो की हुकूमत छीन जाने पर। 
इन्होंने ऐसी कौन सी तरक्की की थी? 

जब मुसलमान अग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ एक हो रहे थे तो इन्होंने मुसलमानो के राजनीतिक एकता का विरोध किया था, और मुसलमानो से अपील की थी के मुसलमानो के हक मे यह नही है के वह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करे क्योंके मुसलमानो को अभी अंग्रेजो की सख्त जरूरत है".
यही वह तरक्की थी क़ौम के बारे मे जो चाहते थे के अंग्रेज़ी सरकार बनी रहे इस से हमारी नौकरी,मुखबिरी सब कुछ बची रहे, और अंग्रेज भी इनको एक पर एक खीताब दे रहा था, अंग्रेजो ने सैयद अहमद को पूरी तरह से मुसलमानो के रहनुमा के तौर पर तसलिम कर लिया, वे मुसलमानो से भी ऐसा ही चाहते थे सैयद अहमद को तसलिम करे। 

ताकि सैयद अहमद के जरिये मुसलमानो से बात की जाए। 
और सैयद अहमद जो रीढविहीन थे उनको जाती फायेदा से मतलब था, ताकि अपना सवार्थ पूरी होता रहे। इसलिए आज सैलेबस् मे भी इन्हे सर सैयद अहमद खान के नाम से पढाया जाता है। 
क्योंके अंग्रेजो के बाद अंग्रेजो के चमचे की हुकूमत हुई, इसलिए वे खुद को जो नरम दल कहते थे उन्होंने अपनी चमचागिरी को छुपाने के लिय उदारवादी तबका और जो इनका विरोध कर रहे थे उनको इन्होंने रूढ़ीवादी, कट्टरपंथी, दकियानुसी कहकर संबोधित करने लगे। 
हमे उर्दू की किताबो मे इनकी तारीफे बहुत पढ़ने को मिली। 
यह मुसलमानो की तरक्की कर रहे थे उनके सियासी बेदारी को दबाकर।

सर सय्यद अहमद ख़ाँ का असल रूप और उनकी फ़िक्रियात। 
सर सय्यद अहमद ख़ाँ का असल नाम सैयद अहमद बिन मुत्तक़ी ख़ाँ (17 अक्टूबर 1817 – 27 मार्च 1898) था। उन्नीसवीं सदी का एक हिंदुस्तानी मुसलमान नज़रिये-ए-अमलियत का हामिल, मुसलिह और फ़लसफ़ी था। सर सय्यद अहमद ख़ाँ एक नबील घराने में पैदा हुए जिनका मुग़ल दरबार से गहरा ताल्लुक था, इसके बावजूद फ़रंगियों की जानिब उनका झुकाव समझ से बाहर है। सर सय्यद ने क़ुरआन और साइंस की तालीम दरबार ही में हासिल की, जिसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबरा ने उन्हें क़ानून में डॉक्टरेट की इज़्ज़ाज़ी डिग्री अता की।

उर्दू अदब पर भी सर सय्यद का गहरा असर पड़ा। उनकी बदौलत एक नए दबिस्तान की बुनियाद पड़ी जिसने सादा और सलीस अन्दाज़ में नशर निगारी शुरू की और अक़्लियत और मक़सदियत, ठोस और जामे मसायल को आमफ़हम अन्दाज़ में बयान करना शुरू किया। उर्दू में इंशाईया निगारी और तहक़ीक़ व तनक़ीद की शाख़ों का इज्रा हुआ।

सर सय्यद हुकूमत-ए-बरतानिया के नमक हलाल रहे, उनकी हर अदा पर दिलो-जान से फ़िदा थे। जब 1857 में जिहाद-ए-हुर्रियत का मआरका गर्म हुआ तो सर सय्यद ने अपने अंग्रेज़ मोहसिनों की जान व माल और इक्तिदार के तहफ़्फ़ुज़ के लिए हरावल दस्ते का किरदार अदा किया और मुक़द्दस जिहाद को बग़ावत का नाम देकर मुजाहिदीन-ए-इस्लाम की किरदारकुशी का फ़रीज़ा बड़ी तंदही से अंजाम दिया।

हुकूमत-ए-बरतानिया ने हुस्न-ए-ख़िदमत के सिलसिले में Sir, HB (शाही मशीर) और KC (हिंदुस्तान में अमन का जज) के ख़िताबात देने के अलावा दो पुश्तों तक दो सौ रुपया माहाना शाही वज़ीफ़ा जारी किया।
सरकारी मुलाज़मत से फ़ारिग़ होने के बाद ज़िंदगी की तमाम तवानाइयाँ अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की तरक़्क़ी के लिए वक़्फ़ कर दीं।

शेम अहमद ने लिखा है:
“सर सय्यद अहमद ख़ाँ से आज भी सख़्त इख़्तिलाफ़ात का इज़हार किया जा रहा है और ये इख़्तिलाफ़ कोई नई या ज़ाती इख़्तिरा नहीं, बल्कि ये इख़्तिलाफ़ और इससे भी ज़्यादा सख़्त इख़्तिलाफ़ सर सय्यद अहमद ख़ाँ की ज़िंदगी ही में शुरू हो गया था — और इख़्तिलाफ़ करने वालों में आम मदरसों के मुल्ला या आलिम ही नहीं थे, बल्कि ऐसे लोग भी थे जो जदीद उलूम से ख़ूब वाक़िफ़ थे और उनके पुरजोष हामी भी थे।”

 इनमे से बाज अहले फिक्र तो ऐसे भी थे जो मगरिब् की जुबान व अदब और यूरोप की फ़िक्रि तहरिको से न सिर्फ सर सैयद से ज्यादा और बराह ए रास्त वाक़िफ़ थे बल्कि उन्होंने यूरोप मे आला तालीम भी हासिल किये थे। इसलिए यह कहना के सर सैयद ज़दीद ख्यालो वाले थे और उलेमा सिर्फ दीनी तालीम तक महदूद थे इसलिए महज उलेमा ही इनके खिलाफ ऐसा नही है। जो आला तालीम याफ्ता, मग्रिबि फिक्र, जुबान व अदब पर महारत रखते थे, जिन्होंने सर सैयद से ज्यादा ज़दीद उलूम, फिक्रि तहरिको के बारे मे जानते थे ऐसे दनिश्वरो ने भी इनके खिलाफ आवाजे उठाई और उनका भी इख़्तेलाफ थे इनसे। सिर्फ उलेमा कहकर अवाम के बीच इस सोच को फ़िरोग् दी जाने की कोशिश की जाती है के उलेमा ज़दीद तालीम के खिलाफ रहते ही है, मगर जिन्होंने उस वक़्त भी सर सैयद से आला तालीम याफ्ता थे उन्होंने भी इनकी सोच और मुखबिरी पर सवाल खड़े किये थे,मगर वह सब एक प्रोपगंडे के तहत नही बताया जाता है। 

“...और ये इख़्तिलाफ़ सिर्फ़ वक़्ती नहीं, बल्कि पूरी एक सदी होने को आई मगर सर सय्यद से ये इख़्तिलाफ़ हर दौर में जारी रहा और अब भी जारी है। ज़ाहिर है किसी फ़िक्र या शख़्सियत से इतना गहरा और मुसलसल ज़ेहनी इख़्तिलाफ़ इत्तेफ़ाक़न नहीं हो सकता। यक़ीनन इस फ़िक्र में कोई न कोई ख़ामी या तज़ाद ज़रूर है जिसकी बुनियाद पर पूरी एक सदी से सर सय्यद की फ़िक्र से इख़्तिलाफ़ हो रहा है।”
(सर सय्यद अहमद ख़ाँ: एक पुराना सवाल नया मसअला, "दानिश", 16 मार्च 2018)

जब हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अवाम बेदार हुए तो सर सय्यद साहब इस जद्दोजहद पर ख़ासा नाराज़ और बरहम नज़र आते हैं। फ़रमाते हैं:

“जिन मुसलमानों ने हमारी सरकार की नमक हरामी और बदख़्वाही की, मैं उनका तरफ़दार नहीं। मैं उनसे बहुत ज़्यादा नाराज़ हूँ और हद से ज़्यादा बुरा जानता हूँ, क्योंकि ये हंगामा ऐसा था कि मुसलमानों को अपने मज़हब के मुताबिक़ ईसाइयों के साथ रहना था, जो अहल-ए-किताब और हमारे मज़हबी भाई-बंद हैं, नबियों पर ईमान लाए हुए हैं, ख़ुदा के दिए हुए अहकाम और किताब अपने पास रखते हैं... फिर जिसने ऐसा नहीं किया, उसने गवर्नमेंट की नाशुक्री के साथ अपने मज़हब के भी ख़िलाफ़ किया।”  इस हंगामे मे जहाँ ईसाइयों (अंग्रेज़) का खून गिरता है वही मुसलमानो का भी खून गिरना चाहिए था, फिर जिसने ऐसा नही किया उसने अंग्रेज़ी सरकार यानी ईसाई सरकार के साथ नाशुक्री की, नमक हरामी की, उसने अपने मजहब के भी खिलाफ किया। फिर बिला शुबा वह इस लायक है के उससे नाराज हुआ जाए। जिस तरह मिर्जा कादयानी ने फिरंगियों के लिए मजहबी खिदमात की उसी तरह सैयद अहमद ने भी फिक्रि और सियासी खिदमात् की। 
(मक़ालात-ए-सर सय्यद, सफ़ा 4)

सर सय्यद का मज़हब पर नज़र:
तारीखी वाक़िआत शाहिद हैं कि अंग्रेज़ों ने मिर्जा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी और सर सय्यद अहमद ख़ाँ से वो काम लिए जो वो अपने मुल्कों की सारी दौलत ख़र्च करके भी नहीं कर सकते थे।

मिर्जा क़ादियानी लिखता है कि सर सय्यद अहमद तीन बातों में मुझसे मुत्तफ़िक़ हैं:
  1. हज़रत ईसा (अ.) बग़ैर बाप के पैदा नहीं हुए, बल्कि मामूल के मुताबिक़ उनका बाप था। (वाज़ेह रहे के ईसाइयों का एक फिरक़ा भी इस अकीदे को मानता है के मरियम अलैहे सलाम का युसुफ नाम के एक शख्स से ताल्लुक था जिसके नतीजे मे हज़रत ईसा अलैहे सलाम की पैदाइश हुई। (नौजॊ बिल्लाह) 
सर सय्यद के मज़हबी अक़ायद व अफ़कार को जानना ज़रूरी है, जिससे मसअले की संगीनियत और उलमा के मुख़ालिफ़ाना रवैए की सेहत का अंदाज़ा हो सकेगा।
सर सय्यद के चंद मज़हबी अक़ायद बतौर नमूना ये हैं:

फ़रिश्तों का कोई बाहरी वजूद नहीं है।

नबी पर मुतआरिफ़ फ़रिश्तों के ज़रिए वही नहीं होती, बल्कि वही का बाहरी वजूद ही नहीं।

मेराज और शक्क-ए-सद्र के वाक़िआत रुया (ख़्वाब) का अमल हैं।

क़ुरआन में जिन या अजिन्ना के अल्फ़ाज़ से मुराद पहाड़ी या सहराई लोग हैं, न कि वो मख़लूक़ जो भूत या देव की सूरत में समझी जाती है।

जो लोग ये समझते हैं कि इस पत्थर के बने चौकोर घर (काबा) में कोई मुतअद्दी बरकत है, जहाँ सात दफ़ा तवाफ़ किया और जन्नत में चले गए — ये उनकी ख़ामख़्याली है।

मुतहनिक़ा-ए-अहल-ए-किताब यानी वो जानवर जिसे अहल-ए-किताब ने गला घोंटकर मारा हो, उसका खाना मुसलमानों के लिए जायज़ है।

हिसाब-किताब, मीज़ान और जन्नत-ओ-दोज़ख़ का कोई बाहरी वजूद नहीं, बल्कि ये सब इस्तिआरा और तम्सील के तौर पर बयान किए गए हैं।

क़ुरआन में कहीं ये साबित नहीं कि हज़रत ईसा बिन बाप के पैदा हुए या आसमान पर उठा लिए गए।

ख़ुदा अपनी क़ुदरत का कोई ख़ालीक़-ए-आदत निशान नहीं दिखा सकता, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उसकी अजमत को बटा लगेगा।

सर सैयद के ये तमाम अक़ायद उनकी तफ़्सीर-उल-क़ुरआन से मख़ूज़ हैं, जिसके बारे में मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली ने अपने एक मजमुंन "सर सैयद और मजहब" मे लिखा: जो अलीगढ़ मैग्ज़िन् मे मॅई 1898 मे साया हुआ। 
“बहुत से मक़ामात उनकी तफ़्सीर में ऐसे मौजूद हैं जिनको देखकर तअज्जुब होता है कि ऐसे आली दिमाग़ शख़्स को कैसे ऐसी तावीलात-ए-बारिदा पर इत्मिनान हुआ।”
(हयात-ए-शिबली, सफ़ा 237)

उम्र के आख़िरी हिस्से में उनके रोशनख़याल साहबज़ादे सैयद महमूद — जो शराब के रसिया थे — ने उन्हें घर से निकाल दिया। आख़िरकार उन्होंने एक दोस्त के यहाँ पनाह ली।

सर सय्यद अहमद ख़ाँ का इंतेक़ाल 81 साल की उम्र में 27 मार्च 1898 को हुआ। उसी घर से उनका जनाज़ा निकला और अलीगढ़ कॉलेज की मस्जिद में दफ़न किए गए। कुछ लोगों ने एतिराज़ भी किया कि सर सय्यद को मस्जिद में दफ़नाना दुरुस्त नहीं।

सर सय्यद और उनके बेटे सैयद महमूद का रिश्ता
सर सय्यद अहमद ख़ान के दो बेटे थे —

  1. सैयद हामिद (जो कम उम्र में ही चल बसे)

  2. सैयद महमूद (Sir Syed Mahmood, 1850–1903) — यही बड़े बेटे थे और काफ़ी मशहूर हुए।

सैयद महमूद ख़ुद भी पढ़े-लिखे और क़ानून के जानकार थे। उन्होंने इंग्लैंड जाकर बैरिस्टरी की तालीम हासिल की और बाद में भारत में जज के ओहदे पर फ़ायज़ हुए।

शुरू में बाप-बेटे का रिश्ता बहुत दोस्ताना और तालीमी मक़सद से जुड़ा हुआ था — सर सय्यद चाहते थे कि उनका बेटा उस "नई नस्ल" की मिसाल बने जो इल्म, तहज़ीब और तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़े। उनके फिक्र की विरासत को फ़िरोग् दे। 

सैयद महमूद की "फरंगीपसंद" सोच

इंग्लैंड में रहकर उनकी सोच बहुत ज़्यादा यूरोपीय हो गई।
वो शराबनोशी, क्लब-कल्चर और फ़रंगी रहन-सहन के शौक़ीन हो गए।
अलीगढ़ के दौर में उनका रवैया अक्सर बाप के मज़हबी और तालीमी अनुशासन से बग़ावत भरा रहता।
सर सय्यद ने देखा कि उनका बेटा शराब और अय्याशी की तरफ़ जा रहा है, तो उन्हें गहरा सदमा हुआ।
कहा जाता है कि उन्होंने कई बार बेटे को नसीहत की, मगर महमूद पर कोई असर नहीं हुआ। 
उम्र के आख़िरी हिस्से में सर सय्यद की सेहत गिर चुकी थी और वो बहुत कमज़ोर हो गए थे।
इसी दौरान सैयद महमूद ने, जो शराब के नशे में रहते थे, अपने बूढ़े बाप को घर से निकलवा दिया।

सर सय्यद ने मजबूर होकर एक दोस्त के यहाँ पनाह ली — यही वो घर था जहाँ उन्होंने आख़िरी साँस ली (27 मार्च 1898) ।
यह वाक़िया सर सय्यद की ज़िंदगी की सबसे तकलिफ और दर्दनाक याद है।
जिन्होंने अपनी सारी उम्र अंग्रेज़ो कि चम्चागिरि मे गुजार दिया, उंनकि मुखबिरि कि और हिंदुस्तान मे ब्रिटिश हुकुमत को मज्बुत करने मे तन मन और कलम कि सियाहि सब कुछ खर्च कर दिये, इनके बेटे भी वज़िफे पे पले और बढ़े, इन्होने जो बीज डाला वह इनके हि आंगन मे तैयार हुआ. उन्हीं का बेटा नाम्निहाद नई तालीम की बेराह-रवी की मिसाल बन गया।

कई तारीख़ नवीस लिखते हैं कि —
"सर सय्यद ने जिस रोशनख़याल और तालीमी मिशन की उन्होंने बुनियाद रखी, उसका सबसे बड़ा इम्तिहान उनका अपना बेटा बना।”
Hali, Altaf Hussain: Hayat-e-Javed
Shibli Nomani: Hayat-e-Shibli
Majmua-e-Maqalat-e-Sir Syed
Aligarh Institute Gazette Archives.
इन सब में उस घरेलू तनाव और आख़िरी दिनों की तन्हाई का ज़िक्र मौजूद है जो सर सय्यद को अपने ही रौशन ख्याल बेटे से नसीब हुई। जैसा बीज वैसा दरख़्त हुआ। 

आईना ए हकीकत। 
 सर सैयद की रौशन-ख़्याली असल में अंग्रेज़ी हुकूमत की वफ़ादारी का दूसरा नाम था, जिसने क़ौम को सियासी तौर पर कमज़ोर कर दिया।
 उन्होंने मगरिबी तहज़ीब को इस क़दर अहमियत दी कि अपनी इस्लामी और हिंदुस्तानी शनाख़्त की तौहीन का रास्ता हमवार हो गया।

मुसलमानों को एक अलग 'क़ौम' कहने की उनकी ज़िद ने, मुल्क की तक़सीम की बुनियाद रखने में मदद की। अंग्रेज़ भी हिंदू मुस्लिम करके आपस मे लड़वाना चाहते थे ताकि कमज़ोर होने पर उसकी हुकुमत बची रहेगी और हिंदुस्तान की आज़ादी का ख्वाब हक़ीक़त नही हो पायेगा। क्योंके क़ौमी एकता देख कर अंग्रेज़ डरे हुए थे इसलिए हजारो फौज मिलकर जो काम नही कर सकता वह सर सैयद ने कर दिया अपनी कलम और फिक्र से। 
 सैयद अहमद ख़ान का सारा ज़ोर सरकारी नौकरियों पर था; चमचागिरी मे अव्वल दर्जे का।  क़ौम की माशी और सनअती तरक़्क़ी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया।

उन्होंने तहरिक ए आज़ादी की मुख़ालफ़त करके मुसलमानों को मुल्क के मरकज़ी सियासी धारे से अलग-थलग करने का काम किया।
 अलीगढ़ तहरीक अपनी वक़ार (Survival) के लिए फिरंगी हुकूमत पर इस क़दर मुनहसिर (dependent) थी कि वो क़ौमी आज़ादी की एक मज़बूत आवाज़ न बन सकी।

 एक तरफ़ जदीदियत (modernity) की वकालत करना और दूसरी तरफ़ अवामी सियासी शिरकत की मुख़ालफ़त, सर सैयद की सोच का सबसे बड़ा नुक्स था।इतने सारे दोहरे मिजाज, सोच के लोग आज हमारे हीरो बने हुए है, इसे कुछ खास तबका ने अपने लैब तैयार करके बनाया है। कलम एक हिंदुस्तानी मुखबिर का था लेकिन अल्फाज, फिक्र और सोच अग्रेजो के थे। 
हाथ सर सैयद का था लेकिन माल व अस्बाब फिरंगियों का था। 

हकीकत यह है के अंग्रेज़ अपने मंसूबे को कांम्याब करने के लिए उन्ही हिंदुस्तानी लोगो मे से अपने मकसद के लिए एक एक करके गद्दार  को खरीदते गए, फिरंगि यहाँ गद्दारो का तिजारत करने आये थे, कोई जंग मे गदारी किया, किसी ने कलम से किसी ने अक़ल, ज़मीर  और सोच से। मगर सभी तरह के गद्दारो को मूंह मांगी किंमत देकर अंग्रेजो ने खरीद लिया, जिसकी जैसी जरूरत थी उससे वैसा ही काम लिया। यह सब कंपनी बहादुर के सबसे वफादार मुलाजिम थे, जिसे कई नस्लो तक वजीफा मिलता रहा। 
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