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Sir Syed Ahmad Khan Qaum Ka Rehnuma Ya Angrez ka Wafadar. History analysis.

Sir Syed Ahmad Khan: National Leader or British Agent?

Sir Syed Ahmad Khan – Visionary Reformer or Colonial Collaborator?
Sir Syed Ahmad Khan: National Leader or British Agent?
Sir Syed Ahmad Khan biography.
Aligarh Movement history: Colonial India politics.
Discover the legacy of Sir Syed Ahmad Khan – was he a true national leader or a British agent? Explore his role in the Aligarh Movement, Indian Muslim society, and colonial politics in this detailed analysis.
सर सैयद अहमद खान: क़ौमी रहनुमा या अंग्रेज़ का ज़र-ख़रीद एजेंट.
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Colonial India politics.
"सर सैयद अहमद खान: क़ौमी रहनुमा या अंग्रेज़ का ज़र-ख़रीद एजेंट? इतिहास के इस अहम सवाल पर नज़र डालें और जानें कि सर सैयद की सोच ने भारतीय समाज और राजनीति को किस तरह प्रभावित किया।"  एक सवाल जो सदी भर से गूंज रहा है.

सर सय्यद अहमद ख़ाँ — अंग्रेज़ी सल्तनत के वफ़ादार या हिंदुस्तान के मुखबिर?
जब हमारे दरबारों में पायल की झंकार पर वाहवाही लुटाई जा रही थी, तब उनके कैंपों में तलवारों पर धार चढ़ाई जा रही थी। हम हुस्न की तारीफ़ में दीवान लिख रहे थे, और वो हमारे मुल्क की तक़दीर का फ़रमान लिख रहे थे।

हिंदुस्तानी तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जो जितनी तारीफ़ के हक़दार ठहराए गए, उतनी ही आलोचना की आग में भी तपे। सर सय्यद अहमद ख़ाँ उन्हीं में से एक नाम हैं।
उनके चाहने वालों की निगाह में वो “मसीहा-ए-तालीम”, “मुफ़क्किर-ए-मिल्लत” और “बाब-ए-इल्म” हैं; मगर उनके मुख़ालिफ़ों की ज़बान में वो अंग्रेज़ों के नमक-ख़्वार, मुखबिर, और मुसलमानों की सियासी ताक़त के कब्र खोदने वाले हैं।

यह विरोध कोई आज का नहीं — यह उस ज़माने से है जब सर सय्यद खुद ज़िंदा थे। सवाल यह है:

जब हिंदुस्तान के ग़रीब, किसान, सिपाही, और आलिम 1857 की लड़ाई में फाँसियों पर चढ़ रहे थे,
तब सर सय्यद को अंग्रेज़ी दरबार में प्रमोशन, वज़ीफ़े और खिताब क्यों मिल रहे थे?”
क्या यह सब महज़ इत्तेफ़ाक़ था, या फिर उस के पीछे कोई गहरी राजनीतिक मुखबिरी की कहानी दबी थी?

पहला बाब — सर सय्यद का ज़माना और हालात

सय्यद अहमद ख़ाँ का जन्म 1817 में दिल्ली के एक ऐसे घराने में हुआ जो मुग़ल दरबार से गहरे ताल्लुक़ रखता था। उनके वालिद ‘सैयद मुत्तक़ी ख़ाँ’ बादशाही दरबार से जुड़े हुए थे, और घर का माहौल इल्म और तहज़ीब से सराबोर था।
मगर जब सय्यद साहब जवानी में आए, तब तक मुग़ल हुकूमत अपनी आख़िरी साँसें ले रही थी। अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी हर सू हावी थी। दिल्ली से लेकर बंगाल तक राजनैतिक हवा बदल चुकी थी।

इस तबाही के दौर में मुसलमानों पर दोहरी चोट थी — एक तरफ़ तख़्तो-ताज छिन गया, दूसरी तरफ़ नये निज़ाम में उनका कोई हिस्सा न रहा।

शिक्षा, व्यापार, अदालतें — सब अंग्रेज़ी हुकूमत के कब्ज़े में थे। पुराने क़ाज़ी, उलेमा और सिपाही अब ‘बेकार’ कहे जाते। यही वह दौर था जब सय्यद अहमद ख़ाँ ने खुद को “क़ौम का रहनुमा” कहकर आगे बढ़ाया।

दूसरा बाब — 1857 की “बग़ावत” और सर सय्यद का रुख़

1857 की लड़ाई, जिसे हिंदुस्तान की “पहली जंग-ए-आज़ादी” कहा जाता है, सर सय्यद के लिए एक अलग माने रखती थी।
जहाँ देश का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी जुल्म के ख़िलाफ़ हथियार उठा रहा था, वहीं सर सय्यद ने इस लड़ाई को “बग़ावत”, “नाशुक्रियापन” और “ग़ैर-इस्लामी हरकत” कहा।

उन्होंने साफ़ लिखा:
“मैं उन मुसलमानों का पक्षधर नहीं, जिन्होंने हमारी सरकार की नमक-हरामी की।
क्योंकि यह हंगामा ऐसा था कि मुसलमानों को अपने मज़हब के मुताबिक़ ईसाइयों (अंग्रेज़ों) के साथ रहना चाहिए था, जो अहले किताब हैं।” (मक़ालात-ए-सैयद, सफ़ा 4)

यह जुमला सिर्फ़ मतभेद नहीं, बल्कि एक बयान-ए-वफ़ादारी था — जिसने अंग्रेज़ों को यह यक़ीन दिलाया कि सय्यद साहब जैसे लोग उनके हक़ में काम कर सकते हैं।

जब अंग्रेज़ी सैनिक दिल्ली, लखनऊ और झाँसी में बग़ावत कुचल रहे थे और हजारों हिंदुस्तानी सिपाही फाँसी पर लटकाए जा रहे थे — तब सय्यद अहमद ख़ाँ को सरकारी इनाम, पदोन्नति और वज़ीफ़ा मिल रहा था।
इतिहास के दस्तावेज़ बताते हैं कि 1858 के बाद उन्हें न सिर्फ़ “राजनिष्ठा” का दर्जा मिला, बल्कि ब्रिटिश अफ़सरशाही ने उन्हें “भरोसेमंद भारतीय सलाहकार” के रूप में इस्तेमाल किया।

तीसरा बाब — “Asbab-e-Baghawat-e-Hind”: एक रिपोर्ट या एक बचावनामा?

1859 में सर सय्यद ने अपनी मशहूर किताब “असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद” लिखी।
ऊपर से यह किताब ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने ‘सलाहनामे’ की तरह पेश की गयी, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई के “कारण” गिनवाए।
मगर भीतर से यह किताब अंग्रेज़ों के लिये एक रणनीतिक दस्तावेज़ साबित हुई।

उन्होंने कहा कि यह बग़ावत इसलिए हुई क्योंकि:
  • अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तानियों से “सही व्यवहार” नहीं किया,
  • उन्हें शिक्षा और रोज़गार में बराबरी का मौका नहीं मिला,
  • और अफ़वाहों से गलतफ़हमियाँ पैदा हुईं।

यह सुनने में संतुलित लगता है, मगर किताब का असल मक़सद था —

अंग्रेज़ सरकार को यह समझाना कि मुसलमान उनकी खिलाफ़त नहीं, बल्कि ग़लत नीतियों के शिकार हुए हैं;
इसलिए उन्हें दुश्मन न समझा जाए, बल्कि सहयोगी माना जाए।

इस किताब के बाद ब्रिटिश अफ़सरों में सर सय्यद का नाम फैल गया। वे “वफ़ादार मुसलमान” कहलाए, और सरकार के उच्च हलकों में उनकी राय अहम हो गयी।

चौथा बाब — अंग्रेज़ी इनाम, वज़ीफ़े और ख़िताब

सर सय्यद की यह वफ़ादारी बेकार नहीं गयी। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें कई इनाम दिए:

  • 1869 में इंग्लैंड में उनका स्वागत किया गया,

  • 1875 में उन्हें “सर” की उपाधि दी गई,

  • “C.S.I.” (Companion of the Star of India) का खिताब दिया गया,

  • और फिर “H.B.M. Judge of Peace” यानी ब्रिटिश साम्राज्य का सलाहकार न्यायाधीश बनाया गया।

इतना ही नहीं — उन्हें और उनकी आने वाली दो नस्लों को 200 रुपये महीना शाही वज़ीफ़े के तौर पर दिया गया।
अब सवाल यह है:

“जब हज़ारों हिंदुस्तानी बग़ावत के जुर्म में फाँसी पा रहे थे,
तब एक मुसलमान अफ़सर को यह सारे इनाम क्यों मिल रहे थे?”

इतिहास में इनाम कभी मुफ्त में नहीं मिलते — वो किसी न किसी काम की कीमत होते हैं।

इस रवैये को बहुत से आलिमों और क़ौमी रहनुमाओं ने मुल्की गैरत के ख़िलाफ़ और हुकूमत की मददगार नीति के तौर पर देखा।

पाँचवाँ बाब — अंग्रेज़ों को सर सय्यद से क्या फ़ायदा हुआ?

यह समझना ज़रूरी है कि ब्रिटिश हुकूमत किसी को सिर्फ़ “अच्छे विचारों” के बदले इनाम नहीं देती थी।
सर सय्यद की नीतियों और कामों से अंग्रेज़ों को कई फायदे हुए:

(1) मुसलमानों की बग़ावती शक्ल को “लॉयल” चेहरा मिला

1857 के बाद अंग्रेज़ों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल थी — मुसलमानों पर से भरोसा।
सर सय्यद ने अपनी कलम से यह छवि तोड़ी। उन्होंने कहा:

“हमारी सल्तनत के साथ रहना हमारे मज़हब का तक़ाज़ा है।”
यह जुमला अंग्रेज़ों के लिये ताबीज़ बन गया।

अब वे कह सकते थे — “देखिए, खुद मुसलमानों का एक बड़ा रहनुमा हमारी वफ़ादारी की बात कर रहा है।”

(2) तालीम के बहाने अंग्रेज़ी संस्कृति का प्रसार

अलीगढ़ कॉलेज (जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना) अंग्रेज़ी तालीम और वेस्टर्न कल्चर का केंद्र था।
यहां जो मुसलमान पढ़े, वे अंग्रेज़ों की सोच, शासन और भाषा से परिचित हुए।
अंग्रेज़ों को एक ऐसा तबका मिला जो ‘ब्रिटिश सिस्टम’ के भीतर रहकर उनकी नीतियाँ लागू करने में मददगार बना।

(3) धार्मिक विवादों के ज़रिए एकता में दरार

सर सय्यद की तफ़सीर-ए-क़ुरआन ने  उलमा को नाराज़ किया।
उन्होंने कहा कि:

  • फ़रिश्ते कोई अलग मख़लूक़ नहीं, बल्कि इंसान की क़ुव्वत हैं,
  • और जन्नत-दोज़ख़ का मतलब नैतिक प्रतीक हैं।
    इन बातों ने धार्मिक समाज को बाँट दिया — और अंग्रेज़ों के लिये यही बँटवारा मुफ़ीद साबित हुआ।
    एक तरफ़ अलीगढ़ स्कूल के “कम्पनि के दर्बारि”, दूसरी तरफ़ देवबंद  के “सिपाहि” 
    मुसलमान अब आपस में उलझ गये, और अंग्रेज़ चैन से शासन करते रहे।

(4) सियासी निष्क्रियता (Political Neutrality)

सर सय्यद ने मुसलमानों को सियासत से दूर रहने की सलाह दी।
उन्होंने कहा:

“हमारी तालीम का मक़सद मुल्क का हुकूमत करना नहीं, बल्कि अपने हालात सुधारना है।”
इसने एक पूरी पीढ़ी को राजनीतिक रूप से निष्क्रिय बना दिया।

अंग्रेज़ों के लिये यह सबसे बड़ा लाभ था — अब कोई मुस्लिम राजनीतिक प्रतिरोध नहीं उठेगा।

सर सय्यद के साथ ब्रिटिश सत्ता के रिश्ते के निहितार्थ स्पष्ट रूप से कई स्तरों पर पड़े:

  1. राजनीतिक स्थिरता: स्थानीय नेतृत्व का एक हिस्सा ब्रिटिश प्रशासन के प्रति सकारात्मक या कम-से-कम समन्वयी हो गया—जिससे विद्रोह की संभावना कम हुई।

  2. प्रशासनिक सहयोग: अंग्रेज़ों को स्थानीय समझ रखने वाले सलाहकार और वफादार मिल गये—जो उन्हें नीतियाँ लागू करने में मदद करते रहे।

  3. सांस्कृतिक औपचारिकता: शिक्षा और अंग्रेज़ी भाषा के प्रसार से एक 'समान व्यावहारिक भाषा' बनी—जिसने ब्रिटिश शासकीय तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया।

  4. समुदायों में विभाजन: धार्मिक और सामाजिक विभाजन की वजह से सामूहिक एकता टूटती है—और यह विभाजन अंग्रेज़ी सत्ता के लिये फायदेमंद रहा।

  5. लोकप्रियता और वैधानिक मान्यता: सर सय्यद जैसे नामों की ओर से ब्रिटिश प्रशंसा ने स्थानीय वैधानिकता (legitimacy) बढ़ाई—यह दिखाने के लिये कि ब्रिटिश शासन 'समझदार' और 'समावेशी' है।

छठा बाब — जब मुखबिरी “इल्मी वफ़ादारी” बन गई

सर सय्यद ने खुद को कभी “मुखबिर” नहीं कहा — उन्होंने कहा, “मैं एक समाजिक सुधारक हूँ।”
मगर उनका “इल्मी सुधार” अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों से इस कदर मिलता-जुलता था कि फर्क़ मिट गया।

  • उन्होंने कहा कि हिंदुस्तानियों को अंग्रेज़ी राज के साथ रहना चाहिए।

  • उन्होंने कहा कि मुल्क की बेहतरी अंग्रेज़ों की हिकमत में है।

अब यह तय कीजिए:
अगर कोई इल्मी आदमी बार-बार उन्हीं बातों की तसदीक़ करे जो अंग्रेज़ सरकार चाहती है, तो क्या वह मुखबिर नहीं कहलाएगा?

सातवाँ बाब — आलोचना, विरोध और समकालीन मत

सर सय्यद के दौर में ही बहुत से बड़े आलिम और बुद्धिजीवी उनके खिलाफ़ उठे।
मौलाना क़ासिम नानौतवी (दारुल उलूम देवबंद के संस्थापक) ने उन्हें “मज़हबी गुमराह” कहा।

शिबली नोमानी, जो शुरू में उनके साथ थे, बाद में बोले:

“सर सय्यद की तफ़सीर में ऐसे ऐसे तावीलात हैं, जिन पर अक़्ल भी हैरान होती है।”

अल्लामा इक़बाल ने भी अप्रत्यक्ष तौर पर कहा:
“सर सय्यद ने मुसलमानों को सियासत से बेपरवाह कर दिया,
और उनका जोश-ए-ईमान तालीमी अक़्ल में गुम हो गया।”

यह विरोध कोई दकियानूसी नहीं था — बल्कि एक चेतावनी थी कि जो तालीम “हकूमत की परछाईं” में बढ़े,
वो इंसान को आज़ाद नहीं, मोहताज बनाती है।

आठवाँ बाब — अलीगढ़ आंदोलन: रिफ़ॉर्म या रिलायंस?

अलीगढ़ आंदोलन का नारा था — “तालीम, तरक़्क़ी और तहज़ीब।”
मगर इसके पीछे जो ढांचा बना, वह पूरी तरह अंग्रेज़ी फंडिंग, पाठ्यक्रम और प्रशासनिक पद्धति पर आधारित था।
किताबें अंग्रेज़ी सोच की थीं, भाषण ब्रिटिश लॉयल्टी के थे, और मक़सद था —

ऐसे मुसलमान पैदा करना जो अंग्रेज़ों के साथ काम कर सकें।”

यह कोई साज़िश नहीं थी — यह अंग्रेज़ों की दीर्घकालिक नीति थी।

सर सय्यद उस नीति के भीतर “स्थानीय मुख़ातिब” (Native interlocutor) की भूमिका निभा रहे थे।
यानी — वो सेतु थे, जिसके ज़रिए अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान के मुसलमानों का दिल जीता, मगर उनका इख़्तियार (self-determination) छीन लिया।

अलीगढ़ तहरीक ने मुसलमानों को “दरबारि तालिम” तो दी, लेकिन “तहरीक” छीन ली।
यानी ये तालीमी इंक़लाब, एक सियासी इत्तिहाद की बजाए, हुकूमत से समझौते का रास्ता बन गया।
इस नज़रिये के मुताबिक़, सर सय्यद की तालीमी कोशिशों ने क़ौम को अंग्रेज़ों के ताबे रहने की आदत डाल दी  और जो अवाम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठ सकते थे, वो किताबों और कॉलेजों में सिमट गए।

नौवाँ बाब — जब “वज़ीफ़ा” वफ़ादारी का दस्तावेज़ बना

इतिहास में “वज़ीफ़ा” कभी मुफ़्त नहीं मिलता।
सर सय्यद को जो शाही वज़ीफ़ा और सरकारी नौकरी मिली — वो उनके “अच्छे व्यवहार” का सिला था।
ब्रिटिश रिकार्ड में लिखा है कि उन्हें “for his loyalty and services to the Crown” के तहत इनाम दिया गया।
यानि, यह तालीम या साहित्य के लिये नहीं, बल्कि “वफ़ादारी” के लिये था।

सोचिए — एक तरफ़ 1857 के ग़दर में दिल्ली के सैकड़ों वतन परस्त, सिपाही, आम लोग बिना मुकदमे के फाँसी पर चढ़ा दिए गये;
दूसरी तरफ़ एक सरकारी अफ़सर मुस्कुराता हुआ “Sir” कहलाने लगा।
इतिहास की यह विडंबना किसी भी ज़मीरदार इंसान को बेचैन कर देती है।

सर सय्यद को ब्रिटिश प्रशासन ने कई तरह के सम्मान दिए: 'सर' का खिताब, ऑफिशियल प्रतिष्ठा, और कई बार सरकारी सहायता/पेंशन और अल्पकालिक/दीर्घकालिक आर्थिक समर्थन। यह कलात्मक सिद्ध करता है कि ब्रिटिश सरकार उनके काम और नज़ारियों को सराहती थी।

राजनीतिक परत — इनाम एक तरह का "लॉयल्टी-इनसेंटिव" भी थे: जो लोग सत्ता के साथ खड़े रहेंगे, उन्हें तरजीह (preference) दी जाएगी; इससे स्थानीय नेतृत्व ब्रिटिश नीतियों के अनुकूल चलता है।

न केवल आर्थिक और सम्मानात्मक लाभ, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव भी मिला: सर सय्यद का रिकॉर्ड ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष 'लोकप्रिय मुस्लिम सलाहकार' के रूप में सराहनीय रहा—और यह प्रतिष्ठा अंग्रेज़ पॉलिसी-निर्धारण में इस्तेमाल होने के लिये मुफीद थी।

दसवाँ बाब — अंग्रेज़ों की राजनीति में सर सय्यद की भूमिका

अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान में शासन टिकाने के लिए तीन चीज़ें चाहिए थीं:

  1. स्थानीय वफ़ादार तबका,

  2. सांस्कृतिक वैधानिकता,

  3. विरोध की ऊर्जा का तर्कसंगत रूपांतरण।

सर सय्यद इन तीनों में काम आए:

  • वो अंग्रेज़ों के लिये “स्थानीय वफ़ादार तबका” के रहनुमा बने,

  • अलीगढ़ आंदोलन ने अंग्रेज़ी शासन को “तालीमी वैधानिकता” दी,

  • और मुसलमानों की सियासी ऊर्जा को “इल्म” और “रोज़गार” की तरफ़ मोड़ दिया।

यानी, ब्रिटिश साम्राज्य को एक ऐसा वर्ग मिला जो उनके लिये बोलता, सोचता और पढ़ाता था।

इस वर्ग ने आगे चलकर “मुस्लिम लीग” जैसी सियासी जमाअतें पैदा कीं, जो अंग्रेज़ों की “कम्युनल पॉलिटिक्स” में फिट बैठीं।
यही वजह थी कि बाद में अंग्रेज़ “दो क़ौम” के सिद्धांत को आसानी से चला सके।

ग्यारहवाँ बाब — सर सय्यद की धार्मिक तफ़सीर और अंग्रेज़ों की रज़ा

सर सय्यद की तफ़सीर “तफ्सीर-उल-क़ुरआन” में उन्होंने इस्लामी मोजिज़ात को अपने नज़रिये की कसौटी पर कसा।
उन्होंने कहा:

  • और दीन को अंगरेजो के नज़रिये से अपनाओ और मगरिबि तर्ज  से जोड़ो।
    अंग्रेज़ों के लिये यह दृष्टिकोण बेहद मुफ़ीद था।
    अब वो कह सकते थे — “देखो, इस्लाम और हमारा साइंस एक हैं। हिंदुस्तान का मुसलमान अब पुराना नहीं रहा।”
    यह सांस्कृतिक तर्क अंग्रेज़ों के “सिविलाइज़ेशन मिशन” की पुष्टि थी।

बारहवाँ बाब — सर सय्यद की मौत और विवादित विरासत

27 मार्च 1898 को सर सय्यद का इंतक़ाल हुआ।
उनके अपने शहर अलीगढ़ में ही उन्हें कॉलेज की मस्जिद में दफ़नाया गया.
मगर तब भी कुछ लोगों ने ऐतराज़ किया कि “जो आदमी शरीअत की तफ़सीर को अपने आक़ा कि वफादारि से तौलता था,
उसे मस्जिद में दफ़न करना सही नहीं।”

उनकी मौत के बाद भी बहस ख़त्म नहीं हुई —
बल्कि हर दौर में यह सवाल फिर ज़िंदा हुआ कि सर सय्यद की नीतियों ने मुसलमानों को तरक़्क़ी दी या गुलामी?
क्या उन्होंने अंग्रेज़ों से ‘इल्म’ लिया या ‘इख़्तियार’ खोया?

तेहरहवाँ बाब — हासिल ए कलाम

सर सय्यद अहमद ख़ाँ का किरदार दो चेहरों वाला था:

  1. एक तरफ़ उन्होंने मुसलमानों को दरबारि  तालीम, अंग्रेजि तहज़ीब और नज़रिया की राह पर लगाया,

  2. दूसरी तरफ़ उन्होंने अंग्रेज़ों के सियासी वर्चस्व को मज़बूत किया।

उनकी “मुखबिरी” का मतलब यह नहीं कि वो किसी जासूस की तरह काम करते थे —
बल्कि यह कि उनकी वफ़ादारी, विचार और इल्म उस सत्ता के हक़ में थे जो हिंदुस्तान को गुलाम बनाए हुए थी।

उनकी नेकनीयती ने अंग्रेज़ों की नींव मजबूत की।
उन्होंने जो अलीगढ़ आंदोलन शुरू किया, उसने सियासी आज़ादी की लौ ठंडी कर दी।

चौदहवाँ बाब — आज के दौर में सर सय्यद का मतलब

आज जब हम सर सय्यद को याद करते हैं, तो हमें यह तय करना होगा कि हम उन्हें आँख मूँद कर सर कहें,
या आँख खोल कर इतिहास पढ़ें।
उनकी मेहनत अंग्रेजो के लिए थी, उसका इस्तेमाल सत्ता ने अपने फ़ायदे में किया।

अगर आज कोई उनके नाम पर “वफ़ादारी की तालीम” देता है,
तो वह वही ग़लती दोहरा रहा है — जिसने हमें सदी भर पीछे धकेल दिया था।

इख़्तिताम — एक सच्चाई जो अब भी सिहराती है

1857 में जब दिल्ली की गलियों में फाँसियों के फंदे लटक रहे थे,
जब हज़ारों सिपाही अपने खून से ज़मीन रंग रहे थे,
तब एक अफ़सर अंग्रेज़ी दरबार में वफ़ादारी का पैग़ाम लिख रहा था।

इतिहास उसे “Sir” कहता है,
मगर ज़मीर की अदालत में सवाल अब भी गूंजता है —

“क्या यह वही आदमी नहीं था, जिसने हमारी सियासी आज़ादी के बदले
अपने लोगों को अंग्रेज़ों की तालीमी जंजीरों में जकड़ दिया?”

सर सय्यद अहमद ख़ाँ की कहानी सिर्फ़ तालीम या सुधार की नहीं —
यह सत्ता, वफ़ादारी, मुखबिरी और विचार की जंग की कहानी है।
उन्होंने अपने लोगों को पढ़ाया, मगर उन्हें उठना नहीं सिखाया।
और शायद यही वजह है कि इतिहास अब भी पूछता है —
“सर सय्यद — रहनुमा थे या मुखबिर?”
जहाँ वो एक ऐसे मुतफ़क्क़िर हैं जिन्होंने क़ौम को हक़ीक़ी आज़ादी की राह से हटा कर “तालीमी ग़ुलामी” का रास्ता दिखाया।
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