The Deception of Democracy and Liberalism: Hidden Truths Unveiled.
Why Democracy Isn’t Always Freedom.
Liberalism’s Hidden Contradictions.
The Impact on Society and Faith.
Breaking the Illusion of Modern Politics.
The Deception of Democracy and Liberalism.
![]() |
| Liberalism deception in society. |
"जम्हूरियत और लिबरलिज़्म का फ़रेब — हक़ीक़त को पहचानो, गुमराही से बचो।
सियासत के इस मायाजाल में सच की तलाश ही असली आज़ादी है..."
आज के दौर में उम्मत-ए-मुस्लिमा को दरपेश मसायेल का हल अक्सर जम्हूरियत (लोकतंत्र) जैसे निज़ामों में तलाश किया जाता है, लेकिन एक हक़ीक़त जो अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती है, वह यह है कि इस्लामी अक़ीदे की रूह से जम्हूरियत अल्लाह के अहकाम और शरीयत में शिर्क के मुतरादिफ़ (समानार्थी) है . इस तहरीर का मक़सद इसी नाज़ुक मौज़ू पर रौशनी डालना और इस्लामी हुकूमत की असल बुनियादों को वाज़ेह करना है।
शिर्क की हक़ीक़त
शिर्क का मतलब सिर्फ़ किसी को अल्लाह समझना या अल्लाह के बराबर मानना नहीं है, बल्कि अल्लाह की ज़ात, सिफ़ात या अहकाम में किसी को शरीक ठहराना भी शिर्क है. मक्का के मुशरिकीन अल्लाह को कायनात का ख़ालिक़ और मालिक मानते थे, काबा को "बैतुल्लाह" (अल्लाह का घर) कहते थे और हज भी करते थे . वो अपने बुतों को अल्लाह नहीं समझते थे, बल्कि उन्हें अल्लाह के यहाँ सिफ़ारिशी और दुआएँ क़बूल करवाने का ज़रिया मानते थे. यही उनका शिर्क था।
जम्हूरियत:
जम्हूरियत में हाकिमियत का हक़ अवाम (जनता) को दिया जाता है, जो अपने नुमाइंदों (प्रतिनिधियों) के ज़रिए पार्लियामेंट में क़ानून बनाते हैं. अगर यह क़ानून अल्लाह के अहकाम और शरीयत के ख़िलाफ़ हों, तब भी उन्हें मानना लाज़िम क़रार दिया जाता है. यह अमल अल्लाह की हाकिमियत में अवाम और पार्लियामेंट को शरीक ठहराने के बराबर है, जो मक्का के मुशरिकीन के शिर्क से भी ज़्यादा संगीन है, क्योंकि इसमें अल्लाह से खुली बग़ावत और नाफ़रमानी का पहलू नुमायाँ है. बुतपरस्ती एक शख़्स की गुमराही है, जबकि जम्हूरी और सेक्युलर निज़ाम पूरे मुआशरे (समाज) को गुमराह करके शरीयत-विरोधी कामों को फ़रोग़ देता है।
सेक्युलर निज़ाम और उसकी गुमराहाँ
सेक्युलरिज्म, जो दीन (धर्म) को सियासत और मुआशरे से अलग करने का नज़रिया है, इस्लामी शरीयत की बुनियादों के सरासर ख़िलाफ़ है . इसी निज़ाम की वजह से सूद (ब्याज) जैसा कबीरा गुनाह आज आम हो चुका है. करोड़ों लोग सिर्फ़ इसलिए इस गुनाह में मुलव्विस हैं क्योंकि सेक्युलर निज़ाम सूदी बैंकिंग को ख़त्म नहीं करता. यह अल्लाह और उसके रसूल से जंग करने के बराबर है. इसी तरह दीगर बुराइयाँ और गुमराही सेक्युलर निज़ाम के तहत फल-फूल रही हैं।
इस्लामी हुकूमत की बुनियाद: निफ़ाज़-ए-शरीयत
इस्लामी हुकूमत की बुनियाद ही निफ़ाज़-ए-शरीयत है। इसका मतलब सिर्फ़ चंद सज़ाएँ नाफ़िज़ करना नहीं, बल्कि मुआशरे के हर शोबे (क्षेत्र) में क़ुरान और सुन्नत के अहकाम को लागू करना है, जिनमें शामिल हैं:
मुआशरे से सूद, फ़हाशी (अश्लीलता) और हर ग़ैर-शरीअ काम का मुकम्मल ख़ात्मा करना.
उम्मत-ए-मुस्लिमा में इत्तिहाद पैदा करने के लिए क़दम उठाना।
हर मालदार शख़्स से ज़कात वसूल करके मुस्तहिक़्क़ीन (ज़रूरतमंदों) तक पहुँचाना।
दौलत की मुंसिफ़ाना (न्यायपूर्ण) तक़सीम को यक़ीनी बनाना।
अद्ल व इंसाफ़ का ऐसा निज़ाम क़ायम करना जहाँ कोई ज़ालिम और मज़लूम न हो।
इस्लाम के ग़लबे के लिए जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह की तैयारी और अमल करना।
इजारादारी (एकाधिकार) और जागीरदारी (सामंतवाद) को ख़त्म करके तबक़ाती तक़्सिम को मिटाना.
जमहुरियत और ज़दिद दौर के दुसरे निज़ाम.
जम्हूरियत (Democracy): यह निज़ाम "अवाम की हुकूमत, अवाम के ज़रिए, अवाम के लिए" के उसूल पर बना है। इसमें क़ानून बनाने का सबसे बड़ा इख़्तियार अल्लाह के बजाय अवाम को दिया गया है, जो इस्लामी अक़ीदे "इन्हिल् हुक्मु इल्ला लिल्लाह" (हुक्म सिर्फ़ अल्लाह का है) के बिल्कुल उलट है.
सोशलिज्म (Socialism): यह निज़ाम माद्दी बुनियादों पर मआशी दब्दबे की बात करता है, इसकी बुनियाद अक्सर ख़ुदा के इंकार पर होती है। यह ज़कात, विरासत और हलाल-ओ-हराम के इस्लामी उसूलों को नज़रअंदाज़ करके एक इंसानी निज़ाम पेश करता है जो रूहानियत से ख़ाली है।
लिबरलिज्म (Liberalism): यह फरद की आज़ादी को हर चीज़ पर तरजीह देता है। इसके तहत ऐसी आज़ादियों को भी जायज़ समझा जाता है जो शरीयत में हराम हैं, जैसे कि इज़हारे-राय की आज़ादी के नाम पर अल्लाह और रसूल की तौहीन या अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी गुज़ारने के नाम पर ग़ैर-शरीअ कामों को अपनाना।
यह तीनों निज़ाम इंसानों के बनाए हुए हैं और अल्लाह की हाकिमियत और शरीयत के मुक़ाबले में खड़े होते हैं।
हल क्या है?
मुसलमानों के तमाम मसायेल का वाहिद हल निफ़ाज़-ए-शरीयत में है। यह मक़सद जम्हूरियत के रास्ते से हासिल नहीं हो सकता, क्योंकि यह निज़ाम ख़ुद शिर्क और ग़ैर-इस्लामी उसूलों पर क़ायम है. अगर पूरी असेंबली में तहज्जुद गुज़ार आलिम भी आ जाएँ, तब भी वो इस निज़ाम के तहत मुकम्मल इस्लामी शरीयत नाफ़िज़ नहीं कर सकते, क्योंकि यह एक दज्जाली निज़ाम है जिसे आलमी ताक़तें अपने मक़ासिद के लिए कंट्रोल करती हैं।
लिहाज़ा, मुसलमानों पर फ़र्ज़ है कि वो जम्हूरियत और सेक्युलरिज्म का मुकम्मल बाईकॉट करें और एक इस्लामी इंक़लाब के ज़रिए निफ़ाज़-ए-शरीयत के लिए जद्दोजहद करें। कम से कम ईमान का तक़ाज़ा यह है कि इस जम्हूरी शिर्क से ख़ुद को बचाया जाए और दूसरों को भी इससे आगाह किया जाए। पचास से ज्यादा मुस्लिम मुमालिक है सब के यहाँ यहि दसतुर है जो इस्लाम से दूरि के लियी बनाया गया है.
जम्हूरियत और लिबरलिज़्म: अज़मत से ज़वाल तक का सफ़र
तारीख़ गवाह है कि जब भी किसी क़ौम ने अपनी कामयाबी का मेयार अल्लाह की शरीयत के बजाय इंसानी नज़रियों को बनाया, वो आख़िरकार तबाही और बर्बादी का शिकार हुई। आज कई मुस्लिम ममालिक (देश) जो कभी अपनी ताक़त, इल्म और अद्ल (न्याय) के लिए मशहूर थे, जम्हूरियत और लिबरलिज़्म के दज्जाली निज़ाम के जाल में फँसकर अपनी पहचान, इक़्तिदार और अज़्मत खो चुके हैं।
वो क़ौमें जो कभी ताक़तवर थीं.
इसकी सबसे वाज़ेह मिसाल उस्मानिया सल्तनत है। सदियों तक तीन बर्रेआज़मों (महाद्वीपों) पर हुकूमत करने वाली यह अज़ीम सल्तनत और निज़ाम क़ायम थी। लेकिन जब लिबरलिज़्म और क़ौम परस्ती (राष्ट्रवाद) के मगरिबी नज़रियों ने इसके अंदर जड़ें पकड़नी शुरू कीं, तो यह अंदर से खोखली हो गई। जम्हूरियत के नाम पर इख़्तियार मिल्लत से लेकर तुर्की क़ौम को दे दिया गया और आख़िरकार ख़िलाफ़त को ख़त्म करके एक सेक्युलर निज़ाम नाफ़िज़ कर दिया गया, जिसने तुर्की को आलमी ताक़तों का मोहताज बना दिया.
इसी तरह, अंदलुस (स्पेन) की मिसाल हमारे सामने है, जहाँ मुसलमानों ने 800 साल तक इल्म-ओ-हिकमत और साईंस के चिराग़ रौशन किए। लेकिन जब हुक्मरान और अवाम अल्लाह के अहकाम से ग़ाफ़िल होकर दुनियावी ऐश-ओ-इशरत में डूब गए और अंदरूनी इख़्तिलाफ़ात (मतभेदों) का शिकार हुए, तो उनकी अज़्मत ख़ाक में मिल गई।
जम्हूरियत और लिबरलिज़्म का फ़रेब.
जम्हूरियत और लिबरलिज़्म, जो आज़ादी, बराबरी और इंसानी हुक़ूक़ के दिलकश नारे लगाते हैं, दरहक़ीक़त ग़ैर-इस्लामी और माद्दी निज़ाम का दर्जा देना है। यह निज़ाम मुस्लिम ममालिक को इन तरीक़ों से बर्बाद करते हैं.
1. अल्लाह की हाकिमियत का इंकार: यह निज़ाम हुक्म और क़ानून बनाने का हक़ अल्लाह से छीनकर इंसानों को दे देते हैं, जो शिर्क-फिल-हाकिमियत है।
2. उम्मत का शीराज़ा बिखेरना: क़ौम परस्ती (राष्ट्रवाद) और वतन परस्ती के नाम पर यह निज़ाम एक उम्मत को छोटे-छोटे मुल्कों में तक़सीम कर देते हैं जो आपस में लड़ते रहते हैं।
3. अख़लाक़ी और मुआशरती तबाही: लिबरलिज़्म शख्स की आज़ादी के नाम पर फ़हाशी, बे-हयाई और हर उस काम को फ़रोग़ देता है जो शरीयत में हराम है.
4. मआशी (आर्थिक) गुलामी: जम्हूरियत के नाम पर मुस्लिम ममालिक पर ऐसे हुक्मरान मुसल्लत किए जाते हैं जो मगरिबी ताक़तों के वफ़ादार होते हैं और मुल्क के वसाइल उनके हवाले कर देते हैं। सूदी निज़ाम के ज़रिए पूरी क़ौम को क़र्ज़ के जाल में फँसा दिया जाता है.
ऐ मिल्लत-ए-इस्लामिया के नौजवानो! अपनी तारीख़ से सबक़ सीखो। तुम्हारी अज़्मत का राज़ तलवारों और ख़ज़ानों में नहीं, बल्कि "ला इलाहा इल्लल्लाह" के कलिमे में पोशीदा है। जब तक तुम अल्लाह की हाकिमियत को मानते रहे, दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें शिकस्त न दे सकी।
जम्हूरियत, लिबरलिज़्म और सोशलिज़्म ज़हरीले फल हैं जो देखने में ख़ुशनुमा लगते हैं लेकिन अंदर से ईमान और रूहानियत को तबाह कर देते हैं । इन इंसानी निज़ामों से उम्मीदें वाबस्ता करना अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों को बर्बाद करने के मुतरादिफ़ है।
तुम्हारी कामयाबी और तमाम मसायेल का हल सिर्फ़ और सिर्फ़ निज़ाम-ए-ख़िलाफ़त और निफ़ाज़-ए-शरीयत में है। उठो और इस दज्जाली निज़ाम के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करो और इस्लामी इंक़लाब के लिए जद्दोजहद करो, क्योंकि यही नजात का वाहिद रास्ता है।
निज़ामों का खोखलापन: एक नई मिसाल.
सोने के अंडे देने वाली मुर्गी और लालची निज़ाम.
आपके पास एक नायाब मुर्गी है जो हर रोज़ सोने का एक अंडा देती है. आप उस अंडे को बेचकर अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं और खुशहाल ज़िंदगी गुज़ारते हैं. अब देखिए अलग-अलग निज़ाम इस मुर्गी के साथ क्या करते हैं.
समाजवाद (#Socialism)
सरकार कहती है कि सोने के अंडे पर सिर्फ़ आपका हक़ नहीं है, बल्कि समाज के हर फर्द का हक़ है. वो आपसे मुर्गी छीन लेती है और एक सरकारी दड़बे में डाल देती है. वो ऐलान करते हैं कि अब हर किसी को सोने का एक टुकड़ा मिलेगा. लेकिन सरकारी अफ़सरों की नाअहलि और सुस्ती की वजह से मुर्गी बीमार पड़ जाती है और अंडे देना बंद कर देती है. अब न आपको कुछ मिलता है, न समाज को. बराबरी के नाम पर सब कंगाल हो जाते हैं.
कम्युनिज़्म (#Communism)
निज़ाम ऐलान करता है कि निजी मिल्कियत एक जुर्म है. आपकी मुर्गी अब "कॉमरेड मुर्गी" है और वो रियासत की मिल्कियत है . उसे एक बड़े फार्म में हज़ारों मुर्गियों के साथ रखा जाता है, जहाँ उसकी कोई पहचान नहीं. आपसे वादा किया जाता है कि आपको अंडे का हिस्सा मिलेगा, लेकिन सारा सोना पार्टी के बड़े लीडरों और अफ़सरों की तिजोरियों में चला जाता है. अगर आप सवाल उठाते हैं, तो आपको "अवाम का दुश्मन" कहकर जेल में डाल दिया जाता है.
लोकतंत्र (#Democracy)
आपके मोहल्ले में ज़्यादातर लोग बत्तख पालते हैं. चुनाव होता है कि मोहल्ले के तालाब पर किसका हक़ होगा: मुर्गी का या बत्तखों का. अक्सरियत (majority) बत्तखों के हक़ में वोट देती है और आपकी मुर्गी को तालाब के पास जाने से भी रोक दिया जाता है. आप अपना हक़ खो देते हैं, लेकिन इस बात पर तसल्ली करते हैं कि फ़ैसला 'अवाम की मर्ज़ी' से हुआ. यह वो #लोकतंत्र है जहाँ अक्सरियत की लाठी चलती है.
लेफ्टिज़्म/लिबरलिज़्म ( #Leftism / #Liberalism)
आपके पास एक बेहतरीन मुर्गी है जो सोने का अंडा देती है. कुछ पढ़े-लिखे, मॉडर्न सोच वाले लोग आपके पास आते हैं और कहते हैं कि आप इस मुर्गी को "कैद" करके इसका "शोषण" (exploitation) कर रहे हैं. वो कहते हैं कि मुर्गी को "आज़ादी" का हक़ है और उसे अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा अधिकार है.
आप समझाते हैं कि आप उसकी कितनी अच्छी देखभाल करते हैं, लेकिन वो आपकी बात नहीं सुनते. वो "मुर्गी के अधिकारों" के लिए प्रोटेस्ट करते हैं, सोशल मीडिया पर आपको "जानवरों का दुश्मन" और "पितृसत्तावादी" (Patriarchal) घोषित कर देते हैं. फिर एक दिन वो ज़बरदस्ती आपकी मुर्गी को "आज़ाद" कराकर जंगल में छोड़ आते हैं.
दूसरे ही दिन, कोई जंगली जानवर उस "आज़ाद" मुर्गी को अपना निवाला बना लेता है. अब न मुर्गी रही, न सोने का अंडा. लेकिन वो लोग अब भी खुश हैं और किसी दूसरी "मज़लूम" मुर्गी को "आज़ाद" कराने के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं. यह है #लेफ्टिज़्म और #लिबरलिज़्म का खोखला निज़ाम, जो हक़ीक़त से दूर, ख़्याली दुनिया में रहता है और भलाई के नाम पर तबाही लाता है.
इस्लामी निज़ाम (#IslamicFinance)
आपके पास सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है. आप अंडा बेचते हैं और जो मुनाफ़ा होता है, उसमें से आप सबसे पहले अल्लाह का हिस्सा, यानी ज़कात, निकालते हैं . फिर आप उन लोगों का ख़याल रखते हैं जिन्होंने मुर्गी की देखभाल में आपकी मदद की. आप सूद (interest) पर पैसा नहीं लगाते, बल्कि किसी भरोसेमंद शख़्स के साथ मिलकर मुर्गी पालन का कारोबार शुरू करते हैं, जिसमें नफ़ा और नुक़सान दोनों में हिस्सेदारी हो. आपकी दौलत बढ़ती है, लेकिन हलाल और पाकीज़ा तरीक़े से. इससे समाज में दौलत गरदिश करती है और ग़रीबों को भी फ़ायदा होता है. जहाँ नुकसान और फाय्दे के जिम्मेदार खुद आप है, अपना कारोबार किजिये और ज़िंदगि जिये.
ये जो सोशलिज़्म का दिलकश नारा है,
इसमें हर शख़्स का हक़ मारा है.
कहते हैं बाँटेंगे दौलत सब में बराबर,
मगर छीन लेते हैं मेहनत का सहारा है.
वो कम्युनिज़्म कि जो मज़दूर का हामी था,
उसी के ख़ून से लिखा हर सलामी था.
सबका सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं,
लीडर ही मालिक, बाकी सब गुलामी था.
अब सुनो क़िस्सा लिबरलिज़्म/ लेफतिज्म की दुकान का,
ये सौदागर है तहज़ीब और ईमान का.
आज़ादी के नाम पे ऐसी हवा चलाई,
घर भी वीरान है, हक़ भी हैवान का.
कहते हैं, "सोच अपनी बदलो, पुराने ख़्यालों को छोड़ो,"
रवायत की हर दीवार को अब तुम तोड़ो.
इनकी बातों में जो आया, वो कहीं का न रहा,
ये वो ज़हर है जो चढ़ता है आहिस्ता-आहिस्ता.
लिबरलिज़्म की आज़ादी भी क्या चीज़ है,
जहाँ हर क़द्र-ओ-रवायत एक मरीज़ है.
तहज़ीब के नाम पर उरियानियत का चलन,
कहते हैं, "आपकी सोच ही बदतमीज़ है."
और ये डेमोक्रेसी का ढोंग निराला है,
अक्सरियत ने अक़लियत को कुचला है.
वोट की ताक़त का वहम पाले हुए,
हमने अपने ही हाथों से घर जला डाला है.
इन निज़ामों के नक़ाबों को उठा कर देखो,
इनकी बातों के फ़रेबों से ज़रा बच के चलो.
इंसाफ़ और हक़ तो बस नाम के हैं,
असल में हर तरफ़ ज़ुल्म का ही बोलबाला है.







No comments:
Post a Comment