Zohran Mamdani: How Socialism Intersects with Muslim Identity in Media Narratives.
Zohran Mamdani’s Socialist Vision and Muslim Identity in Media.
Muslim Identity as a Media Narrative Tool.
Intersection of Faith and Leftist Ideology.
Media Framing of Mamdani’s Dual Identity.
Zohran Mamdani Mayor of New York or Mayor of Muslim World?
Zohran Mamdani’s journey shows how Muslim identity are framed in media narratives, shaping public perception of progressive politics.
ज़ोहरान् म्मदानी न्यूयॉर्क का मेयर कम, मुस्लिम दुनिया का मेयर ज्यादा साबित हुआ सोशल मीडिया नैरेटिव मे।
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| जोहरान मामदानी: नाम की चमक से नज़रिये की गहराई तक. |
ज़ोहरान् म्मदानी को न्यू यॉर्क का ही मेयर रहने दे, उसे मुस्लिम दुनिया का मेयर न बनाये। यह एक बहुत ही खतरनाक मिशाल है जिस तरह से ज़ोहरान के जीत पर सोशल मीडिया पर बर्र ए सगीर के मुस्लिम नव जवान जश्न मनाया रहे है।
आज के दौर में मीडिया एक आईना नहीं, बल्कि एक रंगीन शीशा बन चुकी है — जो हक़ीक़त को नहीं, अपनी मर्ज़ी की तस्वीर दिखाती है। सियासत और समाज के इस बाज़ार में अब यह तय नहीं होता कि कौन क्या सोचता है, बल्कि यह कि किसे कैसे दिखाया जाए। यही वजह है कि कई बार कोई शख़्स, जिसकी विचारधारा इस्लाम या किसी मज़हबी पहचान से दूर होती है, उसे मुसलमानों का रहनुमा, अल्पसंख्यकों की आवाज़ या समाज का ‘वॉइस ऑफ़ चेंज’ बना दिया जाता है।
मीडिया की यह चालाकी पुरानी है। वह हर दौर में एक नया चेहरा ढूँढती है — जो जनता के बीच ‘उम्मीद’ की शक्ल में बेचा जा सके। लेकिन उस चेहरे के पीछे की सोच, उसकी वैचारिक ज़मीन, और उसकी असली पहचान को परतों में छिपा दिया जाता है। यही सिलसिला तब और गहराता है जब बात किसी ऐसे व्यक्ति की हो जो खुद को समाजवादी या Atheist कहता हो, लेकिन मीडिया उसे मज़हबी पहचान के झंडे तले खड़ा कर दे।
जोहरान मामदानी के मुस्लिम पह्चान वाले सुर्ख़ी को देखकर ज़ेहन साज़ी के असरात क़बूल करने से पहले ज़रा ठहर कर जंग-ए-ज़ेहन (mind war) के माज़ी पर नज़र डालें और मजमूई तौर पर मीडिया का मक़सद समझें।
मीडिया का बुनियादी तरीन मक़सद हया को फ़रोग़ देना नहीं, बल्कि हया को मिटाना है। और जब उनका मक़सद ही बे-हयाई हो, तो फिर वो आपको सही ख़बर क्यों देंगे? अगर वो कोई ख़बर देंगे भी तो वो ऐसे अंदाज़ में देंगे जो उनके अज्म (इरादे) और हदफ़ (मक़सद) को मज़बूत करे।
मीडिया का बुनियादी तरीन मक़सद हया को फ़रोग़ देना नहीं, बल्कि हया को मिटाना है। और जब उनका मक़सद ही बे-हयाई हो, तो फिर वो आपको सही ख़बर क्यों देंगे? अगर वो कोई ख़बर देंगे भी तो वो ऐसे अंदाज़ में देंगे जो उनके अज्म (इरादे) और हदफ़ (मक़सद) को मज़बूत करे।
जब ज़ेहन साज़ी का मक़सद इंसान की हया को छीनना हो, तो वो कुछ और नहीं बल्कि एक ऐसी जंग है जो सुर्ख़ी और दजाली मीडिया ने शिद्दत के साथ छेड़ रखी है। इस जंग की तरफ़ से निकलने वाले हर लफ़्ज़ का हदफ़ सिर्फ़ एक है — इंसान के ज़ेहन को गुमराह करना।
अब अगर आप किसी खबर या तहरीर को क़बूल करने से पहले रूक कर ग़ौर करें तो कुछ बातें याद रखिए:
पहली बात — जो शख़्स मीडिया में मशहूर है, या जिसे लोग रहनुमा कहते हैं, वो असल में कौन है?
वो कहाँ से आया, उसकी तालीम क्या है, उसका ताल्लुक किन लोगों से है, और वो किन अफ़कार का हामी है?
क्योंकि जो शख़्स अपने मज़हबी, दीनी और सियासी माजि से बे-ख़बर है, वो दरअस्ल मीडिया की साज़िश में एक मोहरा बन चुका है।
पहली बात — जो शख़्स मीडिया में मशहूर है, या जिसे लोग रहनुमा कहते हैं, वो असल में कौन है?
वो कहाँ से आया, उसकी तालीम क्या है, उसका ताल्लुक किन लोगों से है, और वो किन अफ़कार का हामी है?
क्योंकि जो शख़्स अपने मज़हबी, दीनी और सियासी माजि से बे-ख़बर है, वो दरअस्ल मीडिया की साज़िश में एक मोहरा बन चुका है।
हमारे पास अगर किसी बात की कोई तहक़ीक़ नहीं, कोई सुबूत नहीं, तो किसी की शोहरत या लिबास देखकर उसे सच्चा या रहनुमा मान लेना हमारी अपनी कमज़ोरी है।
कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने “कलिमा” तक नहीं पढ़ा, मगर मीडिया उन्हें “मुस्लिम वॉइस” के तौर पर पेश करता है।
और अफ़सोस ये कि हमारे ही नौजवान बिना जाने, बिना पूछे, उनके पीछे चल पड़ते हैं।
कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने “कलिमा” तक नहीं पढ़ा, मगर मीडिया उन्हें “मुस्लिम वॉइस” के तौर पर पेश करता है।
और अफ़सोस ये कि हमारे ही नौजवान बिना जाने, बिना पूछे, उनके पीछे चल पड़ते हैं।
असल बात यह है कि हमें ये समझना होगा कि मीडिया अब सिर्फ़ “ख़बर देने” वाला ज़रिया नहीं रहा, बल्कि दिमाग़ बदलने का औज़ार बन चुका है।
वो हमारी सोच को उसी तरह ढालना चाहता है जैसे किसी मुल्क की हुकूमत अपने कानून बनाती है।
वो हमें यह सिखाता है कि किससे मोहब्बत करनी है, किसे “एक्सट्रीमिस्ट” कहकर ख़ामोश कर देना है।
वो हमारी सोच को उसी तरह ढालना चाहता है जैसे किसी मुल्क की हुकूमत अपने कानून बनाती है।
वो हमें यह सिखाता है कि किससे मोहब्बत करनी है, किसे “एक्सट्रीमिस्ट” कहकर ख़ामोश कर देना है।
आज मीडिया और लेफ़्टिस्ट तबक़ा हमें “मॉडर्न” और “प्रोग्रेसिव” बनने के नाम पर हया, दीनीयात और इस्लामी तालीमात से दूर कर रहा है।
मगर जो अपनी पहचान भूल जाता है, वो दुनिया की किसी भी पहचान में महफुज नहीं रह सकता।
इसलिए मुसलमानो, अपने ज़ेहन की हिफ़ाज़त करो, हर बात पर यक़ीन करने से पहले तहक़ीक़ करो, और इस बात को याद रखो कि — हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, और हर मुसलमान नाम वाला तुम्हारा हमदर्द नहीं होता।
मगर जो अपनी पहचान भूल जाता है, वो दुनिया की किसी भी पहचान में महफुज नहीं रह सकता।
इसलिए मुसलमानो, अपने ज़ेहन की हिफ़ाज़त करो, हर बात पर यक़ीन करने से पहले तहक़ीक़ करो, और इस बात को याद रखो कि — हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, और हर मुसलमान नाम वाला तुम्हारा हमदर्द नहीं होता।
जोहरान मामदानी: नाम की चमक से नज़रिये की गहराई तक.
एक नाम जो लहरें पैदा कर रहा है.
जोहरान मामदानी – यह नाम सुनते ही मन में एक तस्वीर उभर आती है, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्नों से निकला हुआ शायर या योद्धा, जिसकी आवाज़ हवाओं में गूंजती हो। लेकिन हकीकत में, यह नाम न्यूयॉर्क की राजनीतिक दुनिया का एक चमकदार सितारा है, जो लेफ्टिस्ट विचारों की ज्योति से जगमगा रहा है। यूगांडा में जन्मे, भारतीय मुस्लिम मूल के इस युवा विधायक को मीडिया ने किस तरह मुसलमानों का 'हीरो' बना दिया है?
खासकर उनके अरबी नाम 'जोहरान' की वजह से। हमारी मीडिया कैसे इस नाम की आड़ में एक साधारण राजनीतिज्ञ को मुसलमानों की उम्मीदों का प्रतीक बना रही है? लेकिन सच्चाई इससे कहीं गहरी है। मामदानी की सफलता नाम की चमक में नहीं, बल्कि उनके सोशलिस्ट और लेफ्टिस्ट विचारों में छिपी है, जो अमेरिकी राजनीति को नई दिशा दे रही हैं। यह चित्रण सिर्फ़ सराहना नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश का हिस्सा लगता है, जहां नाम की मिठास राजनीतिक एजेंडे को मीठा कर देती है, लेकिन विचारों की कठोरता को छिपा लेती है।
जोहरान मामदानी का सफर अनोखा है, जैसे कोई नदी जो पहाड़ों से उतरकर समंदर में मिल जाती है। 1991 में यूगांडा के कंपाला में पैदा हुए, वे अमेरिका आकर न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य बने। डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ऑफ अमेरिका (डीएसए) से जुड़े, वे किराया नियंत्रण, फिलिस्तीन समर्थन और सामाजिक न्याय की बातें करते हैं। लेकिन मीडिया का फोकस उनके विचारों पर कम, नाम पर ज़्यादा है। 'जोहरान' – यह शब्द अरबी जड़ों से आता प्रतीत होता है, जो 'प्रकाश' या 'चमक' का बोध कराता है। यही चमक मीडिया ने पकड़ ली, और मुसलमानों के लिए एक नया 'हीरो' गढ़ दिया। क्या यह संयोग है, या जानबूझकर की गई चाल?
वास्तव में, उनकी राजनीतिक उड़ान सोशलिज्म की पंखों पर सवार है, न कि धार्मिक पहचान पर। यह किरदार मुसल्मानो पर थोपा गया है ताकि इस से मुसलमानो को दिखा सके के वे भि ऐसे नज़रिये को गले लगायेंगे तो वे और भि उपर पहुच सकते है.
मीडिया का खेल: अरबी नाम की राजनीति और लेफ्टिस्ट छाया.
हमारी मीडिया, चाहे वह अमेरिकी हो या वैश्विक, हमेशा से नामों की शक्ति को समझती रही है, लेकिन विचारों की ताकत को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है। जोहरान मामदानी का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। उनके नाम को अरबी रंग देकर, मीडिया उन्हें मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि बना रही है। सिर्फ अमेरिकि मयोर नहि बल्कि पुरि मुस्लिम दुनिया के मयोर के तौर पर एक हिरो बनाया. सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट्स, न्यूज़ चैनलों की हेडलाइंस – सबमें 'मुस्लिम हीरो जोहरान' जैसी लाइनें प्रमुख हैं। लेकिन सवाल यह है: क्या मामदानी वाकई मुसलमानों की हर समस्या का हल हैं? या मीडिया सिर्फ़ नाम की चमक से फायदा उठा रही है, जबकि उनकी असली ताकत लेफ्टिस्ट सोशलिज्म में है?
मसलन , फिलिस्तीन मुद्दे पर उनकी मुखरता को देखिए। मामदानी ने इजरायल की नीतियों की आलोचना की, जो मुस्लिम दुनिया में सराहनीय है। लेकिन मीडिया ने इसे 'अरबी नाम वाले मुस्लिम योद्धा' के रूप में पेश किया। फेसबुक शेयर जैसे प्लेटफॉर्म्स पर उनके वीडियोज़ लाखों व्यूज पा रहे हैं, जहां कमेंट्स में 'हमारा जोहरान' जैसे शब्दों की बाढ़ आ जाती है। यह खेल बहुत खतरनाक है, क्योंकि यह मुसलमानों को एक सतही छवि देता है – जहां नाम ही सब कुछ हो जाता है, विचारों की गहराई गायब। लेकिन गहराई में उतरें तो मामदानी का सोशलिज्म एक ऐसी विचारधारा है जो पूंजीवाद की जड़ों को काटने की कोशिश करती है। वे किराया नियंत्रण की वकालत करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि आवास एक मौलिक अधिकार है, न कि व्यापार। यह लेफ्टिस्ट दृष्टिकोण अमेरिकी राजनीति में नया नहीं, लेकिन एक मुस्लिम चेहरे से जुड़कर ताज़गी ला रहा है।
मीडिया की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। याद कीजिए इल्हाम ओमर या रशीदा तलीब को – इनके नामों की वजह से उन्हें 'मुस्लिम महिलाओं का चेहरा' कहा गया। जोहरान मामदानी के साथ भी यही हो रहा है। उनके भारतीय मुस्लिम बैकग्राउंड को नज़रअंदाज़ कर, अरबी नाम को हाइलाइट किया जा रहा है। क्यों? क्योंकि अरबी नाम मुस्लिम पहचान की प्रतीकात्मकता रखता है – कुरान की भाषा, इस्लाम की जड़ें। मीडिया जानती है कि यह नाम मुस्लिम दर्शकों को तुरंत आकर्षित करेगा, भले ही मामदानी के विचार पूरी तरह से इस्लामी न हों। यह एक तरह की मार्केटिंग है, जहां नाम बेचा जा रहा है, इंसान नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी सफलता – चाहे असेंबली मेंबर बनना हो या मेयर पद की दौड़ में उतरना – उनकी लेफ्टिस्ट विचारधारा की वजह से हुई। अमेरिका ने उन्हें इसलिए ऊंचा उठाया क्योंकि उनका सोशलिज्म वर्किंग क्लास की आवाज़ बन गया, न कि मुस्लिम वोट बैंक के कारण।
लेफ्टिस्ट विचारधारा: सोशलिज्म की ज्योति और विवादास्पद समर्थन
जोहरान मामदानी की राजनीति का केंद्रबिंदु उनका सोशलिज्म है, जो लेफ्टिस्ट विचारधारा की एक मिसाल है। डीएसए के सदस्य के रूप में, वे पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना करते हैं। किराया नियंत्रण से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक, उनका एजेंडा मजदूर वर्ग को मजबूत बनाने पर केंद्रित है। लेकिन यह सोशलिज्म सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी फैला हुआ है। यहां आता है उनका LGBTQ+ समुदाय का खुला समर्थन। मामदानी गे राइट्स, होमोसेक्शुअलिटी और ट्रांसजेंडर के प्रबल समर्थक हैं। वे मानते हैं कि प्रेम की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए, न्यूयॉर्क की सड़कों पर उनके भाषणों में यह स्पष्ट झलकता है, चाहे वह मुस्लिम हो या LGBTQ+।
यह समर्थन विवादास्पद है। इस्लामी शिक्षाओं में होमोसेक्शुअलिटी पर सख्त रुख़ है, लेकिन मामदानी इसे लेफ्टिस्ट लेंस से देखते हैं। उनका तर्क है कि सोशलिज्म हर अल्पसंख्यक को शामिल करता है, चाहे वह धार्मिक हो या यौनिक। मीडिया ने इस पहलू को कम ही छुआ, क्योंकि यह उनके 'मुस्लिम हीरो' वाले नैरेटिव को कमज़ोर कर देता। लेकिन यही विचारधारा है जिसने उन्हें अमेरिकी राजनीति में स्थापित किया। मेयर पद की दौड़ में (या भविष्य की महत्वाकांक्षाओं में), उनकी जीत सोशलिज्म की वजह से होगी , न कि नाम या धर्म से। उदाहरणस्वरूप, 2024 के चुनावों में उनके समर्थन में LGBTQ+ ग्रुप्स ने लाखों डॉलर दान दिए, जो दर्शाता है कि उनकी ताकत विचारों में है।
मीडिया अगर इस लेफ्टिस्ट पक्ष को उजागर करे, तो 'जोहरान मामदानी सोशलिज्म' या 'LGBTQ मुस्लिम सपोर्ट' जैसे कीवर्ड्स वायरल हो जाएंगे। लेकिन वे नाम पर अटके रहते हैं, जिससे मुसलमानों में गलतफहमी फैलती है। क्या मामदानी मुस्लिम मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं? शायद नहीं पूरी तरह, क्योंकि उनका LGBTQ+ स्टैंड इस्लामी परंपराओं से टकराता है। फिर भी, अमेरिका ने उन्हें इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उनका सोशलिज्म विचार है – यह मुसलमानों को भी, गे कम्युनिटी को भी एकजुट करता है। यह विचारधारा नाम की चमक से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली है।
मुसलमानों पर असर: हीरो की भ्रांति और विचारधारा का द्वंद्व
मुस्लिम समुदाय के लिए यह चित्रण दोधारी तलवार है। एक तरफ़, जोहरान मामदानी जैसे चेहरे प्रेरणा देते हैं – वे दिखाते हैं कि अमेरिकी राजनीति में मुसलमानों की आवाज़ बुलंद हो सकती है। लेकिन दूसरी तरफ़, मीडिया का यह 'हीरो-बनाना' सतही है। नाम की वजह से उम्मीदें बढ़ जाती हैं, और जब वास्तविकता सामने आती है – जैसे उनका LGBTQ+ समर्थन या सोशलिस्ट एजेंडा – तो निराशा हाथ लगती है। मामदानी के विचारों में इस्लामी मूल्य कहां फिट होते हैं? किराया नियंत्रण अच्छा है, लेकिन मुसलमानों की धार्मिक या सांस्कृतिक चुनौतियां? मीडिया इन पर चुप्पी साधे रहती है।
भारतीय मुस्लिम संदर्भ में देखें तो मामदानी का नाम 'ममदानी' गुजराती मुस्लिम जड़ों को इंगित करता है, न कि अरबी। फिर भी, मीडिया अरबी 'जोहरान' पर जोर देती है। यह मुसलमानों को विभाजित करता है – भारतीय मूल को भुलाकर अरब दुनिया से जोड़ना। मीडिया, खासकर दक्षिण एशियाई, इस ट्रेंड को फॉलो कर रही है। उर्दू अखबारों से लेकर हिंदी चैनलों तक, 'जोहरान मामदानी: मुसलमानों का नया सितारा' जैसी हेडलाइंस आम हैं। लेकिन क्या यह सच्ची पत्रकारिता है, या व्यूअरशिप की होड़?
लेफ्टिस्ट विचारधारा के कारण उनकी सफलता को समझें – अमेरिका में मेयर या विधायक जैसे पद विचारों की परीक्षा देते हैं, न कि धर्म की। मुसलमान होने से वोट मिल सकते हैं, लेकिन बने रहने के लिए सोशलिज्म जैसी मजबूत विचारधारा चाहिए।
इसकी गहराई समझने के लिए सोचिए: अगर नाम 'जॉन स्मिथ' होता, तो क्या मामदानी को इतना ध्यान मिलता? शायद नहीं। नाम की यह शक्ति मीडिया के हाथों में हथियार बन गई है। मुसलमानों को 'हीरो' दिखाकर, वे वोट बैंक या रेटिंग्स का खेल खेल रही हैं। लेकिन उनका चित्रण मुस्लिम आइकॉन के रूप में अतिरंजित है। उनका LGBTQ+ समर्थन मुस्लिम युवाओं के लिए एक चुनौती है – क्या वे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बना पाएंगे?
नाम से आगे की सच्चाई और विचारों की विजय
जोहरान मामदानी का उदय राजनीति का एक रोचक अध्याय है, लेकिन मीडिया का उनका चित्रण एक सबक सिखाता है। अरबी नाम की चमक में मुसलमानों का 'हीरो' गढ़ना आसान है, लेकिन यह स्थायी नहीं। उनकी असली ताकत सोशलिज्म और लेफ्टिस्ट विचारधारा में है, जो LGBTQ+ है। अमेरिका ने उन्हें मेयर या उच्च पद के लिए सोशलिज्म और लेफ्टिस्ट विचारधारा कि वजह से दिया है, न कि मुस्लिम पहचान के कारण। मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी – सतही चित्रण छोड़कर, गहन विश्लेषण पर जोर देना होगा। जोहरान मामदानी जैसे व्यक्तियों को सही संदर्भ में देखें, ताकि मुस्लिम समुदाय की उम्मीदें वास्तविकता पर टिकी रहें। विचारों की गहराई ही सच्ची नजाकत है, नाम की चमक तो क्षणिक है।
ज़ोहरन ममदानी न्यूयॉर्क के मेयर हैं, मुस्लिम दुनिया के नहीं।
उसकी सियासत की पहचान “डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म” और शहरी नीतियाँ हैं, कोई दीनदार पेशवाई नहीं। उनके बारे में जज़्बाती दावों के बजाय यह समझना ज़रूरी है कि वह डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट्स ऑफ़ अमेरिका से जुड़े हुए एक ला-दीन सियासतदान हैं, जिनका एजेंडा शहर की अफ़ोर्डेबिलिटी, ट्रांसपोर्ट, हाउसिंग, टैक्स‑पॉलिसी, हम जींस परस्ती, फ़हाशि को फ़िरोग्, दुनिया की सबसे बदतरीन अमल को आज़ादी और हक के नाम पर फैलाना है।
इसलिए नादान मुस्लमानो से गुजारिश है के ऐसे बेगैरत, फाजीर फाशीक लोगो को अपना हमदर्द न समझे, उनमे खुद को न देखे।
उसके नज़ारिये से ज्यादा अरबी नाम की वजह से शोहरत मिली है , इससे पहले किसी वहदे पर रहते हुए उसे कभी इतनी शोहरत हासिल नही हुई। अरबी नाम या मुसलमान लफ्ज़ मे बहुत बरकत है जिससे हिंदूस्तान से लेकर अमेरिका तक मे यह मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ है।
वह ग्जा और फिलिसतीन पर इसलिए बोलता है के इससे अरबी नाम के वजह से मुस्लिम दुनिया का चेहरा बन जाए।
जज़्बाती न बने दनिश्वर बने, हक़ीक़त जाने और गौर व फिक्र करना सीखे। किसी मसले पर बगैर तहकिक के तबसेरा न करे, किसो अंजान शख्स या शखियत को बगैर जाने ला इल्मी मे उसे पेशवा या रहनुमा का मनसब अता न करे।
ममदानी कहता है कि मेयर बन कर मैं ट्रम्प के ऐंटी LGBTQ एजेंडे के ख़िलाफ़ सैकड़ों वकील खड़ करूँगा, जो इसकी सपोर्ट करें, न्यूयॉर्क को LGBTQ को पनाह देने वाला शहर बनाऊँगा।
यह उन लोगों के साथ बैठता है जो किसी धर्म/मजहब से अलग अपना एक खास फिक्र चलाता है, यह नज़रिया दुनिया के हर कोने मे है, जिसे "वामपंथी" कहते है। यह लेफ्ट नज़रिया दुनिया की सबसे गलिज और फहश नजरिया है।
इसकी माँ मीरा नाएर ‘टेल ऑफ़ लव, कामा सूत्र’ जैसी जिन्सी फ़िल्म की अफसाना निगार (राइटर) है। बाप महमूद ममदानी कोलंबिया विश्वविद्यालय का मशहूर प्रोफेसर है।
यह लोग अपने नज़रिए से काम करते है, जबकी कुछ जज़्बाती मुस्लिम नवजवां अरबी उर्दू नाम देख कर हर ऐरे गैरे को अपना मसीहा समझने लगते है। उन्हें यह समझना होगा के वह अमेरिकी शहर न्यू यॉर्क का मेयर बना है नाकि मुस्लिम दुनिया का मेयर, लेकिन सोशल मीडिया पर बर्र ए सगीर के मुसलमान उसे उम्मत ए मुस्लेमा का हीरो समझने लगा।
जैसे किसी बड़ी जंग मे फतह मिली हो अब जश्न मनाने का वक़्त आगया है वैसा नादान लोगो ने इसे समझा।
असल मसला यही है — पहचान को विचार पर हावी कर देना।
जब कोई समाज किसी की बात उसके किरदार से नहीं, बल्कि उसके नाम या वंश से तौलता है, तो सियासत को एक नया हथियार मिल जाता है। मीडिया उसी हथियार का इस्तेमाल करती है — ताकि आम लोगों के दिलों में भरोसा भी बने और उनकी नज़रों पर परदा भी पड़ा रहे।
जब कोई समाज किसी की बात उसके किरदार से नहीं, बल्कि उसके नाम या वंश से तौलता है, तो सियासत को एक नया हथियार मिल जाता है। मीडिया उसी हथियार का इस्तेमाल करती है — ताकि आम लोगों के दिलों में भरोसा भी बने और उनकी नज़रों पर परदा भी पड़ा रहे।
सोशलिज़्म, सेक्युलरिज़्म या एथिज़्म जैसी विचारधाराएँ बुनियादी तौर पर मज़हबी ढाँचों से जुदा होती हैं। लेकिन मीडिया, अपने “नैरेटिव” की मजबूरी में, इन विचारों को एक समुदाय की “तरक्क़ी” या “जागृति” के प्रतीक के तौर पर पेश कर देती है। इससे दो नुकसान होते हैं — एक तो उस व्यक्ति की असली सोच की पहचान मिट जाती है, और दूसरा, उस समुदाय की असली बौद्धिक बहस दम तोड़ देती है।
मीडिया का यह रवैया सिर्फ़ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की “पॉलिटिकल स्टोरीटेलिंग” का हिस्सा है। कभी किसी को नायक बनाकर पेश किया जाता है, कभी किसी को खलनायक — और दोनों ही सूरतों में सच पीछे रह जाता है। असल बात यह नहीं कि कोई क्या पहनता है, क्या बोलता है, या किस मंच पर खड़ा है; असल बात यह है कि उसके ज़हन में कौन-सी सोच पल रही है और उस सोच से समाज को क्या हासिल हो रहा है।
मुसलमानों के लिए नसीहत: नाम और शक्ल से किसि शख्स की असल फिक्र और नज़रिया (विचारधारा) का अंदाज़ा न लगाये — मीडिया के बने रह्नुमा / हिरो के पीछे की सोच पर ग़ौर करें।
अब वक़्त है कि हम पहचान और विचार में फ़र्क़ को ठीक तरीके से समझें। अक्सर कोई शख्स जिस का नाम उर्दू या अरबी हो, उसी से हमारी उम्मीदें जुड़ जाती हैं — मगर नाम सिर्फ़ एक सूरत है, दिल की राह नहीं। असल इम्तिहान यह है कि उस शख़्स के आमाल, फिक्र, हरकत उसके इज़हारात और उसके ऐक्टिविटी का मुआयना करें: क्या वह हमारे अक़ीदे/फिक्र हमारे मजहबी मसाइल और हमारी हमदर्दी के साथ खड़ा है, या उसकी सोच किसी और मक़सद की कामयाबि के लिये है?
मीडिया और सोशल मीडिया अक्सर चेहरों को किरदार दे देती है — कभी नायक, कभी विरोधी। हमें सूझ-बूझ के साथ इन किरदारों की असलियत पर सवाल उठाने चाहिए। नाम और नस्ल के बहकावे में आकर अपनी आवाज़ किसी एक शख्स के हवाले न कर दें। किसी के नाम से उसकी नीयत और फ़िक़्र का अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता — उसके मजामिन, बयानात, तंजिम और फ़ैसलों को जाँचिए; वही आपकी रह्नुमाइ करेगा.
आज का सबसे बड़ा इम्तिहान तलवारों का नहीं, ज़ेहन का है। अब जंग मैदानों में नहीं, बल्कि अख़बारों, चैनलों और सोशल मीडिया की स्क्रीन पर लड़ी जाती है। जिस तरह पहले दुश्मन सरहद पर खड़ा होता था, अब वो हमारे घरों में, हमारी सोचों में दाख़िल हो चुका है — और इसे हम “नैरेटिव” कहते हैं।
मीडिया और लेफ़्ट-लिबरल इंटेलेक्चुअल तबक़ा अब सिर्फ़ ख़बर नहीं देता, बल्कि फ़िक्र बनाता है। वो ये तय करता है कि हमें किससे मोहब्बत करनी चाहिए और किससे नफ़रत। किसे रहनुमा मानना है और किसे रद्द करना है। यह सब इतनी ख़ूबसूरती से होता है कि देखने वाला समझ भी नहीं पाता कि उसका यक़ीन कब चोरी हो गया।
मुसलमानों को आज सबसे ज़्यादा इसी फ़ित्ने से ख़तरा है। मीडिया ने हमें वो चेहरे दिखाए हैं जो हमारे नाम से बोलते हैं, मगर हमारी फ़िक्र से नहीं चलते। उनके नाम उर्दू या अरबी हैं, मगर उनका दिल उस “इस्म” से बेगाना है जिसे वो अपने साथ लेकर चलते हैं। वो ऐसे शख़्स हैं जो इस्लाम के बजाय “सोशलिज़्म”, “सेक्युलरिज़्म” और “Atheism” के झंडे तले खड़े हैं — और मीडिया उन्हें मुसलमानों की आवाज़ बताता है।
हक़ीक़त यह है कि मीडिया का काम अब सच्चाई दिखाना नहीं, सच्चाई छुपाना है। वो एक ऐसा नक़्शा खींचता है जिसमें मुसलमान की पहचान सिर्फ़ एक वोटर की तरह रह जाए, न कि एक उम्मती की तरह। वो हमें बहसों में उलझा देता है — मगर हमारे दीनी मसाइल, हमारी तालीम, हमारी बुनियादी इज़्ज़त, हमारे हक़ूक़ — सबको पीछे छोड़ देता है।
लेफ़्टिस्ट इंटेलेक्चुअल तबक़ा अपने इल्म की रोशनी में वो अंधेरा फैलाता है जो नज़र तो उजाला आता है, मगर उसमें सच्चाई नज़र नहीं आती। यह तबक़ा हया को “रूढ़िवाद” कहता है, ईमान को “कट्टरता” और अल्लाह की इताअत को “पुराने ज़माने की सोच” बताता है। और अफ़सोस यह है कि हमारे ही कुछ नौजवान ऐसे लफ़्ज़ों में “रोशनी” तलाश करते हैं।
मुसलमानों को अब यह समझना होगा कि नाम से हमदर्दी नहीं, नज़रिया देखना होगा। हर वो इंसान जो हमारे नाम पर बोले, ज़रूरी नहीं कि हमारे लिए बोले। हर वो आवाज़ जो इंसाफ़ का दावा करे, ज़रूरी नहीं कि वो हक़ की आवाज़ हो। हक़ वही है जो क़ुरआन और सुन्नत से मुताबिक़ हो — और जो उससे टकराए, चाहे कितना भी “मॉडर्न” या “इंटेलेक्चुअल” क्यों न लगे, वो गुमराही है।
मीडिया का नैरेटिव हमें एक दूसरे से दूर करने, हमारी पहचान को “पॉलिटिकल आइडेंटिटी” में बदलने की कोशिश कर रहा है। मगर हमें याद रखना चाहिए कि हम किसी पार्टी या एजेंडे के पैरोकार नहीं — हम उम्मत-ए-मुसलिमा हैं, जिनकी राह और राहनुमा दोनों तय हैं।
मीडिया मुसल्मानो वो दिखाता है जो वो चाहता है — मगर देखना वो है जो वो छुपाता है। नाम से नहीं, नज़रिया से पहचान करना चाहिये।
दीन की राह पर चलने वाले हर मुसलमान से दुआ है: अपनी सोच को मजबूत रखिये, शख्स को नही शख़्सियतों को, मन्हज,फिक्र, अक़ीदा और नज़रिया को तरजीह दीजिए — और उस सेफ़गार्ड के साथ खड़े रहिए जो हमारी असल परेशानियों का हल ढूँढे। नाम के पर्दे के पीछे की सच्चाई पहचानिए.
सच की राह पर चलने वाला हमेशा तनहा होता है — मगर उसका रब उसके साथ होता है।







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