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Gharo Ko tabah karne Wala Foreign Job?

Bahar Ki Naukari Kaise Gharo aur Khandan Ko Barbad Kar rahi hai?

टूटते घर और रिश्तों पर असर.
चमक और धोखे के बीच फंसा जीवन.
क्या विदेश की नौकरी वाकई बेहतर है?
परदेस की नौकरी: चमकदार सपने, कड़वा सच और टूटते रिश्ते.
ख़ानदानी निज़ाम टूटे तो इंसान तन्हा नहीं होता, उसकी पहचान भी बिखर जाती है।.
ख़ानदानी निज़ाम मोहब्बत की वो डोर है जो हर तूफ़ान में रिश्तों को मज़बूत रखती है।
जब ख़ानदान साथ होता है तो घर सिर्फ़ दीवारों का नाम नहीं, बल्कि दुआओं का सहारा बन जाता है।
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परिवार और करियर.
विदेश की नौकरी सुनने में जितनी चमकदार लगती है, हकीकत उतनी ही कड़वी हो सकती है। चमक और धोखे के बीच टूटते घरों की कहानी जानिए और सोचिए—क्या परदेस की नौकरी वाकई आपके सपनों का सच है?
 
परदेस की नौकरी: चमक, धोखा और टूटते घर.
ख़ानदान का निज़ाम वो साया है जो हर मुश्किल में इंसान को संभाल लेता है।
रिश्तों की गर्माहट और मोहब्बत का असली सहारा सिर्फ़ ख़ानदानी निज़ाम है।
हमारे मुआशरे में एक चलन आम हो गया है। लड़के बाहर के मुल्कों में रिहाइश-पज़ीर (रहते) हैं, अपने मुल्क में आकर शादी करते हैं और बीवी को यहीं छोड़ जाते हैं। तीन या छह महीने की छुट्टी गुज़ार कर वापस चले जाते हैं। इसके बाद किसी को साल में तो किसी को कई सालों बाद घर आना नसीब होता है। हर घर की कहानी अलग है, मगर दर्द और तन्हाई की दास्ताँ तकरीबन एक जैसी है।

कहीं बीवियों की ख़्वाहिश होती है कि माल मिले, ताकि रिश्तेदारों में उनका मक़ाम बुलंद हो। वहीं, ज़्यादातर मर्द मजबूरियों का बोझ उठाए परदेस काट रहे होते हैं। किसी को क़र्ज़ उतारना है, किसी को घर बनाना है, तो किसी को छोटे बहन-भाइयों की तालीम और शादियों की फ़िक्र है।

 दौलत के बदले बिखरते रिश्ते

साल-दो साल की जुदाई तो शायद मर्द-ओ-ज़न के लिए क़ाबिल-ए-बर्दाश्त है, मगर सालों-साल परदेस में गुज़ार देना रिश्तों को खोखला कर देता है। कई लोग बताते हैं कि शौहर के बाहर होने की वजह से औरतें बेराहरवी (गलत रास्ते) पर जा रही हैं और घर टूट रहे हैं। जिस दौलत के लिए मर्द अपना घर-परिवार छोड़ता है, अक्सर वही दौलत घर की तबाही का सामान बन जाती है।

ऐसे हालात में औरतें अक्सर नफ़सियाती मरीज़ बन जाती हैं। बेवजह बच्चों की मार-पीट, ससुराल वालों से झगड़ा और चिड़चिड़ापन उनकी आदत में शुमार हो जाता है। घरवाले ताना देते हैं, "अच्छा खाने-पहनने को मिल रहा है, फिर भी झगड़े ख़त्म नहीं होते।" वो यह भूल जाते हैं कि निकाह का असल मक़सद सिर्फ़ पैसा कमाना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का साथ और सुकून भी है।

मर्द की अपनी क़ुर्बानी 
ऐसा नहीं है कि मर्द परदेस में बहुत ख़ुश रहते हैं। वो भी अपनों से दूर तन्हाई मे जिंदगी जीते है। घर वालों की ख़ुशियों के लिए कोल्हू के बैल बनकर रहते हैं और अनजाने में अपना और अपने बीवी-बच्चों का मुस्तक़बिल तबाह कर बैठते हैं। अगर बीवी कभी दबे-छिपे लफ़्ज़ों में वापस आने का ज़िक्र कर दे, तो जवाब मिलता है, "मैं यहाँ कौन-सा ख़ुश हूँ? तुम्हारे लिए ही मेहनत कर रहा हूँ।" 
अगर कोई मर्द नही कमाता है तो बीवी की हमेशा उससे शिकायत लगी रहती है। अपने आसपास के औरतो को देखकर, शादियों मे रिश्तेदार के गहने और महंगे कपड़े से किसी की हैसियत आँका जाता है ऐसे मे वह तरह तरह से अपने शौहर को नसीहत करती है के बहुत पैसे कमाए ताकि उसकी अपनी फरमाइश पूरी हो सके, अपनी सहेलियो मे खुद को उसके बराबर साबित कर सके अब या मुकाबले की बाजी और खुद को दुसरो से बेहतर, अमीर और खूबसूरत दिखने के खातिर शौहर को अपनी जिंदगी से खेलना पड़ता है, उसे यह भी मालूम नही के वह किस के लिए यह सब कर रहा है, मेहनत तो कर रहा है लेकिन उसका फल किसी और को मिल रहा है, बीवी के शौक और ख्वाहिश पूरी करने के खातिर मर्द की जिंदगी अज़ाब बन जाती है, अगर ऐसा नही करे तो फिर बीवी के ताने, जहर भरे जुबान के अल्फ़ाज सुनते रहिये और शब् व रोज दिल की बीमारी के मरीज बन जाइये, यह एक अज़ाब है। दोनो तरफ से मर्द की जीन्दगी अज़ाब ही है। 
एक कड़वी हक़ीक़त
एक ख़ातून ने काफी अरसे पहले का वाक़या सुनाया के जिस इलाके में उनकी शादी हुई, वहाँ ज़्यादातर मर्द बाहर थे। जिसके शौहर घर पर थे, उसे ग़रीब घराना समझा जाता था। आज हालात और भी बदतर हो चुके है, औरतें ज़ेवरात से लदी है,  महंगे मोबाइल, रिचार्ज, पर्स, गहने, मेकअप , ज़ेबाईश् के सामान  हैं, आलीशान घर है  लेकिन उसी हिसाब से बेहयाई, बेपर्दगी भी अपने उरूज पर है।
अगर आप इन बजाहिर  ख़ुश नज़र आने वाले लोगो की कहानियाँ सुनें, तो मालूम होगा कि वह किस क़दर नफ़सियति मर्ज, बेचैनी, बेक़रारी, दिलों की बीमारी, नाशुक्रि मे मुब्तिला है। 

 बच्चों की तरबियत पर गहरा असर

एक बात जिसका ढिंढोरा पीटा जाता है कि 'माँ बच्चे की तरबियत करती है'। यह बात तब तक ही दुरुस्त है जब तक बच्चा छोटा हो। बड़े होते ही लड़के माँ के बजाय बाप को कॉपी करते हैं। उन्हीं बच्चों की शख़्सियत मज़बूत होती है जिन्हें वालिद और वालिदा (माता-पिता) दोनों की तवज्जो मिले। कितने ही ऐसे घराने हैं जहाँ वालिद का साया सर पर नहीं और औलाद माँ के क़ाबू से बाहर हो चुकी है।

 बहनों और भाइयों के लिए एक पैग़ाम

आख़िर में बहनों से गुज़ारिश है कि क़नाअत (संतोष) को अपनाएं। अपना रहन-सहन सादा करें ताकि मर्द, चाहे वो आपके बेटे की शक्ल में हो या शौहर की शक्ल में, मजबूर होकर फ़ालतू अख़राजात पूरे करने के लिए बेहतरीन माल की तलाश में दर-ब-दर न हो। पहनना-ओढ़ना, खाना-पीना दरमियाना (मध्यम) कर लें, लेकिन पैसे के पीछे अपना घर और सुकून तबाह न करें। शौहर को एहसास दिलाती रहें कि मुझे और बच्चों को आपकी ज़रूरत है। और अगर आप वालिदा हैं, तो बेटे पर ज़ोर दें कि वो अपने बीवी-बच्चों के पास लौट आए।

और भाई लोगों! अगर आप अपना घर बसाना चाहते हैं, औलाद को नेक देखना चाहते हैं, तो अहल-ए-ख़ाना (परिवार) के साथ इस तरीक़े से रहिए कि उनकी हर बात पर नज़र हो। अहल-ए-ख़ाना की ग़लत बातों पर रुकू-ओ-सुजूद में न पड़े रहें, बल्कि अपनी हाकिमियत यहाँ दिखाएं। अपनी फ़ैमिली की इस्लाह करें, उनकी तबीयत क़नाअत-पसंद बनाएं। तभी आपको नेक सिला मिलेगा, वरना तबाह-हाल घराने हमारी निगाहों से दूर नहीं हैं।

हासिल ए कलाम। 
रिज़्क़ और पैसे की अहमियत अपनी जगह, लेकिन इसके लिए रिश्तों को क़ुर्बान करना सरासर नासमझी है। परदेस की दौलत अक्सर घर का सुकून छीन लेती है और एक ऐसी तन्हाई दे जाती है जिसका कोई इलाज नहीं। मर्द और औरत, दोनों को यह समझना होगा कि थोड़ी कमी में गुज़ारा हो सकता है, लेकिन एक बिखरा हुआ घर और बाप के साये से महरूम बच्चे ज़िन्दगी भर का अज़ाब बन जाते हैं। साथ रहना ही असल दौलत और सुकून है।
ख़ानदानी निज़ाम वो रिश्ता है जो नस्लों को जोड़ता है, मोहब्बत को सहारा देता है और टूटे दिलों को संभालता है। जब ख़ानदान बिखरता है तो सिर्फ़ घर नहीं टूटता, बल्कि इंसान की पहचान भी कमज़ोर पड़ जाती है।

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