Meri Maa Meri Jannat - Aulad par Walidain ki Khidmat Farj hai?
Maa-Baap Ki Muhabbat aur Unki Khidmat Aulad Ke liye wajib hai?
Discover the importance of loving and serving your parents. A touching reminder of the blessings, duties, and emotional bond we share with Maa-Baap.
Unconditional Love and Service to Parents: A Divine Duty”
Serving Your Parents: The True Essence of Gratitude.
Maa-Baap: Honoring Their Love Through Our Actions.
'The Beauty of Caring for Parents in Islam and Life”
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"माँ-बाप भी यतीम होते हैं 💔
लोग समझते हैं कि यतीम वो है जिसके माँ-बाप न हों,
मगर कभी सोचा है?
वो माँ-बाप भी यतीम हो जाते हैं जिनके जीते-जी बच्चे उनका सहारा छोड़ देते हैं।
यतीमी सिर्फ माँ-बाप के मरने से नहीं आती,
ये उस वक़्त भी आती है जब औलाद माँ-बाप को बुढ़ापे में तन्हा छोड़ दे।
जब घर में वो हों मगर दिल से कोई उनके साथ न हो।
जब बात करने वाला न हो, उनकी आँखों का हाल समझने वाला न हो।
माँ-बाप को बुढ़ापे में इज़्ज़त और मोहब्बत न देना
उनकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा यतीमख़ाना बना देता है।
याद रखो,
यतीम वो भी होता है जो अपनी औलाद के होते हुए भी अकेला रह जाए।
इंसानी ज़िन्दगी का सबसे हसीन रिश्ता माँ-बाप और औलाद का रिश्ता है। जिस तरह औलाद अपने बचपन में माँ-बाप पर पूरी तरह इनहिसार करती है, उसी तरह माँ-बाप भी बुढ़ापे में अपनी औलाद से मोहब्बत की तवक़्क़ो रखते हैं। मगर अफ़सोस, आज के दौर में बहुत से औलाद अपने माँ-बाप को उस वक़्त तन्हा छोड़ देते हैं जब उन्हें उनकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा होती है।
यतीमी की हक़ीक़त - सिर्फ़ औलाद के माँ-बाप से महरूम होने तक महदूद नहीं है, बल्कि ये कैफ़ियत माँ-बाप पर भी गुज़रती है। जब उनका बेटा या बेटी उनकी परवाह करना छोड़ दे, उनके पास बैठकर बातें करना गवारा न करे, या उन्हें सिर्फ़ बोझ समझे—तो माँ-बाप का दिल उसी तरह तड़पता है जैसे किसी बच्चे का माँ-बाप से जुदा होने पर।
इस तन्हाई को बयान करने के लिए "यतीम" का लफ़्ज़ इस्तिमाल करना बिल्कुल मुनासिब है, क्योंकि असल यतीमी वही है जब इंसान मोहब्बत और सहारे से महरूम हो जाए।
कितने ही माँ-बाप ऐसे हैं जो आलीशान घरों में रहते हैं, लेकिन औलाद की बेरुख़ी की वजह से उनकी ज़िन्दगी एक वीरान "यतीमख़ाना" बन जाती है। उनके चारों तरफ़ लोग होते हैं मगर दिल से कोई उनका नहीं होता। मादियत परस्ती ने लोगो के अंदर के सुकूँ को खतम कर दिया है। वे बुजुरगो के क़ौल व फेल को दकियानुसी, कदामत् पसंद समझते है।
औलाद का असली फ़र्ज़ - यही है कि बुढ़ापे में माँ-बाप को इज़्ज़त, मोहब्बत और तसल्ली दें। उनके साथ वक़्त गुज़ारें, उनकी ख़िदमत करें, और उनकी दुआएँ हासिल करें। क्योंकि माँ-बाप की दुआएँ दुनिया और आख़िरत दोनों में औलाद के लिए सबसे बड़ी दौलत होती हैं।
याद रखो, जिस औलाद ने अपने माँ-बाप को तन्हा छोड़ दिया, वो दरअस्ल अपने लिए बद्दुआओं और पछतावे की विरासत छोड़ जाता है। और जो औलाद अपने माँ-बाप का सहारा बनी, वो दुनिया और आख़िरत दोनों में सरफ़राज़ होती है।
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यतीमी सिर्फ़ बच्चे की नहीं होती, माँ-बाप भी यतीम हो जाते हैं जब औलाद उन्हें मोहब्बत, तवज्जो और सहारा न दे।







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