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Rustam Aur Shohrab: Baap Bete Ke Khoon ke Rishte ka Maidan-E-Jung Me Khoon.

Khoon Ka Rishta, Jung Ka Maidan: Rustam aur Shohrab ek Dastaan.

Rustam Aur Shohrab: Baap Bete Ke Khoon ke Rishte ka Maidan-E-Jung Me Khoon.
 Rustam aur Shohrab: Ek Baap-Bete Ki Tragic Daastaan.
Shahnameh Ka Dastaan: Rustam vs Shohrab.
Ferdowsi Ki Kalam Se: Rustam Shohrab Ki Kahani Ka Jayeza.
Rustam aur Shohrab – Ek Persian Dastaan.
Rustam Shohrab Shahnama summary Hindi mein.
Rustam Shohrab ki kahani ka moral kya hai?
Rustam Shohrab story analysis in Urdu/Hindi.

रुस्तम-सोहराब: एक अज़ीम अलमिया की दास्तान.
 शाहनामा की अमर कहानी: जब वक़्त ने बाप को बेटे का क़ातिल बनाया
 क्या हुआ जब रुस्तम और सोहराब जंग के मैदान में मिले?
 ईरान की तारीख़ी दास्तान: रुस्तम और सोहराब की अधूरी कहानी
 एक बाप, एक बेटा और एक ख़ूनी ख़ंजर: रुस्तम-सोहराब का अलमिया.
रुस्तम और सोहराब की कहानी का अंत क्या है?
 रुस्तम को कैसे पता चला कि सोहराब उसका बेटा है?
 शाहनामा किताब किसने लिखा था?
 ईरान की सबसे मशहूर कहानी कौन सी है?
रुस्तम और सोहराब की जंग का क़िस्सा.
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रुस्तम-सोहराब: एक अज़ीम अलमिया की दास्तान.
ईरान के अज़ीम हीरो रुस्तम और उनके बहादुर बेटे सोहराब की कहानी पढ़ें। जानें कैसे क़िस्मत ने बाप-बेटे को जंग के मैदान में दुश्मन बना दिया और यह मुलाक़ात एक दर्दनाक अलमिया में तब्दील हो गई। शाहनामा की यह ज़िंदा-दील दास्तान ग़ैरत, वफ़ादारी और तक़दीर के खेल की एक बेमिसाल मिसाल है।

पेश है फ़ारसी अदब के शाहकार 'शाहनामा' से निकली वह अमर और दर्दनाक दास्तान जो सदियों से दिलों को ग़मगीन करती आई है – दास्तान-ए-रुस्तम-ओ-सोहराब।

यह कहानी है क़िस्मत के एक ऐसे  मज़ाक़ की, जहाँ एक बाप और बेटा जंग के मैदान में एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं, अपनी असलियत से पूरी तरह नावाक़िफ़। एक तरफ़ है ईरान की आन, बान और शान, अज़ीम पहलवान रुस्तम, और दूसरी तरफ़ है एक नौजवान सूरमा सोहराब, जो दुनिया में सिर्फ़ एक ही चीज़ ढूंढ रहा है – अपने वालिद का साया। पढ़िए उस तक़दीर के लिखे का बयान, जहाँ जीत ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार में बदल जाती है और पहचान का एक मोहरा मिलने से पहले ही ख़ंजर अपना काम कर जाता है। यह एक ऐसा अलमिया है जो जंग की तबाही, शिनाख्त से लाइल्म और बाप-बेटे के रिश्ते की सबसे दर्दनाक हक़ीक़त को बयां करता है।

रुस्तम और सोहराब की दास्तान, फ़ारसी अदब के सबसे अज़ीम शाहकार 'शाहनामा' का एक ऐसा बाब है जो आज भी दिलों को दहला देता है। यह सिर्फ़ एक जंग नहीं, बल्कि क़िस्मत के खेल, और एक बाप-बेटे के बीच अनजाने में हुई सबसे दर्दनाक जंग की अमर कहानी (अलमिया) है।

 दास्तान-ए-रुस्तम-ओ-सोहराब
ईरान का अज़ीम-उश-शान पहलवान और मुहाफ़िज़ रुस्तम, एक रोज़ शिकार खेलते हुए अपने घोड़े 'रख्श' की तलाश में तूरान की सरज़मीन पर जा पहुँचता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात समनगान के शाह की बेटी, शाहज़ादी तहमीना से होती है। तहमीना, जो रुस्तम की बहादुरी के क़िस्सों की दीवानी थी, उससे मिलती है और दोनों एक दूसरे के होकर रह जाते हैं। वे वहा दोनो शादि कर लेते है. जब रुस्तम को ईरान वापस लौटना पड़ता है, तो वह निशानी के तौर पर एक ख़ास मोहरा (बाज़ूबंद) तहमीना को देते हुए कहता है कि अगर हमारा बेटा हुआ तो उसकी बाज़ू पर बाँधना।

वक़्त गुज़रता है और तहमीना एक बेटे को जन्म देती है, जिसका नाम सोहराब रखा जाता है। सोहराब जवानी में ही अपने बाप की तरह एक बेमिसाल जंगजू और ताक़त का पहाड़ बन जाता है। तहमिना ने रुस्तम को अपने बेटे शोह्राब के बारे मे नहि बतयि, यह एक ऐसि राज या खुफिया मंसुबा बना के बाद मे बाप को बेटे के क़त्ल के बाद मालुम हुआ, इसि राज ने बेटे को बाप से जुदा कर दिया. नहि रुस्तम को पता था के यह मेरा बेटा है,ना शोह्राब को भि अ‍ॅपने वालिद के बारे मे कुछ मालुम था. किसी को पता नहि था के जंग मे ही दोनो आपस मे मिलेंगे.
अपने वालिद की पहचान जानने की ख़्वाहिश में वह तूरान के शाह अफ़रासियाब की मदद से एक बड़ी फ़ौज तैयार करता है और ईरान पर हमला करने निकल पड़ता है, इस उम्मीद में कि वह अपने वालिद को ढूंढकर ईरान का तख़्त उसे सौंप देगा।

ईरान में जब एक नौउम्र तूरानी पहलवान की ताक़त और फ़तह की ख़बरें गूँजती हैं, तो ईरान के बादशाह कैकाऊस परेशान हो जाते हैं। वह अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार रुस्तम को इस नए ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए बुलाते हैं। रुस्तम, जो अब उम्र के उस पड़ाव पर था जहाँ वह जंग से दूर रहना चाहता था, मुल्क की आन के लिए मैदान में उतरने को राज़ी हो जाता है। वह अपनी पहचान छुपा लेता है, ताकि अगर कोई नौजवान उसे हरा दे तो ईरान के सबसे बड़े हीरो की इज़्ज़त ख़ाक में न मिले।

जंग के मैदान में, बाप और बेटा पहली बार मिलते हैं, मगर दोनों एक दूसरे से बेख़बर। सोहराब, रुस्तम की आलीशान शख़्सियत को देखकर उनसे उनका नाम पूछता है, उसे शक होता है कि कहीं यही अज़ीम रुस्तम तो नहीं, लेकिन रुस्तम अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करता। दोनों के बीच घमासान जंग होती है। पहले दिन की लड़ाई में सोहराब अपने बाप पर हावी रहता है, लेकिन रुस्तम चालाकी से उसे बातों में लगाकर बच निकलता है। दूसरे दिन भी जंग बराबरी पर रहती है। तीसरे और आख़िरी दिन, एक लंबी और थका देने वाली कशमकश के बाद, रुस्तम अपनी पूरी क़ुव्वत और तजुर्बे से सोहराब को ज़मीन पर गिरा देता है और अपने ख़ंजर से उसके सीने को छलनी कर देता है।

ज़िंदगी की आख़िरी साँसें लेते हुए सोहराब कहता है, "मेरा क़ुसूर सिर्फ़ इतना था कि मैं अपने बाप को ढूंढ रहा था। मेरा बाप, अज़ीम रुस्तम, जब मेरी मौत की ख़बर सुनेगा तो ज़मीन और आसमान एक कर देगा।" यह सुनकर रुस्तम के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। वह काँपती आवाज़ में उसका नाम पूछता है और जब सोहराब अपनी बाज़ू खोलकर वह मोहरा दिखाता है, तो रुस्तम पर ग़म का पहाड़ टूट पड़ता है। वह अपने ही हाथों से अपने जिगर के टुकड़े को क़त्ल कर चुका था।
इधर  सोहराब ज़ख़्मी हालत में तड़प रहा था। रुस्तम की आँखों से आँसू की धार बह निकली। उसने अपने सीने पर हाथ मारा और आसमान की तरफ़ नज़र उठाई—"या ख़ुदा! मैंने अपने ही ख़ून को अपनी तलवार से गिरा दिया।"
सोहराब की साँसें धीमी हो रही थीं, मगर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा—"अब मुझे सब मालूम हो गया, ऐ रुस्तम... तू ही मेरा बाप है। काश! तू पहले मुझे पहचान लेता, तो आज ये आलम न होता।"
रुस्तम ने अपने दोनों हाथों से बेटे के ज़ख़्म दबाए, उसे बचाने की हर कोशिश की। उसने फ़ौरन फ़रमान भेजा कि शाही दरबार से तबीब (हकीम) आएँ और सोहराब का इलाज करें। मगर तक़दीर का लिखा कौन टाल सकता है? ईरान के बादशाह कैकावूस को डर था कि अगर सोहराब ज़िंदा रहा, तो एक दिन तख़्त पर दावा करेगा। उसने छुपकर हुक्म भेज दिया कि इलाज के लिए जो दवा चाहिए, वह न पहुँचाई जाए।
रुस्तम ये साज़िश न जान सका। वह तड़पता रहा और बेटे को अपनी गोद में थामे रहा। सोहराब की साँस और भी भारी हो चली। उसने रुस्तम की आँखों में देखा और कहा—"बाबा! मेरा लहू तेरे हाथों से बहा है, मगर दिल में तेरा नाम हमेशा ज़िंदा रहेगा। अगर मेरा वजूद न रहा, तो भी तू मेरी याद में जिन्दा रहेगा।"
ये कहकर सोहराब की आँखें बंद हो गईं। रुस्तम ने चीख़कर धरती-आसमान को हिला दिया। उसने बाल नोचे, कपड़े फाड़ डाले और अपने नसीब को कोसने लगा। उस पल ईरान का मैदान-ए-जंग मातम-गाह में बदल गया।
रुस्तम की ये दास्तानशाहनामा का सबसे गहरा और दर्दनाक वाक़िया है। यह हमें सिखाती है कि तख़्त-ओ-ताज की सियासत और तक़दीर की चाल इंसान की मोहब्बत और रिश्तों पर कैसी भारी पड़ सकती है।

सोहराब कि दर्दनाक वाक़्ये के बाद रुस्तम की ज़िन्दगी अँधेरे में डूब गई। उसने मैदान-ए-जंग में बेटे की लाश पर सिर रखकर मातम किया। उसकी चीख़ें सुनकर दुश्मन और दोस्त, दोनों रो उठे। यह ऐसा ग़म था जिसने पूरी ईरान की फ़िज़ा को गम, तक्लिफ मे तब्दिल बना दिया।

कैकावूस बादशाह अपने क़िले में बैठा था। उसने सोचा कि अब ख़तरा टल गया है, लेकिन दरबारियों में बहुत से लोग थे जिन्होंने इस साज़िश को दिल में महसूस किया और चुपचाप आँसू बहाए। सबको यक़ीन हो गया कि सियासत के लिए इंसानियत कुर्बान कर दी जाती है।

सोहराब की मौत के बाद रुस्तम का दिल कभी पहले जैसा न रहा। वह जंग के मैदानों में तो उतरा, मगर उसकी रूह थक चुकी थी। हर बार तलवार उठाते वक़्त उसे अपने बेटे की याद आती। वह सोचता, "जिस हाथ से तख़्त-ओ-ताज की हिफ़ाज़त हुई, उसी हाथ ने मेरा जिगर काट डाला।"
वह बाहरी तौर पर शेर की तरह मज़बूत था, लेकिन अंदर से टूटा हुआ इंसान बन गया। उसके लिए फ़तह अब कोई मायने नहीं रखती थी।
सोहराब की मौत के बाद भी ईरान और तूरान की दुश्मनी ख़त्म न हुई। बल्कि यह ज़ख़्म और गहरा हो गया। अफ़्रासियाब (तूरान का बादशाह) को अपने बहादुर सिपहसालार की मौत पर अफ़सोस हुआ, लेकिन उसने बदले की आग और तेज़ कर दी।
ईरान और तूरान की जंगें कई सालों तक चलती रहीं। हर बार लाशें गिरतीं, शहर उजड़ते, और खून से ज़मीन रंगी जाती। मगर किसी को सोहराब जैसा बहादुर और दिलेर सिपहसालार फिर न मिला।

रुस्तम का दिल उस वक़्त ख़ाक हो गया, जब उसने जाना कि जिस दुश्मन का ख़ून बहाया, वह उसका अपना नूर-ए-नज़र था।"
सोहराब की आख़िरी साँसों में भी मोहब्बत की नूर चमक रहि थी—उसने मौत को गले लगाया, मगर बाप की आँखों से मोहब्बत की रौशनी न बुझने दी।
तहमिना की ख़ामोशी या राज ने तक़दीर का ऐसा ग़ैरमामूली खेल खेला, जिसमें माँ का राज़, बाप की नादानी और बेटे की मासूमियत सब क़ुर्बान हो गए।
ईरान और तूरान की सरज़मीं लहू से रंग गईं, मगर रुस्तम का दिल ताउम्र उस एक ग़लती/नादानि के बोझ तले दबा रहा।"
यह दास्तान सिर्फ़ जंग की नहीं, बल्कि मोहब्बत, सियासत, खमोशि और तक़दीर की वो हाद्सा है जो इंसानियत के सीने पर हमेशा के लिए नक़्श हो गई।

 ईरान का दौर और शान-ओ-शौकत
दौर-ए-हुकूमत और हुक्मरान: शाहनामा में जिस दौर का ज़िक्र है, वह क़दीम ईरान का पौराणिक काल है, ख़ास तौर पर 'कियानियन' ख़ानदान की हुकूमत का ज़माना। बादशाह कैकाऊस और बाद में कैखुसरो जैसे हुक्मरान ईरान पर राज करते थे। इन हुक्मरानों की शान-ओ-शौकत बेमिसाल थी, उनके दरबार सोने-चाँदी और जवाहरात से सजे होते थे और उनकी हुकूमत दूर-दूर तक फैली थी। हालाँकि, बादशाह अक्सर ग़ुरूर और जल्दबाज़ी का शिकार हो जाते थे और सल्तनत को मुश्किल में डाल देते थे।
ताक़त और फ़ौजी लश्कर: फ़ारस (ईरान) की सल्तनत अपनी फ़ौजी क़ुव्वत के लिए मशहूर थी। शाहनामा के मुताबिक़, ईरान के लश्कर में हज़ारों सिपाही, हाथी और बेहतरीन घोड़े होते थे। लेकिन सल्तनत की असली ताक़त रुस्तम जैसे 'पहलवान' थे, जो अकेले ही पूरी फ़ौज पर भारी पड़ते थे। जंग का नतीजा अक्सर दो मुल्कों के सबसे बड़े सूरमाओं के बीच होने वाले मुक़ाबले से तय होता था।
तहज़ीब, रिवायत और इंसाफ़: शाहनामा में बयान की गई ईरानी तहज़ीब में ग़ैरत, वफ़ादारी, मेहमान-नवाज़ी और सच बोलने को बहुत अहमियत दी जाती थी। रुस्तम इन तमाम उसूलों का जीता-जागता नमूना था। जहाँ तक इंसाफ़ का सवाल है, बादशाह इंसाफ़ पसंद होने का दावा तो करते थे, लेकिन उनका इंसाफ़ अक्सर उनके अपने मिज़ाज और फ़ायदे-नुक़सान पर मुनहसिर होता था। रुस्तम कई मौक़ों पर बादशाह को इंसाफ़ की राह दिखाता था और मज़लूमों की हिफ़ाज़त करता था।

शाहनामा, जिसे हकीम अबुल क़ासिम फ़िरदौसी ने तक़रीबन 30 साल की मेहनत से लिखा, सिर्फ़ क़िस्से-कहानियों का मजमुआ नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि इसने फ़ारसी ज़बान को उस वक़्त बचाया जब अरबी का असर बढ़ता जा रहा था। यह ईरान की क़ौमी और तहज़ीबी पहचान की बुनियाद है। इसकी तारीखी अहमियत यह है कि यह क़दीम ईरान के रस्म-ओ-रिवाज, अक़ीदों और समाज की एक झलक पेश करता है। रुस्तम और सोहराब जैसी दास्तानों के ज़रिए यह इंसान के जज़्बात, क़िस्मत की ताक़त और जंग की वहशत जैसे आफ़ाक़ी मौज़ूआत को बयान करता है, जो इसे आज भी दुनिया भर के अदब में एक मुमताज़ मक़ाम अता करते हैं।

रुस्तम और सोहराब के वाक़्ये हमें सिखाती है कि कभी-कभी मोहब्बत और रिश्ते सियासत और तख़्त की चालों में कुर्बान हो जाते हैं। तहमिना की ख़ामोशी, राज, रुस्तम की नादानी और कैकावूस की साज़िश—इन तीनों ने मिलकर उस मासूम जज़्बे को कुचल दिया जिसे बाप-बेटे का रिश्ता कहते हैं।
रुस्तम ज़िन्दगी भर उस ग़म के साथ जीता रहा और दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया कि शौहरत और ताक़त इंसान के अंदरूनी ज़ख़्मों को कभी नहीं भर सकती।

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