Kisi Qaum ko bagair Jung ke Shikast Deni ho to Unke Nawjawano me fahashi aam Kar do.
Sultan Salahuddin Ayyubi: The Noble Warrior of Global History.
Sultan Salahuddin Ayyubi – Legendary Muslim Leader & Conqueror of Jerusalem.
Salahuddin Ayyubi defeated the Crusaders and reclaimed Jerusalem. A symbol of justice, Peace, courage, and unity in the Islamic world.
Sultan Salahuddin Ayyubi aur Unka Masum Bachpan.
Hazrat Khalid Bin Walid R.Z. ne Roman aur Farsi Saltnat ko kaise Shikasht Di?
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सल्तनत-ए- अय्युबि का शम्स: सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी
सलाहुद्दीन अय्यूबी رحمة الله علیه का नाम इस्लामी तारीख़ में शुजाअत (बहादुरी), हिम्मत, ईमान और इंसानियत का पैग़ाम है। आप 1137 ईसवी (532 हिजरी) में तक़रीबन तिकरीत (इराक़) में पैदा हुए। आपके वालिद का नाम नज्मुद्दीन अय्यूब और चचा का नाम असदुद्दीन शीरकुह था। ये दोनों शख़्स सलजूक़ी हुकूमत के साथ जुड़े हुए थे और जिहाद व ग़ज़वा में शामिल रहते थे।
बचपन से ही सलाहुद्दीन ने तलवार, तीरंदाज़ी, सवारी और इल्म में कमाल हासिल किया। आप पर बचपन से ही दीनी रूहानियत का गहरा असर था। इल्म-ए-दीन, कुरआन और हदीस से गहरी दिलचस्पी रखते और उलमा व सूफ़िया की सोहबत में रहते।
आलम-ए-अरब और उस दौर की दुनिया
जब सलाहुद्दीन जवान हुए तो आलम-ए-अरब (अरब दुनिया) का हाल बहुत कमज़ोर था। एक तरफ़ सलजूक़ी हुकूमत के अन्दर आपसी झगड़े और इख़्तिलाफ़ात थे, दूसरी तरफ़ फ़ातिमी ख़िलाफ़त मिस्र में कमज़ोर हो चुकी थी। यूरोप की तरफ़ से सलीबी (क्रुसेडर) फ़ौजें बार-बार हमला करतीं और मुसलमानों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठातीं।
यहूद व नसारा (यहूदी व ईसाई ताक़तें) मिलकर मुसलमानों को कमज़ोर करना चाहतीं, कभी धोखे से, कभी फ़ितने और कभी सीधी जंग के ज़रिये।
सुल्तान बनना और हुकूमत संभालना
सलाहुद्दीन पहले अपने चचा असदुद्दीन शीरकुह के साथ मिस्र पहुँचे। वहाँ की फ़ातिमी सल्तनत बहुत कमज़ोर थी। चचा की वफ़ात के बाद सलाहुद्दीन मिस्र के वज़ीर बनाए गए और धीरे-धीरे पूरी फ़ातिमी सल्तनत उनके क़ब्ज़े में आ गई। इस तरह मिस्र और शाम (सीरिया) दोनों इलाक़े उनके हाथ में आ गए।
1174 ई (≈ 569 हिजरी) के बाद, नूरुद्दीन की मौत के बाद, सलाहुद्दीन ने सीरिया के विभिन्न इलाकों (दमिश्क, अलेप्पो आदि) को अपने अधीन किया।
उन्होंने फ़ौज़ी ताक़त, नीति, आसलाह़-की व्यवस्था और ज़मीनी प्रशासन को मज़बूत किया जिससे सल्तनत-ए-अय्युबी स्थापित हुई।
सलाहुद्दीन अय्यूबी ने अपने हुकूमत का बुनियाद कुरआन और सुन्नत पर रखा। इंसाफ़, सादगी और दीनी जुनून उनके निज़ाम की पहचान थी।
मस्जिद-ए-अक़्सा की फतह
सबसे बड़ी फतह जो सलाहुद्दीन अय्यूबी ने हासिल की, वह थी मस्जिद-ए-अक़्सा की आज़ादी। सन 1187 ईसवी में जंग-ए-हत्तीन (Battle of Hattin) में सलाहुद्दीन ने सलीबी फ़ौजों को शिकस्त दी। इसके बाद क़ुद्स (Jerusalem) की तरफ़ क़दम बढ़ाया और मस्जिद-ए-अक़्सा को दुश्मनों से आज़ाद कराया।
यह फतह मुसलमानों के लिए सिर्फ़ जंग जीतना नहीं थी बल्कि ईमान और उम्मत की बहाली थी। सलाहुद्दीन ने सलीबियों पर ग़ालिब आने के बाद भी उन्हें माफ़ किया और इस्लामी अख़लाक़ (मोरल वैल्यूज़) की रोशन मिसाल पेश की।
फ़हाशि (अश्लीलता) और अनैतिकता से बचने का उनका बड़़ा इल्म-ए-क़ौल मौजूद है; बहुत से ऐतिहासिक लेखकों ने लिखा है कि सलाहुद्दीन नशा, ज़य أبیش (अशाल), या इत्तीफाक़-ए-फ़हाशा आदि को अपने दरबार या शासन व्यवस्था में बर्दाश्त नहीं करते थे। हालांकि “फ़हाशी” के ज़्यादा खुल्ले खुल्ले उद्धरण बहुत कम हैं, पर ब्रिटानिका आदि स्रोतों में यह उल्लेख है कि वे “devoid of pretense, licentiousness, and cruelty” अर्थात दिखावा, बेशर्मी और क्रूरता से दूर रहने वाला शासक था।
"अगर किसी क़ौम को बगैर जंग के शिकस्त देनी है तो उनके नव्जवानो मे फहाशि आम कर दो."
दुश्मनों की मक्कारी और धोखे
यहूद व नसारा बार-बार धोखे और चालों के ज़रिये मुसलमानों को कमज़ोर करने की कोशिश करते। कभी अपने एजेंट्स को भेजते, कभी सुल्तान की फ़ौज में फ़ितना डालने की कोशिश करते। लेकिन सलाहुद्दीन का ख़ुफ़िया निज़ाम (जासूसी) इतना मज़बूत था कि दुश्मनों की हर चाल नाकाम हो जाती।
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी का जासूसी निज़ाम पूरी दुनिया की जंगी तारीख़ में एक मिशाल है।
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी ने फ़रमाया था: अगर आप दुश्मन का एक जासूस पकड़ कर मार दो तो समझो आपने दुश्मन के एक हज़ार जंगजू मार दिये।
सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के दौर में उनका एक जासूस फ़लस्तीन से वापिस आया और सलीबी फ़ौज के बारे में मुकम्मल मालूमात दीं। सुल्तान ने इस को तनख़्वाह के अलावा कीमती तहायेफ भी दिये। इस पर फ़ौज के चंद सिपाहियों ने एतराज़ किया कि हम लोग मैदान-ए-जंग में आप के साथ लड़ते हैं, हमें इतनी क़ीमती तहायेफ क्यों नहीं दिये जाते?
तो सुल्तान ने जवाब दिया:
जब आप लोग लड़ते हैं तो मैं आप के साथ होता हूँ, अगर आप लोग शहीद हो जाएँ तो आप को यक़ीन है कि आप का जनाज़ा भी पढ़ा जाएगा और क़ब्र भी नसीब होगी।
मगर मेरे जासूस मेरे वो गुमनाम सिपाही हैं कि अगर पकड़े जाएँ तो उन्हें कफ़न भी नसीब नहीं होता, ये मेरी आँखें और कान हैं जिन से मैं मिलियन दूर दुश्मन को देखता और सुनता हूँ।
अगर ये चाहें तो अपने ईमान का सौदा कर के अपने (हम सब ) लिये शिकस्त का सबब बन सकते हैं, मगर वतन से दूर दुश्मन के अंदर रह कर ये लोग अपना ईमान नहीं बेचते और मोहम्मद ﷺ के दीन के लिये अपनी जान निसार करते है.
सलाहुद्दीन का जासूसी और ख़ुफ़िया निज़ाम
सुल्तान ने जासूसों को सिर्फ़ दुश्मन की हरकतों की निगरानी के लिए नहीं लगाया बल्कि उनकी मदद से दुश्मन की ताक़त, कमज़ोरी, हथियार और नक़्शा-ए-जंग का पूरा अंदाज़ा लगाया जाता।
सलाहुद्दीन की फ़ौज़ और प्रशासन में चर-चर (Reconnaissance/खुफ़िया जानकारी) और चालाक़ी से काम लिया जाता था। युद्ध से पहले दुश्मन की स्थिति जानना, आपूर्तियों और जल स्रोतों की सीलिंग करना इत्यादि रणनीति का हिस्सा था। उदाहरण के लिए Battle of Hattin में पानी की आपूर्ति बंद करने की रणनीति।
वो अपने सिपाहियों से कहते:
“जब तुम मैदान-ए-जंग में लड़ते हो, तो अपनी शहादत पर यक़ीन रखो। मगर अगर मेरे जासूस पकड़ लिए जाएं तो समझो लाखों मुसलमानों की जान दाँव पर लग जाएगी।”
उनका यक़ीन था कि जासूस उम्मत की आँख और कान होते हैं।
सलाहुद्दीन अय्युबी की मौत 4 मार्च 1193 (4 March 1193 CE) दमिश्क (Damascus, Syria) मे हुई, जो कि 27 सफर 589 हिजरी के दिन है।
उनकी मौत के वक़्त जाति माल एक दिनार और सैंतालीस दिरहम थी (बहुत कम) क्योंकि उन्होंने ज़्यादा माल व दौलत मुफ्लिसो, बेवाओ, बेसहारो पर खर्च कर दिया था।
सलाहुद्दीन के वफात के बाद अय्युबी सल्तनत उनके वरिसो (बच्चे और रिश्तेदार) के बीच तक्सिम हो गई। मिस्र, सीरिया, यमन आदि हिस्से अलग-अलग अमीरों के मातेहत हो गए।
दलायेल तारिखि किताबो से.
Why Islam — उनकी महानता, धैर्य, न्याय, और इन्साफ़ पर आधारित लेख जो उनकी ज़िंदगी से प्रेरणा लेते हैं।
Encyclopaedia Britannica — सुल्तान की ज़िंदगि, दौर ए हुकुमत, जंग और फ़तहें.
Stanley Lane-Poole — ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट, जिन्होंने “The Life of Saladdin and the Fall of the Kingdom of Jerusalem” जैसी किताब में सलाहुद्दीन की बहादुरी, न्यायप्रियता और व्यक्तिगत चरित्र पर प्रकाश डाला है।
ईमान और सबक़
सलाहुद्दीन अय्यूबी का असल हथियार तलवार नहीं बल्कि ईमान था। उन्होंने उम्मत को यह सबक़ दिया कि अगर अपने वतन से दूर रहकर भी लोग अपना ईमान बचाएँ और दीनी ज़िंदगी गुज़ारें, तो अल्लाह उनकी मदद करता है।
उनकी ज़िंदगी इस बात का सबूत है कि जंग सिर्फ़ तलवार से नहीं, बल्कि ख़ुफ़िया तदबीर, सब्र, इल्म और ईमान से जीती जाती है।
सलाहुद्दीन अय्यूबी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िंदगी हमें सिखाती है कि मुसलमान अगर अपने दीनी उसूलों, इंसाफ़ और ईमान पर क़ायम रहें तो पूरी दुनिया की ताक़तें मिलकर भी उन्हें मात नहीं दे सकतीं।
मस्जिद-ए-अक़्सा की फतह, उनका इंसाफ़, दुश्मनों से रहमदिली और जासूसी निज़ाम — सब हमें आज भी यह याद दिलाते हैं कि उम्मत को इल्म, सब्र और तदबीर की ज़रूरत है।







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