Mother’s Rights: The Forgotten Chapter of Women’s Rights.
Mother is also a woman, yet her rights are rarely discussed under "women’s rights." Feminism often highlights wives’ rights but ignores mothers, leaving a gap in justice. Real empowerment means recognizing and protecting mothers’ dignity first.
लिबरलिज़म का पाखंड: माँ के हक़ूक़ कुचलकर ख़ानदान को उजाड़ने की साज़िश!
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| Liberalism and Womens Right. |
माँ की क़द्र करना ही असली औरत की इज़्ज़त है।
माँ भी तो औरत है, उसके हक़ को कौन पहचानेगा?
बीवी के हक़ पर बहस होती है, माँ के हक़ पर ख़ामोशी क्यों?
फ़ेमिनिज़्म अगर हक़ की बात है, तो माँ का हक़ सबसे बड़ा है।
माँ के हक़ को नज़रअंदाज़ करना, औरत के हक़ को अधूरा करना है।
माँ भी औरत है, फिर उसके हक़़ क्यों भुलाए जाते हैं?
लिबरल्स की साज़िश से ख़ानदान उजड़ रहे, मगरिब की तरह! #लिबरल_पाखंड #मगरिब_की_हक़ीक़त
माँ भी तो औरत है: लिबरल्स के पाखंड में भुलाई गई हक़ीक़त
अल्लाह ने माँ के पैरो के निचे जन्नत रखा, लेकिन लिबरलिज़म के नशे में चूर ये नादान लोग माँ को भुला देते हैं। माँ भी तो "औरत" है, लेकिन उसके तहफ़्फ़ुज़ के लिए न क़ानून बनते हैं, न "वूमेन राइट्स" के बहाने उसकी बात को शामिल किया जाता। बस चिल्लाते हैं बीवी के हक़ूक़! ये दोहरी सोच क्यों?
अरे भाइयो, फ़ैमिनिज़म का असल चेहरा ये है कि ये बीवी को शौहर से बाग़ी बनाकर ख़ानदानी निज़ाम को चूर-चूर कर देना चाहता है। माँ के हक़ूक़ की बात करो तो उनका मक़सद नाकाम हो जाता। ये साज़िशन का ख़ूबसूरत जाल है, जो नज़ाक़त से बुनते हैं!
साज़िश का तरीक़ा-ए-कार: बीवी को हथियार बनाकर ख़ानदान तोड़ना
देखिए कैसे काम करती है ये साज़िश!
लिबरल्स मीडिया, फ़िल्मों और सोशियल मीडिया से बीवी को भड़काते हैं – "तुम्हें आज़ादी चाहिए, शौहर तुम्हारा दुश्मन है!" क़ानून बनवाते हैं तलाक़ आसान करने के, हक़ूक़ सिर्फ़ बीवी के। नतीजा?
घर उजड़ते हैं, बच्चे यतिम हो जाते। माँ-बाप की इज़्ज़त कुचली जाती, क्योंकि माँ के हक़ूक़ उठाने से बीवी बाग़ी न होगी। ये चालाक़ी से फैलाई जाती फ़ैशन है – अख्लाकियात का ज़वाल "महिलाओं की आज़ादी" का नाम देकर। समाज में बहयाई फैलती, रिश्ते कटते, और ख़ानदान का पुराना नज़म तबाह हो जाता। अल्लाह न करे, ये हमारे यहाँ भी घुस आया!
मगरिब की करारी मिशाल: लिबरलिज़म ने ख़ानदान उजाड़ दिए.
अब मगरिब की तरफ़ नज़र डालिए, जहाँ ये साज़िश कामयाब हो चुकी। अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस में तलाक़ की दर 50% से ज़्यादा! एक् तरफा कनुन और हक अंजाम... मर्द डिप्रेशन के मरीज़, खुद्कुशि, औरतें अकेली।
वहाँ के लोग किस बीमारी के शिकार? डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी, सूइसाइड रेट आसमान छू रहे।
स्टैटिस्टिक्स चीख़-चीख़कर बताते हैं: 40% बच्चे बिना बाप के पलते, माँ-बाप अकेले मरते। लिबरल्स ने फ़ैशन फैलाया, हम जिंसियत को आज़ादी कहा, नतीजा समाज बीमार। वहाँ के नवजवान नफ़्सियाती मरीज़, ड्रग्स के शिकार, अकेलापन उनकी ज़िंदगी का हिस्सा।
डिप्रेशन, अकेलापन और नफ़्सियाती बीमारियाँ: लिबरल्स का फैलाया ज़हर
आज का दौर देखिए – डर, डिप्रेशन, अकेलापन हर तरफ़।
लिबरल्स की साज़िश से ख़ानदान टूटे तो इंसान अकेला पड़ जाता। बच्चे स्कूलों में डिप्रेशन के मरीज़, बूढ़े अकेले मरते। मगरिब में 1 में से 5 लोग एंटी-डिप्रेसेंट्स खाते। भारत में भी घुस रहा ये – तलाक़ बढ़े, घर उजड़े। ये फ़ैशन का ज़हर है, जो नैतिक बर्बादी लाता। लिबरल्स चिल्लाते "औरत के हक़!", लेकिन माँ को भुलाते। उनका गंदा नज़रिया उजागर हो गया.
माँ के हक़ूक़ उठाओ, साज़िश नाकाम करो
माँ के हक़ूक़ को वूमेन राइट्स में शामिल करो, ख़ानदानी नज़म को मज़बूत करो। लिबरल्स का पाखंड बेनक़ाब हो चुका। मगरिब की तबाही हमारे लिये सबक है। नैतिकता बचाओ, फ़ैशन से दूर रहो। अल्लाह हमारे घरों को सलामत रखे!







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