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Aurat Ki Aazadi Western Libas Me Nahi Sharai Libaas Me Hai.

Tight & Revealing Clothes Are Not Islamic Attire – A Faithful Reminder.

True Freedom for Women Lies in Modesty, Not in Tight Fashion.
Women’s liberation is not measured by how tight or revealing their clothes are, but by the dignity, respect, and honor that modest dress brings. Tight and transparent outfits may be seen as modern trends, but they do not align with the principles of Shari’ah. True empowerment comes when women embrace modesty, which protects their honor and elevates their status in society.
औरत की आज़ादी का हकीकी मफ़हूम: तंग लिबास या शरीअत की पाबंदी?
मेरी बहनों और बेटियों के नाम एक पुर-खुलूस पैगाम: हया की हिफाज़त ही असली इज्जत है।
पर्दा औरत की शान, हया ईमान, Islamic perspective, True empowerment
लिबास के इंतेखाब से पहले यह चंद बातें जरूर सोचिये.
Women’s freedom is celebrated through modesty, dignity, and respect – not through exposure. Islam teaches that real empowerment is found in covering, not in revealing.
खवातीन कि आज़ादि कि अलामत तंग और बारिक लिबास नहि शरइ लिबास है.

याद रखें कि हर वह काम और हर वह चीज़ जो आपको बे-हयाई और ज़िना की तरफ ले जाए, उससे बचो। फहश तस्वीरें और फहश ड्रामे और फहश फिल्में, फहश गाने, फहश किस्म के अफसाने और फहश डाइजेस्ट पढ़ना, गैर-महरम को देखना, तंग या बारीक (पतले) या छोटे कपड़े पहनना, बे-पर्दगी (यानी गैर-महरम से पर्दा न करना) और ना-महरम के लिए ज़ेब व ज़ीनत इख्तियार करना, ना-महरम से तन्हाई में मिलना, या ना-महरम के साथ तन्हा सफर करना, ना-महरम से बातें करना, या ना-महरम को छूना, यह सब बे-हयाई और ज़िना के रास्ते हैं। और इन सब कामों से इस्लाम हमको मना करता है, जैसा कि कुरआन में है कि:

बे-हयाई के जितने भी तरीके हैं उनके पास भी मत जाओ, ख्वाह वह अलानिया हों, ख्वाह पोशीदा। (अल-अनाम, 151).
एक और जगह पर अल्लाह का इरशाद है कि:
खबरदार ज़िना के करीब भी न फटकना क्योंकि वह बड़ी बे-हयाई और बहुत ही बुरी राह है। (बनी इसराइल, 32).

मुआशरे में इज्जत और तहफ्फुज़.
बराए मेहरबानी सब बहनों और बेटियों से दरख्वास्त है कि अपना लिबास इस्लाम की दी हुई तालीम के मुताबिक पहनें और शारई पर्दे को अपनाएं ताकि आपको मुआशरे में इज्जत मिले और आपकी इज्जत भी महफूज रहे.

अगर आप बारीक और तंग लिबास पहनेंगी तो मुआशरे में आपको इज्जत भी नहीं मिलेगी और मुआशरे में बे-हयाई भी पैदा होगी और आप मुआशरे में सताई भी जाओगी और आपको कोई इज्जत की नज़र से नहीं देखेगा बल्कि सब आपको बुरी नज़र से ही देखेंगे। और आप अल्लाह पाक की सज़ा की मुस्तहिक भी होंगी।

लिबास की खरीदारी और नामा-ए-अमाल.
 लिबास की खरीदारी से पहले जरा सोचिए कि लिबास जैसा भी हो, बोसीदा हो जाएगा। लिबास की तारीफ करने वाले या तनकीद करने वाले भी फना हो जाएंगे, लेकिन लिबास के नतीजे में मिलने वाला अजर-ओ-सवाब या गुनाह-ओ-वबाल आपके नामा-ए-अमाल में बाकी रहेगा।

इसीलिए मर्दों को भी चाहिए कि वह अपनी बीवी, बच्चों और घर में बहनों और बेटियों को लिबास के बारे में समझाएं और उनकी इस्लाह करें ताकि उनका लिबास भी इस्लामी तालीम के मुताबिक हो, क्योंकि कल को कयामत के दिन आपसे भी सवाल होगा कि घर वालों को समझाया क्यों नहीं। जैसा कि हदीस में आता है कि:
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: आगाह हो जाओ तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में सवाल किया जाएगा। पस इमाम (अमीरुल-मोमिनीन) लोगों पर निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा। मर्द अपने घर वालों का निगेहबान है और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा और औरत अपने शौहर के घर वालों और उसके बच्चों की निगेहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा और किसी शख्स का गुलाम अपने सरदार के माल का निगेहबान है और उससे उसके बारे में सवाल होगा। आगाह हो जाओ कि तुम में से हर एक निगेहबान है और हर एक से उसकी रिआया के बारे में पुरसिश (पूछ- ताछ) होगी। (सहीह_बुखारी-7138)
अल्लाह के अजाब से बचाव की फिक्र.

और औरतों को भी चाहिए कि वह अपने बुजुर्गों,वालिदैन,और भाइयों और शौहर की फरमाबरदारी करें और अपना लिबास इस्लाम की तालीम के मुताबिक बनाएं। और अपने आप को अल्लाह पाक के अजाब से बचा लें। मर्दो को भि हुक्म है के वह अपनी नज़रे निचि रखे और ना मेहरम से बचे, अगर गलति से नज़र पर जाये तो माफ है लेकिन वह अपनि निगाहो कि हिफाज़त करे. जज़ाक-अल्लाहु खैरा।

अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है:
ऐ ईमान वालो! तुम अपने आप को और अपने घर वालों को उस (जहन्नम की) आग से बचाओ जिसका ईंधन इंसान हैं और पत्थर हैं। जिस पर सख्त दिल मजबूत फरिश्ते मुकर्रर हैं, जिन्हें जो हुक्म अल्लाह तआला देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाए बजा लाते हैं। (सूरह अत-तहरीम 66, आयत नंबर 6)

अल्लाह पाक हम सब को इस्लामी तालीमात पर अमल करने और दूसरों की इस्लाह करने वाला बनाए और हर तरह के गुनाह से बचाए। आमीन।
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