Red Revolution: Reality of Freedom or Mental Slavery?
USSR’s Red Revolution & Qur’an Ban – How Leftism Hollowed Out Humanity.
When the promise of freedom turned into chains of ideology, even the Qur’an was silenced.
The so‑called Red Revolution promised liberation, but in reality, it enslaved minds under rigid ideology. During the USSR era, mosques were shut down, and the Qur’an was banned, cutting people off from divine guidance. Leftism thought replaced spirituality with empty slogans, leaving humanity hollow.
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| लाल इंकलाब' की हकीकत: आजादी या दिमागी गुलामी? जानिए कैसे लेफ्टिज्म ने इंसानियत को खोखला किया! |
क्या सोशलिज्म वाकई बराबरी का निजाम है या यह सिर्फ गरीबी बांटने का एक ढोंग है? कैसे 'आजादी' का नारा लगाने वाले लोग मजहबी और माशी (आर्थिक) तौर पर कौमों को तबाह करते हैं। यह हर उस फितने का हक़ और आज़दि के नाम पर वकालत करते है जो इसानि फितरत,क़ुदरत के खिलाफ है.
जब क़ुरआन पर पाबंदी लगी सोवियत रूस (USSR) मे.
1973 का वह दौर था जब सोवियत रूस में कम्युनिज्म का 'तूति' बोलता था। दुनिया के सियासतदां और दानिशवर यह पेशीनगोई कर रहे थे कि अब बहुत जल्द पूरा एशिया 'सुर्ख' (लाल) हो जाएगा। इसी दौर में एक पाकिस्तानी नौजवान मास्को पहुंचा। वह बताता है कि जुमे के दिन जब उसने नमाज की ख्वाहिश जाहिर की, तो मालूम हुआ कि वहां की मस्जिदों को या तो गोदाम बना दिया गया है या सियाह के ठहरने की जगह।
बड़ी जद्दोजहद के बाद एक बंद मस्जिद का ताला खुलवाया गया। अजान की आवाज गूंजी तो लोग सहम गए कि यह कौन है जिसने मौत को दावत दी है?
तन्हा नमाज पढ़कर जब वह बाहर निकला, तो एक बच्चा उसे अपने घर ले गया। वहां जो मंजर उसने देखा, वह रूह कंपा देने वाला भी था और ईमान रौशन करने वाला भी।
जब उस नौजवान ने अपनी जेब से कुरआन का एक छोटा नुस्खा निकालकर बच्चे को पढ़ने के लिए दिया, तो बच्चा हक्का-बक्का रह गया। उसे 'नाज़रा' (देखकर पढ़ना) नहीं आता था। लेकिन जैसे ही उस शख्स ने एक आयत की इब्तिदा की, बच्चे ने जबानी पूरा पारा सुनाना शुरू कर दिया।
इल्हाद और लिबरलिज्म का फरेब.
यही वह मुकाम है जहां 'सुर्ख' नजरियात और खुद-साख्ता लिबरल दानिशवरों के खोखलेपन का हक़ीक़त आशकार होता है। यह वही तबका है जो 'आजादी-ए-राय' और 'हुकूक' का ढिंढोरा पीटते नहीं थकता, लेकिन जहां इनका इक्तदार (सत्ता) आता है, वहां सबसे पहले मजहबी किताबों और अकीदों को निशाना बनाया जाता है। इनका लिबरलिज्म सिर्फ वहीं तक है जहां तक मजहब की तौहीन की बात हो, लेकिन जब अपनी विचारधारा थोपने की बारी आती है, तो ये फासीवाद की तमाम हदें पार कर जाते हैं।
सोवियत रूस में कुरआन रखने पर खानदान के खानदान को फांसी दे दी जाती थी। जो लोग आज मजहबी आजादी के नाम पर शोर मचाते हैं, उन्हें तारीख के इन पन्नों को पलटना चाहिए कि कैसे लिबरल नकाब ओढ़कर ये लोग इंसानी रूह को कुचलने की कोशिश करते हैं। इनका 'लाल इंकलाब' दरअसल इंसानी फितरत और रूहानियत के खिलाफ एक जंग थी।
सीनों में महफूज खुदा का कलाम.
उस बच्चे के वालिदैन ने बताया कि वहां के दरजी,सब्जी फरोश और मोची, दुकानदार असल में 'हाफिज़-ए-कुरआन' थे। वे बच्चों को मजदूरी के बहाने बुलाते और चुपके से सीना-ब-सीना कुरआन हिफ्ज़ कराते। रूस (इलहाद) की रियासत ने कागज पर तो पाबंदी लगा दी, लेकिन वे उन सीनों पर पाबंदी न लगा सके जिनमें खुदा का नूर बसा था। वहा किताबे नहि होने पर वे लफ्ज़ नहि पह्चान सकते, लकिन आयते उन्हे याद करा दि गयि थी इस्लिये वे देख कर तिलावत तो नहि कर सकते थे क्युंके वे हरुफ ए तहजि से ला इल्म थे मगर उंके दिलो मे क़ुरान कि आयते महफुज थी.
यह वाकिया इस आयत की जिंदा मिसाल है:
"बेशक यह ज़िक्र (कुरआन) हमने ही नाजिल फरमाया और बेशक हम ही इसके निगहबान हैं।"
आज के दौर में भी जो लोग मजहब को 'अफीम' कहते हैं या इसे तरक्की की राह में रुकावट समझते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि दुनियावी निजाम और नजरियात बदलते रहते हैं, मिटते रहते हैं, लेकिन खुदा का कानून अटल है। जो लोग आजादी के नाम पर मजहबी किताबों को जलाते या उन पर पाबंदी लगाते हैं, वे दरअसल अपनी जहालत और बुजदिली का सबूत पेश करते हैं। अल्लाह ने क़ुरान कि हिफाज़त् कि जिम्मेदारि खुद लि है फिर यह दुनिया वाले कौन सि ताक़त रखते है तो उसे पबंदि लगा कर खत्म कर दे, मिटा दे. बेशक अल्लाह हि यह दुनिया बनाने वाला है और असल मालिक ए कायेनात है.
तर्जीह-ए-बातिल: लेफ्टिज्म और सोशलिज्म का ज़ाम.
आज के दौर में 'लेफ्टिज्म' और 'सोशलिज्म' जैसे नजरियात को बड़ी चमक-दमक के साथ पेश किया जाता है। खुद को 'प्रोग्रेसिव' और 'रोशन ख्याल' कहने वाला यह तबका असल में दिमागी कज-रवी (टेढ़ापन) का शिकार है, इनका बुनियादी फलसफा यह है कि मजहब एक 'अफीम' है, जबकि हकीकत यह है कि इनका अपना नजरिया एक ऐसा नशा है जो इंसान से उसकी फितरी पहचान छीन लेता है।
माशी (आर्थिक) तबाही का मंजर.
सोशलिज्म का सबसे बड़ा मुगालता 'मसावात' (बराबरी) है। यह नारा सुनने में तो बड़ा दिलकश लगता है, लेकिन अमली तौर पर यह 'गरीबी की बराबरी' है।
यह निजाम इंसान के इनफरादि सलाहियतो (Individual Skills) का कत्ल कर देता है। जब एक मेहनतकश और एक कामचोर को एक ही तराजू में तोला जाएगा,तो मुआशरे से जद्दोजहद का जज्बा खत्म हो जाता है।
यही वजह है कि जहां-जहां 'सुर्ख परचम' लहराया, वहां की मइशत (Economy) दम तोड़ गई। इन्होंने सरमायादारी (Capitalism) की बुराइयों को खत्म करने के नाम पर रियासती जुल्म का ऐसा निजाम कायम किया जहां इंसान सिर्फ एक मशीन का पुर्जा बनकर रह गया।
मुआशरती बिगाड़ और लिबरल पाखंड.
इन 'जदीद' नजरियात ने खानदानी निजाम (Family System) को जो चोट पहुंचाई है, वह किसी से ढकी-छुपी नहीं। आजादी के नाम पर बद-अख्लाकि, बुराइ, बदकारि (Unrestrained behavior) को फिरोघ देना इनका असल एजेंडा है। ये उस वक्त तक 'लिबरल' रहते हैं जब तक आप इनके सुर में सुर मिलाएं, लेकिन जैसे ही आप खुदा, रसूल या अपनी रिवायत (Tradition) की बात करेंगे, इनका सारा बर्दाश्त का मादा खत्म हो जाता है।
जो लोग आज मजहबी किताबों पर पाबंदी की वकालत करते हैं, वही लोग अपनी 'लाल किताब' (लाल सलाम) को मुकद्दस मनवाने के लिए इंसानी खून बहाने से भी गुरेज नहीं करते। स्टालिन,लेनिन जैसे इनके रहबरो ने क्या किया?
गुलाग मे क्या हुआ यह सब छुपाना इनकि असलियत को दिखाता है.
कम्युनिज़्म और लेफ़्टिज़्म ने मज़दूरों के नाम पर करोड़ों इंसानों की जान ली। सोवियत रूस के गुलाग कैम्प्स में लाखों लोग भूख, ठंड और ज़ुल्म से मारे गए। यह सब "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" के नाम पर हुआ, मगर हक़ीक़त में इंसानियत को गुलाम बना दिया गया
सोवियत यूनियन का जबरी मज़दूरी कैम्प सिस्टम (1929–1953) । इसमें दुश्मन-ए-रियासत कहे जाने वाले लोग, मज़दूर, आलिम, और आम जनता को कैद किया जाता था. सिर्फ़ स्टालिन के ज़माने में ही लाखों को भूख और कत्ल-ए-आम का शिकार बनाया गया. तक़रीबन 1.6 से 15 मिलियन मौतें हुईं। करीब 18 मिलियन लोग गुलाग से गुज़रे.
कहाँ हुआ: रूस और सोवियत यूनियन के दूर-दराज़ इलाक़ों में, ख़ासकर साइबेरिया और आर्कटिक की सर्दियों में।
क्यों हुआ: "बराबरी" और "मज़दूर की हुकूमत" का नारा देकर, असल में इंसानियत को दिमाग़ी गुलामी में धकेलने के लिए।
किस सोच ने किया: लेफ़्टिज़्म और कम्युनिस्ट फ़िक्र, जिस ने इंसनियत का नारा दिया, धर्म/मजहब को अफिम बताया और पाखंड कहकर विज्ञान के नाम पर अपना नज़रिया थोपा. जिस ने कहा के दुनिया मे सभि धर्मो का चेहरा अवाम के खून से रंगा है वगैरह.
लेफ़्ट ने मज़दूर को आज़ादी नहीं दी, बल्कि गुलाग की ज़ंजीरों में जकड़ दिया। नारा था इंसाफ़ का, हक़ीक़त थी कत्ल-ए-आम की.
यह नजरिया इंसान को रूहानियत से काटकर सिर्फ 'पेट' तक महदूद कर देता है। लेकिन इन्हें याद रखना चाहिए कि रूस की रियासत तो टूट सकती है, दीवार-ए-बर्लिन तो गिर सकती है, मगर वो कलमा जो सीनों में उतर जाए, उसे दुनिया की कोई ताकत मिटा नहीं सकती।
दुआ-ए-खैर
ऐ अल्लाह! हमें इन फितना परवर और गुमराह कुन नजरियात के शर से महफूज फरमा। हमारे ईमान की हिफाजत फरमा और हमारी नस्लों को इन 'सुर्ख' और 'लिबरल' फितनों के बहकावे से बचा। हमें सिरात-ए-मुस्तकीम पर साबित कदम रख. ऐ अल्लाह! हमें हक़ को हक़ दिखा और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे।
हमें बातिल को बातिल दिखा और उससे मह्फुज रख।
ऐ अल्लाह! हमें हर तरह के फ़ितनों से महफ़ूज़ रख, ख़ास तौर पर लिब्रलिज़्म और नई गुमराह करने वाली सोच से।
आमीन या रब्बुल आलमीन।







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