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Muslim World Crisis: 57 Muslim Mumalik Ke Pas Koi Alliance Kyo Nahi?

Divided Muslim World: 57 Nations at U.S. Puppetry.

Muslim World in Crisis: From Fragmented Alliances to the Call for a New Global Order.
From Washington’s Puppetry to BRICS Revolution: Muslim World’s Defining Moment.
The Shocking Truth Behind Muslim Alliances: 57 Countries Trapped in Global Power Games.
57 Muslim Nations: Puppets of America or Architects of a New World Order?
The Muslim world, split across 57 countries, faces a defining choice in the era of shifting alliances. As global power tilts toward BRICS, the question remains: will Muslim nations continue under American influence or embrace a new world order? the urgency of unity, sovereignty, and the future of geopolitics.
बँटी हुई मुस्लिम दुनिया: गठबंधनों के दौर में 57 देशों की बेबसी और नए विश्व व्यवस्था की ज़रूरत.
The Shocking Truth Behind Muslim, 57 Muslim Nations, Global Power Games,
Is the Muslim World Ready to Break Free? 57 Nations Face Historic Choice.
ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है.

इतिहास से वर्तमान तक-
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान को सिर्फ़ एक नया राजनीतिक ढांचा नहीं दिया, बल्कि उसने पश्चिमी वर्चस्व को खुली चुनौती भी पेश की। 
आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने शाह पहलवी के पश्चिमीकरण और अमेरिका-परस्त नीतियों के ख़िलाफ़ जो तेवर दिखाए, वही तेवर आज आयतुल्लाह ख़ामेनेई के नेतृत्व में किसी न किसी रूप में जारी हैं। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज का दौर कहीं ज़्यादा जटिल, खतरनाक और वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा ईरान: दबाव, प्रतिबंध और आंतरिक चुनौतियाँ

आज ईरान अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने आम ईरानी नागरिक की ज़िंदगी मुश्किल बना दी है। महंगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष बढ़ा है।
इन हालात में बाहरी ताक़तें आंतरिक असंतोष को हथियार बनाकर ईरानी राज्य को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं। तथाकथित “कलर रिवॉल्यूशन” की रणनीतियाँ—सोशल मीडिया, आर्थिक दबाव और नैरेटिव वॉर—ईरान के ख़िलाफ़ खुलकर इस्तेमाल हो रही हैं.

पश्चिम और यूरोप का दोहरा क़िरदार.

पश्चिम, ख़ासकर अमेरिका और यूरोप, मानवाधिकार और लोकतंत्र की बातें करता है, लेकिन ईरान के मामले में उसका रवैया पूरी तरह दोहरा नज़र आता है।
एक तरफ़ वे कहते हैं कि उन्हें ईरानी जनता की चिंता है, दूसरी तरफ़ वही देश ऐसे प्रतिबंध लगाते हैं जिनका सबसे ज़्यादा असर आम जनता पर पड़ता है, न कि सत्ता के केंद्र पर।

यूरोप कूटनीति की भाषा बोलता है, लेकिन व्यवहार में वह अमेरिकी लाइन से बाहर जाने का साहस नहीं दिखा पाता। परमाणु समझौते (JCPOA) का टूटना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ यूरोप ने वादे किए, लेकिन निभाने में नाकाम रहा।

अरब देशों की मौक़ापरस्ती और दिखावटी एकजुटता.

मुस्लिम दुनिया आज पहले से कहीं ज़्यादा बंटी हुई है। न कोई साझा रणनीति है, न कोई सामूहिक नेतृत्व।

जब अमेरिका या इसराइल ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक क़दम उठाते हैं, तब अरब और मुस्लिम देश बयान जारी कर निंदा ज़रूर करते हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका रवैया पूरी तरह अलग होता है।

कई अरब देशों के इसराइल से मज़बूत राजनयिक और सुरक्षा संबंध हैं। अमेरिका के सैन्य अड्डे इन्हीं देशों की ज़मीन पर मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह निंदा असली होती है या सिर्फ़ “चेहरा बचाने” की कोशिश?

इसराइल की साज़िश और क्षेत्रीय अस्थिरता.

ईरान को क्षेत्रीय ख़तरे के रूप में पेश करना इसराइल की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा रहा है। परमाणु कार्यक्रम को बहाना बनाकर ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना, प्रतिबंधों को सही ठहराना और सैन्य कार्रवाई के लिए माहौल बनाना—यह सब उसी साज़िश का हिस्सा है।

इसराइल जानता है कि एक मज़बूत और स्वतंत्र ईरान उसके क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए चुनौती है। इसलिए वह अमेरिका और पश्चिम को लगातार टकराव की ओर धकेलता है।

अमेरिका-ईरान टकराव और मुस्लिम देशों की दुविधा.

अगर अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध होता है, तो मुस्लिम देशों के सामने सबसे बड़ी दुविधा खड़ी होगी।

एक तरफ़ वे अमेरिका से अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते नहीं तोड़ना चाहेंगे, दूसरी तरफ़ मुस्लिम जनता के सामने अपनी शाख भी बचानी होगी।

इतिहास बताता है कि ज़्यादातर मामलों में ये देश खुलकर विरोध नहीं कर पाएंगे। सैन्य अड्डों के इस्तेमाल से इनकार करना उनके लिए आसान नहीं होगा, ख़ासकर ट्रंप जैसे नेताओं के दौर में, जहाँ कूटनीति से ज़्यादा “एक्शन” को तरजीह दी जाती है।

संख्या बहुत, ताक़त शून्य.

आज की मुस्लिम दुनिया एक कड़वी हक़ीक़त से जूझ रही है। 57 मुस्लिम देश होने के बावजूद न कोई साझा सोच है, न कोई संयुक्त रणनीति और न ही फ़ैसले लेने की मज़बूत सामूहिक व्यवस्था। यह सिर्फ़ कमजोरी नहीं, बल्कि मुस्लिम अभिजात वर्ग की खुली ग़द्दारी और नाकामी को उजागर करता है।
जिस दौर में अमेरिका और यूरोप नए औपनिवेशिक साम्राज्यवाद को नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं, उस दौर में मुस्लिम देशों का बिखरा रहना इस बात का संकेत है कि वे दबाव के आगे समर्पण कर चुके हैं। न एकता बची है, न संप्रभुता।

यूरोप और पश्चिम: गठबंधन ताक़त कैसे बनते हैं?
यूरोप और पश्चिमी दुनिया की असली ताक़त उनके हथियारों में नहीं, बल्कि गठबंधनों में है।
  • NATO सैन्य दबाव का औज़ार है

  • EU आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम है

  • G7 वैश्विक नीतियों को दिशा देने वाला मंच है

इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये पश्चिमी देश न सिर्फ़ आपस में जुड़े रहते हैं, बल्कि विकासशील और कमजोर देशों पर अपनी शर्तें भी थोपते हैं—चाहे वो अर्थव्यवस्था हो, राजनीति हो या सुरक्षा नीतियाँ।

यही कारण है कि पश्चिमी देश अलग-अलग दिखते हुए भी संकट के समय एक ब्लॉक बन जाते हैं।

OIC और GCC: नाम बड़े, असर शून्य.
इसके उलट मुस्लिम दुनिया के पास मौजूद संगठन.
  • OIC (इस्लामिक सहयोग संगठन)
  • GCC (खाड़ी सहयोग परिषद)

सिर्फ़ काग़ज़ी संस्थाएँ बनकर रह गई हैं।
न OIC के पास कोई ठोस राजनीतिक शक्ति है, न कोई सामूहिक सुरक्षा ढांचा। न ही GCC तेल और धन के बावजूद मुस्लिम दुनिया को जोड़ने में सफल हो पाया।

इन मंचों से न तो कोई निर्णायक राजनीतिक फ़ैसला निकलता है, न कोई साझा आर्थिक या सांस्कृतिक रणनीति बनती है। न व्यापार के लिए खुला नेटवर्क, न परिवहन की साझा व्यवस्था, न मुद्रा सहयोग—कुछ भी नहीं।

57 देश, फिर भी कोई एलायंस नहीं.
यह सबसे बड़ा सवाल है कि जब मुस्लिम दुनिया के पास:
  • विशाल जनसंख्या
  • अपार प्राकृतिक संसाधन
  • ऊर्जा का नियंत्रण
  • रणनीतिक भू-स्थान

सब कुछ मौजूद है, तो फिर कोई मज़बूत मुस्लिम एलायंस क्यों नहीं?
कोई साझा करेंसी नहीं, कोई संयुक्त बैंकिंग सिस्टम नहीं, कोई रक्षा गठबंधन नहीं। हर देश अलग-अलग पश्चिम की ओर देख रहा है, जैसे सुरक्षा और तरक्की की चाबी वहीं रखी हो।
यही बिखराव मुस्लिम दुनिया को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाता जा रहा है।

BRICS और नया विश्व व्यवस्था: एक मौका.

इसी पृष्ठभूमि में BRICS का उभार बेहद अहम हो जाता है। यह मंच अमेरिका के एकध्रुवीय दबदबे को चुनौती देता है और एक मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रखता है।

नई विकास बैंक, डॉलर के विकल्प की चर्चा और दक्षिण-दुनिया सहयोग—ये सब संकेत हैं कि दुनिया बदल रही है।
लेकिन अफ़सोस, मुस्लिम देश इस बदलाव में भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ़ दर्शक बने हुए हैं।

सऊदी–पाकिस्तान–तुर्किये गठबंधन: देर से सही, सही क़दम.

हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक सहयोग और उसमें तुर्किये के शामिल होने की ख़बरें उम्मीद की किरण ज़रूर हैं।

यह गठबंधन:

  • सैन्य सहयोग
  • रक्षा उद्योग
  • कूटनीतिक समन्वय
जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम दुनिया को नई दिशा दे सकता है।
लेकिन सच्चाई यह है कि यह पहल बहुत पहले हो जानी चाहिए थी। अगर ऐसे गठबंधन 20–30 साल पहले बने होते, तो आज मुस्लिम दुनिया की स्थिति बिल्कुल अलग होती।

या तो एकता, या फिर इतिहास में गुमनामी

आज मुस्लिम दुनिया दोराहे पर खड़ी है।
या तो वह पश्चिमी साम्राज्यवाद के आगे झुकी रहे, बयानबाज़ी और मौक़ापरस्ती करती रहे—
या फिर साझा सोच, साझा रणनीति और साझा गठबंधनों के ज़रिये अपनी संप्रभुता को फिर से हासिल करे।
अगर 57 देश मिलकर भी एक मज़बूत राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक ब्लॉक नहीं बना सके, तो इतिहास यही लिखेगा कि यह सिर्फ़ बाहरी साज़िश नहीं थी—
यह अंदरूनी कमज़ोरी और नेतृत्व की नाकामी थी।

ईरान: एक मुल्क नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़ा एक नया निज़ाम.

ईरान आज सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा प्रतीक है जो अमेरिकी वर्चस्व पर टिकी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम दुनिया इस चुनौती में उसके साथ खड़ी हो पाएगी?
जब तक मुस्लिम देशों की नीतियाँ मौक़ापरस्ती, डर और दोहरे मानदंडों से बाहर नहीं आतीं, तब तक न तो असली एकता संभव है और न ही संप्रभुता।
 तारिख गवाह रहेगा कि एक-एक करके सबने साम्राज्यवादी दबाव के आगे घुटने टेक दिए—बिना किसी साझा प्रतिरोध के।

ईरान को सिर्फ़ एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका को कम करके आंकना होगा। आज ईरान दुनिया में एक विचार, एक रुख़ और एक वैकल्पिक निज़ाम का प्रतीक बन चुका है—ऐसा निज़ाम जो अमेरिकी वर्चस्व, पश्चिमी शर्तों और ज़ायोनिस्ट एजेंडे को खुलकर चुनौती देता है। यही वजह है कि यूरोप और अमेरिका दोनों को ईरान कभी स्वीकार्य नहीं रहा।

ईरान की सबसे बड़ी “ग़लती” यह है कि वह न तो इसराइल के सामने झुकता है और न ही वॉशिंगटन की मुख़बिरी करता है। 
पश्चिम जिस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को “नियम-आधारित व्यवस्था” कहता है, दरअसल वह उनके बनाए हुए मानकों का ढांचा है—जहाँ वही तय करते हैं कि कौन लोकतांत्रिक है, कौन ख़तरा है और कौन दुश्मन। ईरान इस ढांचे में फ़िट नहीं बैठता, इसलिए उसे अस्वीकार्य घोषित कर दिया गया।

यूरोप और अमेरिका को ऐसा ईरान चाहिए था जो शाह पहलवी के दौर की तरह पश्चिम-परस्त हो—जो इसराइल को बिना सवाल किए स्वीकार करे, अपने परमाणु कार्यक्रम से हाथ खींच ले और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को त्याग दे। पहलवी शासन उनके लिए इसलिए सुविधाजनक था क्योंकि वह न सिर्फ़ अमेरिकी हितों का संरक्षक था, बल्कि क्षेत्र में ज़ायोनिस्ट हितों की भी रक्षा करता था।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने इस पूरी व्यवस्था को पलट दिया। पहली बार मध्य-पूर्व में एक ऐसा राज्य उभरा जिसने कहा कि वह न तो अमेरिका के आदेशों पर चलेगा और न ही इसराइल के अस्तित्व को वैधता देगा।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी सिर्फ़ ऊर्जा या तकनीक का मुद्दा नहीं है; यह ख़ुदमुख़्तारी और संप्रभुता का प्रतीक है। पश्चिम चाहता है कि तकनीक सिर्फ़ उन्हीं देशों के पास हो जो उनकी लाइन पर चलते हों। जो देश स्वतंत्र नीति अपनाता है, उसके लिए वही तकनीक “ख़तरा” बन जाती है। यही दोहरा मापदंड ईरान के मामले में साफ़ दिखाई देता है।

ज़ायोनिस्ट लॉबी के लिए ईरान इसलिए भी असहज है क्योंकि वह सिर्फ़ विरोध नहीं करता, बल्कि क्षेत्रीय नैरेटिव को चुनौती देता है। फ़िलिस्तीन के सवाल पर उसका रुख़ नैतिक और राजनीतिक—दोनों स्तरों पर पश्चिमी चुप्पी को बेनक़ाब करता है। इसराइल की सुरक्षा-केन्द्रित सोच के लिए ऐसा वैचारिक प्रतिरोध किसी सैन्य चुनौती से कम नहीं।
यही कारण है कि आज भी पश्चिम ईरान में शासन परिवर्तन का सपना देखता है। कभी प्रतिबंधों के ज़रिये, कभी आंतरिक असंतोष को हवा देकर और कभी पहलवी परिवार जैसे प्रतीकों को दोबारा सामने लाकर। उद्देश्य साफ़ है—ईरान को फिर से उस ढांचे में लाना जहाँ वह इसराइल को स्वीकार करे, अमेरिकी शर्तों पर चले और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति छोड़ दे।

लेकिन ईरान का महत्व इसी में है कि वह झुकने से इनकार करता है। वह यह संदेश देता है कि दुनिया सिर्फ़ एक ध्रुव पर नहीं चल सकती। इसी वजह से ईरान आज केवल एक देश नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व के ख़िलाफ़ खड़े नए विश्व दृष्टिकोण का प्रतिनिधि बन चुका है—और यही बात पश्चिम को सबसे ज़्यादा बेचैन करती है।

इस पूरे परिदृश्य में शाह पहलवी के वारिस की हालिया घोषणाएँ पश्चिमी मंसूबों को और ज़्यादा बेनक़ाब करती हैं। उसने खुले तौर पर यह संकेत दिया है कि अगर उसे सत्ता मिलती है तो वह इसराइल को तुरंत तस्लीम करेगा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ख़त्म कर देगा और अमेरिका के इशारों पर चलने वाली सरकार बनाएगा।
यह साफ़ संदेश है कि बदले में पश्चिम ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटा देगा, लेकिन इसकी क़ीमत ईरान को अपनी ख़ुदमुख़्तारी, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी। ऐसा शासन ईरान का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अमेरिका की कठपुतली होगा—जो वॉशिंगटन और यूरोप के हितों की रखवाली करेगा, न कि ईरानी अवाम के।
असल में यह कोई “लोकतांत्रिक विकल्प” नहीं, बल्कि ईरान को दोबारा उसी दौर में ले जाने की कोशिश है जहाँ पहलवी सत्ता पश्चिम के दरबार में बैठकर हुक्म बजाती थी। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान सिर्फ़ एक देश नहीं रहेगा, बल्कि हमेशा के लिए यूरोपीय और अमेरिकी एजेंडे का ग़ुलाम बन जाएगा.
57 Muslim nations stand divided—will they remain American puppets or rise with BRICS into a new world order?

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