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Aaj Kal Shadi Ke liye Rishte Kyu Nahi Aa rahe hai?

Jyada Umar Hone Ke Bad Bhi Shadi Ke Liye Rishte Kyo Nahi Aa rahe hai?

The Hidden Burden of Marriage Dreams.
Why Parents Endure Poverty, but Daughters Can’t Accept a Poor Husband?
Luxury denied to parents becomes a heavy demand at their daughter’s wedding.
In many families, parents spend their entire lives enduring poverty and sacrificing comforts. Yet, when it comes to their daughter’s marriage, society suddenly expects wealth, luxury, and status. The irony is clear: a father’s poverty is tolerated, but a husband’s poverty is seen as unacceptable. This mindset creates pressure, unrealistic expectations, and emotional burdens that weigh heavily on husband.
लडकि को बाप कि ग़रिबि मंजुर लेकिन शौहर कि गरिबि पसंद नहि.
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बेटी को 'लॉटरी का टिकट' समझने वाली बीमार ज़हनियत.
अफ़सोस की बात यह है कि जो ऐशो-आराम और सहूलियतें वालिदैन को अपनी पूरी ज़िंदगी में मयस्सर नहीं होतीं, वे उन तमाम अधूरी हसरतों का बोझ अपनी बेटी के निकाह पर डाल देते हैं। 

रिश्ते क्यों नहीं होते आज कल? समाज की कड़वी हकीकत और हमारी कोताहियाँ?

आज के दौर में निकाह जैसा मुकद्दस रिशता एक रूहानी रिश्ता कम और एक 'बिजनेस स्कीम' ज्यादा नज़र आता है। आज हमारे मुआशरे (समाज) का अलमिया यह है कि हर दूसरी गली और हर रिश्तेदारी में सर की चांदी (सफेद बाल) लिए बेटियां रुख़्सती के इंतज़ार में बैठी हैं। ताज्जुब की बात यह है कि शुरू में जब पैगाम आते हैं, तो वालिदैन और खुद लड़कियां नखरों की ऐसी फेहरिस्त थमा देते हैं कि नेक और शरीफ शख्स का मिलना मुहाल हो जाता है।

शादी नहीं, सौदेबाजी के पांच पैमाने.

आजकल रिश्ते देखते वक्त इंसानियत और अख़्लाक़ के बजाय इन बेबुनियाद मुतालबात (मांगों) पर जोर दिया जाता है:
- अपना ज़ाती (निजि) आलीशान मकान हो।
- दरवाजे पर गाड़ी खड़ी हो।
- माहना आमदनी लाखों में हो। (छह डिजिट)
- देखने मे खुब्सुरत और स्टेटस बडा हो.
- फैमिली छोटी हो ताकि कोई रोक-टोक न हो।

कोई यह नहीं कहता कि हमें बस एक नेक और बा-किरदार इंसान चाहिए। लोग भूल जाते हैं कि रिज़्क़ देने वाली ज़ात अल्लाह की है। अगर लड़के की आमदनी आज के दौर में 20 से 30 हज़ार भी है, तो वह एक बा-इज़्ज़त शख्स है, ज़िंदगि जि सकता है। लेकिन अफसोस! लोग 'खर्चे कैसे पूरे होंगे' का बहाना बनाकर ठुकरा देते हैं।

कच्चे मकान और आसमान छूते नखरे.
 बेटी को 'लॉटरी का टिकट' समझने वाली बीमार ज़हनियत.

मुआशरे में एक निहायत ही अफसोसनाक रुझान पनप रहा है, जहाँ वालिदैन अपनी बेटी के निकाह को एक मुकद्दस रिश्ते के बजाय 'शॉर्टकट कामयाबी' की चाबी समझने लगे हैं। वे तमाम ख्वाब और जरूरतें—जो उन्होंने खुद अपनी पूरी ज़िंदगी में मेहनत न करने या बदकिस्मती की वजह से हासिल नहीं कीं—अब वे उसे दामाद की जायदाद और कमाई से पूरा करना चाहते हैं।
                                                        बेटी की शादी किसी इंसान से नहीं, बल्कि लड़के के बैंक बैलेंस और उसकी प्रॉपर्टी से की जाती है। ऐसा लगता है जैसे लड़की देकर उन्होंने लड़के वालों पर कोई बहुत बड़ा 'एहसान' कर दिया हो, जिसके बदले में वे अब पूरी दुनिया की सुख-सुविधाओं का मुतालबा (डिमांड) रखने का हक पा चुके हैं।

हैरत तो तब होती है जब उन लड़की वालों का अपना हाल यह होता है कि खुद कच्चे या किराये वाले मकानों में रह रहे होते हैं, वालिद की मामूली पेंशन पर गुज़ारा होता है, लेकिन ख्वाब कोठियों के देख रहे होते हैं। जहां दो वक्त की रोटी भी मशक्कत से मयस्सर आती है, लेकिन बेटी पैदा होते ही उनकी आंखों में महल और शहजादों के ख्वाब पलने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो उन्होंने बेटी की शादी को गरीबी से निजात पाने का सबसे आसान और 'शॉर्टकट फॉर्मूला' समझ लिया हो।
 फिर जब लाडली बेटी की उम्र 30 साल से तजावुज़ (पार) कर जाती है, तब बेचैनी बढ़ती है। फिर बिचौलियों और जान-पहचान वालों को सुबह-शाम फोन करके कहा जाता है कि 'सिद्दीकी साहब, कोई भी लड़का ढूंढ लें, बहुत मजबूरी है।'

बाप की गुरबत मंजूर, मगर शौहर की तंगी क्यों नहीं?
यह एक अजिब मुनाफिक़त है कि जो लड़की अपने बाप के घर में फटे हाल गुज़ारा कर लेती है, सूखी रोटियां खाकर भी खामोश रहती है, वही लड़की ससुराल कदम रखते ही 'महारानी' बनने के ख्वाब देखने लगती है। उसे अपने बाप की तंगदस्ती और मुफ़लिसी तो नज़र आती है, लेकिन शौहर की मेहनत और उसकी परेशानि दिखाई नहीं देती। अगर शौहर अपने बाप से बेहतर ज़िंदगी भी दे रहा हो, तब भी शिकायतों का अंबार लगा रहता है।

 सवाल यह है कि जिस गुरबत को आपने 20 साल तक मायके में बर्दाश्त किया, उसे शौहर के साथ मिलकर जिने में क्या जिल्लत महसूस होती है? क्या शादि का मतलब "भिखारी से रानी बनने का कोई जादुई करिश्मा" है?

यह कितनी घिनौनी सोच है कि आप खुद तो ज़मीन पर हों, लेकिन दामाद आपको 'आसमान का तारा' चाहिए। आप चाहते हैं कि कोई आए और आपकी बरसों की गुरबत को एक ही रात में सोने-चांदी से बदल दे।
 यह सरासर मुनफ़िक़त और लालच है। शादी को एक 'सौदेबाजी' बनाना बंद करें। जब आप लड़के की आमदनी को तराजू में तौलते हैं, तो आप अपनी बेटी की इज़्ज़त की कीमत लगा रहे होते हैं। एक शरीफ और नेक इंसान की कद्र करने के बजाय उसकी जेब और बैंक बैलेंस देखना इंसानियत की तौहीन है।

यह सोच न सिर्फ घटिया है बल्कि निहायत मुनफ़िकाना भी है। अपनी नाकामियों का मुआवजा दामाद से वसूल करना और बेटी को एक 'सौदे का सामान' बना देना इंसानियत की तौहीन है। जब निकाह की बुनियाद ही लालच और दूसरों के माल पर नज़र रखने पर होगी, तो वहाँ बरकत और मोहब्बत कैसे पैदा हो सकती है? 

वे इंतज़ार करते हैं कि एक बार निकाह हो जाए, फिर वे तमाम ऐश-ओ-इशरत जो उन्हें अब तक मयस्सर न थे, बेटी के वसीले से उनके आंगन में उतर आएंगे। यह सोच कितनी खोखली है कि अपनी उम्र भर की नाकामियों का मुआवज़ा उस लड़के से वसूल किया जाए जो अभी अपनी ज़िंदगी की शुरुआत कर रहा है। 
    हकीकत में, वे बेटी का घर नहीं बसाते, बल्कि अपनी महरूमियों की दुकान सजाते हैं, जहाँ रिश्ता सिर्फ एक ज़रिया होता है उन चीज़ों को पाने का जो उन्हें खुद हासिल न हो सकीं।

यही नहीं जब् सहि वक़्त पर लड्का नहि मिलता है तो, उम्र छुपाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। याद रखें, शादी की बेहतरीन उम्र 18 से 25 साल है। जब उम्र ढल जाती है, तो इनके अरमानो और शौक़ कि फेहरिश्त छोटे होने लगते है. 
वालिदैन को चाहिए कि वे अपनी बेटी को इज़्ज़त और खुददारी का सबक दें, न कि उसे किसी अमीर घराने में 'वसूली एजेंट' बनाकर भेजें। याद रखें, जो रिश्ता जायदाद को देखकर शुरू होता है, वह अक्सर ज़मीर की नीलामी पर खत्म होता है।

 पैसों की चमक और खोखले रिश्ते.
ज़्यादा पैसे वालों के चक्कर में न पड़ें। अक्सर शादी से पहले जो सब्ज-बाग दिखाए जाते हैं, शादी के बाद वे रेत के महल साबित होते हैं। कई बार तो शादी के फौरन बाद हालात ऐसे बिगड़ते हैं कि रूहानी और माली सुकून दोनों छिन जाते हैं। नेक और मुनासिब जोडा देखें और अल्लाह पर भरोसा करके रिश्ता तय करें।

अफ़सोस का मुक़ाम है कि जो ऐशो-आराम और सहूलियतें वालिदैन को अपनी पूरी ज़िंदगी में मयस्सर नहीं होतीं, वे उन तमाम अधूरी हसरतों का बोझ अपनी बेटी के ससुराल पर डाल देते हैं। उन्हें लगता है कि बेटी की रुख़्सती कोई रिश्ता नहीं, बल्कि वह सुनहरा मौका है जहाँ से उनकी अपनी महरूमियों का मदावा (इलाज) होगा। जो ख्वाब उन्होंने अपनी टूटी छतों के नीचे देखे और जो ज़ायके उन्हें उम्र भर नसीब न हुए, वे उम्मीद लगा बैठते हैं कि दामाद के घर से उन अरमानों की तक्मील (पूरा होना) होगी। 

वालिदैन के लिए एक मुखलिस मशविरा.
तमाम वालिदैन से गुज़ारिश है कि अपनी औलाद पर तरस खाएं। अपनी शुरूआती शादीशुदा ज़िंदगी को याद करें कि आपने कैसे तंगी और कोशिशों से घर बसाया था। जवान बेटी को घर बिठाए रखना और उसे शौहर से दूर रखना बहुत बडि ग़लति है। यह नाम-निहाद 'पढ़े-लिखे' और 'दीनदार' लोग इस गुनाह-ए-अज़ीम से तौबा करें और निकाह को आसान बनाएं ताकि मुआशरा बुराई से बच सके।

तल्ख नसीहत: अपनी चादर देखकर पैर फैलाएं.

 खुदा के लिए अपनी औलाद को यह ज़हरीली तालीम न दें कि उनका शौहर कोई अलादीन का चिराग लेकर आएगा। अपनी बेटियों को सब्र और शुक्र की आदत डालें। यह सोचना कि शादी गरीबी दूर करने की कोई 'स्कीम' है, निहायत ही घटिया सोच है। जिस दिन हम इंसान को उसके अख़्लाक़ से परखना शुरू करेंगे, उस दिन हमारी बेटियां घरों में बूढ़ी नहीं होंगी। 
याद रखें, दिखावे के ये महल मिट्टी के ढेर बन जाते हैं, लेकिन मोहब्बत और वफादारि की बुनियाद पर टिके रिश्ते ता-उम्र चलते हैं। इस दोहरे रवैये से तौबा करें, इससे पहले कि आपकी लालच की भेंट चढ़कर एक और मासूम ज़िंदगी मायके की दहलीज पर दम तोड दे। 

ऐ अल्लाह! उम्मे मुसलिमा पर अपनी रहमतों की बारिश फरमा। उनकी ज़िंदगी को सुकून, बरकत और इमान की रोशनी से भर दे। उनके गुनाहों को माफ़ कर और उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता कर।
या अल्लाह! तमाम मुस्लिम बेटियों के मसाइल आसान कर दे। जिनके रिश्ते नहीं आते, उनके लिए नेक और अच्छा शरिक ए हयात मुक़र्रर कर। उनकी ज़िंदगी से तंगी, परेशानी और मायूसी दूर कर। उन्हें इज़्ज़त, मोहब्बत और खुशहाल घर का साया नसीब कर। उनकी जायेज़ दुआओं को कबूल कर और उनके दिलों को सब्र व तसल्ली अता कर। आमीन.
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