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Ayesha Gaddafi Ka Paigam: Iran Aur Duniya Ke Naam.

Ayesha Gaddafi’s Bold Message to Iran & the World.

Libya Venezuela Cuba Iraq Afghanistan Democracy Failures.
Ayesha Gaddafi Breaks Silence: Truths Iran & the World Must Hear.
Colonel Gaddafi’s daughter speaks — and the world is listening.
From Libya to Iran, her words carry weight. Ayesha Gaddafi’s message is going viral.
A voice from history, echoing into today — Ayesha Gaddafi’s message is shaking the world.
लीबिया से अफ़ग़ानिस्तान तक — लोकतंत्र की सौग़ात ने शांति छीन ली।
जहाँ लोकतंत्र का वादा था, वहाँ विनाश और अस्थिरता ही हकीकत बन गई।
वेनेज़ुएला को लोकतंत्र दिया गया, पर जनता को मिला भूख, महंगाई और असुरक्षा।
क्यूबा को बदलने की कोशिश हुई, मगर उसकी पहचान और संस्कृति को चोट पहुँची।
वेनेज़ुएला को लोकतंत्र , क्यूबा , लीबिया में लोकतंत्र का वादा, इराक में लोकतंत्र
लोकतंत्र नहीं, गुलामी ही असली पैमाना.
  इराक में लोकतंत्र के नाम पर युद्ध और खूनखराबा, अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र लाने का दावा किया गया, लेकिन वहाँ की पीढ़ियाँ सिर्फ़ संघर्ष और दर्द देख रही हैं।

कर्नल गद्दाफी की बेटी आयशा गद्दाफ़ी का पैगाम: झूठे समझौते से तबाही तक.
“ओ ईरान के पक्के और आज़ादी पसंद लोगों! मैं तुमसे तबाही, दर्द और धोखे के दिल से बात कर रही हूँ। मैं एक ऐसी औरत की आवाज़ हूँ जिसने अपने देश की तबाही देखी, खुले दुश्मनों के हाथों नहीं, बल्कि मगरिब की धोखेबाज़ मुस्कान और उसके झूठे वादों में फँसकर। 

मैं तुम्हें चेतावनी देती हूँ कि वेस्टर्न साम्राज्यवादियों के धोखेबाज़ शब्दों और नारों में मत पड़ो। उन्होंने ही एक बार मेरे पिता कर्नल गद्दाफी से कहा था कि अगर तुम अपने न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दोगे तो दुनिया के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुल जाएँगे।’ 

मेरे पिता ने अच्छे इरादों और बातचीत में भरोसे के साथ रियायतों का रास्ता चुना। लेकिन आखिर में, हमने देखा कि कैसे NATO के बमों ने हमारी ज़मीन को मलबे में बदल दिया। लीबिया खून में डूब गया, और उसके लोग गरीबी, देश बदर और तबाही में फँस गए।

मेरे ईरानी बहनों और भाइयों , पाबंदियों, जानकारी देने वाले और आर्थिक हमलों के सामने तुम्हारी हिम्मत, इज्ज़त और मज़बूती यह आपके देश के सम्मान और सच्ची आज़ादी का सबूत है। दुश्मन को छूट देने से सिर्फ़ तबाही, बँटवारा और तकलीफ़ ही मिलेगी। भेड़िये से बातचीत भेड़ों को नहीं बचाएगी या अमन नहीं लाएगी—यह सिर्फ़ अगले खाने की तारीख़ तय करेगी!
इतिहास ने साबित कर दिया है कि जो लोग मज़बूती से डटे रहे—क्यूबा, वेनेज़ुएला और नॉर्थ कोरिया से लेकर फ़िलिस्तीन तक वे दुनिया के हीरो के दिलों में बसे रहे और इतिहास में इज्ज़त के साथ ज़िंदा हो गए। और जिन्होंने हार मान ली, वे अपनी ही राख में मिल गए, उनके नाम भुला दिए गए।

बहादुर ईरानी लोगों को सलाम! ईरानी के विरोध को सलाम! फ़िलिस्तीनी लोगों के साथ दुनिया भर की एकजुटता को सलाम! "
प्यार और हमदर्दी के साथ,
आयशा गद्दाफ़ी
ओमान में शरण लेकर रह रहीं आयशा गद्दाफ़ी का ईरान के लोगों के नाम संदेश सिर्फ़ भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि इतिहास से निकली एक कड़वी सच्चाई है। यह वह सच्चाई है जिसे पश्चिम बार-बार छुपाने की कोशिश करता है—कि कैसे स्वतंत्र देशों को पहले “शांति” और “राहत” के नाम पर झुकाया जाता है, और फिर उन्हें मिटा दिया जाता है।
आयशा गद्दाफ़ी की आवाज़ एक बेटी की है, जिसने अपने पिता को दुश्मनों से नहीं, बल्कि 'झूठे वादों और धोखेबाज़ समझौतों'  से खोया।
झूठा फ़ॉर्मूला: पहले निहत्था करो, फिर मारो.

उनके संदेश का सबसे अहम नुक्ता यह है कि पश्चिम का तरीक़ा लगभग हर जगह एक-सा रहा है:

  1. पहला क़दम: प्रतिबंध, दबाव, मीडिया वार और अंतरराष्ट्रीय अलगाव
  2. दूसरा क़दम: बातचीत का झांसा— “अगर तुम अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दो, तो हम सब ठीक कर देंगे”
  3. तीसरा क़दम: जब देश निहत्था हो जाए, तो सीधा सैन्य हमला या सत्ता परिवर्तन.

लीबिया इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है। कर्नल मुअम्मर गद्दाफ़ी ने अच्छे इरादों से पश्चिम पर भरोसा किया। उन्होंने अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दिया, यह सोचकर कि अब लीबिया को स्वीकार कर लिया जाएगा।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज है—NATO के बम, तबाह शहर, बिखरा हुआ देश और एक नेता की हत्या।

यानी समझौता सुरक्षा नहीं लाया, बल्कि तबाही का न्योता बन गया।
आयशा गद्दाफ़ी का संदेश: ईरान के लिए सीधी चेतावनी.

आयशा गद्दाफ़ी साफ़ शब्दों में ईरान को चेतावनी देती हैं कि:

  • पश्चिमी साम्राज्यवादियों की मुस्कान पर भरोसा मत करो

  • उनकी भाषा शांति की होती है, लेकिन इरादे क़ब्ज़े के,

  • दुश्मन को दी गई रियायत आज नहीं तो कल तबाही बनकर लौटती है.

उनका मशहूर कथन—
भेड़िये से बातचीत भेड़ों को नहीं बचाती, यह सिर्फ़ अगले खाने की तारीख़ तय करती है
—दरअसल पूरी पश्चिमी नीति का निचोड़ है।

क्यों ईरान निशाने पर है?

ईरान इसलिए निशाने पर नहीं है कि वह “ख़तरनाक” है, बल्कि इसलिए कि वह:

  • इसराइल के आगे नहीं झुकता
  • अमेरिका की मुख़बिरी नहीं करता
  • अपने न्यूक्लियर और रणनीतिक अधिकारों को छोड़ने से इंकार करता,
  • अपनी शर्तों पर खड़ा रहता है

आयशा गद्दाफ़ी का संदेश ईरान के लिए एक लिविंग वॉर्निंग है—

कि आज जो लोग “डील” की बात कर रहे हैं, वही कल बमों की इजाज़त देंगे।

इतिहास किन्हें याद रखता है?

आयशा गद्दाफ़ी एक और अहम बात कहती हैं—
इतिहास ने उन्हें इज्ज़त दी है जो डटे रहे, चाहे क़ीमत कितनी भी बड़ी क्यों न हो:

  • क्यूबा

  • वेनेज़ुएला

  • नॉर्थ कोरिया

  • फ़िलिस्तीन

और जो झुक गए, जो “राहत” के बदले अपनी संप्रभुता बेच बैठे—
वे देश नाम के साथ ही मिटा दिए गए

गद्दाफ़ी की बेटी, लेकिन इतिहास की गवाह.

आयशा गद्दाफ़ी का यह संदेश सिर्फ़ ईरान के लिए नहीं, बल्कि हर उस देश के लिए है जो पश्चिमी दबाव में समझौते की सोच रहा है

यह एक बेटी का दर्द है, लेकिन उससे भी बढ़कर इतिहास की गवाही है।

लीबिया को पहले निहत्था किया गया, फिर तोड़ा गया, और अंत में उसके नेता को मार दिया गया।
यही फ़ॉर्मूला आज भी ज़िंदा है—सिर्फ़ देश बदलते हैं।

ईरान के लिए यह संदेश साफ़ है:
समझौता सुरक्षा नहीं लाता, मज़बूरि लाती है।

ईरान या कोई भी देश इसलिए निशाने पर नहीं आता कि वह दुनिया के लिए ख़तरा है, बल्कि इसलिए कि वह अपने लिए ख़ुदमुख़्तारी चुनता है। 
अमेरिका, NATO और उनके यूरोपीय सहयोगी ऐसे हर मुल्क को बर्दाश्त नहीं करते जो उनके इशारों पर चलने से इनकार करे। इसका तरीका भी लगभग हर जगह एक-सा होता है—पहले कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जिससे सीधे तौर पर आम जनता को भूख, महंगाई और बेरोज़गारी का तोहफ़ा मिलता है।
                                                                         जब लोग ग़रीबी और बदहाली से परेशान हो जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनका ग़ुस्सा सरकार की ओर मुड़ता है। इसी हालात को भुनाकर पश्चिम “लोकतंत्र” और “मानवाधिकार” का नाटक करता है और सत्ता परिवर्तन की ज़मीन तैयार करता है।
 इसके बाद उनकी पसंद की कठपुतली सरकार बैठा दी जाती है, जो देश के परमाणु कार्यक्रम से लेकर विदेश नीति तक सब कुछ बंद या बेच देती है।

 आज पहलवी परिवार का वारिस उसी भूमिका में पेश किया जा रहा है—वह खुलकर कह चुका है कि सत्ता मिली तो इसराइल को तस्लीम करेगा, ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करेगा और अमेरिका के इशारों पर चलेगा। बदले में उस पर से प्रतिबंध हटाए जाएंगे, ताकि लोग भूख से न मरें—
लेकिन यह राहत अस्थायी होगी, क्योंकि इतिहास बताता है कि इसके बाद या तो देश को बमों से तबाह किया जाता है या उसे हमेशा के लिए गुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाता है।
 यही वजह है कि ईरान निशाने पर है—ख़तरनाक होने के कारण नहीं, बल्कि आज़ाद होने की ज़िद के कारण।

पहलवी: “एक्सपोर्टेड हुकूमत” की पश्चिमी सोच.

पहलवी परिवार का वारिस आज जिस तरह से खुद को ईरान के “विकल्प” के तौर पर पेश कर रहा है, वह असल में अमेरिका द्वारा एक्सपोर्ट की जाने वाली हुकूमत की पूरी तस्वीर है। 

उसकी सोच साफ़ तौर पर इसराइल-परस्त और अमेरिका-परस्त है। वह कह चुका है कि सत्ता मिली तो वॉशिंगटन के इशारों पर चलेगा। 

यह कोई राजनीतिक दूरदृष्टि नहीं, बल्कि खुली ग़द्दारी का एलान है। बदले में वादा सिर्फ़ इतना है कि प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, ताकि लोग भूख से न मरें—लेकिन इसकी क़ीमत ईरान की संप्रभुता, आत्मसम्मान और स्वतंत्र नीति से चुकानी होगी।

अमेरिका–यूरोप को पहलवी क्यों चाहिए?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका और यूरोप एक बादशाह को फिर से सत्ता में क्यों देखना चाहते हैं?

 जबकि वे हर जगह “लोकतंत्र” की बातें करते हैं? 
इसका जवाब लोकतंत्र में नहीं, बल्कि वफ़ादारी में छुपा है। 
पश्चिम के लिए अच्छा शासक वह नहीं होता जो जनता की आवाज़ सुने, बल्कि वह होता है जो अमेरिका की मुख़बिरी करे, उसके आदेश माने और उसके दुश्मनों को अपना दुश्मन घोषित कर दे।
पहलवी उनके लिए आदर्श उम्मीदवार है, क्योंकि वह सवाल नहीं करेगा—न इसराइल पर, न अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर, न संसाधनों की लूट पर।

लोकतंत्र नहीं, गुलामी ही असली पैमाना.

ईरान के मामले में पश्चिम का दोहरा मापदंड पूरी तरह उजागर हो जाता है। अगर सच में लोकतंत्र मुद्दा होता, तो वे किसी राजशाही चेहरे को आगे न बढ़ाते। लेकिन यहाँ लोकतंत्र का कोई सवाल ही नहीं है।
यहाँ पैमाना सिर्फ़ एक है—कौन अमेरिका की लाइन पर चलता है। जो चलेगा, वह “मॉडरेट”, “डेमोक्रेटिक” और “रिफॉर्मर” कहलाएगा। जो नहीं चलेगा, वह “तानाशाह”, “ख़तरा” और “दुष्ट शासन” घोषित कर दिया जाएगा।

पहलवी इसी सिस्टम का हिस्सा है—एक ऐसा चेहरा जिसे लोकतंत्र के नाम पर पेश किया जाएगा, लेकिन जो असल में अमेरिका और यूरोप के हितों की रखवाली करेगा। दुनिया के सभि वोटतंत्र वाले देेेशो का गार्दियन होता है अमेरिका और उस मुल्क कि सरकार अमेरिकि दरबार का वजिर.

ईरान बनाम कठपुतली निज़ाम.
ईरान आज इसलिए निशाने पर है क्योंकि उसने यह फ़ैसला किया है कि वह अपनी शर्तों पर जिएगा। पश्चिम को ऐसा ईरान मंज़ूर नहीं जो स्वतंत्र हो। उसे ऐसा ईरान चाहिए जो निहत्था हो, झुका हुआ हो और आदेशपालक हो—और पहलवी इसी सोच का प्रतीक है।

यही वजह है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति या सरकार की नहीं, बल्कि आज़ादी बनाम गुलामी की है। और इतिहास गवाह है कि जो देश अपनी ख़ुदमुख़्तारी बेच देते हैं, उन्हें न तो सम्मान मिलता है और न ही स्थायी राहत—सिर्फ़ एक नई किस्म की गुलामी।  

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