Soft Censorship of Pro-Palestinian Voices on Social Media.
Digital Suppression: The Hidden Bias Against Palestine Online.
Censorship of Pro-Palestinian Voices on Social Media.
Understanding Soft Censorship in the Digital Age.
Case Studies of Suppressed Palestinian Advocacy.
Platform Policies and Their Impact on Free Speech.
Global Reactions and Resistance Movements.
Meta, Facebook Political bias Algorithm and Shadow ban.
सोशल मीडिया पर फ़िलिस्तीन समर्थक आवाज़ों की सेंसरशिप.
फ़िलिस्तीन की पुकार और डिजिटल सेंसरशिप — जब एल्गोरिदम बन गया ख़ामोश पहरेदार.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स कैसे फ़िलिस्तीन की सच्चाई को शैडोबैन कर रहे हैं। जानिए, ये खामोश सेंसरशिप कैसे इंसानियत की आवाज़ दबा रही है।
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| फ़िलिस्तीन की पुकार और डिजिटल सेंसरशिप. |
आप सब ने यह जरूर महसूस किया होगा के जब भी ग़ज़ा मे इस्राएल का नरसंहार, मोसाद का फिलिस्तीन के नेताओ, उसके रहबर को एक एक कर निशाना बनाने की खबर आती है तो उससे जुड़े पोस्ट्स, वीडियो, लेख, फोटो को ज्यादा रीच नही मिलता है, उसपर ज्यादा कंमेंटे, लाइक, व्यूज़ नही आते है।
इसलिए के वे सभी पोस्ट्स जिसमे ग़ज़ा के नरसंहार को दिखाया जा रहा है, फिलिस्तीन की आवाज़ उठाई जाती है उसे यह नामनिहाद आज़ादी का समर्थक वाला सोशल मीडिया फेसबुक, whatsapp, X (ट्वीटर) सब एक साथ उसे reach-down कर देते है। यानी उन सभी पोस्ट्स को डेलेट न करके उसे दुसरो तक पहुँचने से रोक देते है, उसे खुद के अलावा किसी दूसरे को नही दिखायेगा और आपको भी दूसरे के पोस्ट्स को जल्दी नही दिखायेगा। इसलिए के दुनिया इजरायली नरसंहार के बारे मे नही जाने। उसे किसी तरह छिपाना है, ताकि खुद को जो मानवाधिकार और लोकतंत्र का मसीहा समझते है वह चेहरा बेनकाब न हों जाये। य़ूरोप और अमेरिका का जो आज़ादी का चैंपियन वाला शाख है उसका पर्दाफाश हों जाये। यह सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट्स पर ही नही बल्कि यूटूब के चैनल्स और वीडियो पर भी, यहाँ तक के यूटूब द्वारा बहुत सारे चैनल्स पर पाबंदी लगाना, उसे वार्निंग देना, उसके वीडियो को कंटेंट मॉडरेशन मे डाल देना, कंमयूनिटी guideline का उल्लंघन् कह कर उसे छुपा देना, रिमूव कर देना शामिल है। पेजेस, ब्लॉग, वेबसाइट, प्रोफाइल, गुरूप सभी के साथ यह होता आया है। सभी को restrict करना, वार्निंग देना, उसकी पहुँच को रफ्ता रफ्ता कम करना, उसे इस तरह से दबाया जाता है के किसी को मालूम भी न हो और वह आवाज़ खामोश हो जाए। यह किसी चैनल्स या गुरूपस् के कंटेंट को सेंसर करना नही है बल्कि यह फिलिस्तीन की आवाज़ को खामोश करने का जरिया है, ग्ज़ा के नरसंहार को और नेतन्याहु का फिलिस्तीन विरोधी मांसुबा को छुपाने का एक जरिया है।
यह हमसब के साथ हुआ है और हो रहा है।
इसके खिलाफ कई मीडिया संगठनो और फिलिस्तीन के लिए काम करने वाली संस्था ने आवाज़ उठाई है।
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म फ़िलिस्तीन के हक़ में उठी आवाज़ों को कैसे दबा रहे हैं? शैडोबैन, सेंसरशिप और एल्गोरिदम की खामोश जंग का तजज़िया।
आज के दौर में लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, इंटरनेट की स्क्रीन पर भी लड़ी जा रही है। मोबाइल की स्क्रीन और डेटा के दरमियान लड़ी जा रही है।
जहाँ पहले बम गिरते थे,अब वहाँ एल्गोरिदम और सेंसरशिप का साया पड़ा है।
Al Jazeera की रिपोर्ट (24 अक्टूबर 2023) ने इस पर रोशनी डाली कि किस तरह बड़े-बड़े सोशल-मीडिया प्लेटफ़ॉर्म Facebook (Meta), Instagram, YouTube और X (Twitter) — पर “Palestine” आवाज़ें लगातार सेंसर और Shadowban की जा रही हैं।
फ़िलिस्तीन के मसले पर यही कुछ हो रहा है।
जो भी इंसान या अकाउंट “ग़ज़ा”, “फ़्री फ़िलिस्तीन” या “इज़रायल के हमले” की बात करता है, उसकी पोस्ट या तो गायब हो जाती है, या लोगों तक पहुँचने से पहले ही दफ़न हो जाती है। इसे कहा जा रहा है — शैडोबैन।
शैडोबैन वो तरीका है जिसमें आपकी आवाज़ बंद नहीं की जाती, बल्कि उसकी गूंज दबा दी जाती है। आपकी पोस्ट दिखती तो है, मगर किसी को सुनाई नहीं देती। ऐसे लगता है जैसे कोई अदृश्य दीवार है, जो सिर्फ़ “फ़िलिस्तीन” बोलने वालों के लिए खड़ी की गई हो।
सच्चाई कभी-कभी इतनी सीधी होती है कि समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए पर जो हुआ है, उस पर सवाल उठाना हमारी ज़िम्मेदारी है। आज जब फ़िलिस्तीन की तक़लीफ़ें दुनिया के सामने हैं, बहुत से ऐसे सवाल उभर कर आ रहे हैं जिन पर हम सबको नज़र डालनी चाहिए।
यूरोप आँखें बंद करके इज़राइल का साथ दे रहा हैं चाहे वह कूटनीति हो या खुला दादागिरी रवैया। ये केवल राजनैतिक हिमायत नहीं, बल्कि आम लोगों की ज़िन्दगियों पर असर डालने वाले फैसले हैं। ऐसे में सोचना ग़लत नहीं कि क्या ये रुख़ बस राजनैतिक मुनाफ़े और हितों का नतीजा है, या कहीं कोई बड़े एजेंडा— 'ज़ियॉनिस्ट एजेंडा' कहते हैं—काम कर रहा है।
मगरिबि टेक कंपनियों का छुपा क्रुशेड।
टेक्नॉलॉजी की दुनिया में अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियाँ हैं , जो हमारी बातें सुनतीं, हमारे फ़ोटो रखतीं और हमारे डेटा को सम्भालतीं हैं।
अब सवाल उठता है: क्या यही डेटा कभी किसी ख़ुफ़िया मक़सद या ख़ुद किसी देश की खुफ़िया अदायगी में काम आता है?
कुछ लोगों का कहना है कि बड़ी तकनीकी कंपनियों की मदद से कुछ हुकूमतें या एजेंसीज़ दूसरे मुल्कों की निगरानी में आसानी से क़दम बढ़ा सकती हैं। यह एक बड़ी चिंता की बात है.
हम ऐसे बयान नहीं दे रहे कि "यह हुआ" और "वह हुआ" बल्कि हम सब जानना चाहते हैं कि डेटा,क्लाउड और सॉफ्टवेयर जब हथियार बन जाएँ, तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी?
अगर किसी माँ का रोता हुआ वीडियो “गाइडलाइन वायलेशन” बन जाए, तो समझ लो कि दुनिया के सर्वर अब ज़मीर के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं।
क्या कंपनियाँ सिर्फ़ बिज़नेस कर रही हैं, या उनकी कोई नैतिक ज़िम्मेदारी भी बनती है कि वे जाने कि उनकी तकनीक का इस्तेमाल कैसे हो रहा है?
फिलिस्तिन के मस्ले पर मगरिब्, युरोप और अमेरिका कि कम्पनिया मोसाद से डाटा बेचति है ताकि दुनिया मे फिलिस्तिन कि आवाज़ उठाने वाले पर नज़र रखि जाये, उसे निशाना बनया जाये.
मगरिब कि सरकर इस मामले मे इस्रएल कि मदद करती है, फिलिस्तिनियो को परेशान करने के लिये. खास कर उन्हे जो फिलिस्तिन के लिये काम कर रहे है। मिक्रोसोफ्ट, फेस्बूक जैसी बड़ी कम्पनिया.
अक्टूबर 2023 के बाद से फेसबुक/इंस्टाग्राम (Meta) पर बहु-तरफ़ा आराेप उठे कि फ़िलिस्तीनी आवाज़ों, प्रदर्शनकारी सामग्री और कुछ अरबी नारे पर अनौपचारिक रूप से रोक-टोक या हटाने के सिलसिले में अत्यधिक क़दम उठाए गए। मानवाधिकार संगठन और स्वतंत्र निगरानी समूहों ने "शैडोबैनिंग", पोस्ट-हटाना, या भाषाई अनुवाद की गलतियों के ज़रिये द्वेषपूर्ण असर का हवाला दिया।
Human Rights Watch ने 20–21 दिसम्बर 2023 को विस्तृत रिपोर्ट जारी की जिसमें यह दावा किया गया कि Meta के नीतिगत और तंत्रगत फ़रज़ (algorithms, moderation rules) ने फ़िलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन वाली सामग्री को दुनिया भर में दबा दिया.
Amnesty International और अन्य संगठनों ने भी इसी दौर में Meta की भाषाई/संदर्भ-पॉलिसीज़ पर सवाल उठाए और सुझाव दिए कि 'ज़ियॉनिज़्म' जैसे शब्दों पर व्यापक प्रतिबंध असंतुलित हैं।
Meta ने कुछ मामलों में तकनीकी बग्स और गलत अनुवादों का हवाला दिया, तथा कहा कि वे सामुदायिक मापदण्डों के तहत कार्रवाई करते हैं। दूसरी तरफ़ निगरानी रिपोर्टों ने प्रणालीगत (systemic) झुकाव के ठोस उदाहरण दिये जहाँ न केवल गलतियाँ, बल्कि नीतिगत इम्प्लीमेंटेशन के पैटर्न दिखे। सांसदों और नियामक संस्थाओं ने भी कंपनी से स्पष्टीकरण माँगा। एक खास प्रोपगंडे के तहत ग़ज़ा के क़त्ल ए आम पर पर्दा डाला जा रहा है।
बड़े क्लाउड और एआई प्रदाता — विशेषकर Microsoft ने इज़राइली सरकारी और मिलिट्री इकाइयों को फिलिस्तिन से जुडे डाटा दीं (इंजीनियरिंग सपोर्ट, Azure क्लाउड, AI टूल्स)। इस बारे में दो तरह के सवाल उठते हैं:
(1) क्या ये सेवाएँ नागरिकों की निगरानी/हर्ट के लिए इस्तेमाल हुईं?
(2) क्या कंपनी ने अपने टर्म्स और नैतिक मार्गदर्शिकाओं को ठीक तरह लागू किया?
Microsoft ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि वे इज़राइल के साथ तकनीकी तथा साइबर-रक्षा सहयोग करते हैं। 2025 में कंपनी ने इस पर विस्तृत बयान भी जारी किया जिसमें यह बताया गया कि वे इज़राइल की कुछ संस्थाओं को सेवाएँ दे रहे है/दे चुके हैं, और भीतर की जाँचों का हवाला दे कर कहा कि प्लेटफ़ॉर्म के दुरुपयोग के साक्ष्य नदारद भी मिले। साथ ही, मीडिया रिपोर्ट्स (2025) में यह भी उभरा कि Microsoft ने कुछ सेवाओं की एक्सेस सीमित/रोक दी थी. मोसाद से डाटा लिक किया.
फ़िलिस्तीन की आवाज़ पर डिजिटल सेंसरशिप — कैसे सोशल मीडिया शैडोबैन से सच्चाई दबा रहा है.
2024 के महीनों में इज़राइली खुफ़िया एजेंसियों ने Hezbullah की कम्युनिकेशन डिवाइसेज़ विशेषकर ताइवान-निर्मित पेजर्स/वॉकी-टॉकी जैसे उपकरण में छेड़छाड़ की, जिन्हें बाद में विस्फोटक या ट्रैकिंग मैकेनिज़्म से जोड़ा गया। Reuters और कई अंतरराष्ट्रीय अख़बारों ने इन घटनाओं की कवरेज की और संकेत दिए कि यह एक जटिल आपरेशन था जिसमें आपूर्ति-श्रृंखला और डिवाइस-उत्पादन के स्तर पर परिवर्तन किए गए।
Facebook, Instagram, X (twitter), Youtube जैसे प्लत्फोर्म्स का शैडोबैन ही नही बल्कि मगरिबी मीडिया भी अपने खास प्रोपगंडे के तहत मोर्चा संभाले हुए है।
शैडोबैन मतलब — (Reach Down) “शैडोबैन” कोई खुली पाबंदी नहीं होती।
आपकी पोस्ट दिखती है — मगर किसी को दिखाई नहीं देती, आप सोचते हैं कि आपने दुनिया तक सच पहुँचा दिया,मगर हक़ीक़त में आपकी बात एल्गोरिदम के अंधेरे कोने में खो जाती है। यह मगरिब् के मीडिया के तरफ से भी होता है।
कई उप्योग्कर्ता और रिपोर्ट में कई ऐसे लोगों के तज़ुर्बे बताए गए हैं जिन्होंने देखा कि उनकी “फ़िलिस्तीन” से जुड़ी पोस्ट पर अचानक व्यूज़ गिर गए. लाइक और कमेंट गायब हो गए, और उनके अकाउंट की रीच लगभग खत्म हो गई और शेयरिंग लगभग बंद हो गई।
रिपोर्ट बताती है कि यूरोप, अरब और एशिया के कई देशों के यूज़र्स फ़िल्ममेकर, पत्रकार, और आम लोग सब कह रहे हैं कि जब वो Gaza, Genocide, Free Palestine या Ceasefire Now, Free Palestine, Israel Terrorist, IDF Terrorist, "From the river to the sea Palestine will be free" Israelis Terror, Mossad Terrorist, Silent genocide, जैसे शब्द लिखते हैं तो उनके पोस्ट की पहुँच घट जाती है।
बेल्जियम के एक वीडियोग्राफर ने बताया कि उनका वीडियो, जिसमें उन्होंने ग़ज़ा पर हो रहे हमलों की निंदा की थी,
पहले हज़ारों लोगों ने देखा, फिर अचानक “view count” रुक गया।
Meta और Instagram ने कहा कि ऐसा “bug” या “तकनीकी गलती” की वजह से हुआ।
कंपनी ने कहा कि “किसी भी राजनीतिक झुकाव के साथ जानबूझकर सेंसरशिप नहीं की गई।”
सवाल यह है — अगर बार-बार वही गलती एक ही दिशा में हो रही है, तो क्या उसे महज़ गलती कहा जा सकता है?
एक डिजिटल राइट्स संगठन 7amleh के मुताबिक, सिर्फ़ 2023 में लगभग 238 मामले दर्ज हुए,
जहाँ “Pro-Palestine” कंटेंट या तो हटाया गया, या उसकी रीच घटा दी गई।
कई अकाउंट अस्थायी तौर पर सस्पेंड भी किए गए। यह कोई एक-दो केस नहीं, बल्कि संगठित पैटर्न जैसा दिखता है। जो करुशेड का हिस्सा है। जिसे मंसूबे के तहत अंजाम दिया जा रहा है।
रिपोर्ट में यूरोपीय यूनियन की नई Digital Services Act (DSA) का ज़िक्र भी है।
जो कहती है कि सोशल-मीडिया कंपनियों को बताना होगा कि किसी यूज़र की पोस्ट क्यों सीमित की गई।
और इस बीच “Pro-Israel” नैरेटिव खुलकर चलता है, जबकि “Palestine” पोस्टों पर साया पड़ जाता है।
यह सवाल अहम है। अगर कोई पोस्ट नफ़रत फैलाए तो उसे हटाना ठीक है, मगर मानवीय हक़ और नरसंहार पर बोलना किसी भी कानून और व्यवस्था में गुनाह नहीं हो सकता।
जब एल्गोरिदम सिर्फ़ कुछ शब्द सुनकर कंटेंट रोक देता है, तो वो डिजिटल सेंसरशिप बन जाता है —
जो न सिर्फ़ आवाज़ दबाता है बल्कि कहानी का रुख़ भी बदल देता है। लेकिन सिर्फ फ़िलिस्तीन के माम्ले पर हि यह नियम, शर्त, कानुन, एल्गोरिदम, परोग्राम या बग कैसे ज़िंदा हो जाता है? फ़िलिस्तीन के हक़ में बोलने वालों की आवाज़ को दबा रहे हैं--- कभी “बग” के नाम पर, कभी “कंटेंट वायलोशन” के बहाने।
क्या हमेशा एक ही तरफ़ की गलती हो सकती है?
अगर गलती होती है, तो वो “Pro-Israel” कंटेंट पर क्यों नहीं दिखती?
यहि मेटा के फेस्बूक ने रुस के खिलाफ युक्रैन के समर्थन मे हिंसा बढाने और ऐसे पोस्ट डालने वाले शख्स,मिडिया, सस्था, कम्पनी सभी का साथ देने का एलान किया था. फिर यहाँ उसी कंपनी का अल्गोरीदम कैसे हिंसा, नफरत का साथ देने लगता है? यह अल्गोरीदम कोई फॉर्मूला है या धार्मिक प्रोपगैंडा।
फ़िलिस्तीन के लिए आवाज़ उठाना अपराध क्यों बन गया है?
डिजिटल जंग — जहाँ सच्चाई को भी दुश्मन समझा गया
सोचिए — जब कोई बच्चा मलबे के नीचे दबा हो,
जब एक माँ अपने परिवार को खोज रही हो, तो क्या उसकी तस्वीर दिखाना “नियमों का उल्लंघन” है?
क्या सच बोलना इतना ख़तरनाक हो गया है कि उसे एल्गोरिदम की जेल में डाल दिया जाए?
दरअसल “डिजिटल प्रोपेगैंडा” का नया चेहरा है —
जहाँ सेंसरशिप को “सुरक्षा” और खामोशी को “नियम” कहा जाता है।
सोशल मीडिया जिसे लोगों ने “बे आवाजे- की आवाज़” बनने का वादा किया था,
आज वही प्लेटफ़ॉर्म आवाज़ को म्यूट कर रहे हैं। सियासि दबाओ और नज़रिया से सब कुछ बदल सकता है.
सिर्फ़ तकनीकी मसला नहीं यह इंसानियत का इम्तेहान है।
पारदर्शिता की माँग करें —
कंपनियों से पूछें कि किस आधार पर पोस्ट हटाई जा रही है?
वैकल्पिक प्लेटफ़ॉर्म पर आवाज़ उठाएँ —
ब्लॉग, इंडी मीडिया, लोकल नेटवर्क, (Yandex Browser, Russian and Chinese apps) और स्वतंत्र वेबसाइटें इस्तेमाल करें।
डिजिटल राइट्स की निगरानी करें —
7amleh, Access Now जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें पढ़ें और साझा करें। कानूनी जवाबदेही की पहल।
यूरोपीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाये कि कंपनियाँ “shadowban” जैसी नीतियों की व्याख्या करें।
यूरोप और अमेरिका की दोहरी पॉलिसी.
यूरोपीय यूनियन की Digital Services Act (DSA) कहती है कि सोशल-मीडिया कंपनियों को बताना होगा कि किसी पोस्ट को क्यों सीमित किया गया।
मगर असल में ये नियम सिर्फ अपने सवार्थ के हिसाब से लागू होते है, वही प्लेटफ़ॉर्म जो “Free Speech” का झंडा उठाते हैं, वे फ़िलिस्तीन की आवाज़ पर ताले लगा रहे हैं।
कहा जाता है कि एल्गोरिदम “न्यूट्रल” होते हैं,
मगर अगर हर बार एक ही पक्ष को दबाया जाए,
तो ये तकनीक नहीं, तहरीक बन जाती है।
जो आवाज़ इंसानियत के लिए उठती है,
उसे “ख़तरनाक” बता कर म्यूट कर देना —
यह डिजिटल ज़माने का सबसे बड़ा गुनाह है।
फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर जो बम गिरते हैं,
वो सिर्फ़ घर नहीं, आवाज़ें भी उजाड़ देते हैं।
और अब, इंटरनेट की दुनिया में वही आवाज़ें
एल्गोरिदम की दीवारों में कैद हो रही हैं।
मगर याद रखो - सच्चाई को सेंसर किया जा सकता है, मगर मिटाया नहीं जा सकता। क्योंकि हर खामोशी के पीछे एक चीख होती है और हर शैडोबैन के पीछे एक आवाज़ जो अब भी जिंदा है।
तकनीक अगर इंसानियत की दुश्मन बन जाए, तो हमें उसे बेनक़ाब करना होगा।
क्योंकि सच्चाई की रोशनी को चाहे कितनी भी परछाई ढके,
वो फिर भी दिखती है… और बोलती है.
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