Zadid Daur ka Ghar Baithe Biwi Dikhao paise Kamao.
![]() |
| घर बैठे बीवी दिखाओ पैसे कमाओ |
आज के जदीद दौर मे एक नया ट्रेंड चला है, घर बैठे रील्स बनाये और पैसे कमाए।
मगर रील मे जबतक अपनि निस्वानीयत और नज़ाकत की नुमाइश नही करेंगे तबतक रील्स अधूरा है। इसलिए आजकल हर एक मर्द कैमरा मैन और औरतें (खासकर बीवी) उस फिल्म की अदाकार है। बीवी अदा करती है और हसबैंड कैमरा लाइट, एक्शन करता है। इसे कहते है मॉडर्न दौर का रोजगार जिसमे घर बैठे बीवी दिखाओ पैसे कमाओ वाली काबिलियत और हुनर होना चाहिए।
नाम: शौहर / बीवी (हसबैंड/वाइफ)
उम्र: 30 / 28
पेशा: कैमरा मैन / अदाकारी
काबिलियत: जर खरीद गुलामी मे महारत / निस्वनियायत और नजाकत को बेचना।
मकसद: पैसे कमाना/ अपने हुस्न,अदा,नज़ाकत की नुमाइश करके शोहरत हासिल करना। (Likes, व्यूज़ मे इजाफा)
मकाम: सोशल मीडिया/ रील्स, शॉर्ट वीडियोज
आधुनिक दौर की रील्स: एक खतरा या अवसर?
समाजी प्रभाव: परिवार और समाज पर असर
समाजी नज़रिए से देखें तो यह ट्रेंड परिवार की बुनियाद हिला रहा है। हर मर्द कैमरा मैन और औरत अदाकार बन जाए, तो घर का सुकून कहां बचेगा? बच्चे देखेंगे, पड़ोसी देखेंगे, और समाज में निस्वानीयत की घट जाएगी। आजकल की ये रील्स लत लगाती हैं, जहां बीवी को 'दिखाओ' और 'पैसे कमाओ' का सामान समझा जाता है। यह काबिलियत का नाम नहीं, बल्कि फ़िज़ूलख़र्ची का खेल है। समाज को मज़बूत बनाने के लिए ख़वातीन को अपनी हुनर को घर की चारदीवारी में इस्तेमाल करना चाहिए. बहनों को चाहिए कि वे अपनी नज़ाकत को छिपाएं, न कि नुमाइश करें। प्यारे नबि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत हमें सिखाती है कि औरत का असली जज़्बा घर संभालना और अल्लाह की इबादत है। अगर कमाई की ज़रूरत हो, तो हलाल रास्ते चुनें—जैसे ऑनलाइन ट्यूशन या किताबें लिखना, बिना अपनी इज़्ज़त दांव पर लगाए। हसबैंड को साथ लेकर परिवार को मज़बूत बनाएं, न कि रील्स का सामान। याद रखें, मॉडर्न दौर की चमक अस्थायी है, लेकिन इस्लामी हिदायत हमेशा की रौशनी है। बहनों,अपनी क़ुदरत को अल्लाह के हुक्म पर चलाएं, तो जन्नत की राह आसान हो जाएगी।
मौजूदा दौर की मुश्किल हकीकत
यह ट्रेंड मुस्लिम ख्वातीन को अपनी हया और पर्दा-दारी से दूर ले जाता है, जहां वो अपनी निस्वानीयत को बाजार की चीज बना देती हैं। समाज में यह फैलाव तेजी से हो रहा है, जहां घर की चारदीवारी में ही फहाशी की शुरुआत हो जाती है।
इस दौर की चमक-दमक ने कई गुनाहो को मुताशिर कर लिया है, लेकिन यह दुनियावि नुमाइश आखिरत की राह में रुकावट बन जाता है। जब बीवी खुद को कमाई का जरिया समझकर दिखाने लग जाती है, तो घर का सुकून उड़ जाता है और रिश्तों में दरारें पड़ने लगती हैं। यह सिर्फ मुआशि तंगि का नतीजा नहीं, बल्कि गलत तसव्वुर का फल है जहां हलाल कमाई की बजाय हराम रास्ते अपनाए जाते हैं। मुस्लिम समाज को इस खतरे से आगाह होना चाहिए, ताकि ख्वातीन अपनी असली कद्र को समझें।
इस्लामी नजरिए में ख्वातीन का मुकाम
इस्लाम में ख्वातीन का मुकाम बेहद बुलंद और मुकरम है। कुरान हकीम में अल्लाह तआला ने फरमाया: "और मोमिन ख्वातीन से कह दो कि वो अपनी नजरें नीची रखें और अपनी शर्म्गाह की हिफाजत करें, और अपनी जीनत को जाहिर न करें सिवा उसके जो खुद-ब-खुद नजर आ जाए।" यह आयत करीमा साफ तौर पर बताती है कि मुस्लिम ख्वातीन का असली जोहर उसकी पर्दा-दारी और हया में है, न कि अपनी हुस्न व जमाल की नुमाइश में।
रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "हया ईमान का हिस्सा है।" यह हदीस शरीफ हमें बताती है कि शर्म व हया सिर्फ जाहिरी लिबास का नाम नहीं, बल्कि यह एक पूरी जिंदगी का अंदाज है जो इंसान के दाखिली और बाहरी किरदार दोनों को घेरता है।
इस्लाम में ख्वातीन को जन्नत की राह दिखाई गई है, जहां वो घर संभालने और अल्लाह की इबादत में अपनी कुदरत को इस्तेमाल करें। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत हमें सिखाती है कि शौहर अपनी बीवी का मुहाफिज है, न कि उसे बाजार में बेचने वाला।
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: "तुममें सबसे बेहतर वो है जो अपनी बीवी के साथ सबसे अच्छा सलूक करे, और मैं अपनी बीवियों के साथ सबसे अच्छा हूं।" यह हदीस हमें याद दिलाती है कि बीवी की इज्जत शौहर की जिम्मेदारी है। ख्वातीन का रोल घर को जन्नत बनाना है, न कि सोशल मीडिया पर नचाना।
जदीद दौर के चैलेंजेस: सोशल मीडिया का नेगेटिव असर
आज के दौर में ग्लोबलाइजेशन और डिजिटल मीडिया के असरात से इस्लामी खानदानी कद्रें सख्त खतरे में हैं.
मगरिबि तहजीब की नकल में कई मुस्लिम अपनी असली पहचान खो रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बे-पर्दगी और फहाशी को फिरोग देना, खास तौर पर खानदान के मर्दों की तरफ से अपनी बीवियों को कंटेंट क्रिएटर बनाना, एक सख्त खतरनाक रुझान है। यह ट्रेंड ख्वातीन को अपनी हया से दूर कर देता है, जहां वो अनजाने में हराम कमाई में शरीक हो जाती हैं।
सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिक नफरत भरी बातें और बुलिंग का सामना मुस्लिम ख्वातीन को करना पड़ता है, जो उनकी ज़ेहनि तसल्ली को चोट पहुंचाता है। बच्चे इन चीजों को देखकर अपनी कद्र भूल जाते हैं। डिजिटल दुनिया में तुलना/ मुक़ाबले की आदत पड़ जाती है, जो सेल्फ-डाउट और नेगेटिव सेल्फ-एस्टीम पैदा करती है।
मआशी दबाव और गलत हल
मआशी मुश्किलात के हल के लिए घर बैठे कमाई का ख्वाब देखना फितरी बात है, लेकिन यह ख्वाब जब इस्लामी हदों से तजावुज कर जाए तो आखिरत की तबाही का सबब बनता है। कई घरो में शौहर अपनी बीवी को "बिजनेस पार्टनर" के नाम पर कैमरे के सामने पेश करते हैं, जबकि यह इस्लाम के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। यह रास्ता वक़्ति तौर पर नाजयेज़ फायदा दे सकता है, लेकिन मुस्तक्बिल में खानदान को तोड़ देता है।
डिजिटल उम्र में बच्चे स्क्रीन टाइम से दूर नहीं हो पाते, जो वालिदैन के लिए चैलेंज है। मुस्लिम खानदानों को इस्लामी कद्रें सिखानी पड़ती हैं ताकि बच्चे फितने से बचें।
हराम कमाई के नुकसानात: रुहानि तबाही.
जब कोई ख्वातीन अपनी पर्दा-दारी को छोड़कर ऑनलाइन कंटेंट बनाती है, तो उसकी रूह पर नेगेटिव असरात पड़ते हैं। अल्लाह तआला की नाफरमानी से दिल में कालिख आती है और ईमान कमजोर होता है। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब इंसान गुनाह करता है तो उसके दिल पर एक काला नुक्ता पड़ जाता है। यह हराम कमाई रूहानी अमन, चैन व सुकुन को चुरा लेती है।
हया अल्लाह से सबसे बड़ी हया है, जो इंसान को दुनिया की चमक से बचाती है. बिना हया के जिंदगी अधूरी लगती है।
खानदानी निजाम की तबाही
"घर बैठे बीवी दिखाए, पैसे कमाए" का कल्चर खानदान की बुनियाद को तोड़ देता है। जब घर में हया और पर्दा-दारी का एहतराम न रहे, तो बच्चों पर नेगेटिव असरात पड़ते हैं। वो यह सीखते हैं कि ख्वातीन की इज्जत और वकार को पैसे के बदले बेचा जा सकता है। शौहर-बीवी के रिश्ते में मोहब्बत कम हो जाती है।
समाजी बिगाड़
यह रिवाज न सिर्फ फर्दी खानदानों बल्कि पूरी सोसाइटी पर नेगेटिव असरात डालता है। जब समाज में ख्वातीन की असमत और पाकदामी का एहतराम न रहे, तो फहाशी और बे-हयाई आम हो जाती है।
तालीम और स्किल डेवलपमेंट
ख्वातीन के लिए हलाल कमाई के कई रास्ते मौजूद हैं। ऑनलाइन तालीम, ट्यूशन, राइटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, हैंडीक्राफ्ट्स, और कई दूसरे फील्ड्स में पर्दे के अंदर रहकर भी कामयाबी हासिल की जा सकती है। मिसाल के तौर पर, फैसलेस कंटेंट क्रिएशन जहां चेहरा न दिखाया जाए, बल्कि फायदा पहुंचाने वाला मालूमात शेयर किया जाए।
होममेड क्राफ्ट्स जैसे इस्लामी आर्ट, कैलीग्राफी, और ईदी गिफ्ट्स बेचना अच्छा बिजनेस है। स्किल बेस्ड वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर खोलकर दूसरी ख्वातीन को सिलाई, कढ़ाई, ज्वेलरी मेकिंग सिखाना फायदेमंद है।
फैसलेस कंटेंट क्रिएशन
मुस्लिम ख्वातीन के लिए फैसलेस कंटेंट क्रिएशन बेहतरीन मुबादिल है। इसमें चेहरा छिपाना, म्यूजिक न इस्तेमाल करना, और फायदेमंद तालीमी मालूमात शेयर करना शामिल है। यह तरीका इस्लामी हिदायतों के मुताबिक है और घर से हलाल इनकम देता है।
कारोबार और एंटरप्रेन्योरशिप
घरेलू कारोबार जैसे खाना पकाना, सिलाई कढ़ाई, और ऑनलाइन प्रोडक्ट्स की बिक्री भी बेहतरीन ऑप्शन हैं जो पूरी तरह हलाल हैं। मोडेस्ट इस्लामी कपड़े जैसे अबाया, नकाब, हिजाब बेचना पॉपुलर है।ऑनलाइन कंसल्टिंग और कोचिंग जैसे न्यूट्रिशन या लाइफ कोचिंग में कमाई हो सकती है।
वालिदैन की जिम्मेदारियां
बच्चों की तर्बियत
डिजिटल दौर में मुस्लिम वालिदैन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने बच्चों को इस्लामी तालिमात सिखाना है। बच्चों को बताना चाहिए कि ख्वातीन का असली मुकाम और इज्जत क्या है, और क्यों हया और पर्दा-दारी जरूरी है. खुद को मिसाल बनाएं, सलाह और जिक्र में मसरुफ रहें।
बच्चों को डिजिटल बॉउंडरीज सिखाएं, स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें।
टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल
वालिदैन बच्चों को टेक्नोलॉजी का पॉजिटिव इस्तेमाल सिखाएं। इंटरनेट को इल्म हासिल करने, फायदेमंद काम करने, और दीन की खिदमत के लिए यूज करें, न कि फहाशी के लिए। पैरेंटल कंट्रोल्स और ओपन बातचीत से बच्चों को प्रोटेक्ट करें।
शौहरों के लिए अहम पैगाम
बीवी की हिफाजत की जिम्मेदारी
इस्लाम में शौहर अपनी बीवी का मुहाफिज और निगहबान है। कुरान हकीम में अल्लाह तआला ने फरमाया: "मर्द ख्वातीन के मुहाफिज हैं।" लिहाजा शौहर का फर्ज है कि वो अपनी बीवी की इज्जत और वकार की हिफाजत करे, न कि उसे ऑनलाइन कंटेंट बनाने पर मजबूर करे।
ख्वातीन के लिए खास हिदायतें
खुदा-इज्तिरामी (सेल्फ-रिस्पेक्ट)
मुस्लिम ख्वातीन को याद रखना चाहिए कि उनकी असली ताकत और हुस्न उनकी हया और पर्दा-दारी में है। दुनिया की वक़ति चमक-दमक के लिए अपनी इज्जत को दांव पर न लगाएं। हया अल्लाह की अमानत है।
दीन और दुनिया का तौअजुन
इस्लाम दीन और दुनिया दोनों में तौअजुन की तालीम देता है। ख्वातीन अपनी जरूरतें पूरी कर सकती हैं लेकिन इस्लामी हदों के अंदर रहकर। फैसलेस कंटेंट से दावाह भी कर सकती हैं.
समाजी इस्लाह की जरूरत
उलमा और दानिशवरों का रोल
उलमा कराम और दीनि रहनुमाओं को इस मसले पर तवज्जो देनी चाहिए। मसाइल की तशखीस के साथ हलाल मुबादिलात भी पेश करें।
मीडिया की जिम्मेदारी
इस्लामी मीडिया को चाहिए कि वो पॉजिटिव और तामीर करने वाले कंटेंट को तरोज दे। ख्वातीन को ऐसे रोल मॉडल्स पेश करें जो इस्लामी कद्रों के मुताबिक कामयाब हो रही हों।
नतीजा और तजावीज
"घर बैठे बीवी दिखाए, पैसे कमाए" का कल्चर एक खतरनाक रुझान है जो हमारे दीनि, अख्लाकी और समाजी ढांचे को तबाह कर रहा है। इस मसले का हल सिर्फ मना करने में नहीं बल्कि हलाल मुबादिलात मुहैया करने में है.
फौरी इकदामात:
1. तालीम और आगाही - खानदानों को इस्लामी तालीमात की रौशनी में आगाह करना।
2. हलाल कारोबार की हौसला अफजाई - ख्वातीन के लिए पर्दे के अंदर रहकर काम के मौके मुहैया करना।
3. रुहानी तर्बियत - दीनि तालीम और तर्बियत को मजबूत बनाना।
4. समाजी सपोर्ट सिस्टम - खानदानों को मआशी मदद और राहनुमाई मुहैया करना।
अल्लाह तआला हमें अपनी इज्जत और वकार को कायम रखने की तौफीक अता फरमाए और हलाल रिज्क अता करे। आमीन या रब्बल आलमीन।
याद रखें, असली कामयाबी दुनिया और आखिरत दोनों में अल्लाह की रजा हासिल करने में है, न कि फानी माली फायदे के लिए अपनी इज्जत को दांव पर लगाने में।







No comments:
Post a Comment