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ज़ायेरा वसीम के ट्वीट से लिबरल्स मे फैला मातम।
ज़ायेरा वसीम ने सिर्फ एक पैगाम दिया, जिस से ज़दीद सोच वाले खेमे मे बौखलाहट और मातम फैल गया।
इज़्ज़तें शोहरतें चाहतें उल्फ़तें,कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं
आज मैं हूं जहां कल कोई और था,ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था.
अब हाथी तो अपने पूरे ताक़त से चल रहा है लेकिन जो रास्ते मे कुत्ते होते है वह खुद को उस इलाके का बादशाह समझते है, क्योंके उसे वही रहते हुए काफी अरसे हो गया होता है अब कोई भी अंजान आजये तो उसे दूर से ही भगा देते थे लेकिन इतने बड़े ताक़तवर हाथी को देखने के बाद उसकी अपनी साँस बन्द हो जाती है वह अब उसे कैसे भगाये? जो न उसके कद का है, न देखने मे, नही उसके जैसा शक्ल का, उसके पास यह चिल्ला कर भी क्या कर सकते है? इसलिए बहुत सारे अपने प्रजाति को बुला कर भौंकना शुरू कर देते है, ताकि अपनी आवाज़ से उसे डरा सके।
यही वह कुत्तो की झुंड है आज के लिबरल्स, नामनिहाद् आज़ाद ख्याल, जो दुसरो का फैसला करने को हमेशा तैयार रहते है। वे हर किसी पर अपना हक समझते है, वे सबको तय करना चाहते है सबके उसूलो को दरकिनार कर अपना दोहरी सोच वाली बनाई हुई उसूल व नज़रिया थोपना चाहते है।
वे अपने उसूल के अलावा दुनिया मे किसी को भी इस काबिल नही समझते के वह खुद उसके उसूल से हटकर चले, जिन्होंने भी उनके नज़रिए को जूते के नीचे रखा है वे सब उनकी नज़र मे शिद्दत पसंद, दकियानुसी, क़दामत पसंद है, और जो उनके बनाये हुए रास्ते पर चला वही उसके हिसाब से आज़ाद ख्याल और मॉडर्न कहे गए।
अब इनको लाइसेंस मिला हुआ है के किसे आज़ाद ख्याल की डिग्री देनी है और किसे दकियानुसी की।
यह सबकी अपनी मर्जी की वकालत करते है लेकिन जैसे ही कोई इनके बनाये हुए उसूलो पर न चले और खुद अपनी पसंद से रास्ते का इंतखाब करे उसपर यह लोग अपना गुस्सा किसी न किसी तरह से निकाल ही लेते है, उसपर झलायेंगे, उसे लानत मलामत करेंगे, खुद का इनलोगो का कुत्तो जैसा झुंड रहता है, वह अपने इसी आशियाने मे रह कर सबके फैसले करते है और दुसरो पर नज़र रखते है।
लिबरल्स की परेशानी के असबाब।
ज़ायेरा वसीम "कुबूल"है.
उनका शौहर " कुबूल" है,
लिबरल्स हमे कुबूल नही है।
यह आलंम है नाम निहाद आज़ाद ख्याल और दनिश्वर तबके का, जो दुसरो के मामले मे उंगली करना नही भूलते।
इनकी परेशानी,कुंठा और झुंझलाहट इसलिए है के
ज़ायेरा वसीम ने सोशल मीडिया पर कोई वीडियो नही डाला।
किसी गैर मुस्लिम से शादी नही की।
खुद को overated जैसा नही दिखाई, इनके हिसाब से यह outdated है।
वह हनीमून पर जाकर ट्रिप की सभी तस्वीर डालती और आकर एक एक क्लिक का पेश ए मंजर बताती है।
हॉल से लेकर कमरे तक का इनको आईने मे सब कुछ दिखाती।
खुद को मॉडर्न दिखाने के लिए मुआशारे को नीचा दिखाती।
दिन ए इस्लाम को पिछडा कहती और खुद को तब्दीली चाहने वाली।
हर धर्म को दूसरे धर्म मे शादी करने वाले को यह आज़ाद ख्याल का डिग्री देते है ऐसा इसमे भी करते।
स्विमिंग पूल मे बिकनी वाली बरहना तस्वीरें डाल् कर सबकी छोटी सोच का पैमाना बताती और इसे एक अच्छा तजुर्बा बताती,
वह समाज को खूब गलिया देती, फेमिनिस्ट के नज़रिए से दुनिया के सभी मर्दो को कोसती और उसे रेपिस्ट, ज़ालिम,आवारा, जानवर कहकर फहक्के उड़ाती। वगैरह् वगैरह।
जबकि यह हुआ नही, जिस से लिबरल्स के उम्मीदो पर पानी फेर गया।
उन्होंने इनके बनाये हुए पैमाने पर अमल नही किया, इसलिए अब उनको टार्गेट कर रहे है सोशल मीडिया ट्रायल चलाकर, लेफ्टिस्ट कोर्ट मे।
ज़ायेरा वसीम के फैसले ने इन लोगो के चाहत पर पानी फेर दिया है, वह अब लिबरल्स के डिग्री के काबिल नही रही।
वे जो आज के दौर मे लीबरल बनते है, वे चाहते है के सबकोई हमें तसलिम करे, मगर वे दूसरे के नज़रिए पर खूब तनकीद करते है, वे अपनि गंदगी दुसरो पर थोपना चाहते है।
ज़ायेरा वसीम की शादी मे लिबरल्स दीवाना।
ज़ायरा वसीम का निकाह और जदीदियत के नक़ाब में छुपी मुनाफ़िक़त
ख़बर एक निकाह की थी, मगर मातम मुनाफ़िक़त के खेमे में बरपा हो गया। ज़ायरा वसीम, वो ख़ातून जिसने शोहरत और फ़िल्म की दुनिया की चकाचौंध को अपने ईमान की ख़ातिर पहले ही ख़ैरबाद कह दिया था, उन्होंने अपनी ज़ाती ज़िंदगी के एक निहायत मुक़द्दस बाब का आग़ाज़ किया। उन्होंने दुनिया को महज़ इतनी इत्तिला दी कि उनकी निकाह हो गयी हैं। एक सादा सा ऐलान, जिसमें न तस्वीरों का हुजूम था, न रिसेप्शन की चमक-दमक। बस यही बात रौशन-ख़याली और तरक़्क़ी-पसंदी के कुछ ठेकेदारों को नागवार गुज़री। उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी और तिलमिलाहट पैदा हो गई, जिसका इज़हार उन्होंने अपनी फ़िक्री कंगाली के ज़रिए किया।
अचानक से ‘निजता के अधिकार’ यानी 'राइट टू प्राइवेसी' के ये अलमबरदार भूल गए कि किसी की ज़ाती ज़िंदगी में ताक-झाँक करना अख़लाक़ी तौर पर कितना गिरा हुआ काम है। वो पूछने लगे, "शादी की तस्वीरें कहाँ हैं?
हनीमून पर कहाँ गए?
शौहर के साथ कोई वीडियो क्यों नहीं?"
जबकि किस से शादी हुई, वह कौन शख्स है कुछ नही बताया गया और नही किसी को पता है। जरूरत भी नही है जानने की या उसके बारे मे सोशल मीडिया या कही भी इत्तेला करने की। बस लोग सिर्फ ज़ायेरा वसीम के ट्वीट को देखा और अपने बीमार सोच को कॉमेंट मे इस तरह से बयाँ करने लगे।
हद तो तब हो गई जब कुछ घटिया ज़ेहनियत के लोगों ने बिकिनी और सुहागरात जैसे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल करके अपनी असलियत दिखा दी। ये वही लोग हैं जो 'माई बॉडी, माई चॉइस' का नारा तब लगाते हैं जब कोई औरत अपने जिस्म की नुमाइश करना चाहे, लेकिन जब कोई औरत उसी चॉइस का इस्तेमाल करके अपने जिस्म और अपनी ज़िंदगी को पर्दे में रखना चाहे, तो इनकी आज़ादी की पूरी तस्वीर ही बदल जाती है।
ये एक अजीब फ़िक्री दोगलापन है। उनके नज़दीक औरत की आज़ादी का पैमाना उसके लिबास की लंबाई से तय होता है। जितना छोटा लिबास, उतनी 'आज़ाद' और 'खुद मुख्तार' औरत। लेकिन अगर कोई औरत अपनी मर्ज़ी से हया और पर्दे को अपनाए, तो वो फ़ौरन 'मज़लूम', 'दबी-कुचली' और 'दक़ियानूसी' क़रार दे दी जाती है। गोया औरत की आज़ादी का हक़ सिर्फ़ एक तरफ़ा है— दीनदारी से दूर जाने का हक़। अपनी तहजीब और मज़हब पर क़ायम रहने का हक़, इनकी नज़रों में कोई हक़ नहीं।
दरअस्ल, ये तिलमिलाहट महज़ एक शादी की तस्वीरों को लेकर नहीं है। ये उस गहरी इस्लाम-दुश्मनी और फिक्रि बेईमानी का इज़हार है, जो इनके अंदर भरी पड़ी है। उन्हें एक ख़ुद-मुख़्तार, पढ़ी-लिखी और अपने दीन पर चलने वाली मुस्लिम औरत बर्दाश्त नहीं होती। उनका बयानिया (नैरेटिव) ये है कि मुस्लिम औरतें हमेशा पिटी हुई, बेबस और मर्दों के ज़ुल्म का शिकार होती हैं, जिन्हें बचाने के लिए इन लिब्रान्डवो 'मसीहाओं' की ज़रूरत है। ज़ायरा वसीम अपने हर क़दम से इनके इसी मुनाफ़िक़ाना बयानिए को ज़मींदोज़ कर देती हैं। उन्होंने पहले फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़कर और अब अपनी शादी को इस सादगी और वक़ार से अंजाम देकर ये साबित कर दिया है कि एक औरत को अपनी ख़ुशी और अपनी पहचान के लिए इनके सर्टिफिकेट की कोई ज़रूरत नहीं।
ज़ायरा का ये क़दम असल में एक ताक़तवर ऐलान है। ये ऐलान है कि एक मुस्लिम औरत की इज़्ज़त और उसका वक़ार सोशल मीडिया के लाइक्स और कमेंट्स का मोहताज नहीं। उसकी ज़िंदगी की ख़ुशियाँ दुनिया के लिए नुमाइश का सामान नहीं हैं। उसने अपनी ज़िंदगी को अपनी शराइत पर, अपने रब की रज़ामंदी के लिए जीने का फ़ैसला किया है, और लिबरल तबके की यही सबसे बड़ी शिकस्त है। वो उस आईने को देखकर बौखला गए हैं, जिसमें उन्हें अपनी बदसूरत, दोहरी और पाखंडी शक्ल साफ़ नज़र आ रही है।
लिबरल्स की यह बौखलाहट असल में उनकी हार है। वो यह मानने को तैयार नहीं कि कोई औरत उनकी दी हुई 'आज़ादी' के बिना भी ख़ुश, खुदमुख्तार और अपनी मर्ज़ी की मालिक हो सकती है।







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