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Taliban Visit India: Duniya Ke Sabse Bade Dahshatgard (terrorist) ka Sabse Bade Democracy Se Dosti.

Afghan Foreign Minister Meet Indian Foreign Minister in Delhi.

India Hosts Afghan Foreign Minister Amid Regional Diplomacy Shift.
Afghan-India Diplomatic Engagement: Muttaqi Meets Jaishankar in Delhi.
Breaking: Strengthening Ties: Afghan Foreign Minister’s Visit to India.
Historic Visit: Taliban’s Foreign Minister in New Delhi.
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हैदराबाद हाउस की तस्वीर में दो मुस्कुराहटें हैं—एक ज़िम्मेदारी की, दूसरी ज़रूरत कि.
अफगान हुकूमत के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की 6 दिनों के लिए भारत आये है, जो सोशल मीडिया से लेकर नेताओ, टिप्पिनिकारो, कथित लिबरल्स, इंसानी हुकुक के नुमाइंदे सभी के लिए रौनक ए महफ़िल बने हुए है। अमिर खान मुतक़्क़ि दारुल उलुम देओबंद  भी गये थे. आखिर ऐसि क्या मजबुरि आगयि के जिसे आतंक्वदि का  सरगना कहा जाता था आज उसे सबसे बडे लोक्तंत्र  अपने यहा बुला रहा है? सबसे बडा जम्हुरियत सबसे बडे दह्शत गर्द कि मेहमान नवाजि कर रहा है?

आखिर कैसे हुई यह दोस्ती? दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादि संघठन और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच? 
यह रिश्ता क्या कहलाता है?
जिसे सेकुलर, लिबरल्स, लेफ्ट मीडिया दिन रात आतँक्वादी, दहशत फैलाने वाला, क्रूर, कट्टरपंथी, चरमपंथी, रूढ़ीवादी, शिद्दतपसंद, इंतेहापसंद, क़दामत पसंद, पुराने ख्यालो वाला, पिछड़ी सोच, अनपढ़, हजारो साल पहले वाली सोच रखने वाला कहते थे आज उनसे हाथ मिलाने और उनका इंटरव्यू लेने के लिए बेताब है। 
अगर इन लोगो का ज़मीर जिंदा होता तो ये लोग जाते ही नही उस दहशतगर्द से मिलने, क्योंके इन नामनिहाद लिबरल्स, sexist लोगो के आका य़ूरोप अमेरिका उस इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथी, डेमोक्रेसी के लिए या यूँ कहे के अपने घठिया निजाम के लिए खतरा मानते है। इसलिए यूरोप तलीबांन के खिलाफ नैरेटिव फैलाकर यह लोगो के जहन मे डाल दिया है और डाल रहा है के यह पूरी दुनिया के लिए खतरा है, तक सारी दुनिया मिलकर उसका बहिष्कार करे, जो अमेरिका के लिए नापसंद हो वह सबके लिए अछूत होना चाहिए, जो अमेरिका के लिए सबसे प्यारा हो जैसे इस्राएल वह सबके लिए अच्छा होना चाहिए। 
USA तय करेगा के कौन किस से दोस्ती करे, और उनके फंडिंग पर चलने वाले सस्था, संगठन उसके नैरेटिव को फैलाने वाले मनवाधिकार का चोला डालकर लोगो मे खुद को प्रसंगीकता बनाकर रखने वाले उसी का विरोध करते है.
इनको अगर फंडिग मिलता है और कहा जाए के इस्राएल का साथ दो तो यह बहुते सॉफ्ट हो जायेंगे, फिर कहा जायेगा के तालीबान को कबजाधारी कहो तो यह फिर अपने कथित इंसानी हुकुक और लोकतंत्र के खातिर दहशतगर्द कहेंगे। फिर उसी से मिलने के लिए, इंटरव्यू लेने के लिए इतने बेताब क्यों? 
किसी दहशत गर्द से मिलने के लिए इतनी बेचैनी? 
परेशानी, झुंझलाहट और अड़ियल रवैया इसलिए है के वह इनके विचारधारा के हिसाब से नही चलता है और बहुत ही बारीकी से इनके सिस्टम को नकार देता है। इसी को यह दबे छुपे अंदाज़ मे मनवाधिकार को मोहरा बनाकर अपना भड़ास निकालते है ताकि लोगो का समर्थन मिले और सबको यह दिखा सके के देखिये हम कितने आज़ाद ख्याल लोग है, सबके भले के लिए सोचते है मगर इनसब के पीछे इनका विचारधारा रहता है। अब सवाल यह है के यह अपने उसूलो को दुसरो पर थोपने को अपनि आज़ादी और हक समझते है तो दूसरे के पास भी तो उसूल है, अगर जवाब उसी अंदाज़ मे दिया जाये तो क्या होगा? 
मगरिबि मीडिया, खासकर ब्रिटिश भक्त सेंटर, लेफ्टिस्ट विचारधारा और नामनिहाद् इंसानियत की बात करने वाले सवघोषित उदारवादी तबका युक्रेन, इस्राएल और अफगान के बारे मे अलग अलग नज़रिया रखता है। उसके लफ़ज़ो का खेल देखिये। 
अफगानिस्तान का विदेश मंत्री नही बल्कि तालीबान का विदेश मंत्री। 
अफगानिस्तान का नेता या मंत्री न कह्कर उसे तालीबान का नेता और मंत्री लिखते है.
अफ़ग़ानिस्तान का विदेश मंत्री” के बजाय “तालिबान विदेश मंत्री/एक्टिंग मिनिस्टर” बोलकर वैधता से दूरी रखते हैं, जबकि एंगेजमेंट जारी रहता है.
अफगानिस्तान सरकार नही बल्कि तालीबान सरकार.
"तालीबान ने जब काबुल पर कबज़ा किया" इस तरह से लिखा जाता है जैसे USA नाटो सब अफगानी और वहाँ की मिट्टी से था और तालीबान विदेशी लुटेरा इसलिए उसने कबज़ा कर लिया। 
दूसरी तरफ 1948 से पहले इस्राएल का कोई वजूद नही था और दुसरो के ज़मीन को कबज़ा करके बसा हुआ है तो वह इन उदारवादी तबके के लोगो के बीच आत्मरक्षा का अधिकार रखता है, उसे कोई कबजाधारि नही कहता। 
थूक कर चाटने वाले लोग
जो कल तक भारत मे मुसलमानो से, उलेमा से बयां दिलवाते थे और सवाल करते ताकि उसे किसी तरह उसामा, मसूद अज़हर, हाफिज सैयद जैसे नाम लेकर उसे मीडिया मे दहशत गर्द बना दे,कहे के देखो इस मौलाना का तार इस आतंकवादि से जुड़ा हुआ है, न जाने कितने भारतीय मुसलमानो पर इस तरह के इलजाम लगाकर जेलो मे बंद कर दिया गया, उसे सताया गया आतंकवादि कहकर। अब उसी आंतकवादी संगठन के नेता से सरकार और सरकार के नुमाइंदे हाथ मिला रहे है, गरंमजोशी से इस्तक़बाल कर रहे है। फिर भारत मे जिन लोगो को दहशत गर्द कहकर ललकारा जाता है,
 सबको बदनाम करने के लिए मीडिया लादेन या मसूद से कोई न कोई रिश्ते जोड़ ही देता था लेकिन आज जब वही आतंकवादि आया तो यही लोग सबसे पहले हाथ मिलाने के लिए बेसब्री से कतार लगाए है, लालायित है मिलने को। 
अब यह तो साबित हो गया के कौन लादेन का रिश्तेदार है। इन्ही नामो से जोडकर उलेमा को निशाना बनाया जाता था। क्या वे सब अब माफी मांगेंगे? 
कहते है न के वक़्त और हालत पर गिरफ्त मजबूत हो तो जहर उगलने वाले भी कुछ नही कर सकते है।
नाम-निहाद "विवेकशील" और तालिबान पर दिल्ली का मातम-ए-खुशामदी  
बीस बरस तक अख़बारों के इबारतों में, टीवी चैनलों की चीख़ों में, यूरोप की संसदों और अमरीका के व्हाइट हाउस की रिपोर्टों में, एक नाम बार-बार गूंजता रहा — "आमिर मुत्तकी"। वो नाम, जिसे दहशतगर्दी का पर्याय बना दिया गया; वो चेहरा, जिसे हर फोटो के नीचे "टेरर मास्टरमाइंड" लिखकर दिखाया गया; वो शख़्स, जिसे तालिबान के लहुलहान अफ़सानों में हिस्सा मानकर हर मंच से लानत भेजी जाती रही।  
आज वही शख़्स दिल्ली में है… दिल्ली के सीने पर, हैदराबाद हाउस की मेहराबों के नीचे, मुलायम मुस्कुराहटों के बीच, फूलों और कैमरों से सजे रिसेप्शन में। और सबसे दिलचस्प नज़ारा — वही "नाम-निहाद लिबरल", वही "दहशतगर्द कहने वाली" बिरादरी, आज उसकी मौजूदगी पर ख़ामोश मुस्कान ओढ़े, चाय की चुस्कियों और राजनयिक लफ़्ज़ों के बीच क़दम से क़दम मिला रही है।  
 नैरेटिव की बदलती हवा  
कल तक जिनकी बहसों में तालिबान एक "बर्बर ख़रीदार" था, आज उनके लिए वही एक "राजनयिक मेहमान" है। कल जिनकी कलम में मुत्तकी का नाम आते ही काली स्याही उबलने लगती थी, आज वही स्याही एक मुलायम कप में बह रही है। यूरोप से लेकर NATO तक जिन गलियारों में तालिबान का नाम सुनते ही दरवाज़े बंद हो जाते थे, आज भारत के दरवाज़े उसी के लिए इतने चौड़े खुल गए हैं कि कैमरे भी हैरत में पड़ जाएँ।  
 सवाल या तंज़?  
क्या ये वो ही "मानवता के झंडाबरदार" हैं, जिन्होंने बीस साल तक तालिबान को सभ्यता का सबसे बड़ा ख़तरा बताया? क्या ये वही "सिविल सोसाइटी" है, जिसने आमिर मुत्तकी जैसे नामों को मानवता के दुश्मन के तौर पर पेश किया… और आज उसी के आगे मुस्कान के साथ सलाम पेश कर रही है?  
लिबरल साहिबान के लिए तालिबान अब वो झुलसाता सूरज नहीं, अब वो एक स्ट्रैटेजिक पार्टनर है। मीडिया के लिए अब वो “टेररिस्ट” नहीं, बल्कि “अफ़ग़ान विदेश मंत्री” है। और जनता के लिए? जनता को तो मिठी-लफ़्ज़ी ब्रीफिंग और प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यही सुनना है कि ये तो “दुनियावी रिश्तों का हिस्सा” है।  
 दिल्ली की मेज़ पर ख़ामोशी का काफ़िला  
हैदराबाद हाउस के संगमरमर पर मुत्तकी की परछाईं देख कर लगता है, बीस साल का मीडिया नैरेटिव किसी काग़ज़ के टुकड़े की तरह हवा में उड़ गया। NATO, अमेरिका, यूरोप सबके बयान यूँ बदल गए जैसे किसी ने एक बटन दबा दिया हो। और हमारे "नाम-निहाद विवेकशील" वही बटन दबाने वालों के सुर में सुर मिला रहे हैं।  
एक वक़्त था जब इन लोगों की बहसों में ये सवाल गूंजता था — "क्या तालिबान के साथ किसी भी तरह की दोस्ती इंसानियत के खिलाफ़ नहीं?" अब वही लोग ये कह रहे हैं — “ये बदलते हालात हैं, हमें अवसर का लाभ उठाना चाहिए।”  
   तर्ज़े-सियासत में लफ़्ज़ पहले बदलते हैं, नैतिकताएँ बाद में।
 राग-ए-सेकुलर, सुर-ए-मफ़ाद
कल तक “इंसानियत” का तराना पढ़ने वाले आज “प्रोटोकॉल” की तालीम देने लगे—कहते हैं रिश्ते मुल्कों के होते हैं, अफ़कार के नहीं; मगर सच ये है कि सुर वही अपनाया जाता है जिसमें मफ़ाद की ताल ठीक बैठती हो।
दिल्ली के दस्तूर ने झंडे पर ऐसी गिरह डाल दी कि न उधर का रंग दिखा न इधर का, और इस खामोशी को “डिप्लोमेसी” का हुस्न कहा गया—क्या अजीब, फैसले की आवाज़ को सलीके की चादर से ढक देना भी अब हुनर माना जाता है। 
 नैरेटिव की इस्तरी
कहते हैं देश हित पहले, बाक़ी सब बाद में—ठीक है, मगर फिर ये इक़रार भी कीजिए कि आदर्शों की दुकान अक्सर उसी वक़्त बंद हो जाती है जब रसद की गाड़ी मफ़ाद के गोदाम में पहुँचती है। 
हैदराबाद हाउस की तस्वीर में दो मुस्कुराहटें हैं—एक ज़िम्मेदारी की, दूसरी ज़रूरत कि.
राहदारियाँ कहती हैं कि कारोबार, सेहत, तिजारत पर बात होगी—भली बात है—मगर जो इबारत फ़्रेम से बाहर रह जाती है, वही असल कहानी होती है, और इस कहानी में हर किरदार अपने हिस्से की खामोशी साथ लेकर चलता है।
 डेमोक्रेसी की दुहाई
डेमोक्रेसी के दीये में जब तेल कम पड़े, तो हक़ीक़त के अंधेरे से बचने को “रीजनल स्टेबिलिटी” का नया शेड चढ़ा दिया जाता है—ना रोशनी बढ़ती है ना साया घटता है, बस तस्वीर देखने लायक हो जाती है।
इतिहास ने कई बार बताया कि हालात बदलें तो तर्ज़-ए-ताबीर भी बदल जाती है—कल जो तज़्दीद था, आज वही तमीज़ है.
“जब अमीर खान मुतक्की से भी मोहब्बत हो गयी...”अब देखिए कमाल दौर है—
कल तक जो मुतक्की को दहशत और पिछड़ेपन की मिसाल बताते थे, आज वही उनके साथ सेल्फ़ी के तलबगार हैं। जो उन्हें तालिबानी सोच का पैग़ामबर कहते थे, अब उन्हीं के लफ़्ज़ों में राजनयिक सूझ-बूझ तलाश रहे हैं।सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ स्टूडियो तक, सबके लहजे में अचानक एक नर्म एहतराम उतर आया है।
जब तालिबान से तहज़ीब सीखने लगे लिबरल...”वक़्त का मिज़ाज भी क्या अजीब चीज़ है—
 जो हर मंच पर तालिबान को अँधेरों की नुमाइंदगी कहते थे, अब वही उसके साथ नज़ाकत और मुताआदल लहज़े में बातें कर रहे हैं।अब “इंसानियत के ठेकेदार” बदलते हैं जैसे मौसम,
जहाँ कैमरा हो, वहीं उनकी ज़मीर की गर्मी लौट आती है।
जो सोचते थे तालिबान वक्त से पीछे है, अब कहते हैं कि “कूटनीति सबको सिखा सकती है।”
अजीब सियासि उल्झ्हन है सबसे बडे जम्हुरियत का दावा पेश करने वाले के लिये.
Modern सोच के झंडाबरदार, 
Liberal हक़ की मिसाल, 
Secular इंसाफ़ के तलब्गार, और
 Leftist बदलाव का नुमाइंदा... सबके चेहरे आज मुतक्की-रंग में रंगे हुए हैं।
कल तक तालिबान को “खून का सौदागर” और “सभ्यता का दुश्मन” कहने वाले, आज उसके मुस्कुराहट में अंतरराष्ट्रीय भाईचारा तलाश रहे हैं। डिबेट में जब तालिबान का नाम आता था, ये लोग आँखें तरेरकर मानवता का लेक्चर देते थे। लेकिन जैसे ही मुतक्की दिल्ली उतरे, 
वही Leftist जिनके हाथ में कल तक प्रोटेस्ट के पोस्टर थे, आज पोस्टर बदलकर प्रेस पास बना चुके हैं।
Secular  वो है जो चाटुकारिता को कूटनीति में लपेट दे,
Modern वो जो कैमरे के सामने अपनी ज़मीर को मौकापरस्ती में बदल दे,
Liberal वो है जो कल की गालियाँ,आज के सलाम में बदल दे।
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