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Zahir me Secular, liberal aur Baatin me Salebi, Sahyuni. The Hidden Crusade Behind Secularism.

Europe Israel ke Zariye Arabo ko Control karta hai? 

Zahir Me Secular, liberal aur Baatin me Salebi Sahyuni.. Musalmano ke Liye.
New European Colony in Middle East. 
The Dual Identity of Europe: Secular Facade, Salibi Core.
Modern Liberalism or Masked Crusade.. The Hidden truth.
Secular on the Surface, Crusader Within: Unmasking Hidden Ideologies.
So Called Liberal ideology behind Salebi extremism.
Understanding the Term ‘Salebi’ in Modern Discourse.
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How Liberal Narratives Echo Crusader Ideologies and Salebi thought.
Media, Academia, TV, Mainstream Digital media and the Salebi Influence.
Case Studies: Public Figures with Dual Agendas of Europe.
Secularism vs. West Double Policy and Salebi philosophy.
Historical Roots of Salebi Thought.

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क़तर की सच्चाई, इस्राइल की साजिश और अमरीका-यूरोप की दोस्ती.


अभी कल ही की तो बात है जब क़तर ने अमरीकी सद्र (राष्ट्रपति) डोनाल्ड ट्रम्प को 40 करोड़ डॉलर का तय्यारा (विमान) तोहफ़े में दिया था...

और फिर कल अमरीका के दूसरे रुख़ पर इस्राइल ने क़तर पर हमला कर दिया।

 يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ.
     (अल-माइदा 5:51)

तर्जुमा....
"ऐ ईमान वालो! यहूद (यहूदियों) और नसारी (ईसाइयों) को दोस्त न बनाओ, वो आपस में एक दूसरे के दोस्त हैं, और तुम में से जो कोई उन से दोस्ती करेगा, वो भी उन्हीं में से होगा।"

"बेशक अल्लाह ज़ालिम क़ौम को हिदायत नहीं देता।"

"क़तर की सच्चाई, इस्राइल की साजिश और अमरीका-यूरोप की दोस्ती"  

फिलिस्तीन के मौजूदा मसले पर यूरोप, अमरीका और इस्राइल की दोस्ती मौजूदा दौर की सबसे बड़ी मिसाल है कि कैसे "ज़ाहिर में सेक्युलर" और "बातिन में सलीबी" सोच हावी है। इंसाफ, इंसानियत और सेक्युलरिज्म की बातें सिर्फ नारे हैं, जब फ़ायदा इस्राइल या अपने अज़ीम मक़ासिद के हक़ में हो

आज की दुनिया में जो हम सब देख रहे हैं—क़तर के मामलात से लेकर फिलिस्तीन के हालात तक—इस सबके पीछे यूरोप, अमरीका और इस्राइल की खिचड़ी पक रही है। ऊपर से ये ताक़तें खुद को बड़ा सेक्युलर बताती हैं, मतलब कि सबके साथ बराबरी का सुलूक, इंसानियत की बातें। मगर हकीकत ये है कि इनके दिल में सलीबी (क्रूसेडर) सोच आज भी ज़िंदा है: अपने धर्म और अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जाना, दूसरों पर ज़ुल्म करना, और फिर भी मासूम बनने की एक्टिंग करना।

अभी हाल ही में अमरीकी सदर को क़तर ने अरबों डॉलर का तोहफा दिया। असल में ये कोई तोहफा-वोहफा नहीं, बल्कि अपने फायदे का सौदा था—क्योंकि अमरीका और यूरोप हमेशा उन्हीं मुल्कों का साथ देते हैं, जिनसे उन्हें मुनाफा मिलता है या फिर जिनकी मदद से इस इलाके में इस्राइल को ताक़त बनाकर रखा जा सके।

अब ज़रा फिलिस्तीन का हाल देखिए। पिछले एक साल में ग़ाज़ा और बाकी फिलिस्तीनी इलाकों पर जिस तरह इस्राइल ने तबाही मचाई, उसका हाल यूनाइटेड नेशन्स ने भी "जनसंहार" (genocide) कहकर दुनिया के सामने पेश किया। हज़ारों बेगुनाह मारे गए, घर उजड़ गए, बच्चे, औरतें सब तबाह हो गए। मगर यूरोप और अमरीका ने या तो खुलकर इस्राइल का साथ दिया या फिर कुछ ना बोलकर आंखें मूंद लीं।


 अरबों से धोखा, इस्राइल से यारी: "हिफ़ाज़त" के पर्दे में छुपी हक़ीक़त

आज की दुनिया में जब हम अरब मुल्कों की तबाही, ख़ासकर फ़िलिस्तीन के ज़ुल्म-ओ-सितम को देखते हैं, तो एक सवाल ज़ेहन में आता है: आख़िर अरबों के वो "दोस्त" और "हमदर्द" कहाँ हैं जो उनकी हिफ़ाज़त का दावा करते थे? 
हक़ीक़त ये है कि अमरीका, यूरोप और यहाँ तक कि कुछ अरब हुकूमतों ने भी "ज़ाहिर में सेक्युलर और बातिन में सलीबी" (यानी दिखावे के लिए इंसानियत और दिल में अपने मफ़ाद) वाली पॉलिसी अपना रखी है। ये एक ऐसी गहरी साज़िश है जिसकी जड़ें तारीख़ में बहुत दूर तक फैली हैं।

 शाह फ़ैसल का क़त्ल: एक अज़ीम अरब रहनुमा का ख़ात्मा.

तारीख़ का एक अहम मोड़ सऊदी शाह फ़ैसल बिन अब्दुलअज़ीज़ का क़त्ल था, जिन्हें 25 मार्च 1975 को उन्हीं के भतीजे ने गोली मारकर शहीद कर दिया। शाह फ़ैसल सिर्फ़ एक बादशाह नहीं थे, बल्कि वो अरब और इस्लामी दुनिया की इत्तेहद की एक मज़बूत आवाज़ थे। उन्होंने 1973 की अरब-इस्राइल जंग में पश्चिमी मुल्कों को तेल देना बंद करके पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। उनका मक़सद साफ़ था: जब तक फ़िलिस्तीन को उसका हक़ नहीं मिलता, तेल की दौलत का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जाएगा।

शाह फ़ैसल की ये हिम्मत और फ़िलिस्तीन से उनकी मुहब्बत अमरीका और इस्राइल को एक आँख नहीं भाती थी। उनका क़त्ल महज़ एक घरेलू झगड़ा नहीं था, बल्कि ये उस अरब लीडरशिप को ख़त्म करने की साज़िश का हिस्सा था जो पश्चिमी ताक़तों के सामने झुकने को तैयार नहीं थी। उनकी मौत के बाद सऊदी अरब और बाक़ी अरब दुनिया की पॉलिसी में वो हिम्मत फिर कभी नज़र नहीं आई।

 अरबों के साथ तारीख़ी धोखे

अरबों के साथ धोखे की कहानी बहुत पुरानी है। पहली जंगे-अज़ीम (World War I) में अंग्रेज़ों ने अरबों से वादा किया कि अगर वो उस्मानी सल्तनत (Ottoman Empire) के ख़िलाफ़ बग़ावत करें तो उन्हें एक आज़ाद अरब मुल्क दिया जाएगा। अरबों ने बग़ावत की, लेकिन जंग के बाद अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने आपस में Sykes-Picot Agreement करके अरब सरज़मीन को बंदरबाँट कर लिया और इस्राइल की बुनियाद रखने का रास्ता साफ़ कर दिया। ये अरबों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था।

ये धोखे का सिलसिला आज भी जारी है। आज जब ग़ज़ा पर ज़ुल्म हो रहा है, तो सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन जैसे मुल्क इस्राइल के लिए ज़मीनी रास्ता खोलकर उसकी मदद कर रहे हैं ताकि यमन के हूती बाग़ियों की तरफ़ से की गई समंदरी नाकेबंदी को नाकाम किया जा सके। वो फ़िलिस्तीनियों की मदद करने के बजाय इस्राइल की तिजारत को आसान बना रहे हैं। ये अरबों के नाम पर अरबों से सबसे बड़ी ग़द्दारी है।

इस्राइल से पोशीदा दोस्ती और "अरबों की हिफ़ाज़त" का ढोंग

सबसे बड़ा ढोंग ये है कि अमरीका और कुछ अरब हुकूमतें ईरान का डर दिखाकर इस्राइल के साथ ख़ुफ़िया दोस्ती कर रही हैं। उनका दावा है कि ये सब अरबों को ईरान के ख़तरे से बचाने के लिए है। सऊदी अरब और इस्राइल के बीच दशकों से ख़ुफ़िया ताल्लुक़ात हैं। 1960 की दहाई में यमन की जंग से लेकर ईरान के ख़िलाफ़ आज की जासूसी तक, ये दोनों मुल्क पर्दे के पीछे एक दूसरे के साथ हैं.

अमरीका का किरदार तो और भी मुनाफ़िक़ाना है। वो अरबों को अरबों खरबों डॉलर के हथियार बेचता है और कहता है कि ये तुम्हारी हिफ़ाज़त के लिए है, लेकिन हक़ीक़त में वो सिर्फ़ इस्राइल की सलामती और इस ख़ित्ते में अपनी दादागिरी चाहता है। जब भी अरबों और इस्राइल में जंग हुई, अमरीका हमेशा इस्राइल के साथ खड़ा रहा।

आज सऊदी अरब और इस्राइल के बीच "सदी की डील" की तैयारी हो रही है, जिसमें फ़िलिस्तीन के हक़ूक़ को नज़रअंदाज़ करके इस्राइल को तस्लीम करने की बात चल रही है। ये सब "हिफ़ाज़त" और "तरक़्क़ी" के नाम पर हो रहा है, लेकिन असल मक़सद सिर्फ़ फ़िलिस्तीनी कॉज़ को दफ़न करना है।

तारीख़ गवाह है कि जब-जब अरबों ने बाहरी ताक़तों या अपने ही ग़द्दार रहनुमाओं पर भरोसा किया, उन्हें सिर्फ़ धोखा मिला। शाह फ़ैसल जैसे लीडर को रास्ते से हटा दिया गया क्योंकि वो बिकने को तैयार नहीं थे। आज अरब दुनिया उसी दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ़ फ़िलिस्तीन के मजलूम भाई हैं और दूसरी तरफ़ इस्राइल और अमरीका की दोस्ती का लालच। ये "ज़ाहिर में सेक्युलर और बातिन में सलीबी" ताक़तें कभी भी अरबों की सच्ची दोस्त नहीं हो सकतीं, क्योंकि उनका मक़सद सिर्फ़ अपने मफ़ादात हासिल करना है, चाहे उसके लिए कितने ही बेगुनाहों का ख़ून क्यों न बहे।


यही है "ज़ाहिर में सेक्युलर, बातिन में सलीबी" वाली हकीकत! ऊपर से ये लोक तंत्र और इंसानियत के ठेकेदार, लेकिन जब बात हक़ और इंसाफ़ की आती है, तो इसका सबसे बुरा हाल मुसलमानों को झेलना पड़ता है—कभी इराक, कभी अफ़ग़ानिस्तान, कभी फिलिस्तीन!

कुरान पाक में अल्लाह भी यही इरशाद फरमाता है (मायना):  
"मुसलमानों! यहूदी और ईसाइयों को दोस्त ना बनाओ, ये बस एक-दूसरे के दोस्त हैं और जो इनमें से किसी से दोस्ती करेगा, वो उन्हीं में से हो जाएगा।" (सूरा मायिदा, आयत 51)

आज की दुनिया में यही बात बिल्कुल सच बैठती है—यूरोप, अमरीका, इस्राइल आपस में गहरे दोस्त हैं और मिलकर मुसलमानों के खिलाफ़ चालें चलते रहते हैं। लेकिन याद रखिए, अल्लाह सब से बड़ा है और ज़ुल्म करने वालों का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता।

इसी लिए, हम सब को चाहिए कि हकीकत को समझें, किसी के धोखे में न आएं, और जहां जो दोस्ती छुपी हुई हो, उसे पहचानें। हो सकता है दुनिया के सामने वो बहुत सेक्युलर और इंसानी हमदर्दी दिखाएं, मगर उनके दिल में सलीबी सोच अब भी ज़िंदा है।

दुआ है कि अल्लाह फिलिस्तीन और दुनिया के तमाम मज़लूमों की मदद फरमाए और जालिम ताक़तों को उनके ज़ुल्म के अंजाम तक पहुंचाए।


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