अरब दुनिया की सियासी नाकामी और इसराईल की धौंस
Israel’s Escalating Terror from Gaza to Doha....Step by step, Israel is dragging the whole region into flames. This isn’t defence. This is open terrorism.
First, they bombed Gaza called it “self-defence.”
Then they hit Lebanon blamed “Hezbollah terrorists.”
Then Syria. Then Iran.
And now… Qatar.
Palestine (Filisteen) Arab Me Kab Se Aabad hai?
Kya Arab League Ummat-E-Muslema ke liye hai to Israel ke khilaf Vote kyu nahi kiya?
अरबो ने जब जब अमेरिका पर ज्यादा भरोसा किया, उसके साथ कोई समझौता किया तब तब इस्राएल ने अमेरिका की मदद से अरब मुमालिक पर हमला किया है।
अमेरिका की कठपुतली अरब, इस्राएल का धौंस कब तक बर्दास्त करेगा?
यहूद ओ नसारा एक साथ
फिलिस्तीन को किसका साथ?
अगर हम अरब दुनिया का मौजूदा हाल देखें, तो एक बहुत ही कड़वी हकीकत सामने आती है। इसराईल बार–बार अरब मुल्कों के आसमान में दाख़िल होकर बम गिराता है, हवाई हमले करता है, और खुलेआम धमकियाँ देता है। कभी वह सीरिया पर हमला करता है, कभी ग़ज़्ज़ा को मलबा बना देता है, कभी लेबनान को निशाना बनाता है। हाल ही में तो उसने क़तर और दूसरे खाड़ी देशों के क़रीब भी अपनी फौजी ताक़त का प्रदर्शन किया, ताकि अरब दुनिया को साफ़ पैग़ाम मिले –
"तुम्हारी ऊँची इमारतें और तेल के कुएँ हमें नहीं रोक सकते।"
यह धमकियाँ और हमले कोई एक–दो बार नहीं हुए, बल्कि पिछले पचास सालों में दर्जनों बार अरब दुनिया इस तज़ील (बेइज़्ज़ती) का शिकार हो चुकी है। मगर क्या अरब मुल्कों ने मिलकर कभी कोई मज़बूत फ़ौजी इत्तेहाद (मिलिट्री एलायंस) बनाया? नहीं!
क्या अरब मुल्कों ने कभी अमरीका और यूरोप से हटकर अपनी रिसर्च, टेक्नोलॉजी और हथियारसाज़ी की सोच अपनाई? नहीं!
असल में अरब हुक्काम की सबसे बड़ी नाकामी यही रही है कि उन्होंने अपनी सल्तनत बचाने के लिए हमेशा अमरीका की चापलूसी की। अरब मुल्क अरब लीग की मीटिंग में "उम्मत की एकता" के बड़े–बड़े दावे करते हैं, मगर जब अमरीका या इसराईल का दबाव आता है, तो वही हुक्काम चुप्पी साध लेते हैं। किसी की हिम्मत नहीं कि इसराईल को दो–टूक जवाब दे।
दुनिया गवाह है कि अरब मुल्कों के पास दौलत बहुत है – तेल, गैस और सोने की खानें तक। लेकिन "दौलत" कभी भी "ताक़त" नहीं बनती, जब तक कि वह इल्म, टेक्नोलॉजी और मिलिट्री पावर में तब्दील न हो। अमरीका ने अरब दुनिया की इसी कमजोरी को पकड़ लिया। अरब मुल्कों की हुकूमतें यह समझती रहीं कि "अगर हम अमरीका के वफ़ादार रहेंगे तो हमारी सल्तनतें बची रहेंगी।" लेकिन यह हक़ीक़त भूल गईं कि जो कौमें अपनी हिफ़ाज़त खुद नहीं कर सकतीं, उन्हें दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती।
आज इसराईल अरब दुनिया को सिर्फ़ "डराने" के लिए बम गिराता है। उसे मालूम है कि अरब मुल्क जवाब देने की हिम्मत नहीं रखते। वह सिर्फ़ UN में शिकायत करते हैं, या बयान जारी करते हैं। और बयान कभी भी मिसाइल का जवाब नहीं हो सकता।
कब कब अरबों को यूरोप और अमरीका से धोखा मिला, इसराईल ने किस तरह अरबों पर क़ब्ज़ा किया, और अमरीका ने कैसे हमेशा अरबों की जगह इसराईल का साथ दिया।
अरब मुल्कों को बार–बार धोखा – तारीख़ की गवाही
1. 1916 – साइक्स–पिको समझौता (Sykes–Picot Agreement)
पहला बड़ा धोखा अरबों को यूरोप से मिला।
पहली जंग-ए-अज़ीम (World War I) के दौरान अंग्रेज़ और फ़्रांस ने अरबों से वादा किया कि अगर वे उस्मानी ख़िलाफ़त के खिलाफ बगावत करेंगे तो उन्हें आज़ादी दी जाएगी। लेकिन जंग के बाद गुप्त साइक्स–पिको समझौते के तहत अरब इलाक़ों को अंग्रेज़ और फ़्रांस ने आपस में बाँट लिया।
👉 अरब आज़ादी की जगह गुलामी में चले गए।
2. 1948 – इसराईल का क़याम
दूसरा बड़ा धोखा अमरीका और यूरोप ने अरबों के साथ किया।
अमरीका ने अरब हुक्काम को यक़ीन दिलाया कि "यहूदी सिर्फ़ छोटे से इलाक़े में बसेंगे, तुम्हारी जमीन सुरक्षित रहेगी।" लेकिन 1948 में इसराईल के क़याम के बाद अरबों की नाक के नीचे से फ़लस्तीन छीन लिया गया।
👉 अरब मुल्क बयान देते रहे, अमरीका और यूरोप ने इसराईल को खुला समर्थन दिया।
3. 1967 – छः दिन की जंग (Six-Day War)
तीसरा धोखा अमरीका ने इसराईल के साथ खड़े होकर दिया।
छः दिन की जंग में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन ने इसराईल पर हमला किया। अरबों ने सोचा था कि अमरीका तटस्थ रहेगा, मगर अमरीका ने खुफ़िया जानकारी, हथियार और फौजी मदद इसराईल को दी।
नतीजा: सिर्फ़ 6 दिन में अरबों की फौजें शिकस्त खा गईं, और इसराईल ने यरूशलम, गोलान हाइट्स, वेस्ट बैंक और ग़ज़्ज़ा पर क़ब्ज़ा कर लिया।
4. 1973 – यौम-ए-क़िप्पूर जंग (Yom Kippur War)
मिस्र और सीरिया ने अचानक हमला कर के इसराईल को भारी नुक़सान पहुँचाया। मगर अमरीका खुलकर इसराईल की मदद को आ गया। अरब मुल्क तेल की दौलत पर घमंड कर रहे थे, मगर उनके पास तकनीकी फौजी ताक़त नहीं थी।
नतीजा: अरब मुल्क फिर हार गए, और इसराईल और भी ताक़तवर हो गया।
5. 1990 – खाड़ी जंग (Gulf War)
कुवैत पर सद्दाम हुसैन के क़ब्ज़े के बाद अरब मुल्कों ने अमरीका से मदद माँगी। अमरीका अरबों के मुल्क बचाने आया, मगर उसी बहाने अरबों की फौजों और अर्थव्यवस्था पर पकड़ बना ली।
👉 अरब मुल्कों ने अमरीका पर भरोसा किया, मगर उसी भरोसे ने उन्हें और कमज़ोर कर दिया।
6. 2000 से अब तक – ग़ज़्ज़ा और अरब खाड़ी
हर बार जब इसराईल ने ग़ज़्ज़ा या लेबनान पर हमला किया, अमरीका ने अरबों को "सब्र और अमन" की नसीहत दी। अरब हुक्काम अमरीका की हाँ में हाँ मिलाते रहे, मगर इसराईल ने अपने हमले और मज़बूत कर लिए।
अरबों की नाकामी और अमरीका की चापलूसी
अरब मुल्क अरब लीग की मीटिंग में "उम्मत की एकता" के बड़े–बड़े दावे करते हैं, मगर जब अमरीका या इसराईल का दबाव आता है, तो वही हुक्काम चुप्पी साध लेते हैं।
कोई मुल्क अमरीका की चापलूसी करता है ताकि उसकी हुकूमत बची रहे।
कोई मुल्क इसराईल के साथ समझौते करता है ताकि तख़्ता न उलट दिया जाए।
👉 लेकिन याद रखिए – जो क़ौमें अपनी हिफ़ाज़त खुद नहीं कर सकतीं, उन्हें दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती।
नतीजा और सबक़
तारीख़ हमें बताती है कि –
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अरब मुल्कों ने जब भी यूरोप और अमरीका पर भरोसा किया, उन्हें धोखा मिला।
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इसराईल ने हर बार अमरीका और यूरोप की मदद से अरब मुल्कों की जमीन छीनी।
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अरबों ने तेल और ऊँची इमारतों पर फख्र किया, मगर कभी मज़बूत फौज और साइंस पर निवेश नहीं किया।
👉 और यही वजह है कि आज भी इसराईल अरब मुल्कों को धमकाता है, और अमरीका हर बार इसराईल का साथ देता है।







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