Does Qatar, Jordan, UAE, Saudi Arabs Air Defense System activate only against Iran for Protecting Israel?
US Betrayal of Arabs: Israel Attacks Qatar and When America Refused to Defend Arab Nations?
US Betrayal of Arabs: Israel Attacks Without American Help........Why Arab Defense Systems Stay Silent?
America’s Role in Protecting Israel, Spying Iran, Genocide Gaza and attack on Qatar.
Double Standards of Europe,NATO,UK,USA Policies.
Key Moments When America Help Israel to Attack Arabs.
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1948 War: US Recognized Israel
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1967 Six-Day War: No Arab Support
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1973 Yom Kippur War: US Armed Israel
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1982 Lebanon War: Arab Suffering Ignored
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2006 & 2014 Gaza Genocide: US Backed Israel
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2023–2025: Israel Strikes Qatar, Syria.
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"क्या क़तर, जोरदन और दूसरे अरब मुमालिक् अपने डिफ़ेंस सिस्टम को ईरान के खिलाफ इस्राएल की दीफ़ा के लिए तैयार रखते है?
" क्या अमेरिकि फौज अरब देशो मे अरब मुल्को की हीफाजत के लिए है? या इस्राएल की हीफाजत् के लिए,? अरबो को बगैर फौज के कमजोर बनाकर रखने और ईरान कि जासूसी, निगरानि करने के लिए?
ईरान के मिसाइल को जोरदन , क़तर, UAE और सऊदी अरब मार गिरात है, लेकिन इस्राएल के बोम्बारी से खुद की हीफाज़त नही कर पाता है क़तर?
अमेरिका मध्य पूर्व मे इस्राएल की हीफाजत के लिए है। कब कब ईरान के मिसाइल को इस्राएल की मदद के लिए इंटरसेपट किया है? अरबो की इस्राएल का ईरान के खिलाफ साथ देना और इस्राएल का कतर पर हमला करना... क्या साबित करता है?
क्या इस्राएल की हीफाजत के लिये, इरान के खिलाफ अरब अपने डेफ़ेंस सिस्टम (हिफजति निजाम) एक्टिव रखते है?
ईन सवालो का जवाब कब कैसे और किससे मिलेगा?
अरब डिफ़ेंस सिस्टम: ईरान के खिलाफ या इस्राएल की हिफ़ाज़त के लिए?
अरब दुनिया में अक्सर ये तसव्वुर पेश किया जाता है कि अमेरिका और यूरोपीय ताक़तें अरब ममालिक की सुरक्षा और हिफ़ाज़त के लिए मौजूद हैं। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो असल मक़सद साफ़ नज़र आता है कि अमेरिका और उसके गठबंधन (NATO, CENTCOM वग़ैरह) की मौजूदगी दरअसल इस्राएल के दिफ़ा और ईरान पर निगरानी के लिए है, न कि अरब देशों की हिफ़ाज़त के लिए। हकीकत ये है कि अरब डिफ़ेंस सिस्टम एक दोहरी पॉलिसी पर काम कर रहे हैं—ईरान की निगरानी और इस्राईल के साथ स्ट्रैटेजिक तआवुन। ये जदीद हिफाज़ती निज़ाम सिर्फ जंग से बचाव नहीं, बल्कि सियासी और जियोपॉलिटिकल मक़ासिद भी पूरे कर रहे हैं।
अब्राहम मुआहिदे के बाद इस्राईल और कई अरब ममालिक के दरमियान ताल्लुकात बेहतर हुए हैं। इससे ये सवाल उठता है कि क्या ये डिफ़ेंस सिस्टम इस्राईल की हिफाज़त में भी इस्तेमाल हो रहे हैं, ख़ासकर ईरान के हमलों के जवाब में? आज अरब ममालिक के डिफ़ेंस सिस्टम दो अहम मक़ासिद के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं: एक तरफ ईरान की निगरानी, और दूसरी तरफ इस्राईल की हिफाज़त में. मगर क़तर का क्या?
डिफ़ेंस सिस्टम किसके लिए तैनात है?
इन ठिकानों पर पैट्रियट मिसाइल सिस्टम, THAAD और राडार सिस्टम लगाए गए हैं।
दिखाने के लिए कहा जाता है कि ये अरब मुल्कों को ईरानी ख़तरे से बचाने के लिए हैं।
मगर हक़ीक़त यह है कि इन सिस्टमों का दायरा और ऑपरेशन सीधे तौर पर इस्राएल की हिफ़ाज़त और ईरान की जासूसी के लिए इस्तेमाल होता है।
ईरान के मिसाइल में अरब और इस्राएल का फर्क...
ईरान से आने वाले मिसाइल हमलों को कई बार अरब मुल्कों (खासकर सऊदी और यूएई) ने इंटरसेप्ट किया। इरान क दुश्ममनइस्रएल है. इस्रएल इरान पर हम्ला करता है .अपनि हिफजत के लिये इरान जवाब देता है, फिर इस्राएल कि मदद के लिये अरब मुल्क आते है और इरान के हमले को नाकाम कर देते है, इस्राएल जब क़तर पर बोम्बारि किया तब क़तर और दुसरे अरब ने इस्रएल के हम्ले को नकाम क्यो नही किया? जब इस्राएल की तरफ से ग़ज़ा, लेबनान या यहां तक कि क़तर और सीरिया पर हमले हुए, तो इन अरब सिस्टमों ने खामोशी अख़्तियार की।
अमेरिका की मौजूदगी: किसके लिए?
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अगर अमेरिका वाकयि अरबों की हिफ़ाज़त के लिए होता, तो इस्राएल के हमलों को भी रोकता।
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मगर इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने कभी भी अरबों को इस्राएल की बमबारी से नहीं बचाया।
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अमेरिका के बेस दरअसल तीन कामों के लिए हैं:
इस्राएल की हिफ़ाज़त – ईरान या उसके हामियों से इस्राएल तक पहुँचने से पहले हमलों को रोकना। अरबो को फ्लिसितिन के बारे मे ध्यान भत्काना और अरबो को कम्जोर बनाकर रखना. अरब कि हिफजत नहि बलकि इस्रएल कि अरबो से हिफाजत.
अरबों को फौजी तौर पर कमजोर रखना – ताकि वे अपनी आज़ादाना पॉलिसी न चला सकें। खुद् मुखतारि के लिये अपनी फौज सब्से जरुरि है, अभी क़तर के पास माल व दौलत होते हुए भि इस्रएल के हम्ले को रोक नहि सका, बल्कि जवाब नही दे सक्ता, क्युंके उसके पास अपनी फौज नही है.
ईरान की निगरानी और जासूसी – अरब ज़मीनों को ईरान के खिलाफ "फॉरवर्ड बेस" बनाना।
अमेरिका के पास मध्य पूर्व में 29 से ज़्यादा सैन्य अड्डे हैं, जिनमें क़तर का अल-उदीद एयरबेस, सऊदी अरब का प्रिंस सुल्तान एयरबेस, और यूएई का अल-धफरा एयरबेस शामिल हैं.
अरब सिस्टम क्यों खामोश रहते हैं?
ये सिस्टम अमेरिकी अफ़सरों और टेक्नीशियनों के कंट्रोल में रहते हैं, जो सिर्फ़ तब इस्तेमाल होते हैं जब "इस्राएल की सुरक्षा" खतरे में आती है।
इसकी वजह यह है कि ये सिस्टम अरब सरकारों के "कंट्रोल" में पूरी तरह नहीं हैं।
तारीख़ी मिसालें
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2019: सऊदी अरब पर अरामको के तेल ठिकानों पर मिसाइल हमला हुआ। अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम मौजूद था, लेकिन काम नहीं आया। अमेरिका हर साल अरब देशों में मौजूद अपने बेसों के बावजूद इस्राएल को $3.8 बिलियन से ज़्यादा की सैन्य मदद देता है, जिसमें आयरन डोम जैसे डिफ़ेंस सिस्टम भी शामिल हैं.
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2021-2023: यमन से आए मिसाइल कई बार सऊदी और यूएई ने गिराए, लेकिन वही सिस्टम ग़ज़ा पर इस्राएल के हमलों के वक़्त खामोश रहा। अमेरिका दशकों से इस्राएल को अपना सबसे करीबी सहयोगी मानता है। 1948 में इस्राएल की स्थापना से लेकर आज तक, अमेरिका ने उसे सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन दिया है
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2024-2025: ईरान से आने वाले ड्रोन और मिसाइल इंटरसेप्ट करने में जॉर्डन और यूएई ने इस्राएल की मदद की। लेकिन उसी दौरान इस्राएल ने क़तर और सीरिया में बमबारी की, किसी अरब सिस्टम ने उसे रोकने की कोशिश तक नहीं की। जब इस्राएल हमले करता है—चाहे वह ग़ज़ा हो, लेबनान या सीरिया, क़तर—तो अक्सर देखा गया है कि अमेरिका की अरब देशों में मौजूद फौज हस्तक्षेप नहीं करती। इसके पीछे कई अहम वजहें हैं:
अरबों को बार-बार यही तजुर्बा हुआ कि जब मामला इस्राएल और उनकी जंग का होता है, तो अमेरिका ने कभी उनका साथ नहीं दिया। उल्टा हमेशा इस्राएल की मदद की. जब अरब मुल्क इस्राएल के हमलों का शिकार हुए, लेकिन अमेरिका ने उन्हें मदद नहीं दी —
अरबों को अमेरिका से धोखे ..
1948 – अरब-इस्राएल जंग (पहली अरब जंग)
अमेरिका ने अरबों की मदद नहीं की, बल्कि इस्राएल को पहचान कर लिया और उसे डिप्लोमैटिक व असलहा सपोर्ट दिया।
अरब हार गए और फ़िलिस्तीन का बड़ा हिस्सा इस्राएल के कब्ज़े में चला गया।
1967 – छह रोज़ा जंग
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इस्राएल ने अचानक मिस्र, सीरिया और जॉर्डन पर हमला किया।
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अमेरिका ने अरबों की कोई मदद नहीं की, बल्कि इस्राएल को इंटेलिजेंस और असलहा मुहैया कराया।
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नतीजा: मिस्र से सिनाई, सीरिया से गोलान हाइट्स और जॉर्डन से बैतुल मुक़द्दस इस्राएल ने छीन लिया।
973 – यौम-किप्पुर जंग (अरब-इस्राएल जंग)
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मिस्र और सीरिया ने इस्राएल के कब्ज़े वाले इलाक़े वापस लेने की कोशिश की।
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शुरुआत में अरबों को कामयाबी मिली, लेकिन अमेरिका ने इस्राएल को बड़े पैमाने पर असलहा, फौजी सामान और सीधा हवाई सप्लाई दी।
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अरबों को अमेरिका की तरफ़ से मदद नहीं, बल्कि धोखा मिला।
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नतीजा: इस्राएल ने जंग का रुख़ पलट दिया और अरबों की कामयाबी अधूरी रह गई।
1982 – इस्राएल का लेबनान पर हमला
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इस्राएल ने बेरूत पर बमबारी की और हिज़्बुल्लाह के उभार को रोकने के लिए हमला किया।
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अमेरिका ने अरब मुल्कों की कोई मदद नहीं की।
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बल्कि अमेरिका ने इस्राएल की राजनीतिक हिफ़ाज़त की और अरब पनाहगुज़ीनों के नरसंहार (सबरा और शतीला) पर खामोश रहा।
2006 – इस्राएल बनाम लेबनान (हिज़्बुल्लाह जंग)
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इस्राएल ने लेबनान पर 34 दिन तक हमला किया।
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अमेरिका और यूरोप ने अरब मुल्कों को न तो डिफ़ेंस सपोर्ट दिया और न ही इस्राएल को रोका।
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अरब मुल्क अकेले रहे, बल्कि कुछ खाड़ी मुल्कों ने परोक्ष तौर पर इस्राएल की पॉलिसी को सपोर्ट किया। (मरता क्या न करता)
2008, 2012, 2014 – ग़ज़ा पर इस्राएली जंगें
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इस्राएल ने ग़ज़ा पर बमबारी की, हज़ारों फ़िलिस्तीनी शहीद हुए।
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अरब मुल्कों को अमेरिका से कोई मदद नहीं मिली, बल्कि अमेरिका ने UNO में इस्राएल के ख़िलाफ़ हर क़रारदाद को वीटो किया। (ब्रिटेन ने इस्रएल को पैदा किया अमेरिका ने उसे जवान किया)
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अरब सिर्फ़ बयानबाज़ी तक सीमित रहे।
2021 – ग़ज़ा क़तल ए आम (11 रोज़ा जंग)
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ग़ज़ा पर इस्राएल का हमला, सैकड़ों शहीद।
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अरब मुल्कों के पास एडवांस डिफ़ेंस सिस्टम मौजूद थे (यूएई, सऊदी, क़तर, जॉर्डन), लेकिन उन्होंने न फ़िलिस्तीनियों की मदद की और न इस्राएल को रोका।
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अमेरिका ने इस्राएल को कथित "आत्मरक्षा का हक़" कहकर खुला सपोर्ट दिया।
2023 – ग़ज़ा नस्ल कुशि
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ग़ज़ा तबाह हो गया, हज़ारों फ़िलिस्तीनी शहीद हुए।
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अरब मुल्क खामोश, अमेरिका ने सिर्फ़ इस्राएल की मदद की।
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यहां तक कि अरब सरज़मीन (जॉर्डन और क़तर) से अमेरिकी सिस्टम ने ईरानी और हिज़्बुल्लाह के ड्रोन इस्राएल की हिफ़ाज़त के लिए गिराए, लेकिन इस्राएल की बमबारी से अरबों को नहीं बचाया। फिलिस्तिनियो का नसल कुशि जारी है अभि तक.
2025 – इस्राएल का क़तर और सीरिया पर हमला
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इस्राएल ने सीधे तौर पर क़तर और सीरिया में टार्गेट्स पर हमला किया।
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अमेरिका और अरबों के पास डिफ़ेंस सिस्टम मौजूद था, लेकिन किसी ने इस्राएली बमबारी इंटरसेप्ट नहीं की।
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इससे साफ़ हुआ कि अमेरिकी और अरब डिफ़ेंस सिस्टम सिर्फ़ इस्राएल की सुरक्षा के लिए ऐक्टिव हैं, इरान कि जासुसि - निगरानि करने के लिये है, न कि अरब मुल्कों की।
रणनीतिक तटस्थता: अमेरिका अपने फौजी बेस को सीधे इस्राएल के हमलों से जोड़ने से बचता है ताकि वह क्षेत्रीय युद्ध में न उलझे।
कूटनीतिक संतुलन: अमेरिका चाहता है कि अरब देशों से उसके संबंध बने रहें, लेकिन वह इस्राएल की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, रहेगा. अरब देशों में मौजूद अमेरिकी फौज का मक़सद आमतौर पर ईरान के खिलाफ निगरानी और जवाबी कार्रवाई होता है—not to intervene in Israel’s offensives.
अमेरिका की फौज अरब देशों में मौजूद होते हुए भी इस्राएल के हमलों से उन्हें नहीं बचाती, क्योंकि उसकी रणनीति इस्राएल की हिफाज़त को प्राथमिकता देती है.
असल सच्चाई यह है कि अरब मुल्कों के डिफ़ेंस सिस्टम और वहां मौजूद अमेरिकी फौजें अरबों की हिफ़ाज़त के लिए नहीं बल्कि इस्राएल की सुरक्षा और ईरान की निगरानी के लिए हैं।
यही वजह है कि जब इस्राएल अरब सरज़मीन पर हमला करता है, अमेरिका और अरबों के डिफ़ेंस सिस्टम खामोश रहते हैं। अरब मुल्क अपने पैरों पर खड़े होने की बजाय अमेरिका और इस्राएल की पालिसी के बंधक बने हुए हैं।
अगर अमेरिका वाक़ई क़तर या किसी और अरब देश की हिफाजत के लिए होता, तो इस्राएल की बमबारी को रोकता। लेकिन उसकी खामोशी इस बात का सबूत है कि अरबों के लिए तैनात सिस्टम दरअसल इस्राएल की ढाल हैं, न कि अरबों की हिफ़ाज़त। अरब एक अपाहिज मुल्क है जिसे अमेरिका कि बैसखि कि जरुरत है, सह्युनि चाहते है के अरब हमेशा उस्के मोह्ताज रहे जिससे इस्रएल को खतरा न हो, उसे जब मन करे जिस देश मे हमले करके अपना मनोरंजन करे.
अरबों को हमेशा अमेरिका से धोखा ही मिला:
जब भी इस्राएल ने हमला किया, अमेरिका ने उन्हें न मदद दी, न बचाया। इसके बरक्स, अमेरिका ने हमेशा इस्राएल को असलहा, इंटेलिजेंस और डिप्लोमैटिक मदद कि फिलिस्तिनियो का नस्ल कुशि करने के लिए, अरबो पर हमले करने के लिये. ताकि इस्राएल से सब कोइ डरा रहे, उसकि जिद माने, कुछ भि कहे इंकार न करे. अरब मुल्क अपने डिफ़ेंस सिस्टम के बावजूद इस्राएल की बमबारी से महफ़ूज़ नहीं हुए क्युंके अरबो कि लाठि अमेरिका है, उस्के बगैर वे चल भि नही सकते एक कदम. अगर अरब अपने फैसले खुद करने लग जाये तो अमेरिका (USA+NATO+EU+UK) उनकि अपाहिज बाद्शहत को गिरा देगा, वे सब युरोप के प्रोप्गंदे मे मारे जायेंगे इस्लिये अरब हुकम्रानो कि अपनि मजबुरी है, या तो वे तख्त व ताज चुने या अपनी मौत. यह सारे फैसले अमेरिका - युरोप करता है.
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