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Qatar Ne Trump ko Boing-747 Planes tohfe me diya tha... badle me America ne Israel ke Zariye Doha par Bomb bheja.

Qatar gifted Boeing-747 8 planes to Trump; in return, America sent bombs via Israel to Doha—exposing Western double standards.

क़तर का तोहफ़ा और अमेरिका का जवाब: इज़राइली हमले से पर्दा उठता है.


कतर अपने डबल गेम पॉलिसी की वजह से इस्राएल पर जवाबी करवाई नही कर सकता। 
अरब मे बहुत तेजी से सियासी खेल बदल रहा है। 
अमेरिका की मंजूरी पर इस्राएल दहशतगर्द ने दोहा पर बोम्बारी की, जो इलाके मे कतर की खुदमुखतारी की खुली खिलाफवर्जी है जो खित्ते मे मजिद सुरतेहाल बिगार सकती है। यह उस नामनिहाद् कॉमन वेल्थ, जम्हूरियत, इंसानिहुकुक, कानून का पाबंद और आलमी कानून UN का डबल पॉलिसी की मिशाल है जो यूरोप सारी दुनिया को दर्स देता आया है। 
अरबो ने जब जब अमेरिका पर ज्यादा भरोसा किया, उसके साथ कोई समझौता किया तब तब इस्राएल ने अमेरिका की मदद से अरब मुमालिक पर हमला किया है। 
क़तर ने अमेरिका को Boeing-747 विमान दिए, बदले में इज़राइल ने अमेरिका की ओर से दोहा पर बमबारी की—पश्चिमी दोहरे मापदंडों का खुलासा।
यहूद ओ नसारा एक साथ
फिलिस्तीन को किसका साथ? 
#Western Hypocrisy, #Middle East Politics, #Boeing 747, #Israelterrroism, 

क़तर का तोहफ़ा और अमेरिका का जवाब: इज़राइली हमले से पर्दा उठता है.

कतर ने ट्रंप को मॅई मे बोइंग 747 विमान एयर फोर्स वन तोहफे मे दिया था... उधर अमेरिका ने इस्राएल को दोहा मे बोम्बारी करने का तोहफ़ा दे दिया। 

क़तर और दूसरे अरब देश कितने सियासी नासमझ है और किस कदर कठपुतली बने है के दुश्मन के गोद मे बैठे खुद को ताक़तवर और सबसे महफूज समझते है। 

इज़राइली दहशतगर्दी और क़तर पर हमला: पश्चिमी दोहरे मापदंडों का पर्दाफ़ाश

मई 2025 में क़तर ने अपनी वायुसेना को मज़बूत बनाने के लिए 400 मिलियन डॉलर की क़ीमत से बोइंग 747-8 विमानों को ख़रीदा। यह सौदा न सिर्फ़ क़तर की रक्षात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए था बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि खाड़ी देश अब पश्चिमी दबाव में आने के बजाय अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे। लेकिन ठीक इसी के बाद अमेरिका की मंज़ूरी और यूरोप की चुप्पी के बीच इज़राइली दहशतगर्द  ने क़तर की राजधानी दोहा पर बमबारी की। यह हमला न केवल क़तर की संप्रभुता पर सीधा आघात है बल्कि यह पूरे अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की खुली अवहेलना भी है।

अमेरिका और यूरोप की भूमिका
इज़राइल का अब तक का इतिहास यही बताता है कि उसे हर हमले के लिए पश्चिमी ताक़तों की हरी झंडी मिलती रही है। फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान और ईरान पर लगातार बमबारी करने वाले इज़राइल को कभी भी अंतरराष्ट्रीय अदालत या संयुक्त राष्ट्र की किसी ठोस कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ा। 
वजह साफ़ है—अमेरिका और यूरोप इज़राइल की दहशतगर्दी को "आत्मरक्षा" का नाम देकर उसे वैध ठहराते हैं।
क़तर पर यह हमला यह भी साबित करता है कि हमेशा से पश्चिम का लोकतंत्र, मानवाधिकार और वैश्वीकरण का नारा केवल उनके हितों की पूर्ति तक सीमित है।

अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र की विफलता

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार किसी भी संप्रभु देश पर बिना कारण हमले की अनुमति नहीं है। लेकिन जब मामला इज़राइल का आता है, तब सभी अंतरराष्ट्रीय क़ानून बेमानी हो जाते हैं। अमेरिका की वीटो पॉलिसी और यूरोप की मौन स्वीकृति ने संयुक्त राष्ट्र को एक बेकार संस्थान बना दिया है। यह संस्थान  केवल ग़रीब और कमज़ोर देशों को दबाने का औज़ार था और है, इसी के बदौलत अमेरिका पूरी दुनिया पर अपनी ऑर्डर थोप रहा है। अमेरिकी ऑर्डर जो इस्राएल केंद्रित है। 

 पश्चिमी दोहरे मापदंड वाला लोकतन्त्र और कथित मनवाधिकार

यूरोप और अमेरिका "कॉमनवेल्थ", "लिबरल वैल्यूज़" और "लोकतंत्र" का दम भरते हैं। लेकिन जब इज़राइल जैसे देश खुलेआम निर्दोष नागरिकों और संप्रभु देशों पर हमला करते हैं, तब यही देश खामोश रहते हैं। यह खामोशी उनके दोहरे मापदंडों का सबसे बड़ा सबूत है।

* **लोकतंत्र**: वे कहते हैं कि लोकतंत्र हर देश का अधिकार है, लेकिन फ़िलिस्तीनियों को उनके चुनावी नतीजों के बावजूद मान्यता नहीं देते।
* **मानवाधिकार**: सीरिया और यमन पर जब बम गिरते हैं तो चुप्पी, लेकिन रूस या चीन पर आरोप लगाने में सबसे आगे, युक्रेन और मनवाधिकार की दुहाई देते है, और सारी दुनिया को रूस के खिलाफ खडा करने की कोशिस करते है, जैसे रूस ने सारी दुनिया मे तबाही मचा रखी है डेमोक्रेसी के नाम पर अमेरिका जैसा। 

* **ग्लोबलाइज़ेशन**: जब अपने उद्योगों और हथियारों का व्यापार बढ़ाना हो तो वैश्वीकरण ज़रूरी, लेकिन जब किसी मुस्लिम देश की आत्मनिर्भरता की बात हो तो पाबंदियां और धमकियां।

क़तर पर हमले का मतलब
क़तर पर हमला केवल एक देश पर बमबारी नहीं है। इसका मतलब यह है कि पश्चिमी ताक़तें (UK, USA,EU,NATO) किसी भी मुस्लिम देश को मज़बूत और खुदमुख्तार देखना नहीं चाहतीं। वे चाहते हैं कि यह देश हमेशा उनके तेल, गैस और हथियारों की मंडी बने रहें। जैसे ही कोई देश अपनी सैन्य या राजनीतिक स्वतंत्रता दिखाने की कोशिश करता है, उसे निशाना बनाया जाता है। लोकतन्त्र की आड़ लेकर, वैश्विक शांति का नाटक कर तो कभी लिबर्ल्स बनने का ढोंग। 

क़तर पर इज़राइल का हमला यह साबित करता है कि पश्चिमी सभ्यता की "लोकतांत्रिक" छवि केवल एक मुखौटा है। असलियत यह है कि अमेरिका, यूरोप और इज़राइल का गठबंधन पूरी दुनिया में दहशतगर्दी और युद्ध को बढ़ावा देता है। यह हमला न केवल क़तर बल्कि पूरे मुस्लिम उम्माह के लिए एक चेतावनी है कि अगर हम एकजुट न हुए तो हमारी संप्रभुता और अस्तित्व दोनों दांव पर लग जाएंगे। जो भी मुस्लिम ममालिक् खुदमुख्तार, आज़ाद, सियासी फौजी, मुआशि तौर पर खडा होने की कोशिस करेगा उसे किसी न किसी तरह से बर्बाद कर दिया जायेगा, लोकतन्त्र, लिबरल नीति वगैरह का बहाना करके, जैसा के करते आया है। 

 यह वक़्त है कि मुस्लिम मुल्क अपने संसाधनों, अपनी राजनीति और अपनी सुरक्षा को पश्चिमी ताक़तों से आज़ाद करें। वरना "लोकतंत्र" और "मानवाधिकार" के नाम पर उनकी दहशतगर्दी हमें बार-बार कुचलती रहेगी। अरब ममालिक् की तेल, पैसे, फौज सब सिर्फ मगरिब
 निजाम की हीफाजत करने के लिए है, जबकि खुद की हीफाजत उससे होती नही। यूके डिफ़ेंस सिस्टम सिर्फ ईरान के खिलाफ इस्राएल की रक्षा करते है, मगर वही इस्राएल जब अरबो और हमला करता है तब उसका डिफ़ेंस सिस्टम काम नही करता है। क्या अमेरिकी फौज इस्राएल की हीफाजत के लिए तो उस इलाके मे नही है, आखिर अरबो को डर किस्से है? इस्राएल से मगर ईरान को दुश्मन बताया जाता है। हमला इस्राएल करता है, और ईरान को क्षेत्र की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाता है। 

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