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Modesty vs Immodesty: Hijab Par Western Media ka Attack.

Parda jo Islam ki ek aham or khubsurat taleem hai. Silent Cultural war against Islam.

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The Rise of Immodesty and the Value of Parda in Islam: A Cultural Reflection.
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Islamic Parde ke Khilaf Western (leftism,Sexism) Media.
आपको कमज़ोर इस तरह से किया गया, कि आपको लगता रहा कि आप ही तो ताकतवर हैं, लेकिन अंजाम ये हुआ कि ताकत तो कब की छिन चुकी थी,बस रह गया था ,तो बस एक नाम ,जो अब छीना जा रहा है,बाद कड़वी है मगर आपको किसी दूसरे ने नही बल्कि आपको कमज़ोर किया आपकी अना ने,आपकी लापरवाही ने, आपकी तरबियत ने और रही सही कसर पूरी की है मुनआफ़ीक़ो ने।

पर्दा बनाम बेपर्दगी: इस्लामी तालीम और आज के समाज की हकीकत.
बेपर्दगी का बढ़ता चलन और पर्दे की अहमियत: एक इस्लामी नजरिया.

मुस्लिम मुमालिक मे वेस्ट्र्न प्रोप्गंदे कि तारीख.. इस्लामिक तलिमात के खिलाफ सेक्सिस्म प्रोप्ग़ॅन्डा.

 इस्लामी पर्दे और हिजाब के खिलाफ़ वेस्टर्न मीडिया और सरकारें किस तरह और क्यों प्रोपेगंडा करती रही हैं और आज भी कर रही हैं।
बेपर्दगी का बढ़ता चलन और पर्दे की अहमियत: एक इस्लामी नजरिया
पर्दा बनाम बेपर्दगी: इस्लामी तालीम और आज के समाज की हकीकत.
इस्लामी पर्दा और हिजाब के ख़िलाफ़ वेस्टर्न प्रोपेगंडा

इस्लाम ने औरत को पर्दे और हिजाब का हुक्म दिया ताकि उसकी इज़्ज़त, पाकीज़गी और हिफ़ाज़त बरक़रार रहे। हिजाब और पर्दा इस्लामी शान और तहज़ीब की निशानी है। मगर अफ़सोस कि वेस्टर्न मीडिया और सरकारें हमेशा से इस्लामी हिजाब को एक मसले की शक्ल में पेश करती आई हैं। वे इसे "पाबंदी" और "आज़ादी की रुकावट" बताकर पूरी दुनिया में प्रोपेगंडा करती हैं।

वेस्टर्न मीडिया का प्रोपेगंडा

1. हिजाब को क़ैद बताना
   मीडिया हिजाब को औरत की कैद और घुटन की निशानी बताता है। टीवी, फ़िल्में और अख़बारों में बार-बार यह दिखाया जाता है कि हिजाब पहनने वाली औरत आज़ादी से महरूम है।

2. औरत की पहचान को मिटाना
   हिजाब को औरत की "व्यक्तिगत पहचान" के खिलाफ़ बताया जाता है। पश्चिमी मीडिया यह तास्सुर देता है कि हिजाब और पर्दा औरत को समाज में पिछड़ा और दबा हुआ बना देता है।

3. सिर्फ़ नेगेटिव तस्वीरे
   मीडिया में हिजाब हमेशा निगेटिव संदर्भ में पेश किया जाता है। जब भी मुस्लिम औरत का ज़िक्र आता है, तो उसे मज़लूम, मजबूर और बेज़ुबान दिखाया जाता है।

 वेस्टर्न सरकारों की पालिसियाँ

1. क़ानूनी पाबंदियाँ
    फ्रांस में स्कूलों और सरकारी इदारों में हिजाब पर पाबंदी लगाई गई।
    बेल्जियम, ऑस्ट्रिया और डेनमार्क जैसे मुल्कों में नक़ाब और बुर्क़े पर रोक लगाई गई।
    कई यूरोपीय मुल्क हिजाब को "सिक्योरिटी" और "इंटेग्रेशन" का बहाना बनाकर दबाने की कोशिश करते हैं।

2. आज़ादी का ग़लत तर्जुमा
   वेस्टर्न हुकूमतें यह कहती हैं कि असली आज़ादी वही है जिसमें औरत अपना जिस्म दिखा सके, जबकि असल आज़ादी यह है कि औरत अपने जिस्म की हिफ़ाज़त कर सके।

3. मुसलमान औरत पर दबाव
   जब मुस्लिम औरत हिजाब पहनकर काम या तालीम हासिल करने जाती है, तो उसे शक की निगाह से देखा जाता है। कभी नौकरी नहीं मिलती, कभी उसे क्लास से निकाल दिया जाता है।

वेस्टर्न मीडिया और सरकारों का असल मक़सद यह है कि.
 मुसलमान औरत की पहचान और ताक़त को कमज़ोर किया जाए।
 इस्लामी तालीमात को पिछड़ा और ग़ैर-मॉडर्न साबित किया जाए।
 मुसलमान नौजवानों और औरतों को अपनी तहज़ीब से दूर करके हम जिंसियत के तरफ मायेल किया जाये.

 हक़ीक़त
असलियत यह है कि हिजाब और पर्दा औरत के लिए कोई पाबंदी नहीं बल्कि एक इज़्ज़त और आज़ादी का नाम है। हिजाब पहनकर मुस्लिम औरत समाज में और भी ज़्यादा इज़्ज़त और अमान से रहती है। हिजाब उसे ग़लत निगाहों से बचाता है और उसकी असली क़ीमत को बरक़रार रखता है।
 
वेस्टर्न मीडिया और सरकारों का हिजाब के खिलाफ़ प्रोपेगंडा सिर्फ़ एक साज़िश है, ताकि मुसलमान औरत अपनी पहचान भूल जाए। मगर मुस्लिम औरत ने हर दौर में अपने हिजाब की हिफ़ाज़त की है और करती रहेगी। हिजाब उसकी शान है, उसकी हिफ़ाज़त है और उसकी असली आज़ादी है।

 इस्लामी पर्दा और हिजाब के ख़िलाफ़ वेस्टर्न प्रोपेगंडा — तारीख़ी हक़ाइक़ के साथ

हिजाब और पर्दा इस्लाम की शान, औरत की हिफ़ाज़त और पहचान का प्रतीक है। मगर वेस्टर्न मीडिया और हुकूमतों ने इसे हमेशा निशाना बनाया। कभी इसे "दकियानूसी" (backwardness) कहा, कभी औरत की आज़ादी के खिलाफ़ बताया, और कभी इसे "सिक्योरिटी" का बहाना बनाकर बैन किया। यह प्रोपेगंडा सिर्फ़ मीडिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि क़ानून, पॉलिटिक्स और मुस्लिम मुल्कों की सियासत में भी इस्तेमाल हुआ।

यूरोप में हिजाब पर पाबंदियाँ – तारीख़ी मिसालें. ये वह मुमालिक है जो खुद को सब्से जयादा औरतो को आज़दि देने वाला बताते हे. उंकि नज़र मे वे हि सब्से मुहज्जब लोग है, मगर उन्होने एक नज़रिया पेश किया, जो उस उसुलो के मुतबिक चलेगा, उस्के नक़्श-ए-कदम पर चलेगा वहि सब्से ज्यादा मुहज्जब, बा अख्लाक़ और बा किरदार कहलायेगा. इन्होने अपने उसुलो के मुतबिक खवातीन के लिये कुछ उसुल व जाबते मुक़र्रर किये है.

1. फ़्रांस (2004)
  फ़्रांस पहला बड़ा यूरोपीय मुल्क था जिसने सरकारी स्कूलों और इदारों में हिजाब, नक़ाब और धार्मिक निशानों (जैसे क्रॉस, पगड़ी) पर रोक लगाई।
   2010 में फ़्रांस ने पब्लिक जगहों पर नक़ाब (फेस कवर्ड बुर्क़ा) पर मुकम्मल बैन कर दिया।
   इसे "इल्हाद" (Secularism) के नाम पर किया गया लेकिन असल निशाना मुस्लिम औरतें थीं।

2. बेल्जियम (2011)
    बेल्जियम ने भी नक़ाब पर मुकम्मल रोक लगा दी। जुमला था कि "चेहरा ढकना सिक्योरिटी रिस्क है"।

3. डेनमार्क (2018)
    डेनमार्क ने पब्लिक जगहों पर बुर्क़ा और नक़ाब को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया।

4. नीदरलैंड (2019)
    नीदरलैंड ने ट्रेनों, स्कूलों और सरकारी इदारों में नक़ाब पर रोक लगा दी।

5. ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड
    इन मुल्कों में रेफ़रेंडम कराके बुर्क़ा और नक़ाब पर पाबंदी लगाई गई।
इन क़ानूनों के ज़रिए वेस्टर्न हुकूमतों ने हिजाब को "आधुनिक समाज" के खिलाफ़ और "पिछड़ेपन" की निशानी बना दिया।

 वेस्टर्न मीडिया का प्रोपेगंडा

 फ़िल्मों, अख़बारों और टीवी शो में मुस्लिम औरत को हमेशा दबाई हुई, मजबूर और बेबस दिखाया गया।
 हिजाब और बुर्क़ा को "औरत की क़ैद" करार देकर नफ़रत फैलाने की कोशिश की गई।
 9/11 के बाद वेस्टर्न मीडिया ने हिजाब को "इस्लामी अतिवाद" (Extremism) से जोड़ दिया।

 मुस्लिम मुल्कों में प्रोपेगंडा और तख़्तापलट

वेस्टर्न ताक़तों ने सिर्फ़ यूरोप में हिजाब पर पाबंदियाँ नहीं लगाईं बल्कि मुस्लिम मुल्कों में भी प्रोपेगंडा करके "पर्दे" को पिछड़ेपन का नाम दिया।

तुर्की (1920s-1930s): मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने यूरोप की नक़ल में हिजाब और इस्लामी पहनावे के खिलाफ़ सख़्त क़ानून बनाए, दुसरो को खुश करने के खातिर पबांदि लगयि.

ईरान (1936) शाह रज़ा पहलवी ने हिजाब पर मुकम्मल रोक लगाई और औरतों को जबरदस्ती बेपर्दा किया।

मिस्र और अरब मुल्कों में: पश्चिमी नज़्मों और NGOs ने हिजाब को "women’s oppression" बताकर नौजवान लड़कियों को इससे दूर करने की मुहिम चलाई।

इसके साथ-साथ, जो मुस्लिम बादशाह और हुक़्मरान इस्लामी तालीमात और हिजाब की हिमायत करते थे, उन्हें गिराने के लिए साज़िशें की गईं।

 ईरान के शाह को गिराकर वेस्टर्न ताक़तों ने नए सिस्टम थोपने की कोशिश की।
अफ़ग़ानिस्तान में भी हिजाब और शरई नज़्म के खिलाफ़ बाक़ायदा जंग छेड़ी गई।

असल मक़सद
इन सब पाबंदियों और प्रोपेगंडे का असल मक़सद यह था कि:

 मुस्लिम औरत की पहचान मिटाई जाए।
 इस्लामी तालीमात को दकियानूसी और पिछड़ा साबित किया जाए।
 मुस्लिम नौजवानों को अपनी तहज़ीब से काटकर वेस्टर्न कल्चर की तरफ़ झुका दिया जाए।

इस्लामी हिजाब और पर्दे के खिलाफ़ वेस्टर्न मीडिया और सरकारों का प्रोपेगंडा कोई नई बात नहीं बल्कि एक तवील साज़िश है। कभी इसे सिक्योरिटी का मसला बनाया गया, कभी औरत की आज़ादी का, और कभी इसे दकियानूसी का टैग दिया गया। मगर हक़ीक़त यह है कि हिजाब और पर्दा इस्लामी औरत की शान, इज़्ज़त और असल आज़ादी है, और दुनिया की कोई ताक़त इसे खतम नही कर सकती है। खवातीन को बे पर्दा करने वाले आज बहुत है लेकिन उन् पर इज्जत कि चादर दालने वाले बहुत कम, वे औरतो कि आज़दि नही चाहते बल्कि औरतो तक पहुच बनाने कि अज़ादी चाहते है, इस्लिये अलग अलग शक्ल इख्तियार कर, नाम बदल कर काम कर रहे है. 

हम ऐसा निज़ाम चाहते है।
औरत यमन से मदीना का सफर करे, खूबसूरत और जवान हो, सोने चंदियो के गहने से सजी हो मगर उस खातून की तरफ या उसके गहने की तरफ किसी गैर मर्द को आँख उठाकर देखने तक की जसारत् न हो... तो वह हैरत ज़दा होकर पूछे के यह कौन लोग है और यहाँ किस तरह का नेजाम् है तो पता चले के....
खलीफा उमर फारूक राजिअल्लाहु अनहु है और यह नेजाम्  " निजाम ए इस्लाम " है।

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