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Liberalism exposed: How modern freedom destroys morality?

Akhlakiyaat Ka Matam aur Liberalism Ka Yalgaar.

The Funeral of Morality and the Onslaught of Liberalism.
जब 'आज़ादी' का नारा शैतान की नई ज़बान बन जाए!
वो ख़ामोश तहरीरें जो इस्लाम को गुनहगार बना रही हैं!
इस्लाम में निकाह बनाम मॉडर्न “कंसेंट”: आज़ादी, ज़िम्मेदारी और नस्ल की हिफ़ाज़त.
अधूरी तारीख़ पढ़कर 'इस्लाम' को क़सूरवार ठहराने वाले कौन हैं?
आज़ादी के नारे जब इबादत की जगह ले लें, तब सबसे पहले शर्म का क़त्ल होता है।
औरत के हक़ की आड़ में जो लड़ाई चल रही है — वो दरअसल 'हया' के ख़िलाफ़ है!
Liberalism exposed! Discover how modern “freedom” destroys morality — Islam reveals the truth.
This article unmasks liberalism through the lens of Islamic thought. It argues that liberal ideology, with its emphasis on unrestricted freedom and individual consent, undermines divine guidance and erodes the moral fabric of society. By contrasting the eternal principles of Shariah with the shifting values of modern liberalism, the piece highlights how the pursuit of “absolute liberty” leads to spiritual emptiness, social chaos, and the weakening of family and community bonds. The discussion calls readers to recognize the dangers of liberalism and return to the timeless wisdom of Islam as the true safeguard of morality and justice.
Liberalism exposed, unrestricted freedom, moral fabric of society, leads to spiritual emptiness,
How modern “freedom” destroys morality.
स “आज़ादी” के नारे की  मिठि आवाज़ में वो ज़हर छुपा है जो इमान की जड़ों तक उतर जाता है।
जिस आज़ादी ने हर बंदिश को “क़ैद” कहा, उसी ने औरत से उसकी शर्म,हया और इमान छीन ली।
अख्लाकियात का मातम और “रज़ामंदी” का नया बुत.

जब आज़ादी के नारों के सहारे अधूरी तारीख़ पढ़कर इस्लाम पर हमला किया जाए

आज का “रोशन–ख़याल” दौर एक अजीब ज़हनी उलझन का शिकार है।
हमारे देसी लिबरल और फ़ेमिनिस्ट हल्कों में एक नया फ़िक्री फ़ैशन चल पड़ा है कि तारीख़ की किताबों से चंद आधे–अधूरे वाक़ियात उठा लो, उन पर “ह्यूमन राइट्स” की चमक चढ़ा दो, और फिर उन्हें इस्लाम के ख़िलाफ़ चार्जशीट बना कर पेश कर दो।

हाली दिनों में एक ऐसी ही तहरीर नज़र से गुज़री जिसमें यूनान, रोम और हिन्दू समाज़ के मिसालों को इस अन्दाज़ से इस्लाम के साथ गूँथने की कोशिश की गई कि मानो “शादी” कोई ख़ुदा का हुक्म नहीं, बल्कि मर्दाना ताक़त की साज़िश हो।
दावा यह किया गया कि:

अगर माजि में “लौंडी” से जिस्मानी ताल्लुक़ जायज़ था, तो आज की “आज़ाद औरत” के साथ निकाह के बग़ैर ताल्लुक़ (ज़िना) को गुनाह कैसे कहा जा सकता है?

यही वो जगह है जहाँ ज़रूरत पड़ती है कि इस पूरे माफ़हूम का बारीक तजज़िया किया जाए, ताकि मालूम हो सके कि यह “तारीख़ का तज़ाद” है या फ़िक्र की ख़लल।

1. तारीख़ का आधा सच और “ताक़त” का अफ़साना

तहरीर में लिखा गया कि यूनान में शादी एक मुआहदा थी और रोम में औरत- मर्द की मिल्कियत समझी जाती थी।
यह बात अपनी जगह दुरुस्त है, लेकिन मसला यह है कि यहीं से बात को तोड़कर इस्लाम पर हमला कर दिया जाता है।

यूनान, रोम और दीगर जाहीली मुशरिक समाज वही थे जिनके बरअक्स इस्लाम एक इंक़िलाब बनकर आया।
इस्लाम ने आकर औरत को “शौहर की मिल्कियत” होने के तसव्वुर से निकाला और निकाह को एक “इदारा” — यानी गहराई और ज़िम्मेदारी वाला सामाजिक मुआहदा क़रार दिया, जिसमें औरत की “रज़ामंदी” पहली शर्त रखी गई।

इस्लाम से पहले औरत ख़ुद विरासत में बँटती थी; इस्लाम ने उसे ख़ुद “वारिस” बनाया।
उसके नफ़्स, माल, इज़्ज़त और फ़ैसले की क़ानूनी हैसियत क़ायम की गई।

अब जो लोग यह कहते हैं कि:
“शादी को जबरन मुक़द्दस बनाया गया ताकि इस के बाहर हर रिश्ता गुनाह ठहरे”
तो यह दरअस्ल बचकानी और सतही दलील है।
शादी को मुक़द्दस इसलिए नहीं बनाया गया कि मर्द औरत पर क़ाबिज़ हो सके, बल्कि इसलिए कि “नसब” यानी इंसानी नस्ल, ख़ानदानी पहचान और बाप–औलाद के रिश्ते की हिफ़ाज़त हो सके।
जानवर भी जिस्मानी ताल्लुक़ रखते हैं, लेकिन “बाप” होने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठाते।
इंसान को जानवर से अलग करने वाला अस्ल फ़र्क़ ही यह है कि वह अपने लुत्फ़ के नतीजे की ज़िम्मेदारी उठाए।
निकाह वही इदारा है जो मर्द से कहता है:
अगर तूने लुत्फ़ उठाया है, तो अब उस के नतीजे — बच्चे और औरत — की कफ़ालत और ज़िम्मेदारी भी तेरे ज़िम्मे है। यह “ताक़त” नहीं, “ज़िम्मेदारी” है।

2. लौंडी का मसला और फ़िक्री धोखा–धड़ी

अब आते हैं उस नाज़ुक हिस्से पर, जहाँ “लौंडी” और “ज़िना” का मुक़ाबला खड़ा कर दिया गया।

दावा यह किया गया: 
“अगर लौंडी से ताल्लुक़ जायज़ था तो गर्लफ़्रेंड से क्यूँ नहीं? यही तो दोग़लापन है!”

यहाँ सबसे बड़ी बदनीयती यह है कि लौंडी के पूरे कान्टेक्स्ट (Context) को ग़ायब कर दिया गया।

ग़ुलामी इस्लाम ने इजाद नहीं की थी।
जब क़ुरआन नाज़िल हुआ, उस वक़्त दुनिया का तक़रीबन तमाम मआशी नज़्म–ओ–नसक़ ग़ुलामी पर क़ायम था।
अगर एक दिन में यह कहा जाता कि “आज से सब ग़ुलाम आज़ाद”, तो लाखों लोग जो अपनी रोटी, छत और अम्न के लिए अपने आका पर मुनहसिर थे, एकदम से बेघर और बे–सहारा हो जाते।

इस्लाम ने इस निज़ाम को एक दिन में उखाड़ फेंकने के बजाए उसे सख़्त क़वायद के ज़ेर–ए–निगरानी रखा और दरवाज़े खोल दिए कि ग़ुलामों को आज़ाद करना सब से बड़ा सवाब और कई गुनाहों का कफ़्फ़ारा ठहरे।
यानी मन्ज़िल “इज़ालत–ए–ग़ुलामी” थी, मगर रास्ता तदरीजी और हिकमत पर मबनी था।

लौंडी कोई “पब्लिक प्रॉपर्टी” नहीं थी कि जो चाहे जब चाहे उस से ताल्लुक़ क़ायम कर ले।
शरीअत में लौंडी के साथ जिस्मानी ताल्लुक़ सिर्फ़ उसके मालिक के लिए मुजाज़ था, और उस पर भी कई शराई क़ैदें थीं। अगर वह उम्मीद से हो जाती, तो “उम्म–ए–वलद” कहलाती; उसे बेचा नहीं जा सकता था; उसका बच्चा ग़ुलाम नहीं, बल्कि आज़ाद और अपने बाप का वारिस समझा जाता।

इस के बरअक्स ज़िना क्या है?
एक “ला–वारिस रिश्ता” —

  • न बच्चे का नसब महफ़ूज़,
  • न औरत की कफ़ालत पर कोई क़ानूनी गिरफ़्त,
  • न मर्द पर किसी ज़िम्मेदारी का बोझ।

कुछ फ़ुक़हा की शाज़ और आज के दौर में ज़ारि फहाशि — जैसे लौंडी का मुश्तरक होना — को उठा कर पूरे दीन पर हमले करना इल्मी बहस नहीं, बल्कि फ़िक्री बेईमानी है।

जुमहूर फ़ुक़हा और क़ुरआन–ओ–सुन्नत की रूह यह है कि एक वक़्त में एक औरत के साथ ही ताल्लुक़ की इजाज़त हो, ताकि नसब में ख़ल्त–मल्त न हो और ज़िम्मेदारी मुतअय्यन रहे।

3. नसब की हिफ़ाज़त या मर्दाना बालादस्ती?

तहरीर में जगह–जगह यह बात दोहराई गई कि यह सब

“मर्दाना समाज़ के लिए औरत की जिस्मानियत पर काबू पाने का नज़्म है।”
यह फ़ेमिनिज़्म का एक मशहूर कवायेद है।
असल हक़ीक़त इस के उलट है: क़ानूनी “क़ाबू” औरत पर नहीं, मर्द की हवस पर है।

इक लम्हा ठहर कर सोचिए — अगर निकाह न हो:

  • मर्द के लिए पूरा फ़ायदा,

  • औरत के लिए पूरा ख़तरा,

  • बच्चा अगर आ जाए तो “मेरी मरज़ी नहीं थी” कह कर मुँह मोड़ लेना सब से आसान रास्ता।

निकाह वह ज़ंजीर है जो मर्द को भागने से रोकती है।

शरीअत ने ज़िना को हराम किया और निकाह/मिल्कियत–ए–यमीन को जायज़ इसलिए ठहराया कि ज़िम्मेदारी का दायरा वाज़ेह हो, नसब महफ़ूज़ रहे और कोई ताल्लुक़ बिला जवाबदेही बाक़ी न रहे।

लिबरल नज़्म जिस “आज़ादी” का शोर मचाता है, वह दरअसल मर्द को यह लाइसेंस देता है कि वह औरत को टिश्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करे और जब दिल भर जाए, बिना किसी क़ानूनी जवाबदेही के चलता बने।
यह औरत की आज़ादी नहीं, मर्द की अय्याशी का परवाना है।

लिबरलिज़्म का नया फ़लसफ़ा: मर्द अगर चुप रहे तो “कमज़ोर”, बोले तो “ज़ालिम”!

आज का “आज़ाद‑ख़याल” तबक़ा बड़ा अजीब मिज़ाज रखता है।

यह वही जमाअत है जो हर रियाकारी को “एम्पावरमेंट” कहती है,
हर बेबाकी को “सेक्सिज़्म”,
और हर मर्द को “पितृसत्ता का एजेंट” ठहराने में एक पल नहीं लगाती।

इनके यहाँ औरत का हर तजुर्बा “ट्रॉमा” होता है,
और मर्द का हर लम्हा “क्राइम सीन”।
मज़ाल है कि कोई मर्द अपने दुख कुबूल करे —
फ़ौरन कहा जाएगा: “देखो, ये फिर औरत के दर्द पर मर्दानगी का रोना रो रहा है!

दरअसल लिबरलिज़्म की यह “विक्टिम‑इकॉनॉमी” आज की सबसे मुफ़ीद इंडस्ट्री बन चुकी है —
जहाँ औरत को “हमेशा पीड़िता” और मर्द को “हमेशा मुजरिम” साबित कर देना ही “जेंडर‑जस्टिस” बन गया है।
मज़े की बात यह कि वही तबक़ा, जो बरसों से “बराबरी” का परचम उठाए खड़ा है,
अब हर बहस में अपने “विक्टिम कार्ड” को नया मेडल बना कर पहनता है।

“क्या‑क्या नहीं दिया मर्दों ने इस दुनिया को — जंग, जुल्म, और अब ये शिकायतें भी!”
यहि है उनके असल कवायेद.
4. जदीद दौर और “रज़ामंदी” का बुत

आज के दौर में एक सवाल बार–बार उठाया जाता है:

“एक बालिग़, बातिनन–होशियार इंसान की मरज़ी आज भी इन सब ‘अख़लाक़ी चौकीदारों’ के लिए सबसे बड़ा जुर्म क्यूँ है?”

जवाब सादा और कड़वा है:

आप की “मरज़ी” हवा में नहीं होती, उसके नतीजे पूरा समाज भुगतता है।

जब “अपनी मर्ज़ी” से ज़िना होता है, तो:
  • पैदा होने वाले बच्चों की ज़िंदगी का बोझ कौन उठाएगा?

  • कितने अजन्मे बच्चे अबॉर्शन की नज़र होते हैं,

  • कितने सिंगल पेरेंटिंग के अजाब में पलते हैं,

  • कितने बे–नसब, बे–साया, बे–सहारा रह जाते हैं?

मग़रिब ने “कंसेंट” को ख़ुदा का दर्जा दे दिया —

अब नतीजा यह निकला कि:

  • ख़ानदानी निज़ाम बिखर चुका,

  • रिश्ते क़ानूनी क़रारनामों में सिमट गए,

  • नफ़्सियाती मरीज़ों की फ़ौज खड़ी हो गई,

  • बूढ़े माँ–बाप ओल्ड एज होम्स में तन्हा सड़ते रहे।

शरीअत कहती है कि जिस्मानी अमल महज़ लज़्ज़त नहीं, एक “तमद्दुन अमल” है  (civilizational act) ।

इस से अगली नस्ल वजूद में आती है, तहज़ीब की बुनियाद रखी जाती है।
इसे सिर्फ़ “दो बालिग़ों की मरज़ी” पर नहीं छोड़ा जा सकता; इसे एक मुकम्मल “ मुआशर्ति ज़िम्मेदारी” के फ्रेमवर्क — यानी निकाह — में क़ैद करना ज़रूरी है।

5. फ़िक्ह बनाम दीन: अस्ल निशाना कौन?

बहुत से मज़ामीन फ़ुक़हा के इज्तेहादात का हवाला दे कर शुरू होते हैं, लेकिन निशाना दरअस्ल क़ुरआन के हुक्मात पर होता है — ख़ास तौर पर हराम–ए–ज़िना पर।
वे कहते हैं, “हम फ़िक्ह पर सवाल उठा रहे हैं”, मगर नतीजा यह निकलता है कि:

“ज़िना को जायज़ कर दो, क्योंकि पुराने ज़माने में लौंडी भी तो जायज़ थी।”

यह उसूल ऐसा ही है जैसे कोई कहे:

“पहले लोग तलवारों से लड़ते थे, तो आज हमें एटम बम बेधड़क चलाने की खुली छूट होनी चाहिए।”

पहले ऊँट पर सफ़र होता था, अब बिना लाइसेंस हवाई जहाज़ उड़ाने दो!

इस्लाम का क़ायदा साफ़ और सख़्त है:
हर वो जिस्मानी ताल्लुक़ हराम है, जिसमें न क़ानूनी, न मुआशरती ज़िम्मेदारी ली गई हो।
चाहे वो आज की गर्लफ़्रेंड हो, live-in relationship हो या किसी दौर का बे–लगाम मुहब्बत का रिश्ता।

ये तहरीरें अस्ल में “अख़लाक़” का मातम नहीं कर रहीं, बल्कि इस बात का अफ़सोस कर रही हैं कि इंसान को अपनी “ख्वाहिशात” का पूरा ग़ुलाम बनने की इजाज़त क्यों नहीं दी जा रही।

इंसानी तारीख़ का जो “तज़ाद” बताया जा रहा है, वह दरअस्ल इंसानियत की “बक़ा का उसूल” है —
जो मिजाज़ लुत्फ़ को ज़िम्मेदारी, और हवस को क़ानून के दायरे में लाने का नाम है।

6. समाज ताक़त से नहीं, ज़ाब्तों से ज़िंदा रहता है

मुआशरा तलवार और ताक़त के जोर पर नहीं, बल्कि उसूलों और ज़ाब्तों के सहारे क़ायम रहता है।
अगर आज हम नफ़्सानी ख़्वाहिशों के दबाव में आकर “शादी” के तक़दुस को मिटा दें, हर रिश्ता जायज़ करार दे दें, और “रज़ामंदी” को अकेला मापदंड बना लें, तो हम उसी जंगल की तरफ़ वापस चले जाएँगे जहाँ सिर्फ़ ताक़तवर मर्द की मरज़ी चलती थी और औरत महज़ “गोश्त का टुकड़ा” थी।

इस्लाम ने औरत को “मिल्कियत” से निकाल कर “मु़ह्सऩा” बनाया — क़िले में महफ़ूज़ औरत, जिसके चारों तरफ़ निकाह की दीवारें उसकी इज़्ज़त की निगहबान बनती हैं।
आज का लिबरल तबक़ा उसे फिर से “पब्लिक प्रॉपर्टी” बनाना चाहता है;
फ़र्क़ बस इतना है कि इस बार ज़ंजीरें लोहे की नहीं, बल्कि “रज़ामंदी” और “आज़ादी” के ख़ूबसूरत नारों से बुनी जाएँगी।

ऐ मेरी बहनों,
इस “आज़ादी” के नारे की आवाज़ में वो ज़हर छुपा है जो इमान की जड़ों तक उतर जाता है।
जिस आज़ादी ने हर बंदिश को “क़ैद” कहा, उसी ने औरत से उसकी पाकिजगि, हया और वक़ार छीन ली।

आज बहुत सी क़लमें और स्क्रीने तुम्हें यह यक़ीन दिलाने में लगी हैं कि इस्लाम ने तुम्हें रोका, दबाया और “मर्दों का मज़हब” ठहराया।
लेकिन याद रखो —

इस्लाम वो दीन है जिसने औरत को “मोहब्बत की मिल्कियत” नहीं, “इज़्ज़त की अमानत” बनाया।
जिसने तुम्हारी हिफ़ाज़त के लिए पर्दे को सज़ा नहीं, “साया” बनाया।
जो तुम्हारे हक़ की बात मर्द से पहले ख़ुद अल्लाह ने क़ुरआन में की।
उन लोगों से होशियार रहो जो तुम्हें तुम्हारे ही मज़हब से नफ़रत करना सिखा रहे हैं,
जो निकाह को “ज़ंजीर”, और हया को “कमज़ोरी” कहकर अलफाजो से तुम्हारे दिलों को बदलना चाहते हैं।
यह लड़ाई औरत और मर्द की नहीं — यह लड़ाई फ़िक्र और फ़ितरत की है। अख़लाक़ और हवस,
ज़िम्मेदारी और बेफ़िक्री कीशरीअत और नफ़्सानियत के बीच की जंग है।

ऐ मुसलमान नौजवानो!
इस नफ़्सानी तहज़ीब के झूठे नारों में गुम मत हो जाओ।
हर नारा जो “आज़ादी” का दावा करे, दरअस्ल तुम्हारी “ग़ुलामी” की नई शक्ल भी हो सकता है।
ये फ़िक्री हमला चुपचाप तुम्हारे दिलों और घरों में दाख़िल हो रहा है—
तुम्हारे निकाह, तुम्हारी शर्म, तुम्हारी हया को “पुरानी चीज़ें” बनाकर मिटाने की साजिश की जा रही है।

किसी ने मर्द को दुश्मन और औरत को हथियार बना लिया है।
हमारा फ़र्ज़ है कि क़ुरआन की रोशनी, हया की पनाह, और इल्म की समझ से अपने ईमान, अपनी औलाद, और अपने समाज की हिफ़ाज़त करें।

   ऐ अल्लाह!
हमें उस फ़िक्री धुंध से बचा ले जो “आज़ादी” के नाम पर हमारी हया को छीनती है।
हमें वो फ़हम अता कर जो हक़ और धोखे में फ़र्क़ कर सके,हमारे दिलों को शरीअत पर क़ायम रख, हमारी बहनों को वह फ़हम अता कर जो हक़ और फ़रेब में फ़र्क़ कर सके। हया को उनका ज़ेवर बना, जो नफ़्स के धोखों में बहक रही हैं, उन्हें अपने नूर से राह दिखा। 
हमारी ज़ुबानों को हक़ के लिए बुलंद कर, और हमारे समाज को तोफ़ीक़ दे कि वो “बराबरी” और “इंसाफ़” का असल मायना फिर से क़ुरआन से सीखे।
   आमीन।

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