Akhlakiyaat Ka Matam aur Liberalism Ka Yalgaar.
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| How modern “freedom” destroys morality. |
जिस आज़ादी ने हर बंदिश को “क़ैद” कहा, उसी ने औरत से उसकी शर्म,हया और इमान छीन ली।
जब आज़ादी के नारों के सहारे अधूरी तारीख़ पढ़कर इस्लाम पर हमला किया जाए
आज का “रोशन–ख़याल” दौर एक अजीब ज़हनी उलझन का शिकार है।
हमारे देसी लिबरल और फ़ेमिनिस्ट हल्कों में एक नया फ़िक्री फ़ैशन चल पड़ा है कि तारीख़ की किताबों से चंद आधे–अधूरे वाक़ियात उठा लो, उन पर “ह्यूमन राइट्स” की चमक चढ़ा दो, और फिर उन्हें इस्लाम के ख़िलाफ़ चार्जशीट बना कर पेश कर दो।
हाली दिनों में एक ऐसी ही तहरीर नज़र से गुज़री जिसमें यूनान, रोम और हिन्दू समाज़ के मिसालों को इस अन्दाज़ से इस्लाम के साथ गूँथने की कोशिश की गई कि मानो “शादी” कोई ख़ुदा का हुक्म नहीं, बल्कि मर्दाना ताक़त की साज़िश हो।
दावा यह किया गया कि:
अगर माजि में “लौंडी” से जिस्मानी ताल्लुक़ जायज़ था, तो आज की “आज़ाद औरत” के साथ निकाह के बग़ैर ताल्लुक़ (ज़िना) को गुनाह कैसे कहा जा सकता है?
यही वो जगह है जहाँ ज़रूरत पड़ती है कि इस पूरे माफ़हूम का बारीक तजज़िया किया जाए, ताकि मालूम हो सके कि यह “तारीख़ का तज़ाद” है या फ़िक्र की ख़लल।
1. तारीख़ का आधा सच और “ताक़त” का अफ़साना
तहरीर में लिखा गया कि यूनान में शादी एक मुआहदा थी और रोम में औरत- मर्द की मिल्कियत समझी जाती थी।
यह बात अपनी जगह दुरुस्त है, लेकिन मसला यह है कि यहीं से बात को तोड़कर इस्लाम पर हमला कर दिया जाता है।
यूनान, रोम और दीगर जाहीली मुशरिक समाज वही थे जिनके बरअक्स इस्लाम एक इंक़िलाब बनकर आया।
इस्लाम ने आकर औरत को “शौहर की मिल्कियत” होने के तसव्वुर से निकाला और निकाह को एक “इदारा” — यानी गहराई और ज़िम्मेदारी वाला सामाजिक मुआहदा क़रार दिया, जिसमें औरत की “रज़ामंदी” पहली शर्त रखी गई।
इस्लाम से पहले औरत ख़ुद विरासत में बँटती थी; इस्लाम ने उसे ख़ुद “वारिस” बनाया।
उसके नफ़्स, माल, इज़्ज़त और फ़ैसले की क़ानूनी हैसियत क़ायम की गई।
शादी को मुक़द्दस इसलिए नहीं बनाया गया कि मर्द औरत पर क़ाबिज़ हो सके, बल्कि इसलिए कि “नसब” यानी इंसानी नस्ल, ख़ानदानी पहचान और बाप–औलाद के रिश्ते की हिफ़ाज़त हो सके।
इंसान को जानवर से अलग करने वाला अस्ल फ़र्क़ ही यह है कि वह अपने लुत्फ़ के नतीजे की ज़िम्मेदारी उठाए।
निकाह वही इदारा है जो मर्द से कहता है:
2. लौंडी का मसला और फ़िक्री धोखा–धड़ी
अब आते हैं उस नाज़ुक हिस्से पर, जहाँ “लौंडी” और “ज़िना” का मुक़ाबला खड़ा कर दिया गया।
यहाँ सबसे बड़ी बदनीयती यह है कि लौंडी के पूरे कान्टेक्स्ट (Context) को ग़ायब कर दिया गया।
ग़ुलामी इस्लाम ने इजाद नहीं की थी।
जब क़ुरआन नाज़िल हुआ, उस वक़्त दुनिया का तक़रीबन तमाम मआशी नज़्म–ओ–नसक़ ग़ुलामी पर क़ायम था।
अगर एक दिन में यह कहा जाता कि “आज से सब ग़ुलाम आज़ाद”, तो लाखों लोग जो अपनी रोटी, छत और अम्न के लिए अपने आका पर मुनहसिर थे, एकदम से बेघर और बे–सहारा हो जाते।
शरीअत में लौंडी के साथ जिस्मानी ताल्लुक़ सिर्फ़ उसके मालिक के लिए मुजाज़ था, और उस पर भी कई शराई क़ैदें थीं। अगर वह उम्मीद से हो जाती, तो “उम्म–ए–वलद” कहलाती; उसे बेचा नहीं जा सकता था; उसका बच्चा ग़ुलाम नहीं, बल्कि आज़ाद और अपने बाप का वारिस समझा जाता।
इस के बरअक्स ज़िना क्या है?
एक “ला–वारिस रिश्ता” —
- न बच्चे का नसब महफ़ूज़,
- न औरत की कफ़ालत पर कोई क़ानूनी गिरफ़्त,
- न मर्द पर किसी ज़िम्मेदारी का बोझ।
कुछ फ़ुक़हा की शाज़ और आज के दौर में ज़ारि फहाशि — जैसे लौंडी का मुश्तरक होना — को उठा कर पूरे दीन पर हमले करना इल्मी बहस नहीं, बल्कि फ़िक्री बेईमानी है।
जुमहूर फ़ुक़हा और क़ुरआन–ओ–सुन्नत की रूह यह है कि एक वक़्त में एक औरत के साथ ही ताल्लुक़ की इजाज़त हो, ताकि नसब में ख़ल्त–मल्त न हो और ज़िम्मेदारी मुतअय्यन रहे।
3. नसब की हिफ़ाज़त या मर्दाना बालादस्ती?
तहरीर में जगह–जगह यह बात दोहराई गई कि यह सब
असल हक़ीक़त इस के उलट है: क़ानूनी “क़ाबू” औरत पर नहीं, मर्द की हवस पर है।
इक लम्हा ठहर कर सोचिए — अगर निकाह न हो:
मर्द के लिए पूरा फ़ायदा,
औरत के लिए पूरा ख़तरा,
बच्चा अगर आ जाए तो “मेरी मरज़ी नहीं थी” कह कर मुँह मोड़ लेना सब से आसान रास्ता।
शरीअत ने ज़िना को हराम किया और निकाह/मिल्कियत–ए–यमीन को जायज़ इसलिए ठहराया कि ज़िम्मेदारी का दायरा वाज़ेह हो, नसब महफ़ूज़ रहे और कोई ताल्लुक़ बिला जवाबदेही बाक़ी न रहे।
लिबरल नज़्म जिस “आज़ादी” का शोर मचाता है, वह दरअसल मर्द को यह लाइसेंस देता है कि वह औरत को टिश्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करे और जब दिल भर जाए, बिना किसी क़ानूनी जवाबदेही के चलता बने।
यह औरत की आज़ादी नहीं, मर्द की अय्याशी का परवाना है।
लिबरलिज़्म का नया फ़लसफ़ा: मर्द अगर चुप रहे तो “कमज़ोर”, बोले तो “ज़ालिम”!
आज का “आज़ाद‑ख़याल” तबक़ा बड़ा अजीब मिज़ाज रखता है।
यह वही जमाअत है जो हर रियाकारी को “एम्पावरमेंट” कहती है,
हर बेबाकी को “सेक्सिज़्म”,
और हर मर्द को “पितृसत्ता का एजेंट” ठहराने में एक पल नहीं लगाती।
इनके यहाँ औरत का हर तजुर्बा “ट्रॉमा” होता है,
और मर्द का हर लम्हा “क्राइम सीन”।
मज़ाल है कि कोई मर्द अपने दुख कुबूल करे —
फ़ौरन कहा जाएगा: “देखो, ये फिर औरत के दर्द पर मर्दानगी का रोना रो रहा है!
दरअसल लिबरलिज़्म की यह “विक्टिम‑इकॉनॉमी” आज की सबसे मुफ़ीद इंडस्ट्री बन चुकी है —
जहाँ औरत को “हमेशा पीड़िता” और मर्द को “हमेशा मुजरिम” साबित कर देना ही “जेंडर‑जस्टिस” बन गया है।
मज़े की बात यह कि वही तबक़ा, जो बरसों से “बराबरी” का परचम उठाए खड़ा है,
अब हर बहस में अपने “विक्टिम कार्ड” को नया मेडल बना कर पहनता है।
आज के दौर में एक सवाल बार–बार उठाया जाता है:
“एक बालिग़, बातिनन–होशियार इंसान की मरज़ी आज भी इन सब ‘अख़लाक़ी चौकीदारों’ के लिए सबसे बड़ा जुर्म क्यूँ है?”
जवाब सादा और कड़वा है:
पैदा होने वाले बच्चों की ज़िंदगी का बोझ कौन उठाएगा?
कितने अजन्मे बच्चे अबॉर्शन की नज़र होते हैं,
कितने सिंगल पेरेंटिंग के अजाब में पलते हैं,
कितने बे–नसब, बे–साया, बे–सहारा रह जाते हैं?
अब नतीजा यह निकला कि:
ख़ानदानी निज़ाम बिखर चुका,
रिश्ते क़ानूनी क़रारनामों में सिमट गए,
नफ़्सियाती मरीज़ों की फ़ौज खड़ी हो गई,
बूढ़े माँ–बाप ओल्ड एज होम्स में तन्हा सड़ते रहे।
शरीअत कहती है कि जिस्मानी अमल महज़ लज़्ज़त नहीं, एक “तमद्दुन अमल” है (civilizational act) ।
5. फ़िक्ह बनाम दीन: अस्ल निशाना कौन?
बहुत से मज़ामीन फ़ुक़हा के इज्तेहादात का हवाला दे कर शुरू होते हैं, लेकिन निशाना दरअस्ल क़ुरआन के हुक्मात पर होता है — ख़ास तौर पर हराम–ए–ज़िना पर।
वे कहते हैं, “हम फ़िक्ह पर सवाल उठा रहे हैं”, मगर नतीजा यह निकलता है कि:
“ज़िना को जायज़ कर दो, क्योंकि पुराने ज़माने में लौंडी भी तो जायज़ थी।”
यह उसूल ऐसा ही है जैसे कोई कहे:
“पहले लोग तलवारों से लड़ते थे, तो आज हमें एटम बम बेधड़क चलाने की खुली छूट होनी चाहिए।”
हर वो जिस्मानी ताल्लुक़ हराम है, जिसमें न क़ानूनी, न मुआशरती ज़िम्मेदारी ली गई हो।
चाहे वो आज की गर्लफ़्रेंड हो, live-in relationship हो या किसी दौर का बे–लगाम मुहब्बत का रिश्ता।
इंसानी तारीख़ का जो “तज़ाद” बताया जा रहा है, वह दरअस्ल इंसानियत की “बक़ा का उसूल” है —
जो मिजाज़ लुत्फ़ को ज़िम्मेदारी, और हवस को क़ानून के दायरे में लाने का नाम है।
6. समाज ताक़त से नहीं, ज़ाब्तों से ज़िंदा रहता है
इस्लाम ने औरत को “मिल्कियत” से निकाल कर “मु़ह्सऩा” बनाया — क़िले में महफ़ूज़ औरत, जिसके चारों तरफ़ निकाह की दीवारें उसकी इज़्ज़त की निगहबान बनती हैं।
आज का लिबरल तबक़ा उसे फिर से “पब्लिक प्रॉपर्टी” बनाना चाहता है;
फ़र्क़ बस इतना है कि इस बार ज़ंजीरें लोहे की नहीं, बल्कि “रज़ामंदी” और “आज़ादी” के ख़ूबसूरत नारों से बुनी जाएँगी।
ऐ मेरी बहनों,
इस “आज़ादी” के नारे की आवाज़ में वो ज़हर छुपा है जो इमान की जड़ों तक उतर जाता है।
जिस आज़ादी ने हर बंदिश को “क़ैद” कहा, उसी ने औरत से उसकी पाकिजगि, हया और वक़ार छीन ली।
जो निकाह को “ज़ंजीर”, और हया को “कमज़ोरी” कहकर अलफाजो से तुम्हारे दिलों को बदलना चाहते हैं।
हर नारा जो “आज़ादी” का दावा करे, दरअस्ल तुम्हारी “ग़ुलामी” की नई शक्ल भी हो सकता है।
ये फ़िक्री हमला चुपचाप तुम्हारे दिलों और घरों में दाख़िल हो रहा है—
तुम्हारे निकाह, तुम्हारी शर्म, तुम्हारी हया को “पुरानी चीज़ें” बनाकर मिटाने की साजिश की जा रही है।
हमें उस फ़िक्री धुंध से बचा ले जो “आज़ादी” के नाम पर हमारी हया को छीनती है।
हमें वो फ़हम अता कर जो हक़ और धोखे में फ़र्क़ कर सके,हमारे दिलों को शरीअत पर क़ायम रख, हमारी बहनों को वह फ़हम अता कर जो हक़ और फ़रेब में फ़र्क़ कर सके। हया को उनका ज़ेवर बना, जो नफ़्स के धोखों में बहक रही हैं, उन्हें अपने नूर से राह दिखा।
आमीन।







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