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Tarakki Ya Zawal: Modern Daur Me Rishto Ki Qadr Karna.

Insaniyat, Mohabbat aur Izzat Ka Haque.

इंसानियत वही… जो किसी टूटे दिल को संभाल ले.
कब बदले हमारे घर—माँ पिघल गईं, बाप ख़ामोश हो गया!
मोहब्बत में क्यों खो गया अदब? रिश्तों का बिगड़ता सच.
आज का दौर: जहाँ डिग्रियाँ बढ़ीं लेकिन तहज़ीब गुम हो गई.
माँ-बाप बुज़ुर्ग नहीं, रहमत हैं—लेकिन हमने फ़साना बदल दिया.
अजीब दौर है: पड़ोसी भूखे और हम मोबाइल में मशरूफ़!
क्यों मिट रही है क़द्र? लोगों में अदब और घरों में बरकत कम क्यूँ?
आज की तरक़्क़ी या गिरावट? एक ऐसी सच्चाई जो हर दिल को छू जाएगी?
क्यों टूट रहे हैं घर? नए दौर की वो खामोश बरबादि जिसे कोई नहीं समझता.
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रिश्तों की सच्चाई:  क्यों मिट रहा है मोहब्बत और बढ़ रहा है फ़ासला?
आज की दुनिया में सबसे कीमती चीज़ है—किसी का दिल न तोड़ना।
अगर प्यार नहीं दे सकते, तो कम से कम इज़्ज़त से पेश आना सीखिए।


हमारी तरक़्क़ी या ज़वाल?

आज की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में हम ख़ुद को “Modern Lifestyle, Digital Era, Fast Life, Gen Z Culture” के दायरों में क़ैद कर चुके हैं।
दुनिया आगे बढ़ रही है—पर क्या हम वाक़ई तरक़्क़ी कर रहे हैं?
या हम अपने रिश्तों की गर्माहट, अपनी तहज़ीब की मिठास और घर की रूह खो चुके हैं?

मां से Mom तक — तरबियत की रोशनी कहां खो गई?

एक ज़माना था जब मां की बस एक नज़र बता देती थी कि हम ग़लत कर रहे हैं।
उस नज़र में मोहब्बत भी होती थी और तरबियत की आगाही भी।

आज मां “Mom” बन चुकी हैं—
बहुत नरम, बहुत मुलायम, इतनी कि वो ज़रूरी सख़्ती भी भूलती जा रही हैं।

हम कहते हैं:
“Mom बहुत soft हो गई हैं…”

लेकिन असल में हम ही वो वजह बन गए हैं जिसने मां की मज़बूती को कमज़ोर कर दिया। इस्लिये के अब अम्मि से मोम बन गयि.

अब्बू से Dad तक — रिश्ता जिंदा है या बस एक नाम?

पहले शाम ढलती नहीं थी और दिल अब्बू की आहट ढूंढने लगता था।
उनका दरवाज़े से अंदर आना घर में बरकत, सुकून और अपनापन ले आता था।

आज हम Dad कहते हैं—

मगर रिश्ता “Dead” होने लगा है।
Generation Gap, Busy Life, Mobile Screen ने वो फ़ासला पैदा कर दिया है जो कभी था ही नहीं।
ये फ़ासला वक्त ने नहीं,
हमने खुद बनाया है।

फूफी — कभी रहमत थीं, अब फसाद क्यों?

फूफी के आने पर बेहतरीन बिस्तर, बढ़िया बर्तन और सबसे अच्छा सलीका निकाला जाता था।
घर में बताया जाता था:
ये तुम्हारे अब्बू की बहन हैं… घर इनका भी है।”

आज “Phuphi Problems, Family Politics” जैसे सोशल मीडिया के जुमले हमारी सोच में ज़हर बनकर उतर चुके हैं।

रिश्ते फसाद नहीं लाते,
लोग अपनी नीयत और दिलों से फसाद पैदा करते हैं.

तालीम से डिग्री तक — रोशनी कहां गुम हुई?

तालीम वो थी जो इंसान के अख़्लाक़, आदतों और किरदार में चमकती दिखाई देती थी।

आज डिग्रियाँ, सर्टिफिकेट और मार्कशीट्स ने जगह ले ली—

इल्म से ज्यादा काग़ज़ को अहमियत दी जाने लगी।

सीवी भर गए…
लेकिन दिल और दिमाग खाली रह गए।

इसलिए आज इंसान कहता है:
नौकरी मिल गई, सुकून नहीं मिलता…

क्योंकि सुकून डिग्री से नहीं,
असली तालीम से मिलता है।

पड़ोसी — जो कभी अपना था, आज अंजान क्यों?

कभी मोहल्ला एक परिवार की तरह होता था।
किसी के घर में कुछ पक्का—साझा।
फल—साझा।
खुशी—साझा।
ग़म—साझा।

आज हम Privacy और Personal Space के नाम पर दीवारें खड़ी कर चुके हैं।

इतना कि पड़ोसी भूखे मर जाए,
बच्चे बेचने पर मजबूर हो जाएँ,
और हमें खबर ही न हो।

क्या यही तरक़्क़ी है?
नहीं…  यह इंसानियत का ज़वाल है।

ईद, त्यौहार और परिवार — जश्न का असली मतलब खतम.

कभी ईद और त्यौहार मां-बाप, रिश्तेदारों और पूरे ख़ानदान के साथ मनाते थे।
वो दिन सिर्फ त्योहार नहीं—
मोहब्बत, बरकत और खुलुुुश का दिन होता था।

आज ईद Malls, Outings, Friends Hangouts, Shopping Reels तक सीमित हो चुकी है।
परिवार पीछे छूट रहा है—
और हम सोचते हैं कि हम “Independent” हो गए।

असल में…
हम सिर्फ अकेले हो गए हैं।

शादी — इबादत से ट्रेंड तक

पहले शादी घर के बुज़ुर्ग तय करते थे।
उनकी दुआओं में बरकत होती थी।
रिश्ते उम्र भर चलते थे।

आज “My Choice, Love Marriage, Runaway Couples” जैसे ट्रेंड रिवायत और बरकत दोनों को खा गए।

शादी सिर्फ दो लोगों का फैसला नहीं—
दो परिवारों की दुआ और दो दिलों की ज़िम्मेदारी है।

जब फैसले हवाओं में लिए जाएँ,
तो रिश्ते ज़मीन पर टिक नहीं पाते।

बुज़ुर्ग — रोशनी का चिराग या बोझ?

बुज़ुर्ग घर की रूह होते थे।
उनकी मौजूदगी घर में दुआ, बरकत और अमन भरती थी।

आज लोग कहते हैं:
वक्त नहीं है…

मगर असल में वक्त नहीं,
दिल छोटा हो गया है।

बुज़ुर्गों को बोझ समझने वाली सोच ही असली बोझ है इस समाज पर।

क्या यही तरक़्क़ी है?

हमने घर बदले,
फर्नीचर बदला,
मॉडर्न लाइफ बदली…
लेकिन दिल नहीं बदला।

न ही रिश्तों को संवारने की कोशिश की।
हक़ीक़ी तरक़्क़ी वही है जहाँ—
— मां की इज़्ज़त ज़िंदा रहे
— अब्बू का रुतबा कायम रहे
— फूफी का रिश्ता मीठा रहे
— पड़ोसी का हक़ अदा हो
— बुज़ुर्गों की इज्ज़त बरकरार रहे,
— और इंसानियत दिलों में जिंदा रहे,

आख़िर में… एक रोशन पैग़ाम

ज़िंदगी बहुत छोटी है।
रिश्ते बहुत नाज़ुक हैं।
और मोहब्बत…
वो सबसे कीमती चीज़ है।

अपने आस-पास देखें—
कहीं कोई टूटा हुआ है,
कहीं कोई भूखा है,
कहीं कोई तन्हा है।

बस एक मुस्कुराहट, एक सलाम, एक कदम बढ़ाना—

किसी की दुनिया बदल सकति है।

ज़िंदगी की असल फ़ज़ीलत इसी में है कि हम दिलों को टूटने से बचाएँ,
कदमों को ऐसे रास्तों पर ले जाएँ जहाँ किसी की रूह को ठेस न पहुँचे।

इंसान की कीमत उसके लिबास से नहीं,
बल्कि उसके अंदाज़-ए-ख़लूस, उसके लफ़्ज़ों की नरमी
और उसके दिल की सफ़ाई से पहचानी जाती है।

मोहब्बत में भी एक अदब होता है,
रिश्तों में भी एक हया होती है,
और इंसाफ़ में भी एक ख़ामोश रोशनी—
जो हर उस दिल पर उतरती है
जहाँ नफ़रत की जगह रहमत पलती हो।

किसी को छोटा समझकर कभी फ़ख़्र न करो,
क्योंकि ख़ुदा ने हर दिल को
अपनी मेहर के साये और इज़्ज़त के रंग से पैदा किया है।

ज़िंदगी की राहें तब ही आसान होती हैं
जब हम किसी के लिए मुश्किलें नहीं,
बल्कि आसानियाँ छोड़ कर जाएँ।

ज़िंदगी की असल खूबसूरती इसी में है कि हम दूसरों के लिए आसानी पैदा करें, न कि मुश्किलें।
किसी को छोटा समझकर कभी खुश न हों, क्योंकि हर दिल को खुदा ने अपनी रहमत और फितरत के साथ बनाया है।
मोहब्बत, लिहाज़ और इंसाफ—ये तीन बातें हर रिश्ते को जिंदा रखती हैं।

अल्लाह हम सबको मोहब्बत, अदब, रहमदिली और इंसानियत की रौशनी से भर दे।
जज़ाक अल्लाहु ख़ैरन कसीरा।

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