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DOES GOD EXIST: The Secret War Against Ulema.

 Does God Exist? When Propaganda Fails, Leaders Get Defamed—Know the Game.

When truth rises, propaganda smears the guide—see why?
The Hidden Playbook: Why Propaganda Targets Faith When It Loses.
Truth vs Propaganda: The Secret War Against Belief in God.
Propaganda lost. Faith attacked. Understand the game.
Propaganda vs God: Why Leaders Are Defamed When Truth Prevails.
Does God Exist? Exposing the Propaganda Game Against Faith & Leaders.
जब प्रोपेगेंडा हार जाए, तो रहबर को बदनाम किया जाता है—समझो खेल!
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उलमा फ़ितनापरस्त नज़रियात के लिए सबसे मज़बूत रुकावट हैं।
DOES GOD EXIST? क्यों अथीज़्म और लिबरलिज़्म उलेमा से खफ़ा रहते हैं, कैसे बदनामी की मुहिम चलती है, और मुसलमानों को किस तरह बेदार रहना चाहिए ताकि अपने दीनी रहबरों से जुड़कर गुमराही से महफ़ूज़ रह सकें।

इल्हाद के शोर में ईमान की ख़ामोश मेहनत.
आज के दौर में मुल्हिदीन से मुनाज़रा करना रद्द-ए-इल्हाद का एक जाना-माना और असरदार तरीक़ा है, और इसकी अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह समझ लेना कि इल्हाद के ख़िलाफ़ सारा काम सिर्फ़ मुनाज़रों तक महदूद है, हक़ीक़त से दूर है। रद्द-ए-इल्हाद असल में एक मुसलसल तरबियती अमल है, जो बहस से नहीं बल्कि बचपन में अकीदे की बुनियाद रखने से शुरू होता है।

वह मौलवी साहब जो किसी छोटे से मकतब में बच्चों को सादा सा जुमला पढ़ाते हैं—
रब का शुक्र अदा कर भाई, जिसने हमें पैदा किया
वह भी इल्हाद के ख़िलाफ़ ही काम कर रहे हैं। यहाँ न फ़लसफ़े की पेचीदगियाँ हैं, न दलीलों की नुमाइश, मगर ईमान की जड़ मज़बूत की जा रही है। यही जड़ आगे चल कर हर फ़िक्री हमले के सामने इंसान को क़ायम रखती है।

स्कूलों में हमें यह पढ़ाया जाता है कि इंसान किसी जानवर से तरक़्क़ी करके इस शक्ल तक पहुँचा है, मगर मकतब हमें यह याद दिलाता है कि हम बंदरों की नहीं बल्कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद हैं। यह फ़र्क़ सिर्फ़ निसाब का नहीं, बल्कि सोच और पहचान का है। यही पहचान इंसान को उसके रब से जोड़ती है और यही इल्हाद के नज़रिये के ख़िलाफ़ सबसे मज़बूत जवाब है।

आज अगर जदीद वसाइल, सोशल मीडिया और बड़े-बड़े प्रोपेगेंडा के बावजूद इल्हाद मुसलमानों की बड़ी तादाद को गुमराह नहीं कर सका, तो इसके पीछे उन्हीं गुमनाम असातिज़ा (अलिम ए दीन) की मेहनत है। वे लोग जो शोहरत से दूर, क़र्या-क़र्या और मुहल्ला-मुहल्ला मकातिब और मदरसों में बच्चों को ईमान, इबादत और अख़लाक़ सिखा रहे हैं।

यही वजह है कि आज भी नई नस्ल तौहीद का कलिमा ज़बान पर लाती है। यह किसी एक तक़रीर करने वाले या मुनाजरे की मेहनत नहीं, बल्कि उन उलमा की ख़ामोश जद्द-ओ-जहद का नतीजा है जो दिन-रात तालीम-ओ-तरबियत में लगे रहते हैं। हक़ीक़त यह है कि इल्हाद के ख़िलाफ़ सबसे मज़बूत मोर्चा यही मकातिब और मदरसात हैं, जो फ़िक्री सैलाब के सामने दीवार बन कर खड़े हैं।

मुनाज़रे उन लोगों के लिए होते हैं जो रास्ते से भटक चुके हों, ताकि उन्हें वापस लाया जा सके। मगर सबसे बेहतर हिकमत-ए-अमली यह है कि भटकने ही न दिया जाए। यही काम मकतब करता है, यही मदरसा करता है, और यही वह बुनियादी मोर्चा है जहाँ ईमान की हिफ़ाज़त होती है।

लिबरल सोच और मदरसों से दुश्मनी.

कुछ लिबरल हल्क़ों को मदरसों और उलमा से इसलिए परेशानी है कि ये इदारे इंसान को ख़ुदा से जोड़ते हैं, आज़ादी के नाम पर बे-लगामी नहीं सिखाते। उन्हें वह निज़ाम खटकता है जो अख़लाक़, जवाबदेही और अकीदे की बात करता है। असल में मदरसों से दुश्मनी ईमान की जड़ों पर हमला है, और इसी वजह से यह मुख़ालफ़त इतनी वाज़ेह नज़र आती है।

क्यों निशाने पर हैं उलमा? फ़ितनों की असली घबराहट का राज़
अथीज़्म, लिबरलिज़्म और ऐसे दूसरे फ़ितनापरस्त नज़रियात को उलमा, मौलाना और आलिम-ए-दीन से इस क़दर चिढ़ क्यों होती है? 
इसका जवाब बहुत सादा है। उनकी सबसे मज़बूत दीवार यही आलिम है। वही आख़िरी क़िला, जिसके सामने उनका हर प्रोपेगेंडा दम तोड़ देता है। जब तक अवाम अपने दीनी रहबर से जुड़ी रहती है, तब तक गुमराही का सौदा नहीं चल पाता—इसी सच्चाई से उन्हें बेचैनी रहती है।

इसलिए पहली कोशिश यह होती है कि अवाम और उलमा के दरमियान भरोसा तोड़ा जाए। कभी आलिम को “पिछड़ा, कठ्मुल्लाह” कहा जाता है, कभी “नफ़रत फैलाने वाला”, कभी “वक़्त से कटा हुआ”। मक़सद बहस नहीं, बदनामी है; दलील नहीं, शोर है। 
जब रहबर ही गुमनाम बना दिया जाए, तो क़ौम को भटकाना आसान हो जाता है।

लिबरल और सोशलिस्ट सोच अक्सर मज़हबी आलिम को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है, क्योंकि आलिम सवाल पूछना सिखाता है—और हर सवाल फ़ितने की दुकान के लिए ख़तरा बन जाता है। वह अल्लाह से रिश्ता जोड़ता है, जवाबदेही का एहसास जगाता है, और यही बातें हर बे-लगाम आज़ादी के नारे की जड़ काट देती हैं।

याद रखिए, यह नफ़रत अचानक नहीं उगती—इसे तरतीब से बोया जाता है तरकिब के साथ। सोशल मीडिया पर मज़ाक, तंज़, मीम्स और अधूरी क्लिप्स के ज़रिए उलेमा की शाख गिराने की मुहिम चलाई जाती है, ताकि मुसलमान अपने असली रहबर से दूर हो जाए। जब रिश्ता टूटेगा, तो रास्ता भटकाना आसान होगा—यही उनकी फिक्रि/ नज़रियाति जंग है।
मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वे शोर और साज़िश के फ़र्क़ को पहचानें। हर तंज़ “सच” नहीं होता, हर इलजाम “तहक़ीक़” नहीं। उलमा से इख़्तिलाफ़ हो सकता है, मगर नफ़रत फैलाना फ़ितने की निशानी है। अपने रहबरों से जुड़िए, सवाल कीजिए—मगर इज़्ज़त और इंसाफ़ के साथ।
   
शान-ए-मुफ़्ती शमाइल नदवी की तारीखी जीत.
हक़ और बातिल की जंग में जब भी सुच्चाई का सूरज निकलता है, बातिल की तारीकी छँट जाती है। हाल ही में मुफ़्ती शमाइल नदवी साहब ने जिस निडरता और बेबाकी के साथ इस्लाम के सही रुख़ को दुनिया के सामने पेश किया है, वह न सिर्फ क़ाबिल-ए-तारीफ़ है बल्कि मिल्लत-ए-इस्लामिया के लिए एक सरमाया-ए-इफ़्तिख़ार है।
 उनकी इस अज़ीम फ़तह ने मुसल्मानो के उन अक़ाबिर की याद ताज़ा कर दी है जिन्होंने हमेशा बातिल की आँखों में आँखें डालकर हक़ का परचम बुलंद किया। मुफ़्ती साहब का लहजा, उनके दलायल की मज़बूती और ईमान की हरारत ने दुश्मन के हर वार को नाकाम कर दिया। यह महज़ एक बहस की जीत नहीं, बल्कि अक़ीदे की पाकीज़गी और इल्म की बरतरी का ऐलान है।

जलायी हक़ की शम्ऐ ज़ौफ़शाँ मुफ़्ती शमाइल ने  
सुनायी डट के ईमानी अज़ान मुफ़्ती शमाइल ने

किया है फिर से ताज़ा अहद-ए-क़ासिम की रिवायत को  
किया बातिल को फिर से रायग़ाँ मुफ़्ती शमाइल ने

लहू गर्मा दिया है मिल्लत-ए-बैज़ा का ईमाँ से  
रक़म की जुरअतों की दास्ताँ मुफ़्ती शमाइल ने,

यह फ़तह-ए-हक़ का मुज़्दा है, यह ग़लबा दीन-ए-फ़ित्रत का  
बनायी है नई इक कहकशाँ मुफ़्ती शमाइल ने,

कटी ज़ंजीर-ए-बातिल, जब उठी ललकार-ए-ईमान 
मक़फ़ूल की है बातिल की ज़बाँ मुफ़्ती शमाइल ने

जिसे सुन कर यह अहल-ए-दीन व ईमाँ मुस्कुरा उठे  
किया है इस तरह सच को अयाँ मुफ़्ती शमाइल ने,

यह मुफ़्ती यासिर की दुआओं का समर निकला  
कि जीता इम्तिहान-ए-सख़्त जाँ मुफ़्ती शमाइल ने

अदू का क़स्र-ए-बातिल काँप उठा उनके लहजे से  
कि झंडा गाड़ डाला फिर वहाँ मुफ़्ती शमाइल ने,

ख़ुदा के मुनकिरों पर आज सक्ता हो गया तारी, 
किया बे-ख़ौफ़ होकर हक़ बयाँ मुफ़्ती शमाइल ने

अनस इनको मुबारक़बाद देता हर इक मोमिन  
हराया कुफ़्र का इक तर्जुमाँ मुफ़्ती शमाइल ने.
(मुहम्मद अनस बिजनौरी. दारुल ईमान अलीपुरा जट, ज़िला बिजनौर)
 
हासिल ए कलाम.
इल्हाद का मुक़ाबला सिर्फ़ स्टेज की बहसों से नहीं होता, बल्कि मकतब की ख़ामोश तालीम से होता है। यही ख़ामोश मेहनत आने वाली नस्लों के ईमान की सबसे बड़ी हिफ़ाज़त है। 
उलेमा- फ़ितनापरस्त नज़रियात (Atheism, socialism, liberalism etc.) के लिए सबसे मज़बूत रुकावट हैं। इसलिए अवाम और आलिम के रिश्ते को तोड़ने की कोशिश की जाती है।होशियारी,तदबिर और इंसाफ़ ही इसका जवाब है।
ऐ अल्लाह! हमें और हमारी आने वाली नस्लों को उन फितनों से बचा जो 'हमदर्दी' का लिबादा ओढ़कर हमें हमारे दीन से बेगाना करना चाहते हैं।  आमीन.

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