Bihar CM Hijab Controversy: Muslim Aurat Identity Aur Freedom.
Nitish Kumar Hijab Row: Muslim Aurat Freedom Ka Naya Storm.
Hijab Debate Bihar CM Nitish Kumar Se Muslim Aurat Azadi Talk.
Nitish Kumar Hijab Controversy: Muslim Aurat Azadi Debate.
CM की हरकत से समाज में हलचल: नक़ाब हटाने का असली मतलब क्या है?
मुस्लिम महिलाओं की आज़ादी बनाम राजनीति: नीतीश कुमार का नक़ाब विवाद.
सेक्युलरिज्म का नकाब और संघी एजेंडा: हिजाब के मुद्दे पर बेनकाब हुई दोहरी राजनीति!
बिहार में हिजाब की तौहीन: लिबरल और संघी दोनों का निशाना सिर्फ 'मुसलमान' क्यों?
क्या औरतो ने लिबरल्स को कोंसेट पेपर पर दसतखत करके दे दिया है क्या उसे पसंद है?
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| नीतीश कुमार ने नक़ाब हटाया: मुस्लिम महिलाओं की आज़ादी पर बड़ा सवाल! |
आज के दौर में 'औरत की आज़ादि (Women's Freedom) के दो सबसे बड़े सौदागर घूम रहे हैं। एक का नाम 'लिबरल' है, दूसरे का 'संघी'। दोनों की दुकानें अलग-अलग हैं, फलसफे जुदा-जुदा हैं, लेकिन जब निशाना एक 'मुसलमान औरत' हो, तो दोनों एक ही बोली लगाते हैं।
नीतीश कुमार और नक़ाब विवाद: मुस्लिम महिलाओं की आज़ादी पर क्या संदेश जाता है?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मुस्लिम महिला का नक़ाब हटाने की घटना ने समाज में गहरी बहस छेड़ दी है। जब एक राज्य का सरबराह, जो खुद को समाजवादी सोच वाला नेता मानता है, इस तरह का कदम उठाता है तो यह केवल व्यक्तिगत कार्रवाई नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश बन जाती है।
जब नेता खुद इस तरह का कदम उठाते हैं, तो आम जनता इसे वैध मान सकती है और महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद को दबाने की कोशिश कर सकती है।
इससे यह संदेश जाता है कि महिलाओं की स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। यह मानसिकता समाज में असहिष्णुता और विभाजन को जन्म देती है।
बिहार का वाकया और सियासत का मकरूह चेहरा: लिबरल और संघी गठजोड़ का सच.
बिहार की सरज़मीन पर जो मंज़र देखने को मिला, जहाँ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए एक मुस्लिम खातून डॉक्टर के हिजाब के साथ जो सुलूक किया गया, उसने न सिर्फ एक समुदाय के जज़्बात को मजरूह किया है, बल्कि मुल्क की सियासत में छिपी 'मुनाफिकत' (Hypocrisy) को भी भरे बाज़ार में बेनकाब कर दिया है। यह वाकया महज एक कपड़े का मसला नहीं था, बल्कि यह उस ज़हनीयत की एक झलक थी जो लिबरल और संघि दोनों के दिलों में मुसलमानों के लिये पल रही है।
लिबरल्स का दोहरा मियार: आज़ादी के नाम पर मजहब पर हमला.
सबसे अफ़सोसनाक पहलू यह है कि जब यह वाकया पेश आया, तो नामनिहाद 'लिबरल' तबका, जो खुद को मानवाधिकार और औरत की आज़ादी का अलंबरदार कहता है, उसने फौरन अपनी तोपों का रुख मज़लूम औरत के बजाय उसके हिजाब की तरफ कर दिया।
इनका इस्तदलाल (Argument) देखिए—ये कहते हैं कि "हिजाब औरत की आज़ादी को रोकता है।" यह वही तबका है जो जिस्म की नुमाइश को तो 'आज़ादी' और 'माडर्निटी' का नाम देता है, लेकिन जब कोई खातून अपनी मर्जी और अकीदे के मुताबिक पर्दा करती है, तो उसे 'गुलामी' का लेबल लगा दिया जाता है। यह सरासर "तज़ाद" (Contradiction) है। हकीकत यह है कि लिबरल लॉबी को औरत की आज़ादी से हमदर्दी नहीं, बल्कि इस्लाम के शायार (Symbols) से चिढ़ है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता हंसते हुए किसी की तहजीब का मजाक उड़ाते हैं, तो यह लिबरल जमात खामोश रहती है या दबी जुबान में उसी अमल को सही ठहराती है, क्योंकि उनके नजदीक इस्लाम पर चोट करना ही सबसे बड़ी 'प्रोग्रेसिव' सोच है।
संघी और लिबरल: एक ही सिक्के के दो पहलू.
दूसरी जानिब संघी विचारधारा है, जिसका एजेंडा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हिजाब और मुसलमानों के तशक्खस (Identity) के मसले पर 'लिबरल' और 'संघी' एक ही पेज पर नज़र आते हैं।
संघी खेमा तो चाहता ही यही है कि मुसलमानों की मज़हबी पहचान को मिटा दिया जाए। नीतीश कुमार के इस अमल को सोशल मीडिया पर जिस तरह धार्मिक तबका ने सपोर्ट किया, वह उनकी "इस्लामोफोबिक" मानसिकता का सबूत है। लेकिन यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि लिबरल्स ने अनजाने में या जानबूझकर संघी एजेंडे को ही मजबूत किया।
संघी कहता है: हिजाब हटाओ, यह हमारी संस्कृति नहीं।
लिबरल कहता है: हिजाब हटाओ, यह पिछड़ापन है।
नतीजा एक ही है—मुसलमान औरत से उसका हक़ छीनना। यह दोनों धड़े, जो सियासी मंच पर एक-दूसरे के दुश्मन नज़र आते हैं, इस्लाम मुखालिफत (Anti-Muslim sentiment) में आपस में 'इत्तेहाद' कर लेते हैं।
वोट के लिए 'सेक्युलर', हक के लिए 'खामोश'.
इस पूरे वाकये ने उस सियासी खेल को भी बेपर्दा किया है जो दशकों से मुसलमानों के साथ खेला जा रहा है। जब चुनाव का बिगुल बजता है, तो यही लिबरल पार्टियां और नेता "नेहरूवियन सेक्युलरिज्म" का वास्ता देकर मुसलमानों से "संघि ताकतों" को हराने की अपील करते हैं। उस वक़्त मुसलमान 'वोट बैंक' होता है जिसे डराया जाता है।
लेकिन जैसे ही मामला "शरीयत", "पर्दा" या "मुस्लिम पर्सनल लॉ" का आता है, ये रातों-रात "औरत की आज़ादी" के ठेकेदार बन जाते हैं। क्या सेक्युलरिज्म का मतलब सिर्फ मुसलमानों से वोट लेना है?
क्या उनके मजहबी जज़्बात का एहतराम सेक्युलरिज्म के दायरे में नहीं आता?
यह एक कड़वी सच्चाई है कि सियासी फायदे के लिए संघी "राष्ट्रवाद" का कार्ड खेलते हैं और लिबरल "प्रोग्रेसिव" होने का ढोंग करते हैं, मगर दोनों की सुई मुसलमानों की "तहजीबी शनाख्त" (Cultural Identity) को खत्म करने पर ही आकर रुकती है।
लिबरल इज़्म का नया फतवा: 'कपड़े कम करना आज़ादी, और ओढ़ना गुलामी?' – कंसेंट के ठेकेदारों का असली सच!
क्या औरत की 'रजामंदी' (Consent) भी अब लिबरल्स की मोहताज है?
आज के दौर में 'आज़ादी' और 'कंसेंट' (रजामंदी) दो ऐसे अल्फाज़ हैं, जिनका इस्तेमाल लिबरल जमात ने अपनी जागीर बना लिया है। लेकिन जैसे ही आप इनके फलसफे की गहराई में उतरते हैं, एक अजीबोगरीब तज़ाद सामने आता है। इनके यहाँ 'औरत की मर्जी' का मतलब सिर्फ़ वही है, जो लिबरल एजेंडे के खांचे में फिट बैठता हो।
1. कंसेंट या हुक्मनामा? (Consent or Dictatorship?)
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया भर की औरतों ने इन लिबरल्स के नाम कोई 'मुख्तारनामा' (Power of Attorney) साइन कर दिया है? क्या इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह हक़ मिल गया है कि वो तय करें कि एक बालिग़ और समझदार लडकि के लिए क्या पहनना 'तरक्की' है और क्या पहनना 'दकियानूसी'?
जब एक औरत अपनी मर्जी से, अपने मजहब और तहजीब से मोहब्बत करते हुए हिजाब, नकाब या साड़ी का पल्लू (घुंघट) ओढ़ती है, तो लिबरल्स का दम क्यों घुटने लगता है?
अगर वो 'कम कपड़े' पहने तो कहा जाता है— "Wow! Her Body, Her Choice" (उसका जिस्म, उसकी मर्जी)।
लेकिन अगर वही औरत अपने सर को ढांप ले तो फौरन हुक्म जारी होता है— "She is brainwashed, she is oppressed" (यह तो दबी हुई है, पिछड़ी हुई है)
यह कौन सा इंसाफ है?
क्या 'कंसेंट' का मतलब सिर्फ कपड़े उतारना ही रह गया है?
हकीकत यह है कि लिबरल्स को औरत की 'चॉइस' से नहीं, बल्कि उसकी उस चॉइस से नफरत है जो उनके 'वेस्टर्न मियार' (Western Standards) को चुनौती देती है। यह औरत की आज़ादी नहीं, बल्कि औरत की अक्ल पर तानाशाही है। वो मानकर चलते हैं कि एक मजहबी औरत को अपनी भलाई का पता ही नहीं है, इसलिए "हमें उसे बचाना होगा"—भले ही वो बचना न चाहे। यह रवैया खुद में एक 'पैट्रियार्की' है, बस इसका चोला सेक्युलर है।
2. बिहार का वाकया: जब 'आज़ादी' के नाम पर बद-तहजीबी को डिफेंड किया गया.
बिहार में जो हुआ, वह सिर्फ एक सियासी वाकया नहीं था, बल्कि लिबरल जमात की जहनी गिरावट (Mental Bankruptcy) का सबूत था। नीतीश कुमार ने जब भरी सभा में एक खातून डॉक्टर का हिजाब या नकाब जबरदस्ति उतारा/छेड़ा जैसा विडिओ मे दिख रहा है, तो कायदे से यह "Violation of Bodily Autonomy" (जिस्मानी मुख्तारी का हनन) था। किसी भी औरत को उसकी मर्जी के बिना छूना या उसके कपड़ों से छेड़छाड़ करना जुर्म है।
लेकिन अफसोस! लिबरल्स ने यहाँ भी 'गेम' खेल दिया। बजाय इसके कि वो उस नेता की बद-तहजीबी, बेहुद्ग़ी पर सवाल उठाते, उन्होंने बहस का रुख 'हिजाब' की तरफ मोड़ दिया।
दलीलें दी जाने लगीं कि "सार्वजनिक जीवन में चेहरा दिखना चाहिए"।
कहा गया कि "यह तो मॉडर्न होने की निशानी है"।
गोया, अगर कोई संघी या सेक्युलर नेता किसी मुस्लिम औरत की बेइज्जती करे, तो लिबरल्स उसे 'सुधार' (Reform) का नाम देकर जस्टिफाई कर देते हैं। यह उनकी 'इस्लामोफोबिया' से भरी हुई जेहनियत है, जो उन्हें यह मानने ही नहीं देती कि एक पढ़ी-लिखी डॉक्टर भी अपनी मर्जी से पर्दा कर सकती है।
Timeline: बिहार हिजाब वाकये पर लिबरल्स के रंग बदलने की दास्तान.
कैसे लिबरल-संघी गठजोड़ ने इसे मुस्लिम मुखालिफ रंग दिया, इसकी तफ्सील मुलाहिज़ा फरमाएं:
पहला मरहला: वाकया (The Incident)
क्या हुआ: नीतीश कुमार एक प्रोग्राम के दौरान एक मुस्लिम महिला डॉक्टर की तरफ बढ़ते हैं और हंसते हुए उसके हिजाब/नकाब की तरफ इशारा करके उसे टोकते हैं, फिर उसे हटा देते हैं खिंच कर। महिला असहज (Uncomfortable) हो जाती है।
फौरी असर: वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होता है। आम मुसलमानों और इंसाफ पसंद लोगों को यह एक औरत की 'Self-Respect' (आत्म-सम्मान) पर हमला लगता है।
दूसरा मरहला: खामोशी और कन्फ्यूज़न (The Silence)
लिबरल्स का रिएक्शन: शुरू में सन्नाटा। क्योंकि करने वाला 'नीतीश कुमार' है (जो कभी सेक्युलर खेमे के हीरो होते हैं, समाज्वादि ख्यालात के), और जिसके साथ हुआ वो 'मुस्लिम महिला' है।
दुविधा: अगर नीतीश की आलोचना करें तो 'इंडी गठबंधन' या सेक्युलर/ समाजवाद इमेज को नुकसान होगा। अगर सपोर्ट करें तो 'मुस्लिम तबका' का क्या होगा?
तीसरा मरहला: नैरेटिव का 'शिफ्ट' (The Narrative Shift)
पैंतरा: यहाँ लिबरल्स ने अपनी पुरानी चाल चली। उन्होंने 'एक्शन' (नीतीश की हरकत) को इग्नोर करके 'ऑब्जेक्ट' (हिजाब) को विलेन बना दिया।
बयान: सोशल मीडिया पर तथाकथित बुद्धिजीवी लिखने लगे— "डॉक्टर को चेहरा तो दिखाना ही चाहिए," "पर्दा तो दकियानूसी है," "नीतीश जी शायद उसे आज़ाद करना चाह रहे थे।"
नतीजा: जो मुद्दा "बदतमीजी" का था, उसे "पर्दा प्रथा" का मुद्दा बना दिया गया।
चौथा मरहला: संघी-लिबरल भाईचारा (The Unholy Alliance)
क्लाइमेक्स: आखिर में, संघी ट्रोल आर्मी (जो हिजाब से नफरत करती है) और लिबरल जमात (जो हिजाब को पिछड़ापन मानती है) दोनों एक सुर में बोलने लगे।
मकसद: दोनों का मकसद एक ही था—मुस्लिम औरत की 'इज़्ज़त व वक़ार, खुदमुख्तारि, इमान और हक़' को खारिज करना और यह साबित करना कि "हम तय करेंगे कि तुम कैसे रहोगी।"
इस पूरे तमाशे से यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई है कि लिबरल्स के लिए 'औरत की आज़ादी' सिर्फ एक सियासी नारा है। अगर औरत की मर्जी उनके लाइफस्टाइल से मेल खाती है, तो वो 'क्रांतिकारी' है। लेकिन अगर वो अपनी तहजीब और हया के साथ जीना चाहे, तो वो 'बेचारी' है।
हकीकत यह है कि इन्होंने औरतों से कोई कंसेंट नहीं लिया है, बल्कि यह चाहते हैं कि हर औरत अपनी सोच, अपनी पहचान और अपना अकीदा गिरवी रखकर, इनके बनाए हुए 'आज़ादी के पिंजरे' में कैद हो जाए। लेकिन अब वक़्त बदल रहा है, और लोग इस मुनाफिकत (Hypocrisy) को बखूबी पहचानने लगे हैं।
लिबरल की 'बिकनी वाली आज़ादी' और संघी का 'नारीवाद': मुसलमान औरत ही निशाना क्यों?
आज़ादी के दो सौदागर और एक मज़लूम औरत.
पहला सौदागर: 'ग्लोबल' लिबरल और उसका हुक्मनामा.
यह लिबरल तबका, जिसका नेटवर्क और इकोसिस्टम पूरी दुनिया में फैला है, खुद को अमेरिका/लेफ्ट/महिला का भेजा हुआ 'मुक्तिदाता' समझता है। उसका एक सीधा-सादा उसूल है:
"तुम वही पहनो जो मैं चाहूँ, क्योंकि मेरी मर्ज़ी ही तुम्हारी आज़ादी है।"
उसके नज़दीक, एक औरत का बिकनी पहनना या नंगा रहना उसका "Bold Choice" है, लेकिन अगर वही औरत अपनी मर्ज़ी से अपनी हया और तहज़ीब की हिफाज़त के लिए पर्दा कर ले, तो उसे "दिमागी गुलाम" करार दे दिया जाता है। यह ज़हनियत कितनी खतरनाक है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि यह सिर्फ भारत तक महदूद नहीं। यह एक ग्लोबल एजेंडा है जो दुनिया भर के मुसलमानों पर अपनी सोच थोपना चाहता है।
वे कहते हैं, "हम तुम्हें पिछड़ेपन से आज़ाद कर रहे हैं।" हकीकत में, वो आपको अपनी पहचान से आज़ाद करके, अपनी तहज़ीबी गुलामी में जकड़ना चाहते हैं। यह एक ऐसी मीठी ज़हर की गोली है जो 'आज़ादी' के रैपर में लपेटकर दी जाती है, और जो इसे खाने से इंकार कर दे, वो 'जाहिल' और 'दकियानूस' है। दरअसल मे वह मुसलमानो कि शिनाख्त खत्म करके अपना पह्चान थोपना चाहता है, जो उसके उसुलो पर खडा उतरे.
दूसरा सौदागर: 'देसी' संघी और उसका दोहरा चेहरा.
दूसरा सौदागर और भी दिलचस्प है। यह अपनी घर की औरतों से उम्मीद करता है कि वो 'भारतीय परंपरा' और 'संस्कृति' में रहें। घूंघट या साड़ी के पल्लू को वो 'मर्यादा' का नाम देता है, और यह उसकी नज़र में बिलकुल सही है।
लेकिन जैसे ही मामला एक मुस्लिम औरत का आता है, उसके अंदर का सोया हुआ 'नारीवादी' अचानक जाग जाता है। वो फौरन लिबरल्स के सुर में सुर मिलाकर चिल्लाने लगता है—"देखो, देखो! मुस्लिम औरत पर ज़ुल्म हो रहा है! उसे हिजाब से आज़ाद करो!"
यह मुनाफिक़त की इंतेहा है। क्या संघी को सच में मुस्लिम औरत की फिक्र है? हरगिज़ नहीं!
उसकी लड़ाई औरत की आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि 'मुसलमान दुश्मनी' में है। वह लिबरल के कंधे पर रखकर अपनी बंदूक चलाना चाहता है। उसे पता है कि मुस्लिम औरत का हिजाब इस्लाम की एक मज़बूत निशानी है, और अगर इस निशानी पर हमला हो, तो इससे उसका 'इस्लाम-मुक्त भारत' का एजेंडा ही मजबूत होगा।
जब दोनों सौदागर एक हो गए. (संघी+लिबरल)
लिबरल और संघी, दोनों जानते हैं कि वो एक दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन जब एक बा-हिजाब, खुद-मुख्तार (Independent) मुस्लिम औरत सामने आती है, तो दोनों की दुश्मनी 'इत्तेहाद' में बदल जाती है।
लिबरल कहता है: "यह मेरे 'प्रोग्रेसिव वर्ल्ड ऑर्डर' के खिलाफ है।"
संघी कहता है: "यह मेरे 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के खिलाफ है।"
अंजाम?
दोनों मिलकर उस औरत को घेर लेते हैं और उस पर अपनी-अपनी पसंद थोपने की कोशिश करते हैं। एक 'आज़ादी' के नाम पर, दूसरा 'संस्कृति' के नाम पर, लेकिन मकसद दोनों का एक ही है—मुस्लिम पहचान को मिटाना।
इसलिए, ऐ सोचने वालो! समझ जाओ कि यह लड़ाई तुम्हारी भलाई की नहीं, बल्कि तुम्हारी शनाख्त (Identity) को छीनने की है। असली आज़ादी यह नहीं है कि तुम बिकनी पहनो या घूंघट करो। असली आज़ादी यह है कि तुम्हें यह तय करने का हक़ हो कि तुम क्या करना चाहती हो—और इस फैसले पर न तो किसी ग्लोबल लिबरल की मुहर की ज़रूरत हो, और न ही किसी देसी संघी की इजाज़त की।
नतीजा: बेदारी की ज़रूरत.
मौजूदा हालात में यह साफ़ हो चुका है कि यह लड़ाई सिर्फ एक हिजाब की नहीं, बल्कि उस 'ज़ेहन' (Mindset) के खिलाफ है जो मुसलमानों को उनकी शर्तों पर जीने नहीं देना चाहता। नीतीश कुमार का हंसना और लिबरल्स का उस पर फलसफा बघारना, यह साबित करता है कि मुस्लिम कौम को अब अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान नए सिरे से करनी होगी।
जो हाथ वोट मांगते वक़्त आपके सामने जुड़ते हैं, वही हाथ जब आपके सर से दुपट्टा खींचते हैं, तो समझ जाना चाहिए कि इस सियासी बिसात पर आप सिर्फ एक मोहरा हैं। वक़्त आ गया है कि इस दोहरे रवैये और "एंटी-मुस्लिम फिक्र" को पूरी शिद्दत से रिजेक्ट किया जाए।
ऐ अल्लाह! हमारी मा बहनो को इज़्ज़त, हिफ़ाज़त और इल्म की दौलत अता कर। हमारी माँओं और बहनों को ज़दीद और लिबरल फ़ितनों और ऐसे शैतानि शर से महफ़ूज़ फ़रमा।







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