Find All types of Authentic Islamic Posts in English, Roman Urdu, Urdu and Hindi related to Quran, Namaz, Hadeeth, Ramzan, Haz, Zakat, Tauhid, Iman, Shirk, Islah-U-Nisa, Daily Hadith, Hayat-E-Sahaba and Islamic quotes.

Javed Akhtar: Islam Se Socialism Tak Ka Safar.

Javed Akhtar: Chaar Naslon Mein Fikri Tabdili Ka Safar.

Chaar Naslon Ka Fikri Safar: Javed Akhtar Ki Kahani.
चार पीढ़ियों की नींद, एक पूरी नस्ल का अंधेरा।.
हक़ की आवाज़ धीमी हो सकती है—ख़ामोश नहीं।
नस्लें अचानक नहीं बदलतीं… बेपरवाही धीरे-धीरे उनका रास्ता मोड़ देती है।
जहाँ दीन की शमअ बुझती है, वहीं बातिल अपनी सबसे तेज़ हवा भेजता है।
हक़ की राह हमेशा तंग होती है, मगर बातिल की राह हमेशा ढलान पर मिलती है।
जो नस्लें खुदा को भूल जाती हैं, दुनिया उन पर अपनी हदें थोप देती है।
बातिल की चमक को पहचानो — वह हमेशा तेज़ होती है, मगर हमेशा खोखली।
दीन हदें देता है ताकि इंसान टूटे नहीं — यह बात आज की दुनिया समझना नहीं चाहती।
ख़ाहिश की आज़ादी, अक़्ल की ग़ुलामी बन जाती है — यह बात लिबरलिज़्म नहीं बताता।
अपनी नस्ल को यह मत बताओ कि ‘जो चाहो करो’, बल्कि यह बताओ कि दिल किसके इशारे पर चाहता है।
नस्लों का सफ़र और हमारी बेख़बरी — एक तंबीही पैग़ाम
liberalism, JAved akhtar singer ideology, Poor ideology,
लिबरलिज़्म: आज़ादी के नाम पर रूह की कैद।
कभी–कभी इंसानी तारिख हमें ऐसी हैरतंगेज़ मिसालें दे जाता है कि रूह काँप उठती है। बस चंद नस्ले… और क़ौमों की राहें बदल जाती हैं। वही घराने जिनमें कभी इमान की ख़ुशबू बसती थी, कभी इल्म-ओ-दीन की रौशनी झिलमिलाती थी — वक़्त कि तारिकि उन्हें ऐसी मंज़िलों तक पहुँचा देते हैं जहाँ रूह तक उजड़ जाती है।

एक ऐसी कहानी जो हर घर में दोहराई जा सकती है.

आज का दौर तेज़ी से बदल रहा है। मोबाइल स्क्रीन, फ़िल्में, सोशल मीडिया और विचारधाराएँ बच्चों के दिमाग़ में उसी चुपचाप उतर रही हैं, जैसे पानी बिना आवाज़ के रेत में समा जाता है।

इसी तल्लुक से एक मशहूर परिवार कि मिशाल बार-बार चर्चा में आता है.
एक ऐसा परिवार जिसकी जड़ें दीन, इमान, अक़ीदा आज़ादी की लड़ाई और विज्ञान से जुड़ी थीं…
और बाद में उसका एक सदस्य खुले तौर पर नास्तिक बन गया।

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार की नहीं—

यह चेतावनी है कि किसी भी घर में ऐसा हो सकता है। 
जावेद अख्तर के बाप, दादा और परदादा तक का सफर करे, कैसे एक आलिम और दीनदार खानदान के अंदर बातिल का यलगार होता है और इल्म कि शम्मा बुझ जाति है.

फ़ज़ल हक़ ख़ैराबादी —  तालिम, दीन और बहादुरि कि अलामत

1857 की लड़ाई में फ़ज़ल हक़ ख़ैराबादी जैसी हस्ती ने
— ज्ञान भी संभाला,
— और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने का साहस भी दिखाया।

वे धर्म के गहरे जानकार, विचारों में दृढ़ और सिद्धांतों के पक्के थे।
ऐसी पीढ़ी मजबूत पहचान छोड़ती है, लेकिन…पीढ़ियों का परिवर्तन हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

मज़्तर ख़ैराबादी — कविता की कोमलता, परंपरा की खुशबू

अगली पीढ़ी के मज़्तर ख़ैराबादी साहित्य से जुड़ी,
कविता का सौंदर्य भी था और घर की धार्मिक परंपरा की चमक भी।

यह वह समय था जब दुनिया बदल रही थी,
और विचार धीरे-धीरे पुराने ढांचे में प्रवेश कर रहे थे।
फिर भी घर की बुनियाद स्थिर थी।

जानिसार अख़्तर — साहित्य महान, विचार समाजवादी.

अब आते हैं जानिसार अख़्तर की पीढ़ी पर—
जहाँ साहित्यिक प्रतिभा तो अद्भुत रही,
लेकिन सोच समाजवाद की तरफ़ झुकने लगी। (Leftism, Atheism)

यह वही पड़ाव था जहाँ परिवार की फिक्र, धार्मिक धरातल से हटकर राजनीतिक और वैचारिक लहरों में बहने लगी।

जावेद अख़्तर — शोहरत का सितारा, विचारों में नास्तिकता

आज के दौर में गीतकार जावेद अख़्तर सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि,
वे ईश्वर में विश्वास नहीं रखते।

अब सोचिए—
जहाँ एक समय पूर्वज धार्मिक विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी और आध्यात्मिक व्यक्ति थे,
कुछ ही पीढ़ियों बाद वंश का एक प्रतिनिधि पूरी तरह इलहाद पर खड़ा दिखाई देता है।

यह कहानी है पीढ़ियों की फिक्र के बदलते रास्ते की।

यह किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं—
बल्कि एक चेतावनी है कि:

अगर विचारों और मूल्यों की सुरक्षा कमज़ोर हो जाए,
तो परिवार की पहचान कुछ पीढ़ियों में पूरी तरह बदल जाती है।

कैसे बदल जाती हैं नसले?
जब घर की तालीम-ओ-तरबियत कमज़ोर पड़ जाती है

अक़ीदा, शऊर और पहचान ख़ून से विरासत में नहीं मिलती;
इसे तो मोहब्बत, तालीम और मुसलसल तरबियत की रोशनी से ही सँवारा जाता है।
जब ये रोशनी धुंधली हो जाए तो दिल-ओ-दिमाग़ पर दूसरे रंग हावी हो जाते हैं।

माहौल इंसान की सोच को धीरे-धीरे बदल देता है.

अगर घर का माहौल मज़बूत न रहे,
तो बाहर की हवा— चाहे वह लिबरलिज़्म हो, समाजवाद हो या सरासर इलहादी खयालात—
बहुत आसानी से दिलों में जगह बना लेती है।

इंसान वही बनता है जिस माहौल में उसकी रूह ज़्यादा साँस लेती है।

स्क्रीन नई उस्दाद और नई तर्बियतगाह बन चुकी है.

आज की औलाद ज़्यादा वक्त
यूट्यूब, इंस्टाग्राम, वेब-सीरीज़ और डिजिटल दुनिया से सीखती है,
जहाँ हर बात चमकदार लगती है लेकिन हक़ीक़त से अक्सर खाली होती है।

कल को वही बच्चे शायद ईमान, तहज़ीब या पैरवी को एक “पुराने दौर की बात” समझने लगें—

तो इसमें हैरत कैसी?

दीन-ओ-पहचान से दूरियाँ नस्लो में जमा होती हैं, अचानक नहीं.

पहली नस्ल थोड़ी दूर जाए,
तो दूसरी और ज़्यादा,
और तीसरी कभी-कभी पूरी तरह कट जाती है।
यह सिलसिला यूँ ही चुपचाप आगे बढ़ता है और अचानक एक दिन महसूस होता है कि
हमारी नस्लें उस रास्ते पर पहुँच चुकी हैं

जिसका तसव्वुर भी हमने नहीं किया था।

यह किसी एक शख़्स की तन्क़ीद नहीं— बल्क़े समाज का आइना है.

हर इंसान को अपने यक़ीन और सोच का हक़ है,
लेकिन हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि

अपनी औलाद की फ़िक्र, तालीम और तरबियत को दुनिया की हवाओं के हवाले न कर दें।
अगर आज हम अपनी नस्लों की हिफ़ाज़त नहीं करेंगे,
तो कल वही नस्लें हमारी पहचान को “पुरानी” और इलहाद को “जदीद” समझने लगेंगी।
तो फिर रास्ता क्या है? — कुछ ज़रूरी बाते.

✔️ 1. घर के अंदर रूहानी और अख़लाक़ी माहौल क़ाएम रहे.

रोज़ाना कुछ लम्हे दीन, सच्चाई, इंसानियत या अच्छी बातों पर गुफ़्तगू के लिए निकालें।
यह छोटी सी कोशिश आने वाली नस्लों के लिए सहारा बन जाती है।

✔️ 2. स्क्रीन को बेहिसाब हुकूमत न करने दें.

डिजिटल दुनिया इंसान की सोच और रुख़ बदल देती है।
इस पर निगरानी न रखना ऐसे है जैसे...

घर का दरवाज़ा खुला छोड़कर सो जाना।

✔️ 3. औलाद से खुली और समझदार बातचीत.

बच्चों को समझाएँ कि
ज़िंदगी का मक़सद क्या है?
अच्छाई-बुराई का असल पैमाना क्या है,
और इंसान का असली सफ़र किस तरफ़ होना चाहिए।

✔️ 4. हम खुद अपने बच्चों के लिए मिसाल बनें.

क्योंकि बच्चे अक्सर वह नहीं सीखते जो हम कहते हैं,
बल्कि वह सीखते हैं जो हम करते हैं।

नतीजा — अक़ीदा की विरासत सिखाई जाती है, पैदा होते ही नहीं मिल जाती.

फ़ज़ल हक़ ख़ैराबादी से जावेद अख़्तर तक का सफ़र

हमारे सामने एक सख़्त मगर हक़ीक़त से भरा सबक़ रखता है:

परिवार की फ़िक्र और पहचान को बचाने के लिए
तरबियत की रोशनी को हर आने वालि नस्लो में पहुँचाना ज़रूरी होता है।

🔥 और अगर यह रोशनी बुझ जाए,
तो ईमान से इलहाद तक का फ़ासला सिर्फ कुछ नस्ल का ही होता है।

दींदारी से इलहाद तक का फासला
कई सदियों में नहीं—
कभी-कभी सिर्फ दो-तीन नस्लों में तय हो जाता है।

परदादा – फ़ज़ल-हक़ ख़ैरआबादी

1857 की जंगे-आज़ादी के बहादुर मुजाहिद,
शेख़ुल-इस्लाम, क़ुरआन के आलिम,
वह शख़्स जिसने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जेहाद का फ़तवा दिया।
दीन, इमान और वफ़ादारी — सब कुछ उनकी पहचान था।

दादा – मुअत्तर ख़ैरआबादी (मज़तर ख़ैरआबादी)

बड़े शायर, गहरे इल्म वाले,
अपनी दीनि विरासत के सच्चे अमीन।
घर में अभी भी रूहानियत की हवा बहती थी,
इमान की शम्मा अभी भी जगमगा रही थी।

वालिद – जानीसार अख़्तर. (Socialism, Leftism)

लफ़्ज़ों के बादशाह, मशहूर शायर —
लेकिन यहाँ से सफ़र बदलने लगता है।
सोशलिस्ट फ़िक्र, नए फलसफ़े. (इलहाद कि याल्गार यहि से शुरु हो गयि.)
दीन पर पकड़ ढीली होने लगी।
वह रौशनी जो दादा–परदादा के दिलों में चमकती थी, अब कुछ धुंधली होने लगी।

 मुल्हिद – जावेद अख़्तर (Leftism, Atheism)

नामवर शायर, मशहूर शख़्सियत —मगर मुल्हिद
ख़ुदा के वजूद तक का इंकार करने वाले।
इमान व अक़ीदा की चिंगारी जो पहली नस्ल में शोला थी,
इस नस्ल तक पहुँचते–पहुंचते ख़ाक हो गई।

गौर फरमाइये.
चार नसलो का यह सफ़र हमें क्या सिखाता है?
वही ख़ानदान…
जिसका पर्दादा दीन का सिपाही,
जिसका दादा इल्म का वारिस,
जिसका बाप शायर मगर दीन से दूर,
और जिसकी चौथी नस्ल खुलकर कहती है कि ख़ुदा है ही नहीं
क्या यह सिर्फ़ एक शख्स कि कहानी है?
नहीं…
यह हर उस घर की दास्तान बन सकती है जो अपनी नस्लों को दीन की हवाओं से दूर कर देता है।

आज अगर हम अपने बच्चों को
स्क्रीन की चकाचौंध,
मगरिबी रंग-ढंग,
और नफ़्स की बे-लगाम ख्वाहिशों के हवाले कर दें,
तो कल कौन जानता है—

हमारी आने वाली नस्ले
इमान को बोझ समझे,
दीन को मज़ाक समझे,
और अल्लाह का नाम लेना भी “जुर्म” मान ले!

नस्लें अकसर अचानक नहीं बिगड़तीं—
धीरे-धीरे, खामोशी से,
बस उतनी देर में जितनी देर हम अपने ही घर की शम्मा बुझती नहीं देखते।

तो अपने घर के माहौल को फिर से रौशन कीजिए।
इल्म, दुआ और तअलीम की हवा बहने दीजिए।
क्योंकि आपकी एक कोशिश,
आपकी एक दुआ,
आपकी एक तवज्जो —
शायद आपकी आने वाली कई नस्लों की हिफ़ाज़त बन जाए।

नस्लों का सफ़र हमारे हाथ में है…
उसे रौशन रखना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।

आख़िरी पैग़ाम — हक़ की रौशनी और बातिल की तारिकि

ख़ुदा की कसम… आज का सबसे बड़ा फ़ितना यही है कि
लिबरलिज़्म के नाम पर इंसान को उसके असल वजूद से काट दिया गया है।
हक़ और बातिल की सरहदें मिटा दी गई हैं,
और “आज़ादी” की खुशबू में, नफ़्स की बदबू छुपा दी गई है।

लोग समझ बैठे हैं कि बीना-सरहद की सोच ही तरक़्क़ी है,
जबकि सच्चाई यह है कि हदें टूटने से पहले इंसान टूटता है।

आज का लिबरल नज़रिया इंसान को
बे-लगाम रहने का हक़ तो देता है,
मगर सही राह चुनने की समझ छीन लेता है।

वह कहता है:
“जो दिल करे वही कर”… मगर कभी यह नहीं पूछता कि
दिल को किसने संभाला है?
कौन-सी ताक़त उसे सच और झूठ के बीच फर्क सिखाती है?

लिबरलिज़्म कहता है:
“सवाल करो।”
दीन कहता है:
सवाल करो, मगर जवाब रब्ब से मांगो।

लिबरलिज़्म कहता है:
“खुद को आज़ाद रखो।”
दीन कहता है:
“नफ़्स की गुलामी से निकलिए, तभी असली आज़ादी मिलेगी।”
जो दिल को खुदा से जोड़ दे… वही नस्लों का असली रखवाला।

ऐ अल्लाह…
हमारे दिलों, हमारी औलाद और हमारी आने वाली नस्लों को
हर तरह के बातिल, फ़ितने, गुमराही और नफ़्स की गुलामी से महफ़ूज़ रखना।
हमें हक़ की रौशनी पर क़ायम रख, और वह नज़र अता कर जो सच और झूठ में फ़र्क कर सके।
आमीन।

Share:

No comments:

Post a Comment

Translate

youtube

Recent Posts

Labels

Blog Archive

Please share these articles for Sadqa E Jaria
Jazak Allah Shukran

POPULAR POSTS