Javed Akhtar: Chaar Naslon Mein Fikri Tabdili Ka Safar.
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| लिबरलिज़्म: आज़ादी के नाम पर रूह की कैद। |
आज का दौर तेज़ी से बदल रहा है। मोबाइल स्क्रीन, फ़िल्में, सोशल मीडिया और विचारधाराएँ बच्चों के दिमाग़ में उसी चुपचाप उतर रही हैं, जैसे पानी बिना आवाज़ के रेत में समा जाता है।
इसी तल्लुक से एक मशहूर परिवार कि मिशाल बार-बार चर्चा में आता है.
एक ऐसा परिवार जिसकी जड़ें दीन, इमान, अक़ीदा आज़ादी की लड़ाई और विज्ञान से जुड़ी थीं…
और बाद में उसका एक सदस्य खुले तौर पर नास्तिक बन गया।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार की नहीं—
1857 की लड़ाई में फ़ज़ल हक़ ख़ैराबादी जैसी हस्ती ने
— ज्ञान भी संभाला,
— और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने का साहस भी दिखाया।
वे धर्म के गहरे जानकार, विचारों में दृढ़ और सिद्धांतों के पक्के थे।
ऐसी पीढ़ी मजबूत पहचान छोड़ती है, लेकिन…पीढ़ियों का परिवर्तन हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
यह वह समय था जब दुनिया बदल रही थी,
और विचार धीरे-धीरे पुराने ढांचे में प्रवेश कर रहे थे।
फिर भी घर की बुनियाद स्थिर थी।
अब आते हैं जानिसार अख़्तर की पीढ़ी पर—
जहाँ साहित्यिक प्रतिभा तो अद्भुत रही,
लेकिन सोच समाजवाद की तरफ़ झुकने लगी। (Leftism, Atheism)
यह वही पड़ाव था जहाँ परिवार की फिक्र, धार्मिक धरातल से हटकर राजनीतिक और वैचारिक लहरों में बहने लगी।
आज के दौर में गीतकार जावेद अख़्तर सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि,
वे ईश्वर में विश्वास नहीं रखते।
अब सोचिए—
जहाँ एक समय पूर्वज धार्मिक विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी और आध्यात्मिक व्यक्ति थे,
कुछ ही पीढ़ियों बाद वंश का एक प्रतिनिधि पूरी तरह इलहाद पर खड़ा दिखाई देता है।
यह कहानी है पीढ़ियों की फिक्र के बदलते रास्ते की।
तो परिवार की पहचान कुछ पीढ़ियों में पूरी तरह बदल जाती है।
बहुत आसानी से दिलों में जगह बना लेती है।
आज की औलाद ज़्यादा वक्त
यूट्यूब, इंस्टाग्राम, वेब-सीरीज़ और डिजिटल दुनिया से सीखती है,
जहाँ हर बात चमकदार लगती है लेकिन हक़ीक़त से अक्सर खाली होती है।
पहली नस्ल थोड़ी दूर जाए,
तो दूसरी और ज़्यादा,
और तीसरी कभी-कभी पूरी तरह कट जाती है।
यह सिलसिला यूँ ही चुपचाप आगे बढ़ता है और अचानक एक दिन महसूस होता है कि
हमारी नस्लें उस रास्ते पर पहुँच चुकी हैं
हर इंसान को अपने यक़ीन और सोच का हक़ है,
लेकिन हमारी ज़िम्मेदारी यह है कि
तो कल वही नस्लें हमारी पहचान को “पुरानी” और इलहाद को “जदीद” समझने लगेंगी।
डिजिटल दुनिया इंसान की सोच और रुख़ बदल देती है।
इस पर निगरानी न रखना ऐसे है जैसे...
बच्चों को समझाएँ कि
ज़िंदगी का मक़सद क्या है?
अच्छाई-बुराई का असल पैमाना क्या है,
और इंसान का असली सफ़र किस तरफ़ होना चाहिए।
क्योंकि बच्चे अक्सर वह नहीं सीखते जो हम कहते हैं,
बल्कि वह सीखते हैं जो हम करते हैं।
फ़ज़ल हक़ ख़ैराबादी से जावेद अख़्तर तक का सफ़र
🔥 और अगर यह रोशनी बुझ जाए,
तो ईमान से इलहाद तक का फ़ासला सिर्फ कुछ नस्ल का ही होता है।
दींदारी से इलहाद तक का फासला
कई सदियों में नहीं—
कभी-कभी सिर्फ दो-तीन नस्लों में तय हो जाता है।
1857 की जंगे-आज़ादी के बहादुर मुजाहिद,
शेख़ुल-इस्लाम, क़ुरआन के आलिम,
वह शख़्स जिसने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जेहाद का फ़तवा दिया।
दीन, इमान और वफ़ादारी — सब कुछ उनकी पहचान था।
बड़े शायर, गहरे इल्म वाले,
अपनी दीनि विरासत के सच्चे अमीन।
घर में अभी भी रूहानियत की हवा बहती थी,
इमान की शम्मा अभी भी जगमगा रही थी।
लफ़्ज़ों के बादशाह, मशहूर शायर —
लेकिन यहाँ से सफ़र बदलने लगता है।
सोशलिस्ट फ़िक्र, नए फलसफ़े. (इलहाद कि याल्गार यहि से शुरु हो गयि.)
दीन पर पकड़ ढीली होने लगी।
वह रौशनी जो दादा–परदादा के दिलों में चमकती थी, अब कुछ धुंधली होने लगी।
इमान व अक़ीदा की चिंगारी जो पहली नस्ल में शोला थी,
इस नस्ल तक पहुँचते–पहुंचते ख़ाक हो गई।
जिसका पर्दादा दीन का सिपाही,
जिसका दादा इल्म का वारिस,
जिसका बाप शायर मगर दीन से दूर,
और जिसकी चौथी नस्ल खुलकर कहती है कि ख़ुदा है ही नहीं।
नहीं…
आज अगर हम अपने बच्चों को
स्क्रीन की चकाचौंध,
मगरिबी रंग-ढंग,
और नफ़्स की बे-लगाम ख्वाहिशों के हवाले कर दें,
तो कल कौन जानता है—
हमारी आने वाली नस्ले
इमान को बोझ समझे,
दीन को मज़ाक समझे,
और अल्लाह का नाम लेना भी “जुर्म” मान ले!
नस्लें अकसर अचानक नहीं बिगड़तीं—
धीरे-धीरे, खामोशी से,
बस उतनी देर में जितनी देर हम अपने ही घर की शम्मा बुझती नहीं देखते।
तो अपने घर के माहौल को फिर से रौशन कीजिए।
इल्म, दुआ और तअलीम की हवा बहने दीजिए।
क्योंकि आपकी एक कोशिश,
आपकी एक दुआ,
आपकी एक तवज्जो —
शायद आपकी आने वाली कई नस्लों की हिफ़ाज़त बन जाए।
नस्लों का सफ़र हमारे हाथ में है…
उसे रौशन रखना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।
ख़ुदा की कसम… आज का सबसे बड़ा फ़ितना यही है कि
लिबरलिज़्म के नाम पर इंसान को उसके असल वजूद से काट दिया गया है।
हक़ और बातिल की सरहदें मिटा दी गई हैं,
और “आज़ादी” की खुशबू में, नफ़्स की बदबू छुपा दी गई है।
जबकि सच्चाई यह है कि हदें टूटने से पहले इंसान टूटता है।
बे-लगाम रहने का हक़ तो देता है,
मगर सही राह चुनने की समझ छीन लेता है।
“जो दिल करे वही कर”… मगर कभी यह नहीं पूछता कि
दिल को किसने संभाला है?
कौन-सी ताक़त उसे सच और झूठ के बीच फर्क सिखाती है?
“सवाल करो।”
दीन कहता है:
“सवाल करो, मगर जवाब रब्ब से मांगो।”
“खुद को आज़ाद रखो।”
दीन कहता है:
“नफ़्स की गुलामी से निकलिए, तभी असली आज़ादी मिलेगी।”
हमारे दिलों, हमारी औलाद और हमारी आने वाली नस्लों को
हर तरह के बातिल, फ़ितने, गुमराही और नफ़्स की गुलामी से महफ़ूज़ रखना।
हमें हक़ की रौशनी पर क़ायम रख, और वह नज़र अता कर जो सच और झूठ में फ़र्क कर सके।
आमीन।







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