Javed Akhtar Ne Debate Ko Rekhta Ka Stage Samajh Liya.
DOES GOD EXIST? इल्मी बहस या नफ्सियाती शिकस्त?
Why Liberals Fear the Ulema: The Hidden War Against Islamic Scholars.
जब जावेद अख्तर की 'बेबाकी' पर भारी पड़ी मुफ्ती शुमाइल नदवी की 'पुख्तगी'
जावेद अख्तर बनाम मुफ्ती शुमाइल नदवी: क्या दलीलों के सामने हार गई फिल्मी दानिशवरी?
जावेद अख्तर बनाम मुफ्ती शुमाइल नदवी: जब दलीलों के बुलडोजर ने 'नशिस्त-ए-रेख़्ता' का भ्रम तोड़ दिया.
Javed Akhtar Debate Analysis: चेहरे की शिकनें और बेबसी का अक्स— संजीदा फिक्री जायजा.
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| जब बेबाकी का जादू दलील के सामने फिका पड गया! |
जावेद अख्तर ने इल्मी मुबाहिसे को 'रेख़्ता' की महफिल समझ लिया, मुफ्ती शुमाइल नदवी के माकुल जवाब और फल्सफा ने एक 'शायर' के लहजे की इमारत को गिरा दिया, जावेद अख्तर के चेहरे पर छुपी बेबसी और पेशानी की शिकनें उस शिकस्त की कहानी सुना रही हैं जो शायद अल्फाज बयान न कर सके।
DOES GOD EXIST? क्या वाकई दलीलों के बुलडोजर ने लहजे की इमारत गिरा दी?
आज के दौर में फिक्री मुबाहिसे (वैचारिक बहस) महज इल्मी प्यास बुझाने का जरिया नहीं रहे, बल्कि ये नजरियात की बका (अस्तित्व) की जंग बन चुके हैं।
हाल ही में (20 दिसम्बर 2025) जावेद अख्तर और मुफ्ती शुमाइल नदवी के दरमियान होने वाला मुकामला सोशल मीडिया और फिक्री हलकों में बहस का मरकज बना हुआ है।
आम तौर पर जावेद अख्तर को 'रेख़्ता' जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बेबाकी, बरजस्ता जुमला-बाजी और हाजिर जवाबी के लिए जाना जाता है, जहां मद्दाह उनकी हर बात पर वाह-वाह करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। लेकिन इस बार मामला बिल्कुल बरअक्स (विपरीत) था। ऐसा मालूम होता था कि जावेद अख्तर ने नादानी में इस इल्मी स्टेज को भी रेख़्ता का मंच समझ लिया, मगर सामने कोई शायर या मद्दाह नहीं बल्कि इल्म-ओ-हिकमत की पुख्तगी लिए मुफ्ती शुमाइल नदवी खड़े थे।
नफ्सियाती उलझनें और इल्म का खोखलापन.
अगर हम जावेद अख्तर जैसे दानिशवरों के पस-मंजर (पृष्ठभूमि) का जायजा लें, तो यह अलमिया वाज़ेह नजर आता है कि उनकी फिक्र की बुनियादें फिल्मी दुनिया, कम्युनिस्ट नजरियात और माद्दा-परस्ती (भौतिकवाद) पर उस्तवार हैं।
उनका वास्ता या तो कभी पुख्ता मजहबी इल्म से पड़ा ही नहीं, या फिर उन्होंने जान-बूझकर अपनी 'हैवानी सोच पर इलाही तालीमात को कभी हावी नहीं होने दिया।
उनकी आंखें दुनिया की रंगीनियों के लिए तो खुली रहीं, लेकिन दिल का वो खला (खालीपन) जो सिर्फ ईमान और सुकून-ए-कल्ब से भरता है, शायद उन्हें कभी मुजतरिब (बेचैन) नहीं कर सका। यही वजह है कि मुफ्ती साहब के अकली (तार्किक), मंतिक और फिक्री दलायल के सामने वो संजीदगी से गौर करने के बजाय अपनी अना और जिद की तस्कीन में मसरूफ नजर आए।
चेहरे की शिकनें और बेबसी के आसार.
एक साहिब-ए-नजर कारी जब इस मुबाहिसे की वीडियो को 'जूम' करके देखता है, तो उसे लफ्जों के पीछे छुपी हकीकत साफ दिखाई देती है।
जावेद अख्तर भले ही ऊपर से मुस्कुरा कर सेशन को एन्जॉय करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी पेशानी पर उभरने वाली शिकनें, हाथों में पैदा होने वाली लरज़िश (कंपकंपी) और आंखों में तैरती बेबसी की लकीरें कुछ और ही कहानी सुना रही थीं।
वह शख्स जो हर महफिल में अपनी गुफ्तगू से दूसरों को दबा लेता था, आज उसके लहजे की इमारत मुफ्ती साहब की दलीलों के बुलडोजर से मुनहदमि (ध्वस्त) होती दिखाई दे रही थी।
यह एक ऐसी शिकस्त (हार) थी जो जुबान से तस्लीम नहीं की गई, मगर चेहरे के उतार-चढ़ाव ने इसका एलान कर दिया।
शिकस्त का अक्स और इंसानी हमदर्दी.
कभी-कभार जब मुखालिफ अपनी अना की वजह से अल-एलान हार न माने, तो उसके चेहरे पर फैली 'बेचारगी' खुद उसकी शिकस्त की गवाही देती है।
जावेद अख्तर जैसे शख्स को, जिसे हमेशा 'चढ़कर' बोलते देखा गया हो, इस हाल में देखना कि उसके पास कोई जवाब न बन पड़े, वाकई तरस का मुकाम है।
एक साहिब-ए-फिक्र-ओ-नजर के लिए यह मंजर इबरतनाक भी है और अफसोसनाक भी।
मुफ्ती शुमाइल नदवी की गुफ्तगू की पुख्तगी ने न सिर्फ दिल जीत लिए, बल्कि यह साबित कर दिया कि जब खालिस इल्म का मुकाबला सतही दानिशवरी से होता है, तो फतह हमेशा सच्चाई की होती है।
ज़ेहन की गिरफ़्त में लिपटी तरक़्क़ी—जावेद अख़्तर का नज़रिया और तहज़ीबी गुलामी.
जब कोई साहिब-ए-क़लम शख़्स महज़ अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ की नुमाइश से अपने इल्म और शऊर का सिक्का जमाने की कोशिश करे, तो समझ लीजिए कि वो दानिश की ऊँचाइयों पर नहीं, बल्कि मगरिबि तहज़ीब से ज़ेहनी मर्ग़ूबियत (mental submission) में गिरफ़्तार है। जावेद अख्तर नास्तिक का बचकाना हरकत मुफ्ती साहेब के सामने उन्हे नर्सरी का बच्चा साबित कर दिया। किसी राठी या कामरा को सुनने के बजाए ऐसे मुफ्ती को सुने जो उन्के झूठ का पर्दाफ़ाश करता हो।
असल परेशानी उनकी इल्मी कमज़ोरी नहीं, बल्कि वो सोच है जो अंग्रेज़ी ज़बान, मगरिबि लिबास और मवाद परस्ती को अक़्ल और हिकमत का मयार (standard) बना बैठी है।
आज का बुरा आलम ये है कि जो शख़्स अपनी तहज़ीब, अपनी ज़बान मे बात करे, उसे 'जाहिल, कट्टर' या 'पुराना' करार दे दिया जाता है — और जो पश्चिम की नकल करते हुए अपनी शिनाख़्त को खो दे, उसे 'रौशन-ख़याल', 'वैज्ञानिक' और 'लिबरल' का तमग़ा मिल जाता है। मगर हक़ ये है कि कपड़ों, ज़बान या लहजे से अक़्लमंदी नहीं टपकती, और न ही खुदा का इनकार करने से इंसान आलिम बन जाता है।
जावेद अख़्तर साहब contingency का मअनी न समझ पाए, ये कोई अफ़सोस की बात नहीं...
अफ़सोस तो ये है कि वो खुद को ख़ालिक़ से बेताल्लुक़ समझते हैं, लेकिन उसकी तर्जुमानी करने की कोशिश में मख़लूक़ के भी उसूल भुला बैठे।
जावेद अख़्तर साहब का "contingency" पूछना मज़ाक़ नहीं, बल्कि इस बात की दलील है कि सिनेमा और पश्चिमी अंदाज़ में जीने वाले अपनी ideological ज़ुबान अंग्रेज़ी मे ही ज्ञान बघारते हैं मगर यहाँ उनका वह सारा विलाय्ति अंदाज़ कमज़ोर और बेबस नज़र आया.
ऐ अल्लाह! उम्मत-ए-मुस्लिमाह को हर तरह के बातिल और नए-नए फ़ितनों से महफ़ूज़ रख। हमारे दिलों को ईमान पर क़ायम कर, हमारी ज़बानों को हक़ पर मज़बूत कर, और हमें उन राहों पर चला जो तेरी रहमत और नजात की तरफ़ ले जाती हैं। हमें गुमराही और फ़ितनों से बचा, और अपनी हिफ़ाज़त के साए में रख। आमीन







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