Jawed Akhtar vs Mufti Sahmail Nadvi: Liberalism ka Chehra.
Mufti’s Counter to Liberal Philosophy.
Exposing the Hollow Side of Liberalism.
Public Reactions and Viral Moments.
Conclusion: Faith vs Rationalism in Modern Times.
जब जावेद अख्तर की 'अंग्रेज़ी' दानिशमंदी एक मुफ्ती के सामने पानी भरती नज़र आई: लिबरलिज़्म का खोखलापन बेनक़ाब.
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| क्या आप चाहते हैं कि अब हम इस पर बात करें कि अपने बच्चों या नौजवानों को इस 'लिबरल और एथिस्ट प्रोपेगेंडा' से बचाने के लिए किस तरह की 'मेंटल ट्रेनिंग' (ज़हनी तरबियत) दी जाए? |
आज के दौर में जब कोई दाढ़ी-टोपी वाला आलिम-ए-दीन नज़र आता है, तो एक मख़सूस तबक़ा, जिसे हम 'लिबरल' या 'लेफ्टिस्ट' कहते हैं, उनके ज़ेहन में फ़ौरन एक ही तसव्वुर उभरता है—"ये तो मदरसा छाप है, इसे दुनियावी उलूम की क्या खबर? इसकी दौड़ तो बस मस्जिद तक है।" मगर हाल ही में एक ऐसा वाक़िया पेश आया जिसने इन तथाकथित रोशन-ख़यालों के गुमान के शीशमहल को चकनाचूर कर दिया।
20 December को टीवी पे मुनाज़रा था.
क्या खुदा/इशवर/God का वजुद है? (Does God Exist?)
Atheist Singer Jawed Akhtar VS Mufti Shamayil Nadavi.
डिबेट का मुकम्मल ख़ुलासा.
जब जावेद अख्तर साहब, जो अपनी ज़बान-दानी और शायरी के लिए जाने जाते हैं, मुफ्ती साहब के सामने तशरीफ़ लाए, तो उनका अंदाज़ ऐसा था गोया वो किसी मदरसे के तालिब-ए-इल्म को साइंस का पाठ पढ़ाने आए हों। लेकिन बहस जैसे-जैसे आगे बढ़ी, मंज़र बदल गया। जावेद अख्तर की दलीलें 'घिसी-पिटी पुरानी लाल सलाम टेप-रिकॉर्डर' जैसी साबित हुईं, जबकि मुफ्ती साहब ने जदीद फ़लसफ़े (Modern Philosophy) और साइंस की 'टर्मिनोलॉजी' से उन्हें ला-जवाब कर दिया।
यहाँ उस बहस के अहम नुक्तों का पोस्टमार्टम है:
1. कायनात का वजूद: 'चांस' (इत्तेफ़ाक़) या 'डिज़ाइन'?
जावेद अख्तर की घिसी-पिटी दलील:
जावेद साहब ने वही पुराना नास्तिकता का रटा-रटाया सबक़ दोहराया—"यह कायनात (Universe) एक 'एक्सीडेंट' है, बिग-बैंग हुआ और सब कुछ अपने आप बन गया। इसमें किसी ख़ुदा की ज़रूरत नहीं।" यह बात वो ऐसे कह रहे थे जैसे साइंस सिर्फ़ यही मानती हो।
मुफ्ती साहब का 'सर्जिकल स्ट्राइक' (The Counter)
मुफ्ती साहब ने ख़ालिस अंग्रेज़ी में 'Fine Tuning Argument' और 'Causality' (सबब और मुसब्बिब) का हवाला दिया। उन्होंने पूछा:
"Mr. Akhtar, if you see a complex machine like a watch, do you assume it assembled itself by an explosion in a metal factory? Or do you assume a maker?"
(मिस्टर अख्तर, अगर आप एक घड़ी देखते हैं, तो क्या यह मानते हैं कि यह किसी लोहे की फैक्ट्री में धमाका होने से ख़ुद-ब-ख़ुद बन गई? या आप इसके बनाने वाले को तस्लीम करते हैं?)
मुफ्ती साहब ने समझाया कि बिग-बैंग एक 'धमाका' था, और धमाके तबाही लाते हैं, निज़ाम (System) नहीं बनाते। इस क़ायनात का इतना सटीक निज़ाम इस बात का सबूत है कि इसके पीछे एक 'Intelligent Designer' (अक़्ल-ए-कुल) है। जावेद साहब यहाँ निरुत्तर थे, क्योंकि उनके पास 'इत्तेफ़ाक़' के अलावा कोई मंतिक नहीं थी।
2. नैतिकता (Morality) का सवाल: क्या सही, क्या ग़लत?
जावेद अख्तर का बचकाना तर्क:
"हम बिना मज़हब के भी अच्छे इंसान हो सकते हैं। अच्छाई हमारे अंदर है, इसके लिए डरने या जन्नत के लालच की ज़रूरत नहीं।"
मुफ्ती साहब का करारा जवाब (Objective vs Subjective Morality):
मुफ्ती साहब ने उनकी इस बात को 'इंटेलेक्चुअल ख़ुदकुशी' करार दिया। उन्होंने पूछा:
"On what basis do you define 'Good'? If there is no God, then morals are just personal opinions."
(आप 'अच्छाई' को किस बुनियाद पर तय करते हैं? अगर ख़ुदा नहीं है, तो अख़लाक़ सिर्फ़ आपकी ज़ाती राय है।)
मुफ्ती साहब ने मिसाल दी कि अगर कल को कोई समाज यह तय कर ले कि 'कमज़ोरों को मारना' सही है (जैसा हिटलर ने किया था), तो नास्तिकता (Atheism) के पास इसे ग़लत कहने की कोई ठोस वजह नहीं है, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ़ 'मैटर' का खेल है। मज़हब ही वह 'एंकर' है जो 'एब्सोल्यूट मोरालिटी' (मुतलक़ अख़लाक़) देता है। जावेद साहब यहाँ बगले झांकने लगे क्योंकि उनकी 'इंसानियत' का फलसफ़ा बिना ख़ुदा के खोखला साबित हुआ।
3. साइंस और इल्हाद: 'नर्सरी' बनाम 'पीएचडी'.
जावेद अख्तर की ग़लतफ़हमी:
जावेद साहब बार-बार डार्विन (Darwin) और साइंस का नाम लेकर यह साबित करना चाह रहे थे कि साइंस मज़हब के ख़िलाफ़ है। उनकी बातें 19वीं सदी के पुराने एथिस्ट लेखकों की नक़ल लग रही थीं।
मुफ्ती साहब का इल्मी वार:
मुफ्ती साहब ने साफ़ किया कि "Science explains 'How', Religion explains 'Why'." (साइंस बताती है कि चीज़ें 'कैसे' काम करती हैं, मज़हब बताता है कि चीज़ें 'क्यों' हैं।)
उन्होंने जावेद अख्तर को याद दिलाया कि साइंस बदलती रहती है, लेकिन हक़ीक़त (Truth) नहीं बदलती। मुफ्ती साहब ने 'Epistemology' (इल्मियात) पर बात करते हुए कहा कि जावेद साहब, आप जिस साइंस की आड़ ले रहे हैं, वो ख़ुद 'मेटा-फिज़िकल' (माबाद-उत-तबीयात) सवालों का जवाब देने में क़ासिर है। जावेद साहब को शायद उम्मीद नहीं थी कि एक 'मौलाना' उन्हें 'Epistemology' और 'Ontology' का पाठ पढ़ा देगा।
4. जावेद अख्तर की 'शेर-ओ-शायरी' काम न आई.
पूरी बहस का लब्ब-ओ-लुआब (Conclusion) यह था कि जावेद अख्तर सिर्फ़ 'लफ़्फ़ाज़ी' (Wordplay) कर रहे थे। वो शेर सुनाकर, लच्छेदार उर्दू बोलकर बात को घुमाना चाह रहे थे। यह उनका पुराना पैंतरा है—जब तर्क ख़त्म हो जाए, तो शायरी शुरू कर दो।
लेकिन मुफ्ती साहब ने उन्हें उनके इस 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर खींच लिया। मुफ्ती साहब की अंग्रेज़ी दलीलें इतनी सधी हुई और लॉजिकल थीं कि जावेद साहब की 'मग़रिबी आक़ाओं' वाली हेकड़ी निकल गई। यह साबित हो गया कि जावेद अख्तर साइंस के 'स्टूडेंट' नहीं, बल्कि मग़रिब के 'फैनबॉय' हैं, जो सिर्फ़ ऊपर-ऊपर की बातें जानते हैं। जबकि मुफ्ती साहब ने साबित किया कि दीन की समझ रखने वाला इंसान जब दुनियावी उलूम पढ़ता है, तो उसकी नज़र जावेद अख्तर जैसे 'स्यूडो-इंटेलेक्चुअल्स' (फर्ज़ी दानिश्वरों) से कहीं ज्यादा गहरी होती है।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले।
जो मुसलमान Leftist ध्रुव राठी या कुणाल कामरा को मोदी विरोधी की वजह से देखते है वे राठी को देखने के बजाए मुफ्ती साहेब का यह debate देखे। Click Here.
1. लिबरलिज़्म का मगरिबी चश्मा और हक़ीक़त की मार.
लिबरल्स और वामपंथी विचारधारा के हामियों की सबसे बड़ी ग़लती यह है कि वो हर चीज़ को मगरिबी (Western) चश्मे से देखते हैं। उन्हें लगता है कि अक़्लमंदी और दानिशवरी सिर्फ़ अंग्रेज़ी बोलने और सूट-बूट पहनने में है। जावेद अख्तर जैसे लोग, जो समाजवाद और नास्तिकता का लबादा ओढ़े हुए हैं, अक्सर मज़हबी तबक़े को हक़ारत की नज़र से देखते हैं।
जब मुफ्ती शमायिल साहब ने उनसे गुफ़्तगू शुरू की, तो उन्होंने सिर्फ़ रवायती दलीलों का सहारा नहीं लिया। उन्होंने उसी 'वेस्टर्न अंदाज़' और उसी 'अंग्रेज़ी ज़बान' में जावेद अख्तर को जवाब दिया, जिस पर इन लिबरल्स को बड़ा नाज़ होता है। नतीजा यह हुआ कि जावेद अख्तर, जो अंग्रेज़ी तहज़ीब की पैरोकारी करते नहीं थकते, मुफ्ती साहब की खालिस और मयारी (standard) अंग्रेज़ी को समझने में ही कासिर नज़र आए। यह वाक़िया साबित करता है कि सिर्फ़ अंधी तक़लीद (blind following) करना ही काफी नहीं होता, इल्म की गहराई भी ज़रूरी है।
2. 'कुत्ते की दुम' जैसी टेढ़ी सोच और दोहरी चाल.
पुराने बुजुर्गों की कहावत है कि "कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती।" यह मिसाल उन लोगों पर सटीक बैठती है जो दूसरों के अंदर कमियां निकालने के माहिर हैं, मगर अपने गिरेबां में झांकना नहीं जानते। लिबरल्स का यह पुराना शगल है कि जब तक उन्हें उनकी ही ज़बान में, उनके ही तर्ज़ पर करारा जवाब न मिले, वो अपनी रट लगाए रहते हैं।
जावेद अख्तर और उनके हमख़यालों को लगता है कि 'मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक' है। यानी एक आलिम सिर्फ़ तकरीर कर सकता है या शेर-ओ-शायरी पर बात कर सकता है। लेकिन जब एक बा-अमल मुफ्ती ने 'तर्क और दलील' (Logic and Reason) के मैदान में, वो भी अंग्रेज़ी ज़बान में उन्हें चुनौती दी, तो उनकी सारी तथाकथित 'मॉडर्निटी' धरी की धरी रह गई। यह उस जेहनियत पर करारा तमाचा था जो मदरसों को पिछड़ेपन की निशानी समझती है।
3. एथिज़्म के नाम पर मज़हब दुश्मनी.
आजकल सेक्युलरिज्म और लिबरलिज़्म की आड़ में एथिज़्म (नास्तिकता) को एक फैशन बना दिया गया है। इनका 'मॉडस ऑपरेंडी' (काम करने का तरीका) बहुत साफ़ है—खुद को आज़ाद-ख़याल बताओ और तमाम मज़हबों, ख़ासतौर पर इस्लाम पर तंज़ करो। इन्हें लगता है कि इन्हें हर मज़हब पर टीका-टिप्पणी करने का हक़ हासिल है, गोया ये 'फ्रीडम ऑफ़ स्पीच' के ठेकेदार हों।
लेकिन जैसे ही कोई बा-इल्म शख्स इनकी दोहरी चालों को बेनक़ाब करता है, या इनके खोखले तर्कों का जवाब देता है, तो ये फ़ौरन 'विक्टिम कार्ड' खेलने लगते हैं और शोर मचाना शुरू कर देते हैं। जावेद अख्तर का मामला भी कुछ ऐसा ही है। जब मुफ्ती साहब ने इल्मी और अक़्ली दलीलों के ज़रिए इनकी बोलती बंद की, तो वो हक्के-बक्के रह गए। उर्दू-अरबी में मात खाते तो शायद कह देते कि "हमें ये ज़बान नहीं आती", मगर अपनी ही 'आइडियोलॉजिकल' ज़बान (अंग्रेज़ी) में पिछड़ना इनकी ज़हनी पस्ती का सबूत है।
4. मुनाफ़िक़त का पर्दाफाश.
यह बहस सिर्फ़ दो अफराद के बीच की नहीं थी, बल्कि यह दो नज़रियात का टकराव था। एक तरफ वो थे जो सिर्फ़ मग़रिब की अंधी तक़लीद को तरक़्क़ी समझते हैं, और दूसरी तरफ वो जो अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी दुनियावी उलूम में महारत रखते हैं।
मुफ्ती शमायिल नदवि साहब ने यह साबित कर दिया कि दाढ़ी और टोपी का मतलब सिर्फ़ रवायती तालीम नहीं, बल्कि वक़्त के तकाज़ों को समझना और बातिल को उसी के हथियार से पछाड़ना भी है। जावेद अख्तर की ख़ामोशी और अंग्रेज़ी समझने में दुश्वारी ने यह बता दिया कि जो लोग दूसरों को 'पिछड़ा' कहते हैं, वो हक़ीक़त में ख़ुद इल्मी एतबार से कितने 'बौने' हैं।
साइंस किसि की जागीर नहीं: लिबरलिज़्म और 'फ़हाशी' के बिना भी आप 'मॉडर्न' बन सकते हैं.
आज के दौर में एक बहुत बड़ा 'मुग़ालता' (Misconception) फैलाया जा रहा है, ख़ास तौर पर हमारे नौजवानों के बीच। वो यह कि अगर तुम्हें साइंटिस्ट बनना है, या मॉडर्न कहलाना है, तो तुम्हें अपनी मज़हबी पहचान, अपनी दाढ़ी, टोपि, कुरता या अपना हिजाब और अपने अक़ीदे को सबसे पहले खैराबाद कहना होगा। जावेद अख्तर जैसे 'लेफ्टिस्ट' (वामपंथी) यह पट्टी पढ़ाते हैं कि साइंस और मज़हब (Religion) एक साथ नहीं चल सकते।
लेकिन हक़ीक़त इसके बिल्कुल बरअक्स (उलट) है। आइए, इस झूठ का पर्दाफ़ाश करते हैं।
1. साइंस 'लैब' में होती है, 'लेफ्टिज़्म' के दफ़्तर में नहीं.
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि साइंस किसी विचारधारा की मोहताज नहीं है। साइंस का मतलब है कायनात के क़ानूनों को समझना और उनका इस्तेमाल करना।
एक बा-अमल नमाज़ी, जो ख़ुदा के सामने सजदा करता है, वो भी 'एल्गोरिदम' बना सकता है, रॉकेट डिज़ाइन कर सकता है और न्यूरो-सर्जरी कर सकता है। साइंस के लिए 'एथिस्ट/ मुलह्हिद' (नास्तिक) बनना कोई 'एंट्री टिकट' नहीं है। न्यूटन से लेकर अब तक हज़ारों ऐसे साइंटिस्ट गुज़रे हैं जो पक्के मज़हबी थे।
लिबरल्स ने सिर्फ़ यह चाल चली है कि साइंस पर अपना 'ठप्पा' लगा दिया है, जबकि साइंस तो अल्लाह की बनाई हुई कायनात को समझने का एक ज़रिया भर है। आप अपने ईमान के साथ दुनिया के सबसे बड़े साइंटिस्ट बन सकते हैं।
2. 'फ़हाशी' और 'LGBTQ' एजेंडा: यह साइंस नहीं, 'कचरा' है.
जावेद अख्तर और उनके हम-ख़याल लोग चालाकी से 'टेक्नोलॉजी' और 'कल्चर' को मिला देते हैं।
याद रखिए! आईफ़ोन बनाना साइंस है, लेकिन आईफ़ोन पर नंगा नाच (फ़हाशी) देखना साइंस नहीं है।
हवाई जहाज़ उड़ाना तरक़्क़ी है, लेकिन मर्दों का मर्दों से शादी करना (Homosexuality/LGBTQ) तरक़्क़ी नहीं, बल्कि इंसानियत की पस्ती और एक दिमाग़ी ख़लल है।
मग़रिब (West) से हमें उनकी 'फिज़िक्स' और 'मेडिसीन' लेनी है, उनकी 'गंदगी' नहीं। साइंस का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि आप किसके साथ सो रहे हैं या आप कितने कम कपड़े पहनते हैं। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ 'मग़रिबी कल्चर' का एक हिस्सा है जिसे 'आज़ादी' के नाम पर थोपा जा रहा है। एक मुसलमान अपनी हया, अपनी शर्म और अपनी तहज़ीब के साथ भी चाँद पर जा सकता है। उसे मॉडर्न बनने के लिए 'बेहया' होने की ज़रूरत नहीं।
3. अंधी नक़ल नहीं, अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ें.
क्या आपने कभी जापानी या चीनी लोगों को देखा है?
वो अपनी ज़बान बोलते हैं, अपना खाना खाते हैं, अपने कल्चर पर फख़्र करते हैं, और फिर भी टेक्नोलॉजी में अमेरिका की आंख में आंख डालकर बात करते हैं।
तो फिर एक मुसलमान/हिंदु या कोई भी मज़हबी इंसान 'कुत्ते की दुम' बनकर मग़रिब की नक़ल क्यों करे?
असली मॉडर्निटी यह है कि आपका दिमाग़ कितना तेज़ है, यह नहीं कि आपकी स्कर्ट कितनी छोटी है या आपने शराब पी रखी है। लिबरलिज़्म सिर्फ़ एक 'सियासी पाखंड' है, साइंस से इसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। आप अपने दीन पर क़ायम रहकर भी दुनिया को लीड कर सकते हैं।
जावेद अख्तर की 'साइंसी' दलीलों का जनाज़ा: मुफ्ती साहब ने समझाया 'नर्सरी' और 'यूनिवर्सिटी' का फ़र्क.
एक तरफ वो लोग हैं जो खुद को 'दानिश्वर' और 'रेशनल' (तर्कवादी) कहते हैं, और दूसरी तरफ वो जिन्हें ये लोग हिकारत से 'कठमुल्ला' समझते हैं। लेकिन जब हक़ीक़त के मैदान में आमना-सामना हुआ, तो मंज़र कुछ और ही था। जावेद अख्तर, जो साइंस की आड़ लेकर इल्हाद (नास्तिकता) का प्रचार करते हैं, एक ऐसे मुफ्ती साहब के सामने तिफ़्ल-ए-मक़तब (स्कूल के बच्चे) साबित हुए, जो न सिर्फ़ दीन के माहिर थे, बल्कि मंतिक (Logic) और अंग्रेज़ी ज़बान के भी शहसवार निकले।
1. आठवीं जमात का तालिब-ए-इल्म बनाम जावेद अख्तर: तैयारी का मेयार.
किसी भी डिबेट या मुबाहिसे का उसूल होता है—तैयारी। एक आठवीं जमात का बच्चा भी जब किसी कॉम्पिटिशन में जाता है, तो अपने मौज़ू (विषय) पर पूरी तहक़ीक़ करता है, दलीलों को जमा करता है। लेकिन अफ़सोस! 'महान नास्तिक' और मग़रिब के प्यादे जावेद अख्तर साहब मुफ्ती साहब के सामने ऐसे नज़र आए जैसे किसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के सामने नर्सरी का बच्चा आ खड़ा हुआ हो।
जावेद अख्तर की सारी 'तैयारी' सिर्फ़ रटे-रटाए जुमलों और पुरानी कम्युनिस्ट किताबों तक महदूद थी। इसके बरअक्स, मुफ्ती साहब ने जावेद अख्तर के ही उसूलों और उनकी ही पसंदीदा ज़बान (अंग्रेज़ी) में दलीलों के ऐसे पहाड़ खड़े कर दिए, जिनका जवाब देने के बजाए जावेद साहब बगले झांकते नज़र आए। मुफ्ती साहब ने साबित किया कि साइंस पर सिर्फ़ नास्तिकों का कॉपीराइट नहीं है, बल्कि एक मज़हबी इंसान भी साइंस की गहराइयों को उनसे बेहतर समझ सकता है।
2. मग़रिब की 'अंधी तक़लीद' और साइंस का फ़रेब. (Science VS Scientism)
लिबरल्स की सबसे बड़ी चालाकी यह है कि उन्होंने 'साइंस' और 'वेस्टर्न कल्चर' (मग़रिबी तहज़ीब) को आपस में गडमड कर दिया है। मुफ्ती साहब ने इस फ़र्क को बहुत बारीक-बीन से वाज़ेह (स्पष्ट) किया।
साइंस लिबरलिज़्म की मोहताज नहीं: मुफ्ती साहब ने समझाया कि न्यूटन का क़ानून या आइंस्टीन की थ्योरी इस बात पर काम नहीं करती कि आप शराब पीते हैं या नहीं, या आप ख़ुदा को मानते हैं या नहीं। साइंस 'तजुर्बे' (Experiment) का नाम है, 'इल्हाद' (Atheism) का नहीं।
कल्चर इम्पिकोरियलज़्म: जावेद अख्तर जैसे लोग साइंस को अपनाने की बात नहीं करते, वो दरअसल मग़रिबी कल्चर को थोपना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक आप अपनी जड़ों, अपने दीन और अपनी रवायतों को गाली नहीं देंगे, आप 'मॉडर्न' नहीं हो सकते। मुफ्ती साहब ने इस दोहरी मानसिकता की धज्जियां उड़ा दीं।
3. जड़ों से जुड़कर भी आसमां छूने का हुनर.
इस बहस का सबसे अहम् पहलू यह था कि क्या तरक़्क़ी के लिए अपनी तहज़ीब का सौदा करना ज़रूरी है?
मुल्लहिद जावेद अख्तर और उनके हम-ख़याल लिबरल्स का मानना है कि तरक़्क़ी का रास्ता सिर्फ़ मग़रिब (West) की नक़ल करने से गुज़रता है। यानी उनका कपड़ा, उनका रहन-सहन और उनकी बे-दीनी अपना लो, तो तुम 'सभ्य' हो।
मुफ्ती साहब ने अपनी शख्सियत और गुफ़्तगू से यह पैगाम दिया कि "दरख़्त वही ऊंचा जाता है जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी हों।"
एक बा-अमल मुसलमान दाढ़ी और टोपी के साथ भी न्यूक्लियर साइंटिस्ट बन सकता है और ख़ुदा का इनकार करने वाला कोट-पैंट पहनकर भी जाहिल रह सकता है—जैसा कि इस डिबेट में जावेद अख्तर का हाल हुआ।
4.साइंस का नक़ाब और लिबरल का असली चेहरा.
जावेद अख्तर जैसे लोग साइंस के वकील नहीं, बल्कि मग़रिबी प्रोपेगेंडा के एजेंट हैं। उनका मक़सद इल्म फैलाना नहीं, बल्कि दीन-ए-इस्लाम और मज़हबी अक़ीदों पर हमला करना होता है। लेकिन जब सामने कोई ऐसा आलिम आ जाए जो 'दीन' और 'दुनिया' दोनों का इल्म रखता हो, तो इनका 'इंटेलेक्चुअल' नक़ाब उतर जाता है।
मुफ्ती साहब ने यह बता दिया कि साइंस किसी विचारधारा (Ideology) की जागीर नहीं है। हम अपनी नमाज़ों, अपने रोज़ों और अपनी तहज़ीब के साथ भी साइंस और टेक्नोलॉजी के मैदान में मग़रिब की आंखों में आंखें डालकर बात कर सकते हैं। हमें तरक़्क़ी के लिए अपनी शनाख़्त (पहचान) मिटाने की ज़रूरत नहीं, ज़रूरत है तो बस 'हीन भावना' (Inferiority Complex) से बाहर निकलने की, जिसमें ये लिबरल्स ग़र्क हैं।
लिबरल प्रोपेगेंडा का तोड़: नौजवानों को 'ज़हनी ग़ुलामी' से आज़ाद कराने का नुस्खा.
मुस्लिम नौजवानों की तरबियत, इस्लाम और साइंस.
लिबरलिज़्म से बचाव, साइंस बनाम एथिज़्म।
ज़हनी ग़ुलामी, एहसास-ए-कमतरी, इस्लामिक पेरेंटिंग.
आज हमारे नौजवानों के दिलों में यह बात बिठा दी गई है कि अगर तुम्हें अक़्लमंद दिखना है, तो मग़रिब (West) की हां में हां मिलाओ। यह 'एहसास-ए-कमतरी' एक दीमक है। इसे ख़त्म करने के लिए हमें अपने बच्चों की ज़हनी तरबियत इन चार नुक्तों पर करनी होगी.
1. साइंस को 'आला' (Tool) समझें, 'ख़ुदा' नहीं.
बच्चों को बचपन से यह फ़र्क समझाना ज़रूरी है कि साइंस एक 'टूल' है, कोई 'आइडियोलॉजी' नहीं।
जिस तरह एक छुरी (Knife) का काम काटना है—चाहे वो किसी डाकू के हाथ में हो या डॉक्टर के—उसी तरह साइंस का काम कायनात को समझना है।
उन्हें बताएं कि माइक्रोस्कोप में 'सेल' (Cell) नज़र आता है, 'इल्हाद' (नास्तिकता) नहीं।
लिबरल्स ने साइंस को 'हाईजैक' कर रखा है। जब कोई जावेद अख्तर जैसा शख्स साइंस की बात करे, तो बच्चे को यह समझ होनी चाहिए कि यह शख्स साइंस का इस्तमाल अपने 'ज़हरीले एजेंडे' के लिए कर रहा है। साइंस पढ़ने के लिए एथिस्ट होना शर्त नहीं, बल्कि एक मोमिन साइंस को अल्लाह की कुदरत समझने के लिए पढ़ता है।
2. 'माज़रत-ख़्वाना' (Apologetic) रवैया छोड़ें, 'सवालात' करना सिखाएं.
अक्सर हमारे नौजवान लिबरल्स के सामने डिफ़ेंसिव (दिफायि रुख) हो जाते हैं। हमें उन्हें 'ऑफेंसिव' (आक्रामक) और लॉजिकल होना सिखाना होगा।
अगर कोई कहे "पर्दा या दाढ़ी पिछड़ापन है", तो बच्चा सर न झुकाए, बल्कि सवाल पूछे: "अगर कपड़े उतारना 'मॉडर्निटी' है, तो जानवर तो सबसे ज़्यादा मॉडर्न हुए?"
उन्हें सिखाएं कि मग़रिब की हर बात 'पत्थर की लकीर' नहीं है। उनके 'Human Rights' और 'Freedom' के दोहरे मापदंड (Double Standards) पर उंगली उठाना सिखाएं। जब बच्चा सवाल करना सीखेगा, तो वह कभी किसी प्रोपेगेंडा का शिकार नहीं होगा।
3. अपने 'बाप-दादा' की विरासत को पहचानें.
ज़हनी ग़ुलामी तब आती है जब इंसान को लगता है कि "हम तो हमेशा से जाहिल थे, सब कुछ अंग्रेजों ने दिया है।"
बच्चों को अल-ज़हरावी, इब्न-अल-हैथम, और मरियम अल-अस्तुरलाबी के बारे में बताएं।
उन्हें बताएं कि जब यूरोप के लोग नहाना भी नहीं जानते थे, तब हम आंखों का ऑपरेशन कर रहे थे और सितारों की चाल नाप रहे थे।
यह बताएं कि हम साइंस के मैदान में 'किरायेदार' नहीं, बल्कि 'मालिक' हैं। आज अगर हम पीछे हैं, तो उसकी वजह दीन से दूरी है, न कि दीन। दीन से जुड़कर ही हम दोबारा वो मुक़ाम हासिल कर सकते हैं।
4. दीनदार भी, और शानदार भी.
इस ग़लतफ़हमी को जड़ से उखाड़ फेंकें कि दीनदार आदमी सिर्फ़ मस्जिद के कोने में बैठ सकता है।
अपने बच्चों को ऐसे 'रोल मॉडल' दिखाएं जो पक्के नमाज़ के पाबंद हों और साथ ही टॉप के डॉक्टर, इंजीनियर या बिजनेसमैन हों।
उन्हें समझाएं कि "लैब कोट और टोपी/हिजाब में कोई विरोधाभास (Conflict) नहीं है।" आप पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़कर भी नासा (NASA) में रॉकेट लॉन्च कर सकते हैं। साइंस पढ़ने के लिए शराब पीना या 'हम जिंस परस्ति, फ़हाशि' का समर्थन करना ज़रूरी नहीं, यह सिर्फ़ मग़रिब का फैलाया हुआ कूड़ा-करकट है।
तरबियत का मक़सद यह हो कि हमारा नौजवान जब दुनिया में खड़ा हो, तो उसके एक हाथ में कुरआन हो और दूसरे में लेटेस्ट टेक्नोलॉजी। उसके माथे पर सजदे का निशान हो और आंखों में ऐसी चमक कि कोई भी लिबरल उसे 'पिछड़ा' कहने की जुर्रत न कर सके।
मुफ्ती शमायिल नदवि साहब: एक मिसाली शख्सियत.
तालीम: मुफ्ती साहब सिर्फ़ मदरसे के फ़ारिग़-उल-तहसील (Graduate) नहीं हैं, बल्कि उन्होंने दुनियावी तालीम में भी आला डिग्रियां हासिल की हैं। वो 'तुलनात्मक धर्म' (Comparative Religion) और 'फ़लसफ़ा' (Philosophy) पर गहरी पकड़ रखते हैं।
शख्सियत: ज़ाहिरी तौर पर वो सुन्नत-ए-रसूल (स.अ.व.) के मुताबिक़ दाढ़ी और लिबास में रहते हैं, लेकिन जब वो लब-कुशाई (बोलते) करते हैं, तो उनकी अंग्रेज़ी और मंतिक (Logic) बड़े-बड़े ऑक्सफ़ोर्ड रिटर्न दानिश्वरों को पानी पिला देती है।
उनकी ज़िन्दगी यही पैगाम देती है कि अपने बच्चों को कुरआन भी पढ़ाओ और क्वांटम फिज़िक्स भी। ताकि कल को कोई जावेद अख्तर जैसा नास्तिक उन्हें यह न कह सके कि "तुम तो मदरसे वाले हो, तुम्हें क्या पता साइंस क्या है.
मुफ्ती साहब ने जावेद अख्तर को उनकी ही ज़बान में खामोश किया, वो इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं कि 'दीन' और 'दुनिया' अलग नहीं हैं।
पैगाम-ए-बेदारी: अक़्ल के अंधों के लिए, जो मग़रिब को ही 'मसीहा' समझ बैठे हैं.
आज वक़्त आ गया है कि हम अपनी आंखों पर पड़ा हुआ 'लिबरलिज़्म' का चश्मा उतार फेंकें। याद रखो, साइंस और लिबरलिज़्म दो अलग चीज़ें हैं। साइंस अल्लाह की बनाई हुई कायनात को समझने का नाम है, जबकि लिबरलिज़्म एक ज़हरीली विचारधारा है जो इंसान को अपनी नफ़्स (इच्छाओं) का ग़ुलाम बनाती है।
मग़रिब (West) की तरक़्क़ी उनकी 'फिज़िक्स' और 'मेहनत' की वजह से है, उनकी 'बेहयाई' या 'शराब' की वजह से नहीं। अफ़सोस है कि हम उनकी मेहनत लेने के बजाय उनका 'कचरा' (Culture) उठा लाए हैं। साइंस पढ़ने के लिए या चाँद पर जाने के लिए तुम्हें अपना ईमान बेचने की ज़रूरत नहीं, न ही तुम्हें एथिस्ट (नास्तिक) बनने की ज़रूरत है। एक मोमिन साइंस की गहराइयों में उतरकर भी अल्लाह को पहचानता है, जबकि एक काफ़िर सिर्फ़ मैटर (मादे) में उलझ कर रह जाता है।
या अल्लाह! हम सब तेरे आज़िज़ और कमज़ोर बंदे हैं। ए परवरदिगार! हमारी उम्मत के नौजवानों को इस 'फ़िक्री पस्ती' और 'ज़हनी ग़ुलामी' से नजात अता फ़रमा। उन्हें लिबरलिज़्म और एथिज़्म के फ़ितनों से महफ़ूज़ रख और उन्हें हक़ीक़ी इल्म की समझ अता कर।
या रब्बुल आलमीन! हमें मग़रिब की चकाचौंध से बचा और हमें वो 'बसीरत' (Insight) दे कि हम हक़ और बातिल में फ़र्क कर सकें। हमें साइंस और टेक्नोलॉजी में इमामत (Leadership) का मक़ाम अता फ़रमा, ताकि हम दुनिया के सामने हाथ फैलाने वाले नहीं, बल्कि देने वाले बनें।
ए मेरे मालिक! हमारी माओं, बहनों और बेटियों की हिफ़ाज़त फ़रमा। उनके दिलों में 'हया', 'ईमान' और 'पर्दे' की मोहब्बत डाल दे। उन्हें हज़रत फ़ातिमा (र.अ.) और हज़रत आयशा (र.अ.) के नक्श-ए-क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आज के इस बेहयाई के दौर में, उन्हें शैतानी हथकंडों और फैशनेबल 'फ़हाशी' से बचाकर इफ़्फ़त-ओ-इस्मत का पैकर बना दे। आमीन या रब्बुल आलमीन।







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