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DOES GOD EXIST: Screen Ka Badshah Vs Khuda Ka Banda?

Jab Screen Ke Writer Ka Khuda Ke Bande Se Samana Hua.

 ला-इल्मी बनाम हक़ीक़त: एक गहरी सोच.
कायनात का असली स्क्रिप्ट राइटर कौन?
इंसान की कहानियाँ और अल्लाह का हक़ — सच्चाई का सामना
जब स्क्रीन का 'बाद्शाह' ' ख़ुदा' के बंदे से टकराया: मुफ्ती शुमाइल बनाम जावेद अख्तर.
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जब इंसान की स्क्रिप्ट अल्लाह के हक़ीक़त से टकराती है.
जब इंसान अपनी लिखी हुई कहानियों के सहारे हक़ीक़त के मालिक के सामने बैठता है, तो उसके पास सिर्फ़ ला-इल्मी ही रह जाती है। असल दलील वही है जो ख़ुदा की किताब और हक़ से आती है।
DOES GOD EXIST? पिछले कई दिनों से जिस ”तहज़ीबी और इल्मी तब्दीली” का ढिंढोरा पीट रहा हूं, जिसमें मैंने बार-बार कहा कि ”मुनाज़रे के अखाड़े” को छोड़कर ”मुकालमे की मेज़” पर आओ, आज कुदरत ने मेरी इस बात पर एक अमली मुहर सब्त कर दी है। सरज़मीन-ए-दिल्लि में होने वाला यह ”ग्रेट डायलॉग” (Great Dialogue) दरअसल दो शख्सियात का टकराव नहीं था, यह दो ”नज़रियाती कायनात” (Worldviews) का टकराव था।

एक तरफ बॉलीवुड की चकाचौंध, 60 साला फन्नी रियाज़त और अल्फ़ाज़ की जादूगरी का बादशाह नास्तिक जावेद अख्तर थे, और दूसरी तरफ कुरान, मंतक और फलसफे के हथियारों से लैस, धीमे लहजे वाला एक खुदा का बंदा, मुफ्ती शुमाइल नदवी।

इस मुकालमे ने साबित कर दिया कि जब ”हक” मुकम्मल तैयारी और ”इल्मी वकार” के साथ बातिल के सामने आता है, तो बातिल की चर्ब-ज़बानी, उसका औरा (Aura) और उसकी शोहरत सब धरी की धरी रह जाती है।

इस तारीख़ी नशिस्त का एक ”इल्मियाती पोस्टमार्टम” (Epistemological Post-mortem) करते हैं और देखते हैं कि कैसे एक मुसलमान स्कॉलर ने बगैर आवाज़ ऊंची किए, इल्हाद के गुब्बारे से हवा निकाली।

1. नफ़सियाती जंग: तौहीद बनाम सेलिब्रिटी औरा (The Psychology of Aura)

सबसे पहले इस मंज़रनामे की नफ़सियात को समझें। जावेद अख्तर कोई आम मुलहिद नहीं है। वह बर-ए-सगीर का वह ”दानिशवर” है जिसके लिखे हुए मुकालमों पर करोड़ों लोग तालियां बजाते हैं। वह मीडिया का ”गॉड फादर” है। ऐसे लोग जब बात करते हैं तो उनके पास दलाईल हों न हों, उनका ”प्रेशर” और ”शख्सियत का रौब” अगले को निगल लेता है।

आम मौलवी ऐसे लोगों के सामने या तो मरऊब होकर ”माज़रत-ख्वाहना” (Apologetic) हो जाता है या फिर गुस्से में आकर बदतमीज़ी कर बैठता है (जो दरअसल खौफ का रद्दे-अमल होता है)। लेकिन मुफ्ती शुमाइल नदवी यहां एक चट्टान की तरह नज़र आए। 
क्यों? यह है ”तौहीद की ताक़त”।

जब आपके दिल में यह यकीन रासिख हो जाए कि इज़्ज़त, ज़िल्लत, मौत और हयात सिर्फ उस ”रब” के हाथ में है जिसका मुकदमा आप लड़ रहे हैं, तो फिर सामने जावेद अख्तर हो या वक्त का फिरौन, वह आपको एक ”आम इंसान” से ज्यादा कुछ नहीं लगता। मुफ्ती साहब ने जावेद अख्तर के ”सेलिब्रिटी स्टेटस” को यकसर नज़र-अंदाज़ करके उनसे ऐसे बात की जैसे वह एक आम तालिब-ए-इल्म से मुखातिब हों। उन्होंने जावेद अख्तर की ”अना” (Ego) को चैलेंज नहीं किया, बल्कि उनकी ”अक्ल” को कठघरे में खड़ा किया। यह पहली नफ़सियाती फतह थी!

2. सुकराती तरीका-ए-वारदात: जवाब देने के बजाय सवाल उठाना.

मैंने हमेशा कहा है कि मुलहिद को डिफेंस पर मत खेलो, उसे डिफेंस पर लाओ। मुफ्ती शुमाइल ने यहां कमाल महारत से ”Socratic Method” (सुकराती तरीका) इस्तेमाल किया। जावेद अख्तर की पूरी गुफ्तगू का लब-ए-लुबाब यह था: ”मैं खुदा को नहीं मानता क्योंकि मुझे समझ नहीं आता या नज़र नहीं आता।”

आम मुनाज़िर यहां ”खुदा के वजूद के सबूत” देने लगता। मगर मुफ्ती साहब ने ”इल्मियात” (Epistemology) का वार किया। उन्होंने बुनियादी सवाल उठाया: ”क्या किसी चीज़ का आपके इल्म में न होना, उसके वजूद न होने की दलील बन सकता है?” (Absence of Evidence is not Evidence of Absence).

यह वह मंतकी फंदा है जिसमें जावेद अख्तर जैसा ज़ोकर शख्स भी फंस गया। मुफ्ती साहब ने बड़े प्यार से यह समझाया कि जावेद साहब! 
आपका ”न जानना” (Ignorance) सिर्फ आपकी ला-इल्मी का सबूत है, कायनात के खाली होने का सबूत नहीं। अगर एक अंधा कहे कि ”सूरज नहीं है क्योंकि मुझे नज़र नहीं आता”, तो इससे सूरज गायब नहीं हो जाता, सिर्फ अंधे की बीनाई का नुक्स साबित होता है। मुफ्ती साहब ने जावेद अख्तर को यह आईना दिखाया कि आप ”साइंस” पर नहीं, अपनी ”ज़ाती समझ” की बुनियाद पर खुदा का इंकार कर रहे हैं, जो कि बिज़ात-ए-खुद एक गैर-साइंटिफिक रवैया है।

3. मसला-खैर-ओ-शर और बॉलीवुड की ”फिक्शन”

जावेद अख्तर ने, हर रिवायती मुलहिद की तरह, आखिर में अपने तरकश का सबसे घिसा-पिटा तीर निकाला: ”मसला-ए-खैर-ओ-शर” (Problem of Evil) । उन्होंने खुदा पर तंज़ किया कि अगर वह है तो दुनिया में इतना दुख क्यों है? यह दलील जज़बातियत पर मबनी थी, मंतक पर नहीं।

मुफ्ती शुमाइल का जवाब यहां ”फलसफियाना शाहकार” था। उन्होंने समझाया कि ”शर” (Evil) का वजूद ”खुदा के न होने” की दलील नहीं, बल्कि ”इंसान के बा-इख्तियार होने” (Free Will) की दलील है। अगर दुनिया में दुख न होता, तो यह दुनिया ”इम्तिहान-गाह” न होती, जन्नत होती।

और फिल्मी दुनिया के बादशाह को यह समझना चाहिए था कि अगर कहानी में ”विलन” (Villain) न हो और हीरो के लिए मुश्किलात न हों, तो कहानी का ”मकसद” फौत हो जाता है। मुफ्ती साहब ने जावेद अख्तर को उन्हीं के मैदान (कहानी और स्क्रिप्ट) की मंतक से समझाया कि अल्लाह ने यह कायनात ”Comfort Zone” के तौर पर नहीं, बल्कि ”Testing Zone” के तौर पर बनाई है। मशीन की खराबी और मशीन के इम्तिहान में फर्क होता है।

4. तंज़ का जवाब मुस्कुराहट: अख्लाकी फतह.
जावेद अख्तर की गुफ्तगू में जगह-जगह ”तंज़” (Sarcasm), ”इस्तेहज़ा” और मज़हब को दकियानूसी साबित करने की कोशिश थी। वह बार-बार मौज़ू से हटकर इधर-उधर की बातें (Red Herrings) कर रहे थे ताकि मुफ्ती साहब को उलझा सकें। लेकिन सलाम है मुफ्ती शुमाइल के आसाब पर!

उन्होंने बदतमीज़ी का जवाब दलील से और तंज़ का जवाब मुस्कुराहट से दिया। 
यही वह ”मुकालमे की ताक़त” है जिसका अवाम दिवाना है। जब आप गाली का जवाब गाली से देते हैं, तो तमाशाइयों को ”दंगल” नज़र आता है। लेकिन जब आप तंज़ का जवाब संजीदा दलील से देते हैं, तो तमाशाइयों को ”हक और बातिल का फर्क” नज़र आता है। मुफ्ती साहब ने साबित किया कि मुसलमान ”जज़बाती जुनूनी” नहीं होता, बल्कि मुसलमान वह होता है जिसके पास ”हकीकत का इत्मीनान” (Tranquility of Truth) होता है। जो सच्चा होता है, वह चीखता नहीं है।

 हमारा लाएहा-ए-अमल.

मेरे नौजवानों! दोस्तों! मुफ्ती शुमाइल नदवी और जावेद अख्तर का यह मुकालमा हमारे लिए एक ”केस स्टडी” है। यह साबित करता है कि:

इल्म ही असल ताक़त है: अगर आपके पास मंतक और फलसफे का इल्म है अलावा तौहीद, तो आप बड़े से बड़े मुलहिद को चारों शाने चित कर सकते हैं।
अस्लूब (Style) अहमियत रखता है: आप क्या कह रहे हैं, इससे ज्यादा अहम यह है कि आप ”कैसे” कह रहे हैं। शाइस्तगी कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ा हथियार है।
मरऊबियत से निजात: जावेद अख्तर हो या रिचर्ड डॉकिन्स, ये सब इंसान हैं। इनके पास सिर्फ ”अल्फ़ाज़ की बाज़ीगरी” है, जबकि आपके पास ”कायनात की हतमी सच्चाई” है।

मैं मुफ्ती शुमाइल नदवी को सलाम पेश करता हूं कि उन्होंने तौहिद की अमली तफसीर पेश कर दी। उन्होंने जावेद अख्तर को हराया नहीं, बल्कि उसे ”बे-नकाब” (Expose) किया। उन्होंने दिखा दिया कि जब स्क्रीन का स्क्रिप्ट राइटर, कायनात के स्क्रिप्ट राइटर (अल्लाह) के वकील के सामने बैठता है, तो उसके पास ”ला-इल्मी” के सिवा कोई दलील नहीं बचती।
यही हमारा रास्ता है।
मुनाज़रे छोड़ें, मुकालमे अपनाएं।
गालियां छोड़ें, दलील अपनाएं।
और याद रखें, फतह हमेशा ”हक” की होती है, बशर्ते कि हक को पेश करने वाला ”हक-शनास” हो।
जब इंसान की लिखी स्क्रिप्ट, कायनात के असली स्क्रिप्ट राइटर (अल्लाह) के हक़ के सामने आती है, तो उसकी सारी दलीलें मिट जाती हैं और सिर्फ़ ला-इल्मी रह जाती है।

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