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DOES GOD EXIST: Sadhguru Ko Harane Wale Javed Akhtar Khud Haar Gaya?

How the Jawed Akhtar Who Defeated Sadhguru Lost to Mufti Shamayil?

सदगुरु को हराने वाला, मुस्लिम स्कॉलर से कैसे हार गया?
सदगुरु बनाम जावेद: जावेद की पुरानी फ़तह. 
मुफ़्ती शमाइल नदवी बनाम नास्तिक जावेद अख्तर.
जावेद अख़्तर बनाम मुफ़्ती शमाइल नदवी: जिस बहस ने नास्तिक सोच की बुनियाद हिलाकर रख दी?
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DOES GOD EXIST?
एक तरफ़ नास्तिक शायर और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख़्तर, दूसरी तरफ़ दीन और फ़लसफ़े को अक़्ली अंदाज़ में समझने वाले मुफ़्ती शमाइल नदवी।

 मजलिस–ए–बहस: दो ज़हन, एक सवाल
इस्लामी नज़रिए से देखा जाए तो ईश्वर (अल्लाह) पर बहस कोई नई चीज़ नहीं; कुरआन खुद बार–बार इंसान को सोचने, तर्क करने और "अफ़ला तअक़िलून" की पुकार लगाकर अक़्ल को जगा देता है।

मगर इस बार सामने कोई ख़ालिस रिवायती मौलवी नहीं, बल्कि रिसर्च–माइंड स्कॉलर था, फ़लसफ़ी और लॉजिकल टर्म्स में पेश कर रहा था। यही वह नुकता था जहाँ बहस एक आम टीवी शो से निकलकर अकादमिक मुनाज़रे में बदल गई.

सद्गुरु (जग्गी वासुदेव) बनाम जावेद: जावेद की पुरानी फ़तह. 
जावेद अख़्तर और सद्गुरु के बीच बहुत पहले जो बातचीत हुई, उसे नास्तिक बनाम आध्यात्मिक गुरु के क्लासिक बहस के तौर पर देखा जाता है। उस मुज़ाकरात में जावेद साहब ने दो काम बड़ी मजबूती से किए:  

 उन्होंने "वाग" और "रहस्यमय" स्टाइल को चुनौती देकर क्लियर, स्ट्रेट सवाल किए .
 जैसे कि empirical proof, falsifiability, और measurable impact की डिमांड.

- उन्होंने आध्यात्मिक दावों को "subjective experience" तक सीमित कर दिया और कहा कि जब तक कोई चीज़ सार्वजनिक रूप से टेस्ट न हो सके, उसे ऑब्जेक्टिव हक़ीक़त नहीं कहा जा सकता।

सद्गुरु की बातों में रहस्य,रूपक और दास्तान का रंग ज़्यादा था, जबकि जावेद की ज़बान आम फहम पर खड़ी थी, इसलिए उस बहस में नैरेटिव ज़्यादातर जावेद के हक़ में चला गया।

 मुफ़्ती शमाइल नदवी बनाम नास्तिक जावेद अख्तर.
(20 Dec 2025) जावेद अख़्तर साहब, जो अपनी पूरी ज़िंदगी तर्क और नास्तिकता के झंडाबरदार रहे, इस बार एक ऐसे मोड़ पर खड़े थे जहाँ उनका तजुर्बा और शोहरत उनके काम नहीं आ रही थी।

मुफ़्ती शमाइल नदवी ने "ख़ुदा है या नहीं?" वाले सवाल को क्लासिकल कलाम और मॉडर्न फ़िलॉसफ़ी के बीच पुल बनाकर उठाया। उन्होंने बहस में न तो कुरआनी आयतें पढ़ीं, न जज़्बाती तक़रीर की; उल्टा कंटिंजेंसी आर्गुमेंट, फर्स्ट कॉज़, फ्री विल, मॉरल ऑब्जेक्टिविटी जैसे कॉन्सेप्ट्स को आसान ज़ुबान में लेकर आए।

उनका अंदाज़ तीन चीज़ों पर खड़ा था:  
अक़्ली तर्क: ब्रह्मांड, वक़्त, स्पेस और कारण–परिणाम के सिलसिले को किसी "ज़रूरी वजूद" की तरफ़ इशारा मानना।
साइंटिफ़िक अप्रोच: साइंस को "हाउ" (कैसे) का जवाब और मेटाफ़िज़िक्स को "व्हाई" (क्यों) का सवाल बताते हुए दोनों को दुश्मन नहीं, तकमील करने वाली ताक़त कहना।

इस्लामी तसव्वुर–ए–ख़ुदा: यह बताना कि इस्लाम में अल्लाह न इंसानी शक्ल रखता है, न इंसानी कमज़ोरियाँ इसलिए इस तसव्वुर पर "मूर्ति, अवतार या स्थानीय देवता" वाली आफ़तें लागू ही नहीं होतीं।
यहीं से जावेद अख़्तर के लिए मैदान मुश्किल होना शुरू हुआ, क्योंकि अब सामने कोई ब्लाइंड बेलिवर नहीं, बल्कि लॉजिक याफता आलिम था।

 सवाल–जवाब की काउंटर–डिबेट: कौन क्या कह रहा था?
कौन सा सवाल किसने उठाया और किस तरह उसका जवाब मिला।

 1. ईश्वर/खुदा का अस्तित्व: "कहाँ है सबूत?"
-जावेद अख़्तर का सवाल:
  - जो चीज़ दिखाई नहीं देती, मापी नहीं जा सकती, लैब में टेस्ट नहीं हो सकती, उसे "वजूद" कैसे मान लें?  
  - क्या "गैप ऑफ़ नॉलेज" (जहाँ साइंस अभी न पहुँची हो) को "ईश्वर" मान लेना ईमानदारी है? 

-मुफ़्ती शमाइल नदवी का जवाब:
  - हर वजूद–ए–मुमकिन (possible existence) का तआरुफ़ किसी न किसी वजह से जुड़ा है; खुद ब्रह्मांड भी "क्यों है?" का सवाल पैदा करता है, न कि सिर्फ़ "कैसे बना?" का।

  - कंटिंजेंसी आर्गुमेंट के मुताबिक़ जब तक एक "ज़रूरी वजूद" (Necessary Being) न मानो, तब तक पूरी चेन लटकी रहती है; उसी Necessary Being को इस्लाम अल्लाह कहता है, जो न पैदा हुआ, न पैदा किया गया।

यहाँ जावेद साहब साइंस की हदें दिखा पाए, मगर इसिलिए कि उन्होंने मेटाफ़िज़िकल लेवल पर जाने से इनकार किया, उनका इनकार खुद ही "फ़लसफ़ी पॉज़ीशन" बनकर सामने आ गया।

 2. इंसानी दुख–दर्द और गाज़ा का सवाल
-जावेद अख़्तर का सवाल:
  - अगर ईश्वर रहमदिल है, तो गाज़ा जैसे इलाक़ों में मासूम बच्चों पर बम क्यों गिरते हैं?  
  - अगर इत्तेफ़ाक़ और पावर पॉलिटिक्स ही सब कुछ चला रही है, तो "मर्सीफुल गॉड" का कॉन्सेप्ट सिर्फ़ तसल्ली का नशा नहीं?

मुफ़्ती शमाइल नदवी का जवाब:

  - इंसान को दी गई "फ्री विल" ही इम्तिहान की बुनियाद है; अगर इंसान के हर ज़ुल्म को अल्लाह तुरंत रोक दे, तो फिर इंसान न जिम्मेदार बचेगा, न उसकी नैतिक आज़ादी।
  - इस्लामी तसव्वुर में दुनिया "अंतिम मंज़िल" नहीं; मज़लूम की असली अदालत आख़िरत में है, जहाँ ज़ालिम और मज़लूम दोनों का हिसाब ज़रूर होता है, चाहे दुनिया की चालें कुछ भी हों।

जावेद ने यहाँ जज़्बाती लेवल पर बहुत स्ट्रॉन्ग पॉइंट उठाया, लेकिन मुफ़्ती की बात ने बहस को "भावनात्मक" से "थियोडिसी" (Theodicy) की दार्शनिक बहस में बदल दिया।

 3. नैतिकता (Morality): बहुमत या हक़?
-जावेद अख़्तर का सवाल/दावा:
   नैतिकता इंसानी समाजों से निकलती है; बहुमत की राय, सामाजिक सहमति और ज़रूरतें मिलकर तय करती हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत।

-मुफ़्ती शमाइल नदवी का काउंटर:
  - अगर बहुमत ही आख़िरी पैमाना है, तो हिटलर के दौर में बहुमत जब यहूदियों के कत्ल पर ख़ामोश था, क्या वह नैतिक हो गया?  
  - अगर कल पूरी दुनिया रेफरेंडम करके कह दे कि झूठ बोलना, धोखा देना, बच्चों पर ज़ुल्म करना ठीक है, तो क्या वे चीज़ें सचमुच "ठीक" हो जाएँगी?

यहीं एक दिलचस्प मोड़ आया — जावेद ने "majority morality" की बात की, मगर इसी standard से खुद उनके "minority position" (नास्तिक होना) पर सवाल उठ गया कि जब दुनिया की बड़ी आबादी ईश्वर को मानती है, तो आपके अपने ही मेयार से आपकी पोज़िशन कमज़ोर क्यों न मानी जाए?
इस काउंटर–आर्गुमेंट पर जावेद अख़्तर visibly डिफ़ेंसिव नज़र आए और बातचीत को दूसरी तरफ़ मोड़ने की कोशिश करते दिखे।

सद्गुरु बनाम मुफ़्ती: इल्म और फिक्र का बड़ा फर्क.
सद्गुरु के साथ जावेद साहब की जीत की बड़ी वजह यह थी कि सद्गुरु की बातें अक्सर "मिस्टिसिज्म" (रहस्यवाद) और गोल-मोल आध्यात्मिक दावों पर आधारित होती हैं, जिन्हें तर्क की कसौटी पर तोड़ना आसान होता है। लेकिन मुफ़्ती शमाइल नदवी ने अपनी दलीलों की बुनियाद किसी "रहस्य" पर नहीं, बल्कि 'कॉन्टिंजेंसी आर्गुमेंट' (Imkan-e-Wajood) और 'कॉज़ एंड इफ़ेक्ट' (Illat-o-Maalool) जैसे ठोस दार्शनिक उसूलों पर रखी।

 सद्गुरु जहाँ "अनुभव" की बात कर रहे थे, मुफ़्ती साहब वहाँ "अक़्ली हक़ीक़त" (Rational Reality) पेश कर रहे थे, और यही वह नुकताअ था जहाँ जावेद साहब का पुराना फॉर्मूला नाकाम हो गया।

जावेद अख़्तर की 'ला-इल्मी' और नादानी.

75 साला जावेद अख़्तर ने शायद 28 साल के मुफ़्ती शमाइल को उनकी उम्र और लिबास देखकर कमतर आंकने की भूल कर दी।
 उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी उनकी यह ज़िद है कि वे विज्ञान की अधूरी जानकारी को ईश्वर के खिलाफ़ ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

 जब मुफ़्ती साहब ने यह सवाल उठाया कि "ब्रह्मांड का अस्तित्व होना ही किसी 'नेसेसरी बीइंग' (ज़रूरी वजूद) की गवाही है", तो जावेद साहब के पास इसका कोई वैज्ञानिक या तार्किक तोड़ नहीं था। उनकी 'ला-इल्मी' (अज्ञानता) यहाँ साफ़ दिखी कि वे नास्तिकता को एक ज़ज्बाती ढाल बना चुके हैं, जबकि मुफ़्ती साहब उसे एक अकादमिक चुनौती बना रहे थे।

 जावेद साहब को यह समझना होगा कि इल्म की कोई उम्र नहीं होती और नही वह किसी के नाम की जागीर है। एक युवा आलिम ने जिस सलीक़े,ज़ब्त और मंतिक़ (Logic) के साथ अपनी बात रखी, उसने साबित कर दिया कि महज़ लफजो की जादूगरी से हक़ीक़त को नहीं बदला जा सकता।

 जावेद अख़्तर साहब को यह हार तसलिम करनी चाहिए कि जहाँ तक 'वजूद-ए-बारी' (ईश्वर के अस्तित्व) की तार्किक बहस का सवाल है, मुफ़्ती शमाइल नदवी की इल्मी गहराई और इस्लामी फ़लसफ़े की समझ के आगे उनकी नास्तिकता की बुनियादें बेहद कमज़ोर और खोखली साबित हुईं।

सद्गुरु बनाम जावेद अख़्तर: इस बहस में 'नास्तिकता' की जीत हुई क्योंकि जावेद साहब का मुक़ाबला उन दावों से था जिनकी बुनियाद महज़ व्यक्तिगत अनुभवों और आध्यात्मिक रहस्यों पर थी। जावेद अख़्तर के सवालो के सामने सद्गुरु की 'इनर इंजीनियरिंग' फीकी पड़ गई.
जावेद अख़्तर बनाम मुफ़्ती शमाइल: यहाँ 'ईमान और मंतिक़' (तर्क) की जीत हुई। मुफ़्ती साहब ने साबित किया कि इस्लाम का 'तसव्वुर-ए-ख़ुदा' (ईश्वर की अवधारणा) इतना मज़बूत और अक़्ली है कि उसे साबित करने के लिए किसी जज़्बाती सहारे की ज़रूरत नहीं।

मुनाफिक़त: 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त' वाली सियासत.
इस डिबेट (DOES GOD EXIST?) का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि जो 'संघी'  तबका कल तक जावेद अख़्तर को देवी-देवताओं और धर्म पर टिप्पणी करने के कारण कोसता था, आज वही मुफ़्ती साहब के खिलाफ़ जावेद अख़्तर के बचाव में खड़ा नज़र आया।
                                                                             इसकी वजह कोई विचारधारा नहीं, बल्कि यह कड़वाहट है कि "सद्गुरु को हराने वाला शख्स एक मुस्लिम स्कॉलर से कैसे हार गया?" यह एक अजीबोग़रीब मंज़र है जहाँ जावेद साहब की नास्तिकता को उनके विरोधियों ने महज़ इसलिए गले लगा लिया क्योंकि सामने वाला स्कॉलर इस्लाम से तल्लुक रखता है. जबकि यह मामला आस्तिक बनाम नासतिक था. खुदा/भग्वान/GOD  है या नहि?

यह महज़ एक डिबेट नहीं थी, बल्कि भारतीय सोशल मीडिया के उस मुनाफिक़त का चेहरा था जहाँ "दुश्मन का दुश्मन दोस्त" वाला फॉर्मूला काम करता है। जो लोग कल तक जावेद अख़्तर को उनकी धर्म-निरपेक्ष और नास्तिक बातों के लिए 'राष्ट्रविरोधी' करार देते थे, आज वही लोग मुफ़्ती शमाइल नदवी के मुक़ाबले में जावेद साहब के 'स्लीपर सेल' बनकर खड़े हो गए हैं।

सद्गुरु को हराने वाला मुस्लिम स्कॉलर से कैसे हार गया?

यही वह जुमला है जिसने 'अंधभक्तों' की रातों की नींद उड़ा दी है। जिस जावेद अख़्तर ने सद्गुरु के आध्यात्मिक दावों को तर्कों से तार-तार कर दिया था, वही जावेद साहब जब एक 28 साल के युवा आस्तिक स्कॉलर के सामने निरुत्तर होने लगे, तो भक्तों को अपनी वैचारिक ज़मीन खिसकती महसूस हुई।
 उनके लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि जिस इस्लामी अक़्ल और मंतिक़ (Logic) को वे कमतर समझते थे, उसने उनके सबसे बड़े वैचारिक प्रतिद्वंदी (जावेद अख़्तर) को ही आईना दिखा दिया।

भक्त बने 'इंस्टेंट एथिस्ट': सिर्फ़ मुस्लिम दुश्मनी का असर.

यह भारतीय डिजिटल इतिहास का सबसे मज़ेदार विरोधाभास है। जो लोग दिन-रात देवी-देवताओं की रक्षा का संकल्प लेते हैं, वे आज उस जावेद अख़्तर के लिए बैटिंग कर रहे हैं जो खुलेआम कहता है कि "ईश्वर एक मानवीय कल्पना है।" 
 क्या अब ये भक्त भी नास्तिक बन जाएंगे? बिल्कुल नहीं। 
यह कोई वैचारिक बदलाव नहीं, बल्कि शुद्ध 'मुस्लिम दुश्मनी' है. उनके लिए मुफ़्ती साहब की दलीलें इतनी भारी पड़ गईं कि वे उस नास्तिक (जावेद) की टीम में शामिल हो गए जो खुद उनके धर्म का मज़ाक उड़ाता आया है।

 'स्लीपर सेल' और सोशल मीडिया का दोगलापन.

आज सोशल मीडिया पर जावेद अख़्तर के नाम पर जो नया "नास्तिक विंग" तैयार हुआ है, वह दरअसल उन लोगों का है जिनका धर्म से ज़्यादा "एंटी-इस्लाम" एजेंडे से लगाव है।

अजीबोग़रीब गठबंधन: कल तक जो जावेद साहब को 'शरिया' का पैरोकार बताते थे, आज उन्हें 'तर्क का देवता' मान रहे हैं क्योंकि उन्होंने मुफ़्ती साहब से सवाल पूछे।
वैचारिक नादानी: ये लोग यह भूल रहे हैं कि मुफ़्ती साहब ने किसी धर्म से नहीं, बल्कि उन्हीं वैज्ञानिक और दार्शनिक उसूलों से बात की जिन्हें जावेद साहब अपनी जागीर समझते थे।

यह उन लोगों की "बौद्धिक धूल चटाई" है जो अपनी नफ़रत में इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें अब एक नास्तिक (Atheist) में अपना भगवान नज़र आने लगा है, बशर्ते वह मुसलमान से सवाल कर रहा हो।
 यह जावेद साहब की जीत नहीं, बल्कि उन भक्तों की वैचारिक हार है जो मुफ़्ती साहब के तर्कों का मुक़ाबला करने की हैसियत नहीं रखते।

यह बहस साबित करती है कि इल्म और हक़ीक़त किसी के चश्मे के मोहताज नहीं होते।
 मुफ़्ती शमाइल नदवी ने महज़ 28 साल की उम्र में वह इल्मी गहराई दिखाई कि 75 साल के तजुर्बेकार, नास्तिको या नमनिहद साइंस के वकिल जावेद अख़्तर को भी जज़्बाती दलीलें देनी पड़ीं, और उनके पीछे खड़ी नफ़रती फौज को मजबूरन उस 'नास्तिकता' की गोद में बैठना पड़ा जिससे उन्हें कल तक नफ़रत थी।

कई ऑब्ज़र्वर्स और online रिएक्शंस ने भी यही तस्सुरात दिए कि इस खास डिबेट में तर्क और मंतिक़ के मैदान में मुफ़्ती शमाइल नदवी का पलड़ा ज़्यादा भारी दिखा, भले ही जावेद अख़्तर की शख़्सियत और शोहरत बहुत बडी हे, क्युंके वे फिल्मो मे तकरिबन पचास सालो से पह्चान बनाये हुए हे लेकिन अक़लि दलील और लौजिक के सामने उन्होने धारनाओ, जज़्बातो और जिओपोलिटिक्स कि बाते कि यानि वे इस बेहस को सियासि रुख देने कि पुरि कोशिश कि लेकिन मुफ्ति साहेब असल मुद्दे से हटे नही.
 जब इस्लाम को अक़्ली, फ़लसफ़ी और साइंटिफ़िक लैंग्वेज में पेश किया जाए, तो educated नास्तिक भी चैलेंज महसूस करते हैं।
 अगली बहसें उन लोगों से होनी चाहिए जो खुद को साइंस और फ़लसफ़े का जानकार कहते हैं, ताकि "blind faith vs blind rejection" की जगह "reasoned faith vs reasoned scepticism" की बहस आगे बढ़े।

हासिल-ए-कलाम:
जब मुक़ाबला महज़ 'सूरत' और 'मिस्टिसिज्म' से था, तो जावेद अख़्तर जीत गए; लेकिन जब उनका सामना 'हक़ीक़त' और 'इल्मी गहराई' (मुफ़्ती शमाइल) से हुआ, तो उनकी नास्तिकता के पास कोई जवाब न था।
 यह बहस उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक़ है जो यह समझते थे कि इस्लाम सिर्फ़ रिवायतों का नाम है—मुफ़्ती साहब ने बता दिया कि इस्लाम दरअसल गहरी अक़्ल और पुख़्ता दलील का मज़हब है।

ऐ रब्ब-ए-करीम! हमारी माओ, बहनों और बेटियों को हया, पाकबाज़ी और ईमान की हक़ीक़ी दौलत से मालामाल फरमा। उन्हें ज़माने की बे-राह-रवी से बचाकर सीरत-ए-फातिमा (रज़ि.) का पैरोकार बना और उनके पर्दे व पाकीज़गी को उनकी इज़्ज़त व हिफ़ाज़त का ज़रिया बना दे। उम्मत की हर बेटी को इल्म और हिकमत से मुनव्वर फरमा ताकि वह आने वाली नस्लों की बेहतरीन तरबियत कर सके। बातिल के यलगार से उम्मत कि हिफाज़त कर.
आमीन.
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