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Baghdad Ki Tabahi: Halaku Khan Ka Aakhri Zumla.

Mongol Hamala 1258: Baghdad Tabahi Ka Haqeeqat.

मंगोलों द्वारा बग़दाद की तबाही 1258.
बग़दाद का इतिहास और मंगोल हमला.
हुलागू ख़ान का बग़दाद पर हमला.
अब्बासी ख़िलाफ़त का अंत.
बग़दाद पर मंगोलों का हमला इस्लामी तारीख़ का सबसे बड़ा हादसा  है। जनवरी–फ़रवरी 1258 ईस्वी में हुलागू ख़ान की क़ियादत में मंगोल फ़ौज ने शहर को घेर कर तबाह कर दिया। लाखों लोग क़त्ल हुए, मस्जिदें और महल जलाए गए और "बैतुल हिक्मा" यानी हाउस ऑफ़ विज़डम को भी राख कर दिया गया। इस हमले ने अब्बासी ख़िलाफ़त का ख़ात्मा कर दिया और बग़दाद की इल्मी व तहज़ीबी शान हमेशा के लिए मुताशिर हो गई।
बग़दाद की तबाही 1258, इस्लामी सुनहरी दौर बग़दाद, बग़दाद का इतिहास, हुलागू ख़ान का बग़दाद पर हमला
मंगोल हमला 1258: बग़दाद की तबाही का इतिहास.
जनवरी–फ़रवरी 1258 में मंगोलों ने हुलागू ख़ान की क़ियादत में बग़दाद को तबाह कर दिया। लाखों लोग क़त्ल हुए और अब्बासी ख़िलाफ़त का  खातमा हुआ। मगर हलाकु खान के उस तारिखि ज़ुमले से क्या अब तक किसि ने सबक हासिल किया है जो अब्बसि हुकमरान के क़त्ल से पहले कहा था? हुलागू ख़ान के आख़िरी जुमले ने बग़दाद की तबाही को हमेशा के लिए तारीख़ में दर्ज कर दिया, जहाँ इल्म और तहज़ीब राख बन गई।

 दार-उस-सलाम बग़दाद: अब्बासी ख़िलाफ़त के उरूज-ओ-ज़वाल और तारीख़ी अज़मत की दास्तान

अब्बासी ख़िलाफ़त और उसकी राजधानी बग़दाद की तारीख़, इस्लामी तारिख के उस सुनहरे दौर (Golden Age) की दासतान है, जब ये शहर इल्म, सियासत, फन ओ अदब और तिजारत का आलमी मरकज़ हुआ करता था। बग़दाद सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि एक अज़ीम सल्तनत की धड़कन और उस दौर की सबसे बड़ी सुपरपावर का दिल था, जिसका असर सदियों तक क़ायम रहा. आज के दौर मे जो मुक़ाम वाशिंग्टोन डी. सी. को हासिल है, जो सिर्फ एक मुल्क का दारुल हुकुमत हि नहि बल्कि दुनिया के आलमि निजाम कि निगरानि करने वाला शहर भि है, उसि तरह बगदाद भि अपने दौर मे उस से ज्यादा मुक़ाम रखता था.

 अब्बासी ख़िलाफ़त और बग़दाद की बुनियाद

750 ईसवी में बनी उमय्या (Umayyad Caliphate) को शिकस्त देने के बाद अब्बासियों ने इस्लामी दुनिया की बागडोर संभाली। दूसरे अब्बासी ख़लीफ़ा अबू जाफ़र अल-मंसूर ने एक नए दारुल-ख़िलाफ़ा की ज़रूरत महसूस की, जो महफ़ूज़ भी हो और तिजारती शाहराह पर भी वाक़े हो।
बग़दाद की बुनियाद 762 ईस्वी में रखी गई और यह शहर दुनिया का सबसे बड़ा इल्मी और शकाफति मरकज़ बना। मगर मंगोलों के हमलों ने इसे कई बार तबाह किया। इसके बावजूद बग़दाद आज भी अपनी तारीखी और तहज़ीबी पहचान के लिए मशहूर है।
शहर का नक़्शा गोलाकार था, जिसे "मदीनत-उस-सलाम" यानी "शांति का शहर" कहा गया

मंगोलों ने बग़दाद को जनवरी–फ़रवरी 1258 में तबाह किया। यह हमला इस्लामी दुनिया के सुनहरे दौर का अंत साबित हुआ और बग़दाद कभी भी अपनी पुरानी शान वापस हासिल नहीं कर सका।

 "मदीनत-उस-सलाम" का क़याम
अल-मंसूर ने दरिया-ए-दजला (Tigris River) के किनारे एक शानदार शहर की बुनियाद रखी, जिसे उसने "मदीनत-उस-सलाम" यानी "सलामती का शहर" का नाम दिया, जो बाद में बग़दाद के नाम से मशहूर हुआ। 30 जुलाई, 762 ईसवी में इसकी तामीर शुरू हुई। इस शहर को एक गोल नक़्शे पर बनाया गया था, जो उस दौर की फ़न-ए-तामीर और शहरी मंसूबाबंदी का एक शाहकार था। शहर के बीचों-बीच ख़लीफ़ा का महल और जामा मस्जिद थी, जो उसकी मरकज़ी हैसियत को ज़ाहिर करती थी।

 अब्बासी हुकूमत का सुनहरा दौर

बग़दाद बहुत जल्द दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर बन गया। यह दौर अब्बासी ख़िलाफ़त के उरूज का ज़माना था, ख़ास तौर पर ख़लीफ़ा हारून-उर-रशीद और उनके बेटे अल-मामून के अहद में।

 1. इल्म और फ़नून का गहवारा
अब्बासी दौर में बग़दाद इल्म-ओ-अदब का ऐसा मरकज़ बन गया, जिसकी मिसाल नहीं मिलती।
बैत-उल-हिकमत (House of Wisdom): ख़लीफ़ा अल-मामून ने "बैत-उल-हिकमत" की बुनियाद रखी, जो एक लाइब्रेरी, तर्जुमे का इदारा और यूनिवर्सिटी थी। यहां यूनानी (Greek), ईरानी (Persian), और हिंदुस्तानी (Indian) किताबों के अरबी में तर्जुमे किए गए, जिससे अल-जबर (Algebra), तिब (Medicine), और फ़लसफ़ा (Philosophy) जैसे उलूम ने तरक़्क़ी की।

अज़ीम उलमा और दानिश्वर: इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम अहमद बिन हंबल, अल-ख़्वारिज़मी और अल-किंदी जैसे बेमिसाल उलमा, फ़ुक़हा और साइंसदान इसी शहर की रौनक थे।

 2. इंतिज़ामिया और फ़ौजी क़ुव्वत

अब्बासी हुकूमत का इंतिज़ामी ढांचा बहुत मज़बूत और मुनज़्ज़म था। वज़ीरों, क़ाज़ियों, और गवर्नरों का एक वसीअ नेटवर्क पूरी सल्तनत को कंट्रोल करता था। उनकी फ़ौज उस दौर की सबसे ताक़तवर फ़ौजों में से एक थी, जिसने बैज़न्तीनी सल्तनत (Byzantine Empire) के ख़िलाफ़ कई कामयाब जंगें लड़ीं और इस्लामी सरहदों को महफ़ूज़ रखा।

 जंगें और फ़तूहात

अब्बासियों ने अपनी हुकूमत के शुरुआती दौर में कई अहम फ़तूहात हासिल कीं और सल्तनत को सिंध से लेकर शुमाली अफ़्रीक़ा तक फैलाया। हारून-उर-रशीद के दौर में बैज़न्तीनी हुक्मरान अब्बासियों को ख़िराज अदा करते थे, जो उनकी फ़ौजी बड़ाई का सुबूत था।

 ख़िलाफ़त का ज़वाल: बग़दाद की तबाही.

हर उरूज को ज़वाल है। अब्बासी ख़िलाफ़त का सुनहरा दौर हमेशा क़ायम न रह सका। अंदरूनी साज़िशें, तुर्क सिपाहियों का बढ़ता हुआ असर, और सूबाई गवर्नरों की ख़ुदमुख़्तारी ने मरकज़ी हुकूमत को कमज़ोर कर दिया।

 मंगोल हमला और बग़दाद का सुकूत

ख़िलाफ़त के ज़वाल का सबसे दर्दनाक बाब 1258 ईसवी में लिखा गया, जब चंगेज़ ख़ान के पोते हलाकू ख़ान ने एक अज़ीम लश्कर के साथ बग़दाद पर चढ़ाई कर दी।

तारीख़ की अज़ीम तबाही: मंगोलों ने शहर को घेर लिया और आख़िरी अब्बासी हुकम्रान अल-मुस्तअसिम बिल्लाह को शिकस्त दी। उन्होंने बग़दाद में ख़ून की नदियां बहा दीं। लाखों लोगों को क़त्ल कर दिया गया।

बग़दाद, जिसे कभी "शहरों की मां" (Umm al-Qura) और दुनिया का सबसे अमीर शहर कहा जाता था, तारीख़ के पन्नों में अपनी शान-ओ-शौकत और फिर अपनी दर्दनाक बर्बादी के लिए जाना जाता है। 1258 ईसवी में इस शहर पर जो क़यामत टूटी, उसने इस्लामी तारीख़ का धारा हमेशा के लिए बदल दिया।

 हलाकू ख़ान का हमला: जब बग़दाद "ख़ून के दरिया" में बदल गया.

1258 ईसवी का साल बग़दाद के लिए "सन-ए-मौत" (Year of Death) साबित हुआ। चंगेज़ ख़ान के पोते हलाकू ख़ान ने अपनी मंगोल फ़ौजों के साथ बग़दाद का मुहासरा (Siege) कर लिया।

उस वक़्त के मशहूर तारीख़दान अब्दुल्ला वस्साफ़ शीराज़ी ने उस मंज़रकशी को कुछ यूं बयान किया है कि मंगोल फ़ौजी शहर में "भूखे भेड़ियों" की तरह दाखिल हुए और "भेड़ों के रेवड़" (बग़दाद के अवाम) पर टूट पड़े। उन्होंने न बच्चों को बख्शा, न बूढ़ों को। महलों और मस्जिदों को आग लगा दी गई, और शहर की गलियां लाशों से इस कदर भर गईं कि हलाकू ख़ान को बदबू की वजह से अपना खेमा शहर से बाहर लगाना पड़ा।

आख़िरी ख़लीफ़ा अल-मुस्तअसिम बिल्लाह का अंजाम.

अब्बासी ख़िलाफ़त के 37वें और आख़िरी ख़लीफ़ा, अल-मुस्तअसिम बिल्लाह की मौत का वाक़या तारीख़ का एक बेहद इबरतनाक सबक है।

हलाकू के वज़ीर नसीरुद्दीन तूसी जो उस वक़्त वहां मौजूद थे, एक दिलचस्प और दर्दनाक वाक़या बयान करते हैं:
हलाकू ने ख़लीफ़ा को गिरफ़्तार करने के बाद उन्हें कई दिनों तक भूखा रखा। 

फिर उनके सामने एक बर्तन लाया गया जो सोने-चांदी और जवाहरात से भरा हुआ था।

हलाकू ने तंज़िया लहजे में कहा: "खाओ इसे!"

ख़लीफ़ा ने बेबसी से जवाब दिया: "मैं सोना कैसे खा सकता हूं?"

इस पर हलाकू ने एक तारीख़ी जुमला कहा:

"अगर तुमने यह सोना, हिरे ज़वाहरात जमा करने के बजाय, इससे अपने सिपाहियों के लिए तलवारें और तीर बनवाए होते, तो आज मैं दरिया पार करके तुम तक न पहुंच पाता।"

ख़लीफ़ा ने जवाब दिया: "यह ख़ुदा की मर्जी थी।"
हलाकू ने पलटकर कहा: "तो अब मैं तुम्हारे साथ जो करने जा रहा हूं, वो भी ख़ुदा ही की मर्जी है।"

मौत का अनोखा और खौफ़नाक तरीक़ा.

मंगोलों के अक़ीदे के मुताबिक, किसी बादशाह या शाही ख़ून को ज़मीन पर गिराना मनहूस समझा जाता था। इसलिए ख़लीफ़ा को तलवार से मारने के बजाय, उन्हें एक मोटे चादर में लपेटा गया। फिर उनके ऊपर घोड़े दौड़ा दिए गए, यहां तक कि घोड़ों की टापों के नीचे कुचलकर आख़िरी अब्बासी हुकम्रान ने दम तोड़ दिया।

बैत-उल-हिकमत की बर्बादी: "बैत-उल-हिकमत" की बेशक़ीमत किताबों को या तो जला दिया गया या दरिया-ए-दजला में फेंक दिया गया। कहा जाता है कि दरिया का पानी कई दिनों तक किताबों की सियाही से काला रहा।

यह हमला सिर्फ़ एक शहर की तबाही नहीं था, बल्कि यह इस्लामी तहज़ीब के उस सुनहरे दौर का ख़ात्मा था, जिसकी रौशनी से कभी पूरी दुनिया मुनव्वर थी। इसके बाद बग़दाद कभी अपनी खोई हुई अज़मत दोबारा हासिल न कर सका और सदियों तक गुमनामी और तबाही का शिकार रहा। बीसवीं सदी में इराक़ की राजधानी बनने के बाद इसने फिर से तरक़्क़ी की, लेकिन अब्बासी दौर की शान-ओ-शौकत एक ख़्वाब बनकर रह गई.

 तारीख के आईने में हमारी गफ़लत

तारीख गवाह है: जब कोई क़ौम अपने असल मकसद को भूलकर फ़ुज़ूल बहसों और आपसी इख़्तिलाफ़ात में उलझ जाती है, तो उसका ज़वाल मुकद्दर बन जाता है। अब्बासी ख़िलाफ़त की यह दास्तान महज़ एक किस्सा नहीं, बल्कि सोई हुई उम्मत के लिए एक "बर्बादी का सायरन" है।

बगदाद की वो आख़िरी शामें: इल्म की महफ़िलें या जहालत का तमाशा?

अब्बासी हुकूमत का आख़िरी दौर भी क्या अजीब मंज़र पेश कर रहा था! 
एक तरफ़ मुसलमानों का दारुल-ख़िलाफ़ा बगदाद, जो कभी इल्म-ओ-हिकमत का सूरज हुआ करता था, अब "फिर्क़ावाराना बहसों" और "ला-यानी मुनाज़रों" का अखाड़ा बन चुका था।

हालात इस कदर बिगड़ चुके थे कि हर दूसरे दिन बगदाद के चौराहों पर अजीब-ओ-गरीब दीनी मसलों पर मजमे लग रहे थे।

पहला मुनाज़रा: क्या आपने कभी सोचा है कि एक वक्त में "सूई की नोक पर कितने फ़रिश्ते बैठ सकते हैं?" जी हाँ! उम्मत के दानिश्वर इस "अहम तरीन" मसले पर अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा रहे थे।

- दूसरा मुनाज़रा: बहस इस बात पर गर्म थी कि "कौआ हलाल है या हराम?" गोया उम्मत के सारे मसले हल हो चुके थे, बस यही एक गुत्थी सुलझानी बाकी थी।

तीसरा मुनाज़रा: उलमा-ए-किराम इस बात पर उलझ रहे थे कि "मिस्वाक का शरई साइज़ कितना होना चाहिए?" और हर कोई अपनी राय को ही हक़-ए-इलाही साबित करने पर तुला था।

फिर आया हलाकू ख़ान का तूफ़ान

अभी बगदाद की गलियों में ये बे-मानी बहसें अपने उरूज पर ही थीं कि हलाकू ख़ान अपनी वहशी मंगोल फौजों के साथ कयामत बनकर नाज़िल हो गया।

- वो लोग जो 'मिस्वाक की हुरमत' पर एक-दूसरे का गिरेबान पकड़ रहे थे, उनकी अपनी बोटियाँ हवा में बिखेर दी गईं।
- वो अक़्लमंद जो "सूई की नोक पर फ़रिश्ते" गिन रहे थे, उनके सरों को काटकर हलाकू ने ऐसी खोपड़ियों के मीनार खड़े किए कि उन्हें गिनना भी मुमकिन न रहा।

 और वो जो 'कौवे के गोश्त' की हिल्लत और हुरमत पर मुनाज़रा कर रहे थे, उनके बे-गोर-ओ-कफ़न जिस्मों को चील और कौवे नोच-नोच कर खा रहे थे।

तारीख का सबसे बड़ा सबक यही है कि क़ौमें तारीख से सबक नहीं सीखतीं। आज फिर वही मंज़र है, वही गफ़लत है और वही अंजाम का इंतज़ार है।

आज का "सोशल मीडिया" हमारा नया बगदाद बन चुका है, जहाँ मस्जिदों के मिम्बरों से लेकर फ़ेसबुक और व्हाट्सएप के ग्रुप्स तक, वही पुरानी "मुनाज़रेबाज़ी" पूरी शिद्दत से जारी है।
- हर फ़िर्क़े और मसलक का "झंडाबरदार" अपने मानने वालों को जन्नत की टिकट बांट रहा है और दूसरों को जहन्नुम रसीद कर रहा है।
- हम लिबरलिज़्म, इल्हाद (Atheism) और मगरिबी तहज़ीब के यलगार से बे-ख़बर, आपस में "काफ़िर-काफ़िर" का खेल खेल रहे हैं।

अब्बासी तजुर्बे से आज के मुसलमानों के लिए इबरत के चिराग: तारीख का ख़ामोश पैगाम

तारीख (History) अपने आप को दोहराती नहीं है, लेकिन वो 'राइम' (Rhyme) ज़रूर करती है। बगदाद का सुकूत महज़ एक शहर का जलना नहीं था, बल्कि यह उस फिक्र और नज़रिया (Mindset) का जनाज़ा था जिसने कौम को अंदर से खोखला कर दिया था। अगर आज हम अब्बासी दौर के आख़िरी अय्याम का मुवाज़ना मौजूदा हालात से करें, तो कई कड़वे सच सामने आते हैं।

यहाँ वो 5 बड़े सबक़ हैं जो ख़िलाफ़त-ए-अब्बासिया के ज़वाल से आज की उम्मत-ए-मुस्लिमा को सीखने चाहिए:

1. फ़िर्क़ावारियत: घर को लगी आग घर के चिराग से
बगदाद पर हलाकू ख़ान के हमले से पहले, वहाँ शिया और सुन्नी आपस में इस कदर उलझे हुए थे कि एक फ़िर्क़ा दूसरे को नीचा दिखाने के लिए बाहरी दुश्मन से हाथ मिलाने को तैयार था।

आज का सबक़: आज भी उम्मत "मसलकी जंगों" में मुब्तला है। हम एक अल्लाह और एक रसूल (स.अ.व.) को मानने वाले, आपस में ही काफ़िर-काफ़िर खेल रहे हैं। याद रखें, जब हम आपस में लड़ते हैं, तो दुश्मन को हमला करने के लिए तलवार की ज़रूरत नहीं पड़ती, हमारी आपसी नफ़रत ही काफ़ी होती है। इत्तेहाद (Unity) कोई 'ऑप्शन' नहीं, बल्कि बक़ा (Survival) की शर्त है।

2. तरजीहात का ग़लत ताय्युन (Misplaced Priorities)
जैसा कि आपने पढ़ा, जब मंगोल तलवारें तेज़ कर रहे थे, बगदाद के उलमा और दानिश्वर "कौवे के गोश्त" और "सूई की नोक" पर बहस कर रहे थे।

आज का सबक़: आज मुसलमान तालीम, मईशत और टेक्नोलॉजी में दुनिया से कोसों दूर हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर हमारी बहसें देखें— चाँद रात की तारीख, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल, या रफ़ा-यदैन के मसाइल। हम "उसूल" (Fundamentals) छोड़कर "फ़ुरू" (Peripheral issues) में उलझे हैं। जब कौम बुनियादी मसलों से आँखें चुराकर लान-तानी बहसों में सुकून तलाशने लगे, तो समझ लें ज़वाल नज़दीक है।

3. इल्म-ओ-तहक़ीक़ से दूरी (Intellectual Stagnation)
अब्बासी दौर का आगाज़ "बैत-उल-हिकमत" (House of Wisdom) से हुआ था, जहाँ दुनिया भर का इल्म जमा किया गया। लेकिन आख़िरी दौर में इल्म सिर्फ़ रट्टा लगाने और पुरानी किताबों की शरह (Explanation) लिखने तक महदूद हो गया। इजतिहाद (Creative thinking) का दरवाज़ा बंद कर दिया गया।

आज का सबक़: आज हमारे पास जज़्बात तो हैं, मगर इल्म नहीं। हम कंज्यूमर (Consumer) हैं, इन्वेंटर (Inventor) नहीं। जब तक मुसलमान दोबारा "किताब" और "प्रयोगशाला" (Laboratory) से नहीं जुड़ेंगे, दुनिया उन्हें इज़्ज़त की निगाह से नहीं देखेगी। जज़्बाती नारों से नहीं, इल्मी सलाहियत से दुनिया फ़तह होती है।

 4. ख़ुश-फ़हमी और माज़ी पर फख्र.
आख़िरी ख़लीफ़ा अल-मुस्तअसिम को यह ग़लत-फ़हमी थी कि अगर बगदाद पर हमला हुआ, तो पूरी दुनिया के मुसलमान उसे बचाने के लिए उमड़ पड़ेंगे। वो माज़ी की शान-ओ-शौकत के नशे में गफ़लत की नींद सोता रहा।

आज का सबक़: हम भी आज सिर्फ़ अपने बुज़ुर्गों के कारनामों पर ज़िंदा हैं— "हमारे असलाफ़ ने स्पेन फ़तह किया था," "हमने यह बनाया, हमने वो किया।" माज़ी याद रखने के लिए है, उसमें रहने के लिए नहीं। दुनिया यह नहीं पूछती कि तुम "क्या थे?", दुनिया पूछती है कि तुम "आज क्या हो?"

5. गद्दारों की शनाख़्त में नाकामी
बगदाद के ज़वाल में अंदरूनी गद्दारों (जैसे वज़ीर इब्न अल-अलक़मी का किरदार) ने अहम किरदार अदा किया, जिन्होंने दुश्मन के लिए दरवाज़े खोले।

आज का सबक़: आज भी हमारी सफों में ऐसे "मीर जाफ़र", 'सर सैयद' और "मीर सादिक़" मौजूद हैं जो जाती मफ़ाद (Personal Interest) के लिए पूरी कौम का सौदा कर देते हैं। अपनी सफों को पहचानना और चापलूसों, मुखबिरो (Flatterers) के बजाय मुखलिस (Sincere) लोगों को क़ियादत सौंपना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

ख़ुलासा-ए-कलाम (Conclusion)

अब्बासी ख़िलाफ़त का ज़वाल हमें चीख़-चीख़ कर बता रहा है कि:
"कुदरत किसी क़ौम की हालत तब तक नहीं बदलती, जब तक वो ख़ुद अपने अंदर तब्दीली न पैदा करे।"

आज अगर हमें ज़वाल के इस गहरे गढ़े से निकलना है, तो हमें 'फिर्क़ावारियत की आग को बुझाकर, इल्म की शमा जलानी होगी।' वरना हलाकू ख़ान की शक्लें बदलती रहेंगी, कभी मुवाशि पाबंदियों की शक्ल में तो कभी मीडिया वॉर की शक्ल में, और हम सिर्फ़ तारीख का एक "ग़मगीन बाब" बनकर रह जाएंगे।

इबरत हासिल करो!

मेरे अज़ीज़ो! याद रखो, आज का "हलाकू ख़ान" (ज़दीद फितने और दुश्मन-ए-इस्लाम ताकतें) हमारी सरहदों पर नहीं, बल्कि हमारे घरों और जेहनों में दाखिल हो चुका है। वो हमें तबाह-ओ-बर्बाद करता हुआ आगे बढ़ रहा है, और हम? 
हम अपनी "बारी" आने का ख़ामोशी से इंतज़ार कर रहे हैं।
ख़ुदारा! जाग जाओ, इससे पहले कि तारीख हमें भी सिर्फ़ एक "इबरतनाक दास्तान" बनाकर छोड़ दे।

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