Debate Loss of Mufti Saheb and the Media’s Humiliation of Muslims.
If Mufti Saheb Lost the Debate, Muslims Would Face Humiliation on Social and Mainstream Media.
Mufti Saheb’s Defeat: How Muslims Could Be Targeted by Social and Mainstream Media.
अगर मुफ्ती साहब हारते तो मुसलमानों को मीडिया में कैसे ज़लील किया जाता?
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| Atheist VS Theist. |
अपनी नस्लों को 'अज्ञेयवादी' (Agnostic) उलझनों से बचाने के लिए उन्हें मोहब्बत और मन्तिक (Logic) का दीन सिखाइए। याद रखें, खुदा बहस का नहीं, बल्कि अहसास और इबादत का मौजू है।
क्या खुदा सिर्फ बहस का मौजू है? (Does God Exist?)
जावेद अख्तर और मुफ्ती शामील के मुनाजरे से उम्मत के लिए चंद दर्र-ए-नायाब.
20 Dec को जावेद अख्तर साहब और मुफ्ती शामील साहब के दरमियान हुई गुफ्तगू ने दानिशवरी के हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। यह सिर्फ दो शख्सियतों का टकराव नहीं था, बल्कि दो मुख्तलिफ सोच और नजरियात का आमना-सामना था। इस गुफ्तगू से जो हकायेक छन कर सामने आए हैं, वे हर मुसलमान वालिदैन और मुअल्लिम के लिए गौर-ओ-फिक्र का मकाम हैं।
इल्म और शऊर का हसीन संगम.
मुफ्ती शामील साहब ने जिस तरह दीनी तालीमात के साथ-साथ साइंसी उलूम और अक्ली दलाइल (Rationality) को पेश किया, वह इस बात की तस्दीक है कि इस्लाम इल्म की राह में रोड़ा नहीं बल्कि उसका सरचश्मा है। हमारे बच्चों के हाथों में कुरआन के साथ-साथ साइंस की किताबें भी होनी चाहिए। जब तक हम अपने बच्चों को तहकीक और अक्ल के इस्तेमाल का हुनर नहीं सिखाएंगे, वे जदीद दौर के फित्नों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उलमा-ए-किराम और दीगर मजहबी रहनुमाओं को चाहिए कि वे मुनाजरे का यह सलीका और संजीदगी मुफ्ती साहब से सीखें, ताकि दावत-ए-दीन का काम ज्यादा मुअस्सिर हो सके।
नजरियात के पीछे छिपे जख्म.
जावेद अख्तर साहब की इल्हाद (Atheism) पसंदी को देखकर ऐसा महसूस होता है कि यह किसी गहरी तहकीक या लाजिक का नतीजा नहीं, बल्कि उन तलख तजुर्बात का अक्स है जो उन्हें सो-कॉल्ड मजहबी पेशवाओं के रवैयों से मिले। अक्सर इंसान खुदा से नहीं, बल्कि खुदा के ठेकेदारों के जुल्म और रियाकारी से तंग आकर मजहब से दूर हो जाता है। यह हमारे लिए एक लम्हा-ए-फिक्रिया है कि क्या हमारा किरदार लोगों को दीन के करीब ला रहा है या उनसे दूर कर रहा है?
साइंस की हदें और वजूद-ए-बारी ताला.
यह बात समझने की है कि साइंस सिर्फ उन चीजों पर बहस करती है जो 'ऑब्जर्वेबल' (Observable) हों। खुदा के वजूद को खालिस साइंसी तराजू में तौलना एक मन्तिकी गलती (Logical Error) है। खुदा को झुठलाना भी उतना ही गैर-साइंसी है जितना उसे तजुर्बागाह में साबित करना। इस मामले में एक 'अज्ञेयवादी' (Agnostic) रवैया फिर भी अक्ल के करीब हो सकता है, लेकिन मुकम्मल इनकार सिर्फ अना और बेबसी की निशानी है।
शिद्दत पसंदी पर बहस करना तो तामीरी हो सकता है, लेकिन खुदा के वजूद पर बहस करना अक्सर ला-हासिल साबित होता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई रोबोट अपने बनाने वाले इंसान का वजूद तलाश रहा हो और दूसरा रोबोट उसका मजाक उड़ाए। जो मखलूक है, वह खालिक के वजूद को अपनी महदूद अक्ल के दायरे में कैसे कैद कर सकती है?
ये कोई नॉर्मल डिबेट नहीं थी, यह मुसलमानों की आइडियोलॉजी का इम्तेहान था.
यह ईमान बनाम तंज़ का मुकाबला था।
यह बातिल के सरदार का 'हकिकि खुदा के बंदे' से टकराव था.
मुफति शमयिल साहेब वहा पर खुदा/इश्वर के बंदे के तौर पर सभी आस्तिक/इमान वाले कि नुमाइंदगि कर रहे थे.
वहा पर अगर कम्ज़ोर पड जाते मुफ्ति साहेब तो बातिल किस तरह अपनि असलियत दिखाता इसका तस्सवुर किजिये.
अगर इस बहस में मुफ्ती साहब हार जाते, तो मुसलमानों को सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक ज़लील किया जाता, आज जो मेनस्ट्रीम मीडिया में सन्नाटा पसरा है, वो इसलिए है क्योंकि, मुफ्ती शमाइल नदवी ने जावेद अख़्तर को चारों खाने चित्त कर दिया।
मगर नास्तिक जावेद अख्तर का बचकाना हरकत मुफ्ती साहेब के सामने उन्हे नर्सरी का बच्चा साबित कर दिया।
यह महज़ एक गुफ्तगू नहीं थी, बल्कि उम्मत-ए-मुस्लिमा के नजरियात और उनकी साख का एक निहायत कड़ा इम्तिहान था। एक तरफ जावेद अख्तर का वह तंज़िया और इल्हादी लब-ओ-लहजा था जो बरसों से मजहब को 'दकियानूसी' साबित करने की कोशिश में मसरूफ है, और दूसरी तरफ मुफ्ती शमाइल नदवी की ईमानी फिरासत और साइंसी बसीरत थी। आज जो मेनस्ट्रीम मीडिया के गलियारों में सन्नाटा पसरा है, वह दरअसल मुफ्ती साहब की उस फतह का गवाह है जिसने 'लिबरल' और 'लेफ्टिस्ट' खेमे के तमाम मंसूबों पर पानी फेर दिया।
अगर मुफ्ती साहब का इल्मी मयार जरा भी कम होता?
जरा तसव्वुर कीजिए, अगर मुफ्ती साहब की जगह कोई ऐसा शख्स होता जो जदीद उलूम और मन्तिक से नावाकिफ होता, तो यह खुद-साख्ता दानिशवर अब तक इस्लाम को 'कठमुल्लाइज्म' का नाम देकर पूरी दुनिया में रुसवा कर चुके होते। यह तथाकथित सेकुलर और लिबरल तबका हमेशा ताक में रहता है कि कब कोई मजहबी शख्स दलीलों में लड़खड़ाए और कब ये उसे 'जहालत' का लेबल लगाकर उसका मजाक उड़ाएं। लेकिन मुफ्ती साहब ने अपनी इल्मी कुव्वत से इन तमाम मुल्हिदीन (Atheists) के मुंह बंद कर दिए और उन्हें यह बता दिया कि इस्लाम का डिफा (Defense) सिर्फ जज्बात से नहीं, बल्कि खालिस अक्ल और इल्म से भी मुमकिन है।
डूबते ईमान के लिए एक मजबूत ढाल.
इस बहस का सबसे बड़ा फायदा उन नौजवानों को हुआ जो जदीदियत और इल्हाद की चकाचौंध में अपने ईमान से हाथ धोने वाले थे। मुफ्ती साहब उन लोगों के लिए एक ढाल बन गए जो नास्तिकता की ढलान पर फिसल रहे थे। उन्होंने न जाने कितनी रूहों को कश्मकश के अंधेरे से निकालकर दोबारा ईमान की रौशनि अता की। यह उन लोगों के लिए एक करारा जवाब था जो यह समझते थे कि मजहब और साइंस दो मुख्तलिफ रास्ते हैं।
एक तारीखी फतह का आगाज.
20 दिसंबर का दिन तारीख में इस हवाले से याद रखा जाएगा कि जब मुसलमानों को उनकी आइडियोलॉजी के नाम पर जलील करने की कोशिश की गई, तो एक आलिम-ए-दीन ने मैदान-ए-जंग में नहीं बल्कि मैदान-ए-अक्ल में दुश्मन को चारों खाने चित कर दिया। मुफ्ती शमाइल नदवी को जितनी दाद दी जाए वह कम है, क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक मुनाजरा नहीं जीता, बल्कि एक हारी हुई जेहनियत को दोबारा जिंदा किया है। यह जीत उम्मत के उन तमाम लोगों के लिए एक पैगाम है जो इल्म और तहकीक से नाता तोड़ चुके थे।
साइंस हमें यह तो बता सकती है कि फूल कैसे खिलता है, लेकिन यह नहीं बता सकती कि फूल क्यों खिलता है। अक्ल की आखरी हद पर ईमान का सफर शुरू होता है।
दीन और दुनिया दो अलग जजीरे नहीं हैं। मुफ्ती शामील का अंदाज सिखाता है कि कुरआन के साथ साइंस का इल्म ही मोमिन का मुकम्मल हथियार है।
एक मखलूक (Created) के लिए अपने खालिक (Creator) का इनकार करना बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई किताब अपने मुसन्निफ (Author) के वजूद से मुकर जाए।
बहस अगर इलहादि जुनूनियत को खत्म करने के लिए हो तो सहि है, लेकिन अगर खुदा के वजूद को झुठलाने के लिए हो तो सिर्फ वक्त का जिया (बर्बादी) है।
आज के दौर में हमारे बच्चों को सिर्फ रट्टा मार तालीम की जरूरत नहीं, बल्कि मुफ्ती शामील साहब की तरह साइंसी दलाइल और मुदल्लल (Reasoned) गुफ्तगू की जरूरत है। जावेद अख्तर साहब जैसे दानिशवरों की कड़वाहट दरअसल इल्म कि कमि का नतीजा है।
अक्ल की हद: साइंस खुदा को साबित या रद्द करने का आला (Tool) नहीं है। रूहानियत वहां से शुरू होती है जहां मादियत (Materialism) दम तोड़ देती है।
ऐ मुसलमानों! अपनी नस्लों को सिर्फ लफ्जी बहस न सिखाएं, बल्कि उन्हें वह किरदार दें कि कोई उन्हें देखकर खुदा का इनकार न कर सके। इल्म को जज्बात के साथ और अक्ल को ईमान के साथ जोड़ना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।







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