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Hind Ke Musalman aur Angrez: Indian kings Who helped British Colonize India.

The Role of Indian Nobility in Facilitating British Rule.

The Cowardly Royals: Unmasking the True Culprits of Colonial Slavery.
How Indian Kings Betrayed Freedom: A Hidden History of Subjugation?
Royal Complicity in Colonial Rule: The Untold Story of Nawabs and Rajas.
Case Studies: Betrayals That Shaped India’s Colonial Fate.
Resistance vs Collaboration: Who Truly Fought for Freedom?
Legacy of Royal Complicity in Modern India.
Conclusion: Learning from History to Reclaim Agency.
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How Indian royalty betrayed freedom?
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जब हमारी महफ़िलों में शमा रौशन थी और नज़्मों में महबूब की तारीफ़ हो रही थी, तब उनकी छावनियों में साज़िशों के चिराग़ जल रहे थे। हम हुस्न के क़सीदे गढ़ते रह गए और वो हमारे मुल्क की तक़दीर लिख गए।
बुज़दिल नवाब और राजे – ग़ुलामी की तारीख़ के असल मुजरिम
बर-ए-स़गीर की तारीख़ का सबसे अलमानाक बाब वो है जब अँग्रेज़ चंद हज़ार फ़ौजियों और महदूद वसाइल के साथ इस ख़ित्ते की वसीअ सल्तनतों को ज़ेर-ए-कार कर गए। आम तास्सुर ये है कि ब्रिटिश फ़ौज की जदीद तोपें और राइफ़लें ही फ़ैसला कुन साबित हुईं, मगर असल हक़ीक़त इस से कहीं ज़्यादा तल्ख़ है। अँग्रेज़ की जीत का सबसे बड़ा सबब मकामी मुस्लिम हुक्मरानों की बुज़दिली, ऐश-परस्ती और ग़द्दारी थी।  
मीर जाफ़र और प्लासी की ग़द्दारी
1757 की प्लासी की जंग बर-ए-स़गीर की तक़दीर बदलने वाली लड़ाई थी। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने अँग्रेज़ को ललकारा मगर उसके अपने सिपहसालार मीर जाफ़र ने मैदान-ए-जंग में साथ छोड़ दिया। मीर जाफ़र ने अँग्रेज़ों से ख़ुफ़िया मुआहिदा किया और सिराजुद्दौला को धोखा दिया। इस एक ग़द्दारी ने अँग्रेज़ के लिए ग़ुलामी के दरवाज़े खोल दिए।

प्लासी की जंग हिंदुस्तान की तबाही की पहली ईंट थी। सिराजुद्दौला एक जवान, दिलेर और मुल्क-परस्त नवाब था। उसने ईस्ट इंडिया कंपनी को चेतावनी दी कि बंगाल उसकी मिल्कियत है। मगर उसी की फौज के सरदार, मीर जाफ़र, ने अँग्रेज़ों से ख़ुफ़िया मुआहिदा कर लिया।
प्लासी के मैदान में सिपाही तो सिराजुद्दौला के थे, मगर दिल और दौलत मीर जाफ़र की जेब में नहीं थे — वो पहले ही विलियम क्लाइव के सामने बिक चुके थे।

मीर क़ासिम – दूसरी ग़द्दारी
मीर जाफ़र के बाद उसका दामाद मीर क़ासिम आया। इब्तिदा में अँग्रेज़ का साथ दिया, लेकिन फिर मज़ाहमत की कोशिश की। मगर देर हो चुकी थी। उसकी नाकामी ने पूरे बंगाल को अँग्रेज़ों के क़दमों में डाल दिया।
 जब उसे एहसास हुआ कि वो उनकी कठपुतली बन चुका है, तो उसने बग़ावत की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बंगाल की ज़मीन अँग्रेज़ों के हाथों में चली गई और हिंदुस्तान के ताज से पहली मोती की बूंद गिर पड़ी।

मीर सादिक – टीपू सुल्तान का सानिहा

1799 में सरंगपटम की जंग में टीपू सुल्तान ने अँग्रेज़ के ख़िलाफ़ आख़िरी दम तक लड़ाई लड़ी, लेकिन मीर सादिक जैसे ग़द्दार वज़ीर ने पीठ में छुरा घोंपा। उसकी बुज़दिली ने न सिर्फ़ टीपू को शहीद करवाया बल्कि जुबनी हिन्द को हमेशा के लिए अँग्रेज़ के हाथों में दे दिया। मीर सादिक का नाम मीर जाफ़र के साथ “ग़द्दारी” की अलामत के तौर पर हमेशा याद रखा जाता है।
1799 में सरंगपट्टनम की जंग में टीपू सुल्तान ने अँग्रेज़ के सामने सर नहीं झुकाया।
वो जानता था कि अगर वो गिरा, तो पूरा दक्षिण गिर जाएगा। उसने कहा था: “शेर की एक दिन की ज़िंदगी गीदड़ की सौ साल की ज़िंदगी से बेहतर है।”
जब जंग अपने चरम पर थी, उसने अपनी फ़ौज को खाना बाँटने के बहाने पीछे रोक लिया।
अँग्रेज़ों ने हमला किया, और टीपू शेर-ए-मैसूर की लाश उसके क़िले के दरवाज़े पर मिली।
उसकी शहादत हिंदुस्तान की रूह में आग थी, मगर मीर सादिक की ग़द्दारी ने उस आग पर पानी डाल दिया।

नवाब वाजिद अली शाह और अवध की बर्बादी

अवध के नवाब वाजिद अली शाह अपनी शायरी और रंगरेलियों में मगन थे। अँग्रेज़ ने 1856 में अवध को हड़प किया तो वो किसी मज़ाहमत के बजाय कलकत्ता जला वतन हो गए। उनकी ऐश-परस्ती ने एक बड़े ख़ित्ते को ग़ुलामी में धकेल दिया।
लखनऊ की गलियों में नृत्य, संगीत और इत्र की खुशबू थी। मगर जब 1856 में अँग्रेज़ों ने "गवर्नेंस की नाकामी" का बहाना बनाकर अवध को हड़प लिया, तो नवाब ने ताज के बजाय तम्बूरा उठा लिया। वो प्रतिरोध का नहीं, नज़्म का रास्ता चुन गया। अवध के सिपाही भूखे मर रहे थे, मगर दरबार में रंगरेलीयाँ जारी थीं।
इतिहास ने लिखा — “अँग्रेज़ ने अवध जीता नहीं, अवध उसे थाली में परोस दिया गया।”
भोपाल की बेगम और 1857 की जंग
1857 की जंग-ए-आज़ादी में अवाम क़ुर्बानियाँ दे रहे थे मगर भोपाल की बेगम ने अँग्रेज़ का साथ दिया। ये वो मौक़ा था जब अवामी जिद्दोजहद को ताक़त देने के बजाय हुक्मरानों ने ग़ुलामी को तर्ज़ीह दी।
1857 की बग़ावत हिंदुस्तान के दिल की पुकार थी। दिल्ली से कानपुर, झाँसी से मेरठ तक हर तरफ़ अंगारे थे।
मगर कुछ हुक्मरानों ने उस आग को ठंडा किया। भोपाल की बेगम ने ब्रिटिश राज के साथ वफ़ादारी निभाई और अंग्रेज़ी अफ़सरों को मदद दी।
जब बहादुर शाह ज़फ़र दिल्ली में मज़ाहमत की आख़िरी उम्मीद थे, तब भोपाल और कुछ दूसरी रियासतें अंग्रेज़ी हुकूमत के साथ खड़ी थीं।
इतिहास गवाह है — जब हर तरफ़ “सरफ़रोशी की तमन्ना” गूंज रही थी, कुछ महलों में तब भी नफ़ा-नुक़सान के हिसाब लिखे जा रहे थे।
 
रोहिल्ला सरदार
यू॰पी॰ के रोहिल्ला सरदार अपनी बहादुरी के लिए मशहूर थे, लेकिन अँग्रेज़ के ख़िलाफ़ वक़्त-ए-इम्तेहान पर कई ने मुआहिदों और मुफ़ाहमत को तर्ज़ीह दी। इसने 1857 की जंग को कमज़ोर कर दिया।
अंग्रेज़ों की चालाकी और रिश्वत ने उन्हें तोड़ दिया।
नवाब पटौदी
नवाब पटौदी भी उन हुक्मरानों में शामिल थे जिन्होंने अँग्रेज़ के सामने वफ़ादारी और ख़ुशामद का रास्ता अपनाया। उनकी रियासत ने मज़ाहमत की बजाय अँग्रेज़ से क़ुरबत इख़्तियार की, ताके ज़ाती मरा’आत और ऐश-ओ-आराम बरक़रार रहें। पटौदी और मज़फ़्फ़रनगर के नवाबों ने भी अंग्रेज़ों की दोस्ती को अपनी हुकूमत का सहारा समझा।
उन्होंने ताज के बजाय तमगे चुने, हुकूमत के बजाय हुक्मरानों की मेज़बानी को तरजीह दी।
और जब अंग्रेज़ों ने उनके इलाक़े छीन लिए, तो यही नवाब कलकत्ते और दिल्ली के दरबारों में अपने खिताब बचाने के लिए अर्ज़ियाँ लेकर घूमते रहे।
नवाब करनाल और नवाब मज़फ़्फ़रनगर
करनाल और मज़फ़्फ़रनगर के नवाब भी अपनी रियासतों को अँग्रेज़ के साथ जोड़ कर अपने इख़्तियार को महफ़ूज़ रखने की कोशिश करते रहे। उनके फ़ैसलों ने अवाम को मजीद ग़ुलामी की ज़ंजीरों में जकड़ दिया।
पटौदी, करनाल, अलीगढ़, और सहरनपुर जैसे इलाक़ों के नवाबों को तमगे दिए गए।
उनके बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल भेजा गया, ताकि आने वाली नस्लें “ब्रिटिश कल्चर” में ढल जाएँ।
कई खानदानों ने इस तर्ज़ को अपनाया।
कभी अंग्रेज़ों के खिलाफ़ खड़े होने वाले सिपाही के बेटे, अब अंग्रेज़ी अफ़सरों के साथ दावतों में बैठने लगे।
इस तरह ग़ुलामी वफ़ादारी का सिलसिला बन गई — जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला।

लियाक़त अली ख़ान का ख़ानदानी पस-ए-मनज़र

ये भी तारीखी हक़ीक़त है कि पाकिस्तान के पहले वज़ीर-ए-आज़म लियाक़त अली ख़ान के दादा और ख़ानदान भी इन्हीं नवाबी मरा’आत-याफ़्ता तबक़ात में शामिल थे जो अँग्रेज़ के क़रीब रहे। उनकी जागीरें और असर-ओ-रसूख़ ब्रिटिश वफ़ादारी की बदौलत ही क़ायम रहे। ये हक़ीक़त ज़ाहिर करती है कि ग़ुलामी का ढांचा किस तरह नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ाया गया।
जब अंग्रेज़ों ने देखा कि वफ़ादारी बिकती है, तो उन्होंने उसे इनाम और जागीर में बदल दिया।
कलम की ग़द्दारी — जब इल्म भी बिक गया
ग़द्दारी सिर्फ़ तलवार से नहीं होती, कलम से भी होती है
1857 की जंग के बाद जब अंग्रेज़ों ने मुसलमानों को बग़ावत का ज़िम्मेदार ठहराया, तब कुछ ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने इल्म की आड़ में अंग्रेज़ों की हिफ़ाज़त की। इन्हीं में एक नाम है — सर सैयद अहमद ख़ान
उन्होंने अपनी किताब “असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद” में लिखा कि 1857 की बग़ावत मुसलमानों की ग़लती थी।
उन्होंने अंग्रेज़ों से कहा कि मुसलमानों को माफ़ किया जाए, क्योंकि वो वफ़ादार हैं।
यह वो दौर था जब दिल्ली के बाशिंदे भूख से मर रहे थे, जब बहादुर शाह ज़फ़र को रंगून भेजा गया था, और जब लाखों इंसान जेलों में सड़ रहे थे। उस वक़्त अंग्रेज़ों के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होना इल्म की ज़िम्मेदारी थी, मगर सर सैयद ने मिल्ली हमदर्दी के बजाय सियासी हिकमत को चुना।
उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेज़ी तालीम और वफ़ादारी की तरफ़ बुलाया, ताकि वो फिर से “क़ाबिले-ए-क़बूल” बन जाएँ। मज़ाहमत की रूह मर गई।
कलम की नोक पर जो रोशनी होनी चाहिए थी, वो दरबार की मोमबत्ती बन गई।

असल शिकस्त कहाँ हुई?

अँग्रेज़ की असल ताक़त तोप-ओ-तफ़ंग नहीं थी बल्कि वो बुज़दिल, ख़ुदग़र्ज़ और ऐश-परस्त नवाब व राजे थे जिन्होंने अपनी रियाया को धोखा दिया। उनके महल रोशन रहे, मगर अवाम ग़ुलामी और फ़ाक़ों का शिकार हो गए।
वो दौर जब अँग्रेज़ ताजिर बनकर आए और बादशाह बन बैठे। यह वह वक़्त था जब हिंदुस्तान की ज़मीन सोना उगल रही थी, मगर उसके आसमान पर पराये हुक्मरानों का साया था। सवाल यह नहीं कि अँग्रेज़ कैसे जीते — सवाल यह है कि हम कैसे हारे? और इसका जवाब तलवार या तोप में नहीं, बल्कि हमारे महलों, दरबारों और कलमों की साज़िशों में छुपा है।
अँग्रेज़ की असल ताक़त तोप नहीं थी। उनके पास बस कुछ जहाज़, कुछ अफ़सर और सीमित फ़ौज थी। मगर उनके पास वो चीज़ थी जो हिंदुस्तानी हुक्मरानों में नहीं थी — एहतियात, इत्तिहाद और मक़सद। दूसरी तरफ़ हमारे नवाब, बादशाह और राजे अपनी ऐश-ओ-आराम की दुनियाओं में ग़ाफ़िल थे।
दरबारों में मुशायरों, रक़्स-ओ-सुरूर और इत्र की ख़ुशबू थी, मगर सिपाहियों के हलक़ में पानी तक नहीं पहुँचता था। जहाँ एक तरफ़ अंग्रेज़ मुल्क की नक़्शानवीसी कर रहे थे, वहीं हमारे नवाब अपनी हसीनाओं के नक़्शे पर क़सीदे लिखवा रहे थे।  इतिहास गवाही देता है — हिंदुस्तान की शिकस्त बाहर से नहीं, अंदर से हुई।
अँग्रेज़ों ने जो किया, वो किसी भी साम्राज्यवादी ताक़त का तरीक़ा था।
मगर जो हमने किया — वो हमारी नफ़्सीयात की नाकामी थी।
जब नवाबों ने मुल्क को अपनी जागीर समझा, जब राजाओं ने अवाम को ग़ुलाम समझा, जब इल्म ने ज़मीर का सौदा किया — तो ज़ंजीरें उतरना नहीं, कसना लाज़िमी था।
अँग्रेज़ की असल ताक़त उसकी फ़ौज नहीं थी, बल्कि हमारी कमज़ोरी थी।
हमारी आपसी तफ़रीक़, हमारी ऐश-परस्ती, हमारी बेवफ़ाई, और हमारी कलम की ख़ामोशी — यही वो हथियार थे जिनसे मुल्क जीता गया। और जब आख़िरी किला गिरा, तो बाहर के तोपों की गूंज से ज़्यादा शोर हमारे अंदर की ख़ामोशी का था।
अंग्रेज़ी जासूसी और दरबारी तिजारत

अँग्रेज़ों ने सिर्फ़ जंग से नहीं, जासूसी और तिजारत से भी हिंदुस्तान जीता।
उन्होंने हर दरबार में अपने मुख़बिर बिठाए — कोई फ़क़ीर के वेश में, कोई मुंसिफ़ के रूप में, कोई मुहाफ़िज़ के नक़ाब में।
रात की दावतों में शराब के प्यालों के साथ समझौते होते, और सुबह फौजी पोज़िशन बदल जाती।
किसी रियासत का दीवान, किसी नवाब का मुंशी, किसी रानी का नज़दीकी — सब किसी न किसी ब्रिटिश अफ़सर से जुड़ा हुआ था। इस तरह उन्होंने तलवार उठाए बिना एक-एक करके सारी रियासतें निगल लीं।
हिंदुस्तान की ताक़त की जड़ वो नहीं काट पाए जो बाहर से आते थे, बल्कि वो जो भीतर से उन्हें रास्ता दिखाते रहे।
सबक़ — आज की नस्ल के लिए.
इतिहास का मक़सद ग़ुस्सा नहीं, ग़ौर-ओ-फ़िक्र है।
जो क़ौमें अपने अतीत को समझती नहींं, वो अपने हालात को भी नहीं संभाल सकतीं।
हमारे लिए ये ज़रूरी है कि हम मीर जाफ़र, मीर सादिक, वाजिद अली शाह या सर सैयद अहमद ख़ान की गलतियों को गाली देने के बजाय, उनसे सबक़ लें। ग़ुलामी की ज़ंजीरें सिर्फ़ बाहरी ताक़तों से नहीं टूटतीं, बल्कि अंदर की बेदारी से टूटती हैं।
जब तक क़लम ज़मीर की तरफ़ नहीं लिखेगी, तब तक कोई तालीम हमें आज़ाद नहीं कर सकती।
जब तक रियासतें अवाम की अमानत नहीं बनेंगी, तब तक कोई ताज हमें इज़्ज़त नहीं देगा।

नतीजा
मीर जाफ़र, मीर क़ासिम, मीर सादिक, नवाब वाजिद अली शाह, भोपाल की बेगम, रोहिल्ला सरदार, नवाब पटौदी, नवाब करनाल, नवाब मज़फ़्फ़रनगर और इन जैसे दर्जनों किरदार हैं। उनकी बुज़दिली और ग़द्दारी ने अँग्रेज़ को ताक़त दी और अपनी ही क़ौम को ज़ंजीरों में जकड़ दिया। तारीख़ का ये बाब हमें याद दिलाता है कि क़ौमों को हमेशा बेरूनी दुश्मन से ज़्यादा नुक़सान अंदरूनी ग़द्दार पहुंचाते हैं।
हिंदुस्तान की ग़ुलामी का असल सबक़ यही है.
दुश्मन हमेशा बाहर से नहीं आता।
कभी वो दरबार के अंदर बैठा होता है, कभी किसी दरवेश की शक्ल में, कभी किसी इल्मी शख़्सियत की ज़ुबान में।
हमारी शिकस्त की कहानी दरअसल हमारी खुद-गुमानी की कहानी है।
मीर जाफ़र ने तलवार से ग़द्दारी की,
मीर सादिक ने अमानत से,
वाजिद अली शाह ने रक़्स से,
और सर सैयद ने कलम से।
इन सबकी मिसालें सिर्फ़ अतीत नहीं — एक आईना हैं।
क्योंकि जब भी कोई क़ौम अपने ज़मीर से ग़ाफ़िल हो जाती है,
तो कोई न कोई अँग्रेज़ ज़रूर लौट आता है —
कभी किसी सौदे में, कभी किसी तख़्त में, कभी किसी किताब में।
जहाँ ग़द्दारी सिर्फ़ तलवार से नहीं, कलम और समझौते से भी की जाती है। कहीं दौलत के लालच में वफ़ा बिक जाती है, कहीं तख़्त की हवस में ज़मीर गिरफ़्तार हो जाता है, और कहीं इल्म की आड़ में सच्चाई को दफ़्न कर दिया जाता है। ये "ग़द्दारी" उस दर्दनाक सिलसिले की तर्जुमानी करते हैं जहाँ हर दौर में कुछ लोग अपने फ़ायदे के लिए क़ौम का सौदा करते रहे — कभी काग़ज़ पर, कभी ख़ून में, कभी ख़ामोशी में।
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