Talaq Karane Wale Agent Gharo ko Kaise Barbad Kar rahe Hai?
तलाक का धंधा: कैसे कुछ वकील और खुदगर्ज़ लोग रिश्तों की बुनियाद उजाड़ते हैं?
तलाक कैसे रोकें? घर टूटने से कैसे बचाएं?
मियां-बीवी के झगड़े में क्या करें?
कोर्ट-कचहरी के दलालों से कैसे बचें?
पारिवारिक मामलों में सलाह?
तलाक करवाने वाले एजेंट?
रिश्तों को कैसे सुधारें?
"रिश्ते तोड़ना अब कारोबार बन गया है। कुछ वकील और बेग़ैरत लोग दूसरों का घर तोड़कर अपना नाम और जेब भरते हैं। क्या यही इंसाफ़ है?"
आजकल कुछ वकील और खुदगर्ज़ लोग रिश्तों में ज़हर घोलकर तलाक़ को “मुनाफ़े का सौदा” बना चुके हैं। जहाँ रिश्ता बच सकता है, वहाँ भी तोड़ने की सलाह दी जाती है – सिर्फ़ इसलिए कि उनकी दुकान चलती रहे।
कभी बहू को उकसाया जाता है, कभी शौहर को भड़काया जाता है। और जब घर उजड़ता है, तो ये लोग नया केस पकड़ लेते हैं… और नया घर तबाह करने निकल पड़ते हैं।
क्या वकालत का मतलब अब रिश्ता तोड़ना है?
क्या इंसाफ़ सिर्फ़ फीस तक महदूद रह गया है?
हर रिश्ता तलाक़ का मोहताज नहीं होता
कभी समझौता भी इलाज हो सकती है।
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| Talaq Kara kar Paise Kamane wale Agent. |
घर बचाएं, दलालों से, इज़्दिवाजी तनाज़आत में ख़ैर-ख़्वाह बन कर आने वाले हर शख़्स पर ऐतबार ना करें। उनका मक़सद सुलाह नहीं, बल्कि आपके घर की बर्बादी से कमीशन कमाना है।
आस्तीन में छुपे इन सांपों को पहचानें जो मियां-बीवी के मुक़द्दस रिश्ते में ज़हर घोल कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। अपने घरों के मुहाफ़िज़ ख़ुद बनें।
हमारे मुआशरे में कुछ ऐसे ज़मीर-फ़रोश अफ़राद मौजूद हैं जो मियां-बीवी के दरम्यान मामूली इख़्तिलाफ़ात को तलाक़ तक पहुंचा कर अपनी रोज़ी कमाते हैं। ये शैतान-सिफ़त दलाल नाज़ुक हालात में हमदर्द बन कर आपके घर में दाख़िल होते हैं और अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से आपको अदालत और कचहरी के चक्करों में उलझा देते हैं। उनका मक़सद सुलाह करवाना नहीं, बल्कि वकीलों और दीगर इदारों से कमीशन वसूल करके आपके टूटे हुए रिश्तों पर अपनी इमारत खड़ी करना होता है। ऐसे लोगों को पहचानें और अपने रिश्तों को ख़ुद सुलझाने की कोशिश करें। किसी अजनबी को अपने घर के मुआमलात में दख़ल-अंदाज़ी का मौक़ा ना दें ताकि आपका घर, वक़्त और इज़्ज़त महफ़ूज़ रहे।
क़ौम की बेटियों का सुहाग उजाड़ कर अपना घर बनाने वाले शैतान-सिफ़त दलालों से होशियार रहें..!
हमारे पास चल कर हर आने वाला हमारा ख़ैर-ख़्वाह और हमदर्द नहीं होता, बल्कि मीठी ज़बान के पर्दे में छुपा हुआ वो आने वाला एक लुटेरे से कम नहीं। आप के पास आने के पीछे उस का अपना मक़सद पोशीदा होता है। हमारे मुहल्ले और मुआशरे में ऐसे ज़मीर-फ़रोश शैतान-सिफ़त इंसान घूमते हैं। जिन का काम सिर्फ़ मियां-बीवी के दरम्यान तलाक़ करवाकर हराम का रुपिया ऐंठना होता है। ये लोग हमेशा ऐसे घर की तलाश में रहते हैं जहां मियां-बीवी के दरम्यान निज़ाई कैफ़ियत हो और लड़की अपने मैके जाकर बैठ गई हो। ऐसे नाज़ुक मरहले में ये शैतान-सिफ़त दलाल किसी तरह से लड़की के घर वालों तक पहुंच कर उन को अपना हमदर्द बताते हैं और अपनी चर्ब-ज़बानी से उन पर हावी होकर अपने असल मक़सद (दोनों ख़ानदानों के दरम्यान तफ़रीक़) की तरफ़ उकसाकर लड़की वालों को ले जाने का काम करते हैं। बल्कि ये इतने शातिर होते हैं कि अगर मामला सुलझने वाला भी होता है तो ये अपने शैतानी दिमाग़ का इस्तेमाल करके इतना उलझा देते हैं कि उस के बाद फिर बात बनना बहुत मुश्किल हो जाती है।
फिर लड़की के घर वालों से कहते हैं कि आप लोग लड़के वालों के ख़िलाफ़ कोर्ट तक क्यों नहीं जाते?
हम अपने तअल्लुक़ात के लोगों को लगा कर तुम्हारा काम करवा देंगे। उस के बाद वो ऐसे लोगों के पास ले कर जाते हैं जिन से इन का पहले से कमीशन तय हो चुका होता है। इन को ले जाने के एवज़ में कुछ हड्डी के टुकड़े सामने से मिल जाते हैं। जिस के बाद फिर वो लोग दूसरे शिकार की तलाश में निकल जाते हैं। आप तो कोर्ट पहुंच गए अब आप का रुपिया ख़र्च होगा, वक़्त ज़ाया होगा, मुआशरे में जो बदनामी होगी वो अलग, ऐसा नहीं है कि आपने इधर केस दाख़िल किया उधर दूसरे दिन सुनवाई होकर फ़ैसला हो गया, नीचे से ले कर ऊपर तक सब का पेट होता है जब तक दलाल से ले कर बड़ी अंतड़ी वाले सब का पेट नहीं भर जाता केस चलता रहता है। इस लिए लड़की या लड़के के मामले में आप के पास आने वाले हर शख़्स को अपना हमदर्द और ख़ैर-ख़्वाह मत समझिए।
वो आप को कोर्ट, पुलिस स्टेशन या महिला मंडल जाने के लिए जो मशवरा दे रहा है उस के पीछे कार-फ़रमा उस की बदनीयती को देखिए। ये शैतान जिस की नस-नस में हराम सरायत कर गया है तलाक़ करवाकर ही दम लेता है। ऐसे मकरूह लोग जिन के चेहरे पर फटकार बरस रही होती है अक्सर कोर्ट के बाहर, पुलिस स्टेशन में, महिला मंडल के पास या फिर होटल पर, चौक-चौराहों पर कुत्ते की तरह हड्डी की ताक में नाक फुला कर और कान खड़ा करके सूंघते और सुनते रहते हैं। जैसे ही इन को कोई भनक लगती है ये कुत्ते-सिफ़त ज़मीर-फ़रोश क़ौम की बेटियों का घर उजाड़ने वाले उस घर तक पहुंच कर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश में लग जाते हैं।
ऐ ज़मीर-फ़रोशो! कब तक क़ौम की बेटियों का तलाक़ करवाकर उन का इस्तेहसाल करते रहोगे?
मुआशरे के भोले-भाले लोगों को कब तक बेवक़ूफ़ बनाते रहोगे? औलादों को उन के वालिदैन से दूर करने का काम कब तक करते रहोगे? अगर उन के बच्चे हैं तो उन को मां-बाप के साए से दूर करने पर उन के बीते हुए एक-एक लम्हे का हिसाब रब की बारगाह में तुम्हें देना होगा।
इस लिए इस हराम काम से बाज़ आ जाइए वरना मौत का वक़्त क़रीब है ऐसे मनहूस काम की सख़्त सज़ा दुनिया में भी और आख़िरत में दोनों जहान में मिलेगी।







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