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Indian Muslim: Hindustan ke Musalmano ko Secular Partiyo ne Kaise Istemal Kiya?

Muslim Awakening: Truths About Politics, Society & Education in India.

The Rise of Muslim Consciousness: Unveiling Realities in Politics, Society & Education.
From Margins to Momentum: How India's Muslims Are Reclaiming Their Voice in Politics, Society & Education.
मुसलमानों की बेदारी: सियासत, समाज और तालीम पर हक़ीक़त.
भारत के मुसलमानों की हालत — बेदारी की ज़रूरत और सियासी हकीकत का आइना.
अपनी औलाद की तर्बियत और तालीम को मज़बूत करें।
सियासत को ईमानदारी और इल्म की बुनियाद पर परखें।
"लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई में मुसलमान आगे आए, लेकिन आरक्षण और सत्ता की मलाई दूसरों को मिली — क्या यही है सच्चा न्याय?" मुसलमानो को इसतेमाल करो और फेंको.
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ओवैसि, लालु,राहुल या कोइ नेता मुसलमानो का खैर ख्वाह नहि हो सकता.
जब भी लोकतंत्र खतरे में होता है, मुसलमान सबसे पहले सड़कों पर उतरते हैं। संविधान बचाने की आवाज़ बुलंद करते हैं, लेकिन जब बात आरक्षण और सत्ता की हिस्सेदारी की आती है, तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है या एक सोची-समझी रणनीति?
भारत के मुसलमान समाज की मौजूदा हालत जहाँ तालीम, सियासत और समाज तीनों की हकीकत. कैसे मुसलमान तर्बियत से दूर होकर सियासत का औज़ार बन गए हैं। पार्टियाँ मुसलमानों का इस्तेमाल तो करती हैं, मगर देती कुछ नहीं।अख़लाक़, इल्म और इत्तेहाद की कमी ने क़ौम को पीछे धकेल दिया है।अब वक़्त है कि मुसलमान खुद अपने लिए सोचें.
अब वक्त है बेदारी का — जब तक हम खुद नहीं जागेंगे, कोई हमें जगा नहीं सकता।"
सियासत हमें इस्तेमाल करती रही, अब वक्त है हम सोचें — हमारे लिए क्या किया गया?
मुसलमानों की हालत पर नहीं, बेदारी पर बात कीजिए.
हम वोट बैंक नहीं, सोच की ताक़त हैं — बस पहचानने की देर है.
सियासत के मोहरे नहीं, सियासत के रहनुमा बनिए।
बेदारी कोई नारा नहीं — एक अमल है, जो क़ौम को जिंदा करता है।
क़ौम तब नहीं मिटती जब उसे दुश्मन मार दे — बल्कि जब वो खुद सो जाए।
जब दिल से आवाज़ उठती है, तो सियासत भी झुक जाती है।
हम हर मजलूम के साथ हैं, मगर अपनी ग़फ़लत के ख़िलाफ़ नहीं.
जिस दिन मुसलमान ने खुद को पहचान लिया — दुनिया फिर उसी से रौशन होगी।
सियासत बदलने से कुछ नहीं होता, नीयत और नज़र बदलनी पड़ती है।
क़ौम की नींद जितनी लंबी होगी, सियासत की चाल उतनी तेज़ होगी।

मौजूदा हिंदुस्तानी मुसलमान — एक बेदार क़ौम की सोई हुई तस्वीर
वक़्त का पहिया तेज़ी से घूम रहा है। ज़माना बदल रहा है, मगर अफ़सोस कि मुसलमान समाज की हालत भी उसी रफ़्तार से गिरावट की तरफ़ जा रही है।
जहाँ कभी इल्म, अदब, तहज़ीब और दीनदारी मुसलमान की पहचान हुआ करती थी, आज वही समाज लापरवाही, ग़फ़लत और दुनियादारी का मज़हर बन गया है। अफ़सोस कि मुसलमान की सोच और हालत वहीं की वहीं ठहरी हुई है।
जिस क़ौम को कभी इल्म, अख़लाक़ और हिम्मत की वजह से दुनिया में पहचान मिली थी,
आज वही क़ौम कुर्सियों के वादों, जात-पात की सियासत और तसव्वुरात के जाल में उलझी पड़ी है।
मसला सिर्फ़ दीनदारी का नहीं, मसला शऊर-ए-ज़िंदगी का है।
कभी हम तालीम में पीछे रहे, तो अब सियासत की चालों में इस्तेमाल होने लगे हैं।
जो क़ौम कभी और “अबुल कलाम आज़ाद” जैसी शख़्सियतें पैदा करती थी,
आज वो क़ौम टिकटों और भाषणों की मोहताज बन गई है।

मुसलमान समाज की गिरावट — जज़्बे की जगह ग़फ़लत

मुसलमानों के घरों में अब तिलावत की आवाज़ कम और टीवी की आवाज़ ज़्यादा है।
औलाद की तर्बियत पर इल्म-ए-दुनिया का ज़ोर है मगर अख़लाक़-ए-नबी ﷺ से दूरी है।
जहाँ कभी सुबह मस्जिदों में सुकून मिलता था,

अब वही मस्जिदें खाली हैं और कॉफ़ी-हाउस भरे पड़े हैं।
तालीम के नाम पर डिग्रियाँ हैं, मगर शऊर-ए-ज़िंदगी ग़ायब है।
हमने इल्म को रोज़गार का ज़रिया बना लिया है, रूह की नूरानीयत से उसका रिश्ता तोड़ दिया है।
नतीजा यह है कि आज की नौजवानी दुनिया के हर टॉपिक पर बोल सकती है, मगर अपने दीन और तारिख से बेख़बर है।

सियासत और मुसलमान — इस्तेमाल का सिलसिला

यह सबसे अहम पहलू है।

आज मुसलमान हर सियासी पार्टी का “वोट बैंक” तो है, मगर किसी पार्टी का वक़्त-ए-ग़म का साथी नहीं।

हर चुनाव से पहले मुसलमानों के मुहल्लों में दौरे होते हैं,
इमामों और उलेमा से मुलाक़ातें की जाती हैं,
कुर्बानी, नमाज़, और तसव्वुर-ए-मज़हब के नाम पर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं। इफतार दावत से क्या हुआ?
मगर चुनाव के बाद वही मुसलमान भूला दिए जाते हैं, जैसे कोई फाइल बंद हो गई हो।

सियासी हकीकत ये है —

मुसलमानों को भय, नफ़रत और तसल्लियों के बीच रखा जाता है।
कभी डर दिखाकर वोट लिया जाता है,
कभी झूठे वादों की मिठास से दिल बहलाया जाता है।
मुसलमान और “धर्मनिरपेक्ष” सियासत का छलावा

भारत की सेक्युलर सियासत का सबसे बड़ा इम्तिहान यही रहा —
कि उसने मुसलमानों को कभी “बराबर का शरीक” नहीं माना,
बल्कि हमेशा “मज़रूम तबक़ा” (पीड़ित वर्ग) की शक्ल में पेश किया।

काँग्रेस (Rahul Gandhi) —

लंबे अरसे तक उसने मुसलमानों को सेक्युलरिज़्म की ढाल बनाकर रखा।
मगर असलियत में मुसलमानों के लिए न कोई तालीमी इंक़लाब आया, न रोज़गार, न नुमाइंदगी।
नेहरू से लेकर मनमोहन तक, हर दौर में मुसलमान को सिर्फ़ “गंगा-जमुनी तहज़ीब” के नारे सुनाए गए।

असल तरक़्क़ी सिर्फ़ पोस्टरों और वादों तक रही।

समाजवादी पार्टी (Akhilesh Yadav)

लोगों ने उसे “मुस्लिम-फ्रेंडली” समझा,
मगर सच्चाई ये है कि SP ने मुसलमानों को सिर्फ़ वोटों की गिनती समझा।
कई बार मुसलमानों के जज़्बात को इस्तेमाल किया गया,
मगर सियासी फैसलों में उनका हिस्सा हमेशा शून्य रहा।

सिर्फ़ तसवीरों और इफ्तार पार्टियों से कोई क़ौम तरक़्क़ी नहीं करती।

RJD (Lalu Yadav) —

लालू यादव के दौर में “मुस्लिम-यादव” फार्मूला मशहूर हुआ।
मगर उसका नतीजा ये हुआ कि बिहार में न तालीम सुधरी, न रोज़गार।

मुसलमानों के नाम पर सियासत की रोटियाँ सेंकी गईं, मगर खुद मुसलमान आज भी ग़रीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी में डूबे हुए हैं।

TMC (Mamta Banerjee) —

ममता दीदी ने मुसलमानों को “माइनॉरिटी आइकॉन” के तौर पर इस्तेमाल किया,
मगर उनके इलाकों की हालत आज भी दर्दनाक है।
शिक्षा संस्थान कम, और सियासी बयान ज़्यादा हैं।
ममता की सियासत ने मुसलमानों को सांप्रदायिक डर के साये में रखकर सहानुभूति के नाम पर वोट लिए।

मुसलमानों की सियासी ग़लती — इत्तेहाद की कमी

सबसे बड़ी बात ये है कि मुसलमान खुद भी मुत्तहिद नहीं हैं।
हर तबक़ा, हर इलाक़ा, हर मस्लक अपनी “अलग” सियासी सोच रखता है।
कभी कोई AIMIM के पीछे है,
कभी कोई सेक्युलर दलों में “कम बुरे” को चुनता है।

मगर किसी के पास अपनी सियासी तालीम या मैनिफेस्टो नहीं है।
जब तक मुसलमान एक विचार और मक़सद के तहत इकट्ठे नहीं होंगे,
तब तक हर पार्टी उन्हें “मोहरा” बनाकर इस्तेमाल करती रहेगी।

मीडिया और मुसलमान — इमेज की जंग

मीडिया ने मुसलमानों की तस्वीर हमेशा या तो मज़हबी अंधभक्त की दिखाई, या “आतंकवाद” के साये में रखी।
हमारी तरक़्क़ी, हमारे स्कॉलर, हमारे डॉक्टर, इंजीनियर — कभी हेडलाइन नहीं बने।
हमारे नाम के साथ हमेशा “मामला”, “विवाद” या “गिरफ़्तारी” जैसे लफ़्ज़ जोड़े गए।

और अफ़सोस कि हमारे रहनुमा इस बदनाम सियासी खेले के ख़िलाफ़ कभी एकजुट होकर खड़े नहीं हुए।

 रास्ता क्या है? — रूहानी और सियासी बेदारी
मुसलमानों के मसले सिर्फ़ हुकूमत नहीं सुलझा सकती।
जब तक रूहानी बेदारी, अख़लाक़ी इंक़लाब, और सियासी समझदारी नहीं आएगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।
मस्जिदें सिर्फ़ नमाज़ की जगह नहीं —
बल्कि इल्म, तर्बियत और समाजी फ़िक्र का मरकज़ बननी चाहिए।
मदरसे सिर्फ़ हिफ़्ज़ और तजवीद नहीं, बल्कि कम्प्यूटर, इक़्तिसाद और मीडिया तालीम भी दें।
और मुसलमान नौजवान सिर्फ़ सियासी “वोटर” नहीं, बल्कि पॉलिसी-मेकर बनने की सोच रखें।
हमारी तन्क़ीद किसी सियासी शख़्सियत की तौहीन नहीं,
बल्कि उस सियासी निज़ाम पर सवाल है
जो हर बार मुसलमान को सिर्फ़ “डराने और इस्तेमाल करने” का औज़ार बनाता है।
हक़ीक़त ये है कि आज की हर बड़ी पार्टी — चाहे वो कांग्रेस हो, समाजवादी, राजद या तृणमूल — सभी ने मुसलमानों को पॉलिटिकल फोटो-फ्रेम बना दिया है। मगर अब वक़्त है कि मुसलमान खुद अपनी आवाज़, अपना एजेंडा और अपना रास्ता तय करें।

इत्तेहाद की राह

अगर मुसलमान अपनी तालीम, कारोबार, और सियासत को एक नई बुनियाद पर रखें,
तो वो सिर्फ़ “वोट बैंक” नहीं बल्कि “थिंक टैंक” बन सकते हैं।
इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी क़ौमी तंजीमों को
ईमानदार, पढ़े-लिखे और दूरअंदेश लोगों के हवाले करें।

वो लोग जो इलाक़ाई नहीं, बल्कि इंसानी और इस्लामी सोच रखते हों.

नतीजा — अब भी देर नहीं हुई

हालात मुश्किल हैं, मगर नामुमकिन नहीं।
अगर हर मुसलमान ये ठान ले कि वो अपनी औलाद को इल्म, अख़लाक़ और शऊर की बुनियाद देगा,
अगर वो हर वोट से पहले अपने ज़मीर से मशविरा करेगा, तो फिर से क़ौम में जान लौट सकती है।
क़ौम की बेदारी किसी नेता से नहीं, बल्कि हर घर के अंदर से शुरू होती है। और जब हर घर एक मदरसा बन जाएगा, तो फिर सियासत भी हमारे हक़ में बोलेगी।

वक़्त की रफ़्तार में मुसलमानों की बेदारी एक ऐसी ज़रूरत है जो आज न सिर्फ़ एक ख़्वाहिश, बल्कि एक मजबूर हकीक़त बन चुकी है। "सियासी पार्टियों ने हमेशा इस्तेमाल करो और फेंको के उसूल पर मुसलमानों के साथ सुलूक किया" – यह जुमला तो जैसे एक आईना है जो हमारी क़ौम की तारीख़ को नंगा कर देता है। सदियों से चली आ रही यह सियासत की चालाकी, जहां वोट की ख़ातिर मुसलमानों को ललकारा जाता है, वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी हासिल होते ही भुला दिया जाता है। यह सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि एक दर्दनाक हक़ीक़त है जो हमारी क़ौम की रगों में समाया हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस हक़ीक़त को सिर्फ़ रोकर भुला देंगे, या अपनी बेदारी से इसे बदलेंगे?
 आज हम इस मसले पर न सिर्फ़ सियासी दलों की मक्कारी को बेनक़ाब करेंगे, बल्कि अपनी क़ौम की लापरवाही को भी आईने की तरह सामने रखेंगे। क्योंकि बेदारी का मतलब सिर्फ़ शिकायत करना नहीं, बल्कि खुद को संभालना है।
सियासी जमाते और उनका 'इस्तेमाल करो और फेंको' का फलसफ़ा – यह तो जैसे मुसलमानों के लिए एक अफसाना है। भारत की आज़ादी के बाद से ही यह खेल चल रहा है। वोट बैंक के नाम पर मुसलमानों को लुभाया जाता है। चुनाव के मैदान में भाषणों की बौछार होती है.
1947 के बंटवारे के बाद से मुसलमानों की हालत पर ग़ौर फरमाइए। लाखों मुसलमानों ने अपनी जानें गंवाईं, घर-बार उजड़े, लेकिन आज भी शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षा के मामले में हम पिछड़े हुए हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट हो या कोई और आधिकारिक दस्तावेज़, सब यही चीख-चीख कर बताते हैं कि मुसलमानों को सिर्फ़ वोट की मशीन समझा जाता है।
मसलन , 1980 के दशक में बाबरी मस्जिद का मुद्दा। सियासी दलों ने इसे हथियार बनाया, मुसलमानों को भड़काया, लेकिन जब वक़्त आया तो कोई खड़ा न हुआ। या फिर हाल के दशकों में CAA-NRC का विवाद। पार्टियां मुसलमानों के नाम पर वोट मांगती रहीं, लेकिन क़ानून बनते ही चुप्पी साध लीं। 
ग़रीबी में जीते मुसलमान वोट देते हैं, उम्मीद लगाए कि शायद इस बार कुछ बदले। लेकिन नतीजा? वही पुरानी कहानी। सियासतदान अपनी जेबें भरते हैं, और हमारी क़ौम तड़पती रह जाती है। यह पैग़ाम सिर्फ़ शिकायत नहीं, बल्कि एक इंतेबाह् है – अगर हम इस अंधे कुवें से न निकले, तो हमेशा शिकार बने रहेंगे।
सियासी दलों की मक्कारी तो ठीक है, लेकिन हम मुसलमानों की अपनी लापरवाही और न बेदारी पर क्या कहें? यह तो जैसे खुद को धोखा देना है। हम सदियों से दीन की बातें करते हैं, लेकिन अमल कहां? क़ुरआन की आयतें पढ़ते हैं जो इत्तेहाद और इल्म की ताकीद करती हैं, लेकिन अपनी क़ौम में तालीम का मयार इतना कम क्यों? NSSO के आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम बच्चों की स्कूल ड्रॉपआउट रेट सबसे ऊंचा है। क्यों?
 सियासी दल हमें बेवकूफ़ बनाते हैं, लेकिन हम क्यों पड़ते हैं इस जाल में? 
हर चुनाव में वही चेहरे, वही वादे, लेकिन हम सीखते क्यों नहीं? हमारी क़ौम में क़यादत की कमी है – वो नेतृत्व जो सियासत से ऊपर हो, जो क़ौम की खैर के लिए लड़े। इसके बजाय हम छोटे-मोटे नेता चुनते हैं जो दलाल बन जाते हैं। याद कीजिए 1992 का बाबरी विध्वंस – तब हमारी आवाज़ कहां थी? 
या फिर गुजरात दंगों में? हम चुप रह गए, क्योंकि बेदारी न थी। आज सोशल मीडिया के दौर में भी हम फेक न्यूज़ पर भरोसा करते हैं, सच्चाई को परखते नहीं। यह ना बेदारी हमें खोखला कर रही है। अगर हम अपनी लापरवाही न सुधारें,
आज वक़्त है कि हम बेदार हों। न सिर्फ़ शिकायत करें, बल्कि बदलाव लाएं। सियासी दलों को जवाबदेह बनाएं – उनके वादों का हिसाब लें। अपनी क़ौम में जागरूकता फैलाएं – मोहल्लों में डिस्कशन, नवजवानो को। शामिल करे। याद रखें, बेदारी एक आग है जो अंदर से जलती है, बाहर नहीं। अगर हम यह आग न जलाएं, तो 'इस्तेमाल करो और फेंको' वाला सिलसिला कभी न ख़त्म होगा। 
मुसलमानो की बेदारी वक़्त किं जरूरत है। मुसलमान सियासी तौर पर उठेंगे नही तबतक वह इसी तरह नामनिहाद् सियासी जमातो के तलवे चाटते रहेंगे। इस सब के बावजूद वह खुद को नवाब समझ रहे है। उन्हे लगता है के वही हिंद के असल हुकमराँ है। वे इफ्तार पार्टियों मे आने वाले लीडरो के साथ तस्वीर फ्रेम मे लगाकर खुद को उन सियासी जमातो के बराबर खुद को समझते है, ऐसा लगता है जैसे वे इनके खैर खवाह है और मुसलमानो के रहनुमा है। वे तो सिर्फ अपने फायदे का सौदा करने आते है, अगर एक तस्वीर से पूरी मुस्लिम आबादी का साथ मिल जाता है तो क्या ही हर्ज है, थोरि सी सेकुलर बनने का ढोंग करने मे। 
लेकिन वे न मुसलमानों के हक की आवाज़ उठाएंगे, न उसके लिए मेनिफेस्टो लायेंगे। यह उन पार्टियों की गलती नही बल्कि मुसलमानो की गलती है, मुसलमान तालीम और शउर् के मामले मे सबसे पीछे है। इसी वजह से वे हमेशा इस्तेमाल करके छोड़ देते है, नेहरू की सोची समझी चालाकी है। जिसके नज़रिया ने हमेशा के लिए मुसलमानो को अपाहिज बना दिया।

ख़ुलासा

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