Ulema Hi Burai Ka Zad Kyu: Yah Propganda Kaise Kam Kar raha hai?
Mullahs and the Roots of Evil: Myth or Reality?
Mullah vs Modern Islam: Who Fuels Fitna?
Is the Mullah Responsible for All Corruption in Islam?
The Role of Mullahs in Muslim Society: Truth Behind the Blame.
यह बात समझ में आती है कि दाढ़ी, मौलवी और टोपी पर तंज़—दरअसल प्रतीकों पर हमला—एक आसान नैरेटिवी चाल है, जिससे मज़हबी ज़िंदगी को “मुद्दा” और उसकी पहचान को “मुद्दा-परस्त” ठहराकर असली सामाजिक-आर्थिक नाकामियों से ध्यान मोड़ दिया जाए। यही वजह है कि दुनिया की हर खामी का बोझ अलिम-ए-दीन पर रखकर “आज़ाद-ख़याल” तबक़ा नैतिक-सियासी जवाबदेही से बच निकलने की गुंजाइश बना लेता है।
हेडलाइन, विजुअल और एंगलिंग से जब “मौलवी = रुकावट” का समीकरण गढ़ा जाता है, तो जटिल मसलों की तहकीक से नज़रें हटाकर आसान खलनायक पेश किया जाता है।
- बुराई करने वालों और अक़्सरियत में पाई जाने वाली अमन-पसंद दीनी ज़िंदगी में फर्क मिटा देना “स्ट्रॉ-मैन्” तैयार करने जैसा है—मोनोलॉग जीतता है, मुबाहिसा हारता है।
आलिम-ए-दीन की असल सामाजिक ख़िदमत
- मसाजिद, मदरसों, वक़्फ़ और मोहल्लाती नेटवर्क ने तालीम, राहत, मेल-मिलाप और किरदार-साज़ी में तरिखि काम किया है; खामियों की तश्खीस ज़रूरी है, मगर पूरे निजाम को रद्द कर देना ना-इंसाफ़ी है।
- दीन जब इख़लाक़, ज़िम्मेदारी और सोशल केयर सिखाता है, तो समाजी पूँजी बनती है—इसी पूँजी से संकट के वक़्त शहरों-कस्बों में सहारा मिलता है।
तन्क़ीद का पहला हक़ीक़ी उसूल है: इत्तिहाम नहीं, इस्लाह—यानि किस अमल से क्या नुक़्सान हुआ, किस इदारे में क्या बेदिली है, और सुधार का रास्ता क्या है।
- अगर कहीं नफ़रत या तशद्दुद है, तो निशाना वही होना चाहिए; उससे समूची दीनी हैसियत और उसके अमन-पसंद पैरोकारों को कटघरे में खड़ा करना इल्मी अख़लाक़ के ख़िलाफ़ है।
आज़ादी-ए-ख़याल’ की असल शरह
- असल आज़ादी-ए-ख़याल का तक़ाज़ा है कि दीनी आवाज़ों, समाजशास्त्रियों, क़ानूनी माहिरों और मुख़्तलिफ नज़रियों के दरमियान खुली, अदबी और मुहकम बहस हो—जहाँ सवाल तेज़ हों, मगर सलीका साबुत रहे।
- तजुरबे और डेटा की रोशनी में राय बने तो न पड़ताल से घबराहट रहती है, न लेबलिंग की मजबूरी—यहीं से समाज भरोसा सीखता है और इख़्तिलाफ़ सलीके में ढलता है।
बातिल को पता है के यही वह शख्स है जिसकी वजह से वह फिक्रि और नज़रियाति जंग मे मुसलमानों का किला फतह नही कर पा रहा है। यह उलेमा,आलिम, मुफ्ती, और दनिश्वर तबका ही आखिरी किला है जो रहबर बनकर हर तरह के खतरे का सामना कर रहा है। यही तरीका दुशमनांन ए इस्लाम और मुनाफ़ीकीन को पसंद नही होता है। मुसलमानो को उसके रहबर से जुदा करने के लिए मीडिया,नामनीहाद रौशन ख्याल तबका तैयार किया गया ताकि इससे उलेमा के खिलाफ मुसलमानो के अंदर नफरत डाला जा सके,जिसके बदौलत रहनुमा को अवाम से जुदा करके आसानी से अपना नज़रियाती गलबा हासिल कर लेंगे। मुसलमानो से इल्तिजा है के जब तक हक पर दस्तरस् हासिल न हो जाए बातिल को गले नही लगाना।
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| मॉडर्न’ के नाम पर वैचारिक हथकड़ी. |
आधुनिकता” को अगर सिर्फ़ वेस्टर्न साँचे की नकल बना दिया जाए तो यह आज़ादी नहीं, तर्ज़-ए-फिक्र की निगरानी है; असल मॉडर्न रिवायत वही है जो बहुलीअत को जगह दे और जड़ों को मिटाए नहीं।
- खुद को ‘ओपन-माइंडेड’ कहकर असहमती को ‘दकियानूसी’ का लेबल दे देना बहस नहीं, बदनामी की कोशिश है—यहीं से खामोशी और ख़ौफ़ का माहौल बनता है।
मुल्ला ही हर बुराई और फित्ना का जिम्मेदार क्यों ?
एक रौशन ख्याल तबका वाले एक साहेब रहते हैं—क़लम के ऐसे फ़नकार कि बात दिल से निकलती है और सीधे दूसरे के दिल पर दस्तक देती है। मसला कोई भी हो, जनाब इतनी संजीदगी और वक़ार से गुुफ़्तगू करते हैं कि पढ़ने वाला समझता है जैसे किसी हस्सास दिल का दर्द काग़ज़ पर उतर आया हो। हाल ही में उन्होंने एक तहरीर लिखी—"उसे मस्जिद के दरवाज़े पर जूते मारे जाएंगे"—अब नाम तो कलम का है, मगर असल में तो ये पूरी अवाम की चीख़ थी, उन बीमारियों की तरफ़ इशारा था जिनमें हम बरसों से गिरफ़्तार हैं—मुनाफ़िक़त, झूठ और करप्शन जैसी काली दास्तानें।
चूंकि हमारे मजमून में वाअज़ीन और नासेह उलमा ही होते हैं, सो उन्होंने उलमा के बारे में कुछ शिकवे भी कर डाले—और उन काली भीड़ों का तज़किरा भी जिनकी वजह से असल उलमा की रोशनाई धुंधली नज़र आने लगती है। कलम तो हर लिहाज़ से मुकम्मल था, लेकिन एक साहिब जिन्हें शायद उलमा-दुश्मनी का कोई पुराना चाव है, उन्हें ये खटका बैठ गया कि “भई, उलमा पर इतनी कम बातें क्यों?” बस, फिर क्या था—"मुकम्मल आज़ादी" के नाम पर उन्होंने पूरा एक तबर्रा-नामा तैयार कर दिया; मदरसों और उलमा पर ऐसे तअन व तश्नीअ के तीर चलाए कि कोई दुश्मन भी इतना मगन न हो।
जो बुराइयां उलमा की जिम्मेदारी ही नहीं, उन्हें भी उनके सर ऐसे मढ़ा जैसे मुल्क में जितने मसले हैं सब की वजह एक ही तबका हो। अब क्या कहें… साहेब हमारी नज़र में बडे़ भी हैं, उस्ताद की जगह रखते हैं; हम न उनकी तहरीर को ग़लत कह सकते हैं और न उनके बयान किए गए किसी मौलवी की करप्शन की दास्तान का इंकार कर सकते हैं। मैं तो एक अदना-सा, कच्चा-सा तालिब-ए-इल्म हूं—जिसे अभी लिखना भी ठीक से नहीं आता। बस, इस पूरे मसअले को एक अलग ज़ाविये से देखने की कोशिश कर रहा हूं, और उसी सिलसिले में कुछ सवाल-जवाब की शक्ल में गुुफ़्तगू करना चाहता हूं… बाक़ी रोशन-ख़याल लोग तो जानते ही हैं कि तंज़ समझना उनका पुराना फ़न है।
क्या मस्जिद का मौलवी हकीकी मायनों में आलिम भी है ?
मेरे ख़याल में अगर हम हक़ीक़त में इस्लाह चाहते हैं और मसअले की जड़ तक पहुंचना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें यह तहक़ीक़ करनी होगी कि जिन लोगों को हम मौलवी कह रहे हैं क्या वे हक़ीक़त में आलिम भी हैं।?
हदीस में आता है अल-उलमा वारिस-ए-अनबिया। उलमा अंबिया के वारिस हैं, मैं समझता हूं कि जो अंबिया के हकीकी वारिस हैं वे करप्ट नहीं हो सकते और जहां करप्शन हुई वहां हक़ीक़त में इल्म को मुनबर तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। मुनबर-ए-रसूल जब ना अहल लोगों के हवाले कर दिया गया, तो फिर वह उन मक़ासिद के लिए इस्तेमाल हुआ जिन के लिए नहीं होना चाहिए था, लाज़िम है इसके जिम्मेदार उलमा और दीनि मदारिस क़तई नहीं.... अगर मस्जिद का मुल्ला ठीक नहीं तो इसका जिम्मेदार कौन है ?
मसाजिद में महज़ चंदा की बातों, काफ़िर काफ़िर के खेल, फ़िरक़ा परस्ती की बातों, करप्शन, ग़ैर ज़रूरी मसाइल पर तक़रीरों के जिम्मेदार अगर उलमा व मदारिस भी नहीं तो फिर कौन जिम्मेदार है?
इसके लिए हमें यह देखना है कि इन मौलवियों का इंतेख़ाब कौन करता है? कौन यह तय करता है कि इस मुनबर पर कौन बैठेगा?
हम में से हर बंदा जानता है कि यह इंतेख़ाब उस इलाक़े की मस्जिद के वे रिटायर्ड सरकारी बाबू करते हैं, जिनको सरकारी दफ़्तरों से यह कह कर फ़ारिग़ किया जाता है कि आप अब एक्सपायर हो गए और मज़ीद काम के नहीं रहते, वे फिर मस्जिद की कमेटियों की सदारत पर आकर बैठ जाते हैं।
हमारे एक दोस्त के मुताबिक़ उनके इलाक़े की एक मस्जिद में इमाम व ख़त्तीब के लिए तीन महीने तक इमामों के इंटरव्यू होते रहे। पांच-छह रिटायर्ड हज़रात बैठ कर एक इमाम को बुलाते दूसरे को बुलाते, तीन महीने बाद आख़िर में इमामत व ख़त्ताबत के लिए एक बाईस साल के लड़के का इंतेख़ाब किया गया और वजह इंतेख़ाब यह बताई गई कि इसकी आवाज़ बहुत अच्छी है। अब हमें इस नौजवान से क्या ताक़ीद रखनी चाहिए कि जब वह मुनबर पर बैठेगा तो क्या गुफ़्तगू करेगा?...
हमारे लोगों का मेयार इंतेख़ाब ही यही है कि उन्हें सिर्फ़ अच्छी आवाज़ सुननी है, उन्हें वह मौलवी चाहिए जो नातें अच्छी पढ़ सकता हो, थोड़े सुर लगा सकता हो।... जब ये अच्छे सुर लगाने वाले मौलवी बन कर मुनबर पर बैठेंगे तो फिर मुनबर व महराब का तक़द्दुस उसी तरह ही पामाल होगा जिस तरह हमारे गली मोहल्ले की मस्जिद में होता नज़र आता है।
तरीक़ा-ए-कार यह होना चाहिए कि पहले यह देखा जाए कि जो लोग इंतेख़ाब कर रहे हैं उन के अंदर इंतेख़ाब करने की सलाहियत भी है या नहीं।?
जब एक प्राइमरी पास आदमी यूनिवर्सिटीज़ के प्रोफ़ेसर मुंतेख़ब करना शुरू कर देगा तो उस यूनिवर्सिटी की तालीम का क्या हाल होगा?
जब एक कंपोज़र डॉक्टरों का इंतेख़ाब करना शुरू कर देगा कि किस ऑपरेशन के लिए कौन सा डॉक्टर मुंसिब है इस असपताल के मरीज़ का हाल क्या होगा?
जब अदालत के अंदर बैठे हुए मुनशी सुप्रीम कोर्ट के जजों का इंतेख़ाब करना शुरू कर देंगे तो मुक़दमात का हाल क्या होगा?
जहां पर इंतेख़ाब ठीक हुआ, मुनबर अहल अशाब को सुपुर्द किया गया उनकी बरकत से बेहतरी भी आई है, वहां के नमाज़ी सुलझे हुए और मजमून की तामीर में अपना किरदार अदा करते नज़र आते हैं, मजमून में हमें जो थोड़ी बहुत दीन की झलक नज़र आती है यह उनही की मेहनतों का नतीजा है।
इसके लिए हमें अपनी क़ौम में शऊर पैदा करना होगा कि वे इस फ़ील्ड के माहिर हज़रात की निगरानी में अपने मुनबर व महराब के लिए वाअज़ इमाम का इंतेख़ाब करें।...
हकीकी आलिम की मौजूदगी और वाज़ व नसीहत के बावजूद मजमून में बुराई क्यों है ?
कुछ लोग यह कहते हैं कि मजमून में हमें जो बुराइयां नज़र आ रही हैं उन के जिम्मेदार उलमा और वाअज़ीन हैं। दलील में मुसलमानों के पहले दौर की मिसालें देते हैं कि उस दौर में मसाजिद से हुकूमतें चलाई जाती थीं, अवाम के फ़ैसले मसाजिद में होते थे, साहेब ने भी अपनी तहरीर के आख़िर में कुछ तजाविज़ दिए।
मैं इस मुताल्लिक़ यह कहूंगा कि उलमा का मन्सब सिर्फ़ तलकीन का है वे सिर्फ़ नसीहत कर सकते हैं, नसीहत पर अमल-दराज़ कराने के अदारे दूसरे हैं। इस्लामी निज़ाम न होने की वजह से आज एक अच्छे से अच्छे आलिम की अथॉरिटी भी सिर्फ़ इतनी है कि वह सिर्फ़ अपनी मस्जिद में आने वाले कुछ बंदों के सामने वाज़ कर सकता है।
कुछ मसाजिद में तो उसे ख़ुल कर बात करने पर मसाजिद से ही निकाल दिया जाता है। गस्ताख़ी मा'अफ़ जब इसकी अथॉरिटी का यह हाल है तो फिर हम कैसे ताक़ीद रखते हैं कि वह टैक्स चोरी करने वालों को ज़लील करेगा, तिजावात क़ायम करने वालों को जूते मारेगा।... रही यह बात कि उसे अवाम से मुख़ातिब होने का सबसे ज़्यादा मौक़ा मिलता है फिर इसकी वाज़ व नसीहत के बावजूद मजमून में बुराई क्यों है?
इस सवाल के जवाब में मैं भी एक सवाल पूछने की जुरअत करता हूं.
इक़बाल एक अख्लाक़ि शायर हैं, उनकी शायरी हमारे स्कूलों कॉलेजों में एक लाज़मी मज़मून उर्दू में बाक़ायदा पढ़ाई जाती है, इक़बाल ने खुदी की तालीम सबसे ज़्यादा दी, आप मुझे बताएं हमारे मुल्क में खुदी कितने लोगों में है।?
अगर पैग़ाम को इतने वेल् तरीक़े से पहुंचाने के बावजूद खुदी लोगों में मौजूद नहीं है तो इसमें इक़बाल का क्या क़ुसूर है?
महातमा गांधि, शाश्त्रि, मौलाना अबुल कलाम के अक़वाल हमारे सामने हैं, आइंन की दफ़आत हमारे सामने हैं, सियासतदानों और अफसरो ने उन पर कितना अमल किया?
नूह अलैहिस्सलाम ने साढ़े नौ सौ साल तबलीग़ की सिर्फ़ अस्सी लोग ईमान ले कर आए, क्यों?
क्या उन्होंने वाज़ व नसीहत में कोई कमी की?
क्या वे फ़िरक़ा वारियत की तालीम देते थे?
नबी से ज़्यादा अच्छे तरीक़े से वाज़ कौन कर सकता है?
क्या वे बाक़ी लोगों की गुमराही के जिम्मेदार हैं?...
मैं अपनी बात फिर दोहराऊंगा कि जो सही मायनों में आलिम और मौलवी हैं उन्होंने बात पहुंचाने में कोई कोताही नहीं की, जो वरासत-ए-नुबूवत उन तक नसल दर नसल चलती हुई पहुंची थी उस वरासत का पूरा ख़याल रखते हुए कमाल ईमानदारी के साथ उसे मज़ीद आसान करके अवाम तक पहुंचाया है। पिछले सौ सालों में क़ुरआन व हदीस के मसाइल पर जो तहक़ीक़ हुई है उसकी मिसाल पिछली तीन सदियों में नहीं मिलती।
साहेब की तहरीर पर तंज़ूर करने का दिल तो नहीं कर रहा क्योंकि वह महज़ अदावत और तअस्सुब में उलमा के खिलाफ़ लिखते हैं।
मुलाहिज़ा करें... यह (मौलवी) बेचारे कभी यह तक नहीं बताये के साफ़-सफ़ाई निस्फ़ ईमान है, क्यों के वे खुद जानते हैं के वे खुद गंदगी के ढेर पर चोरी की जगह पर क़ब्ज़े की जगह पर बैठे हुए हैं।
वे खुद मस्जिद के बैत-उल-ख़ला में नाक पर हाथ रखे बग़ैर नहीं जा सकते तो वे किस मून्ह से लोगों के बताएंगे के साफ़-सफ़ाई निस्फ़ ईमान है?
सभी लोग अपने-अपने इलाक़े की मसाजिद का जायज़ा लें उन्हें खुद अंदाज़ा हो जाएगा के सत्तर फ़ीसद मसाजिद चोरी और क़ब्ज़े की ज़मीन पर बनी हुई हैं, अब चोरी की मस्जिद में नमाज़ होती है या नहीं होती इसका फ़ैसला क़ारी ख़ुद कर लें।
हद हो गई मबालग़ा आराई और नफ़रत की।
उनकी बद नियति और झूठ का यह आलम है और क़ौमि यक़जहत़ी किस के साथ करने निकले हैं।
आप का मसअला ही कुछ और है। उनके दिल में दर्द है और आप के दिल में उलमा और मदारिस के खिलाफ़ सख़्त नफ़रत और ग़ुस्सा है इसलिए जब भी आपको मौक़ा मिलता है आप उलमा और मदारिस के बारे में अपने अंदर जमा किया गंद और ज़हर बाहर निकाल फेंकते हैं।
एक शख्स ने तो लिखा है... "अच्छे बुरे अंसार हर शोबे में हैं। मदारिस चलाने वाले भी इसी मजमून से हैं। उन में अच्छे भी हैं और ख़राब भी‘ जो बात यहाँ समझ में आती है यह है कि नाज़िम मदरसा‘ साबिक़ क़ौंसलर और पुलिस.... कोई भी झूठ और फ़रेब को बुरा नहीं समझ रहा।"
उन्होंने इस वाक़िए में तीनों को क़ुसूरवार ठहराया और आप सिर्फ़ उलमा के पीछे डंडा ले कर दौड़ पड़े और ऐसी बुराइयों का जिम्मेदार भी उलमा को ठहरा दिया जिनके वे जिम्मेदार नहीं।
जनाब मुझे बताएं- क्या मस्जिद के बाथरूमों में गंद मौलवी मचाता है?
मसाजिद से जूते और बाथरूमों से टॉयलेट पेपर उलमा चोरी करते हैं?
किस बंदे से इसकी ज़मीन ज़बरदस्ती छीन कर या चोरी करके सत्तर फ़ीसद मसाजिद बनाई गई हैं?
हम मानते हैं कि अवाम और इंतेज़ामिया की जमा'ई ग़फ़लत से पैदा होने वाली इस फ़िरक़ा परस्ती की नहूसत ने कुछ जगहो में यह फूल भी खिलाए हैं कि कुछ जगह मसाजिद पर क़ब्ज़ा भी किया गया लेकिन जिस को आप ग़ैर क़ानूनी और चोरी की ज़मीन कह रहे हैं वह बेबुनियाद है।
हम क्या समझें आप को असल में तकलीफ़ किस से है?
आगे फरमाते हैं....
पहली बात तो यह है के इन बेचारों को ख़ुद कुछ नहीं पता होता, जो कुछ उन्हें दर्स-ए-निज़ामी में पढ़ाया जाता है उसके बाहर उन्हें एक लफ़्ज़ की भी मालूमात नहीं होतीं।।
कभी किसी बड़े से बड़े मौलवी मुफ़्ती आलिम के मून्ह से नहीं सुना के क़ुरआन में सैकड़ों आयात मुबारक़ा का ताल्लुक़ तसख़ीर-ए-क़ायनात से है, ग़ौर व फ़िक्र करने से है, अल्लाह की इस क़ायनात के असरार व रमूज़ जानने से है, ज़मीन के ऊपर ज़मीन के अंदर समंदर की तह में छिपी अल्लाह की निशानियों से है इन सब में छिपे क़ुदरत के ख़जानों से है,। यह इसलिए नहीं बताते के उनकी ख़ुद कोई औक़ात नहीं के यह सब कर सकें...
इसके लिए पढ़ना पड़ता है यह सब सैकड़ों साल पुराने दर्स-ए-निज़ामी पढ़ने से नहीं मिलने वाला।
रौशन ख्याल साहेब कुछ तो ख़ुदा का ख़ौफ़ कीजिए! कुछ तो अक़्ल व शऊर के नाख़ून लीजिए!
दर्स-ए-निज़ामी में क़ुरआन व हदीस पढ़ाया जाता है या... फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री की किताबें पढ़ाई जाती हैं?
आप के कहने का मतलब यही है कि जो क़ुरआन व हदीस पढ़ाए जाते हैं वे महज़ टाइम का ज़ाया है और उन में काम की कोई चीज़ नहीं।!!
जनाब से मैं पहले भी एक दफ़ा दर्स-ए-निज़ामी में शामिल किताबों पर काफ़ी लंबी बात कर चुका हूं कि दर्स-ए-निज़ामी में क्या और क्यों पढ़ाया जाता है।
अभी दीनि मदारिस के निज़ाम-ए-तालीम के मेयार की दलील के मुताल्लिक़ सिर्फ़ एक बात की तरफ़ तवज्ज़ोह दिलाऊंगा कि हम देखते हैं कि गली मोहल्ले के प्राइमरी स्कूल से लेकर शहर की बड़ी यूनिवर्सिटी तक को चलाने के लिए फ़ंड, असातिज़ा की तनख़्वाहें, करसियां, मेज़ें तक हुकूमत देती है लेकिन फिर भी उनकी क्या हालत है वह सब के सामने है, दूसरी तरफ़ मदारिस के मुताल्लिक़ हुकूमती रवैय्या क्या है वह भी हम जानते हैं, उनकी मदद के बजाये उनके खिलाफ़ बयानात रोज़ अख़बारात में पढ़ने को मिलते हैं।
लेकिन फिर भी अपनी मदद आप के तहत चलने वाले इन मदारिस के तालीमी निज़ाम का मेयार देखिएं कि दूसरे ममालिक से तलबाह यहाँ दीनि तालीम हासिल करने आते हैं।
हुकूमत की सख़्त शरायेत और पाबंदियों के बावजूद इस वक़्त सिर्फ़ देओबंद, नदवा मे चालीस के क़रीब ममालिक के तलबाह दीनि तालीम हासिल कर रहे हैं।
अगर मदारिस का तालीमी निज़ाम (दर्स-ए-निज़ामी) इतना ही ख़राब और बे-फ़ायदा और फ़रसूदा होता तो दूसरे इस्लामी ममालिक को छोड़ कर ग़ैर मुल्की तलबाह यहाँ के मदारिस में आकर फ़र्श पर बैठ कर और दाल रोटी खा कर गुज़ारा करके इसकी तालीम हासिल न करते।
दूसरी तरफ़ हमारी यूनिवर्सिटीज़ की क्या हालत है यहाँ बाहर से किसी ने आकर क्या पढा, हमारे अपने तलबाह यहाँ पढ़ना नहीं चाहते और बाहर की यूनिवर्सिटीज़ की तरफ़ सफ़र करते हैं।
आख़िरी बात साहेब ने भी अपने कलम में यह बात की आज यूनिवर्सिटीज़, कॉलेजों में भी जो बुरक़े पहने नौजवान और पर्दा नशीं लड़कियां नज़र आती हैं वे दर्स-ए-निज़ामी पढ़ने वाले इनहि उलमा की इसी वाज़ व नसीहत का असर हैं।...
यह मौलवी ही है जिस ने ग़ांव की टूटी मस्जिद में बैठ कर कुछ टुकड़ों के हौज़ अवाम का रिश्ता इस्लाम से जोड़ा हुआ है।
इसकी पीठ पर न कोई तंज़ीम है, न कोई फ़ंड है और न कोई तहरीक।
अपनो की बे-इंतेज़ामी, बेगानों की मख़ासमत, माहौल की बे-हिस्सी और मजमून की कज अदायगी के बावजूद इस ने न अपनी वसअत व क़ता को बदला और न अपने लिबास की मुक़र्ररा वर्दी को छोड़ा।
अपनी इस्तितात और दूसरों की तौफ़ीक़ के मुताबिक़ इस ने कहीं दीन की शमा, कहीं दीन का शोला, कहीं दीन की चिनगारी रौशन रखी।
मुल्ला ने इसकी राख ही को समेट समेट कर बाद-ए-मुख़ालिफ़ के झोंकों में उड़ जाने से महफ़ूज़ रखा।
दिन हो या रात, आंधी हो या तूफ़ान, अमन हो या फ़साद, हर ज़माने में शहर शहर, गली गली, छोटी बड़ी, कच्ची पक्की मस्जिदें इसी एक मुल्ला के दम से आबाद हैं जो ख़ैरात के टुकड़ों पर मदरसों में पड़ा रहता है और दरबदर की ठोकरें खा कर घर-बार से दूर कहीं अल्लाह के किसी घर में सर छिपा कर बैठा है।
कोई शख़्स वफ़ात पा जाता है, तो यह उसका जनाज़ा पढ़ा देता है, नौज़ाइदा बच्चों के कान में अज़ान दे देता है, कोई शादी तय होती है तो निकाह पढ़वा देता है।
इसे इसकी कोई परवाह नहीं कि कोई इसे जमाति, शब्राती कहता है, यह मुल्ला ही का फ़ैज़ है कि कहीं काम के मुसलमान, कहीं नाम के मुसलमान, कहीं महज़ निस्फ़ नाम के मुसलमान साबित व सलामत व बरक़रार हैं, ब्रितिश-ए-हिंद के मुसलमान उमूमन और बर्रे सगिर के मुसलमान ख़ुसूसन मुल्ला के इस एहसान-ए-आज़िम से किसी तरह सबक़दौश नहीं हो सकते जिस ने किसी न किसी तरह किसी न किसी हद तक उनके तशख़्क़ुस की बुनियाद को हर दौर और हर ज़माने में क़ायम रखा।...
एतिराज़ करने वाले यह क्यों नहीं सोचने कि लू से झुलसी हुई गर्म दोपहर में मोहल्ले की तंग मस्जिद में ज़ुहर की अज़ान हर रोज़ ऐन वक़्त पर अपने आप कैसे होती रहती है?
कड़कड़ाते हुए सर्दि में नर्म व गर्म लिहाफ़ों में लिपटे हुए अजसाम को इस बात पर कभी हैरत न हुई कि इतनी सुबह मून्ह अंधेरे उठ कर फ़ज्र की अज़ान इस क़दर पाबंदी से कौन दे जाता है?
उलमा और दीनि मदारिस के खिलाफ़ प्रोपेगंडा की असल वजह.
दीनि मदारिस का सिलसिला सदियों से क़ायम है और ग़ज़िश्ता सदी में हिंदुस्तान में इनही दीनि मदारिस के दम से उलूम-ए-नुबूवत ज़िंदा व ताबंदा हैं‘ इनही की वजह से इस्तेमार के जबर व इस्तिबदाद का ख़ातिमा हुआ‘ यही वे क़िले थे जिन से दीन इस्लाम का दिफ़ा हुआ‘ यही वे नज़रीयाती छावनीयां थीं‘ जिन्होंने इस्लामी नज़रिया की हिफ़ाज़त की‘ दीनि मदारिस ही आब-ए-हयात के वे पाकीज़ा चश्मे थे‘ जिन्होंने मुसलमानों में दीनि ज़िंदगी बाक़ी रखी।
इस्लाम-दुश्मन और आलमी दहश्तगर्द अमरीका के खिलाफ़ दुनिया भर में जहां कहीं उम्मत-ए-मुस्लिमा ने मज़ाहमत की‘ इस की क़ियादत व सीयादत दीनि मदारिस से वाबस्ता उलमा-ए-कराम के हिस्से में आई‘ इसिलिए ग़ज़िश्ता कई दहाइयों से दीनि मदारिस का ख़ालिस इलमी‘ तहक़ीक़ी माहौल और आज़ाद निज़ाम-ए-तालीम अरबाब-ए-इक़्तिदार की निगाहों में बुरे तरह खटक रहा है।
जिस तरह आज से चौदह सौ साल पहले क़ायम होने वाला मदरसा कुफ़्र की निगाह में खटकता था‘ इसि तरह आज भी हिंदुस्तान, पाकिस्तान और दुनिया भर के दीनि मदारिस इस्लाम-दुश्मनों की निगाहों में ख़ार बने हुए हैं‘
चनांचह मुसिबत के आलम में दीन-ए-हक़ की शमा को रौशन करने वाले मदारिस को दीन-दुश्मन अपने लिए एटम बम से ज़्यादा ख़तरनाक समझते हैं‘
इसलिए दीन-दुश्मन क़ुव्वतें अपने तमाम तर वसाइल के साथ इन मदारिस को ख़त्म करने‘ उन्हें कमज़ोर करने‘ मुसलमानों का इन से ताल्लुक़ तोड़ने और इन की हुर्रियत व आज़ादी को ख़त्म करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही हैं‘।...
इन लोगों का ख़याल है कि जब तक यह मदारिस और इन का आज़ाद तालीमी निज़ाम हुकूमती तहवील में नहीं आ जाता‘ इस वक़्त तक इस से फ़ारिग़ होने वाले उलमा को नकेल नहीं डाली जा सकती‘ और न ही इन से अपनी मंशा के मुताबिक़ दीन व मज़हब में तहरीफ़ और कतर-बयानी कराई जा सकती है।
इसलिए अमरीका‘ मग़रिब और यहूदी लॉबी ने दीनि मदारिस के खिलाफ़ मज़मूम प्रोपेगंडा शुरू की हुई है और उन्हें बदनाम करने और दुनिया को इन से मुनफ़ुर करने के लिए बाक़ायदा मंसूबे के तहत अलग़ अलग हथकंडे और हर्बे इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।
हर हुकूमत को दीनि मदारिस के खिलाफ़ इक़दामात करने पर मज़बूर किया जाता है।
अमरीकी हिदायतों पर हर हुकूमत ने मदारिस में मुदाख़लत की ‘ हर मौक़ा पर अरबाब-ए-इक़्तिदार ने मदारिस के खिलाफ़ ज़हर उगला‘ रजिस्ट्रेशन के नाम पर मदारिस को अपने जाल में फंसा ना चाहा‘ ग़ैर मुल्की तलबाह के खिलाफ़ मुल्क बदरी का ज़ुल्माना फ़ैसला किया‘ मदारिस की सनदों को बे-वक़त करने की कोशिशें भी इसी एजेंडे का तस्लसुल थीं‘।...
इस मकरूह प्रोपेगंडे में सिर्फ़ हुकूमती अरकान मलूस नहीं बल्कि नाम निहाद मुस्लिम मुल्क पाकिस्तानी मीडिया में ख़ुसूसी तौर पर मुनाफ़िक़ीन की एक जमात को अमरीकन सिफ़ारतख़ाना से सूर के बदले हायर किया गया है, मौजूदा दीनि मदारिस से सिर्फ़ उलमा पैदा हो रहे हैं‘ जबकि हम चाहते हैं कि इन से जिस तरह उलमा पैदा होते हैं‘ वैसे ही डॉक्टर‘ इंजीनियर और वकील भी पैदा हों और हमारी ख़्वाहिश व कोशिश है कि दीनि मदारिस से निकलने वाले उलमा हर शोबा-ए-ज़िंदगी में ख़िदमात अंजाम देने की सलाहियत से मालामाल हों ‘
जब इन अक़्ल बंदों को यह बावर कराया जाता है कि: अगर मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ से इंजीनियर और वकील पैदा करने की फरमाइश नहीं की जाती तो दीनि मदारिस से यह ताक़ीद क्यों की जाती है?
फिर कहते हैं: दीनि मदारिस में इंग्लिश‘ साइंस और दूसरे मज़ामीन क्यों नहीं पढ़ाए जाते?
हलांकि यह ख़ुद भी जानते हैं कि दीनि मदारिस में पहले से ही मैट्रिक का निसाब ज़ेर-ए-तालीम है और किसी दीनि मदरसे का निज़ाम-ए-तालीम किसी भी असरी और सरकारी स्कूल के मेयार-ए-तालीम से कम नहीं‘ बल्कि उस से बढ़ कर है।...
इसके अलावा प्रोपेगंडा बाज़ी की क़िस्तें चलाते नज़र आते हैं।
कभी उन्हें मुल्क कि तरक़्क़ी की राह में हरज क़रार दिया जाता है तो कभी दहश्तगर्द, कभी उन्हें फ़सादी कहा जाता है तो कभी तशद्दुद-पसंद, कभी किसी दाड़ी वाले के बुरे अमल को अच्छा ला कर उसे उलमा का नुमाइंदा बनाते हुए सारे उलमा पर कीचड़ अछाला जाता है, तो कभी जाली मौलवियों, क़ारियों और पीरों के मकरूह अमल और हरकतों की मीडिया के ज़रिए तशहीर करके उलमा से नफ़रत अवाम के दिलों में बिठाई जाती है।
ग़रज़ इस वक़्त तान व तशनीअ और तौहीन व तज़हीक की तमाम तोपों का रुख़ मुल्ला, दीनि मदारिस और तलबा की तरफ़ है, सिर्फ़ यही नहीं! बल्कि अब तो हुकूमती अमरीकी एजेंट और यह मुनाफ़िक़ बेरोज़गार पूरी क़ौम को ज़हनी तौर पर उसके लिए तेयार कर रहे हैं कि अगर मुल्क कि सलामती और अमन व अमान दरकार है तो इन ”मौलवियों“ से जान छुड़ानी होगी और इन के खिलाफ़ मुनज़्ज़म जद्दोजहद करनी होगी.
चनांचह इस नापाक मंसूबे को परवान चढ़ाने के लिए उलमा की गिरफ़्तारियां और मदारिस पर चापे मारे जाते हैं, किसी मस्जिद, मदरसे और इलमी मरकज़ पर बॉम्बारी करके इन मासूमों को ख़ाक व ख़ून में तड़पाया जाता है और उसके बाद बयान जारी कर दिया जाता है कि: ”इस जगह मज़लूम इंसानों को ज़बह किया जाता था, या यहाँ जिहादी तर्जुमा का मरकज़ और किताबो का ज़ख़ीरा था वग़ैरह वग़ैरह।...
निशानियों से आगे, इंसाफ़ की तरफ़.
दाढ़ी और टोपी पर तंज़ से कोई मसला हल नहीं होता; यह बस धुएँ की दीवार है—अंदर की आग वही रहती है। जो समाज अमल की तौसीक़, इल्मी मुबाहिसा और इदारों की इस्लाह पर खड़ा हो, वहाँ लेबलों की बाज़ारगर्दी नहीं चलती। अदब से की गई सख़्त तन्क़ीद, और सख़्त मसलों पर अदबी हल—यही रास्ता है कि रूह भी महफ़ूज़ रहे और सुधार भी जारी।
आखिरी पैग़ाम ।
बातिल को अच्छी तरह मालूम है कि यह उलेमा, यह आलिम और दानिश्वर त़बक़ा ही उम्मत का आख़िरी क़िला-ए-हिफ़ाज़त है, इसी लिए उसकी पूरी फिक्र-ओ-नज़रिया की जंग इसी मोर्चे पर आकर टूट जाती है। यह रहबरान-ए-हक़ अपने सीने से वक़्त के हर तूफ़ान को रोक कर इंतज़ाम-ए-उम्मत की निगहबानी कर रहे हैं, और यही मज़बूती दुश्मनान-ए-इस्लाम और मुनाफ़िक़ीन के लिए सबसे बड़ी चुभन बनी हुई है। इस्लाम में असल रहबर की पहचान हिदायत, अमानतदारी और इल्म से होती है, न कि दौलत या शोहरत से।
यही वजह है कि मुसलमानों को अपने रहबरों से जुदा करने के लिए मीडिया और नाम-निहाद रौशन-ख़्याल त़बक़ा तैयार किया गया, जो उलमा-ए-हक़ के ख़िलाफ़ नफ़रत, बदगुमानी और तोहमत का ज़हर मुसलमानों के दिलों में टपकाता है। जब रहनुमा को अवाम से काट दिया जाए, तो क़ौम बे-रहबर हो जाती है, और फिर बातिल के लिए नज़रिया थोपना, अपना निजाम नाफ़िज करना,तहज़ीब व रिवायत बदलना और फ़िक्र को गिरफ़्त में लेना एक आसान शिकार बन जाता है।
ऐ मुसलमानो! यह वक़्त नींद और ग़फ़लत का नहीं, होश और बस़ीरत का है; जब तक हक़ की हक़ीक़त और उसकी दलील तुम्हारे सामने रौशन न हो जाए, बातिल के लिबास को गले न लगाओ। अपने उलमा-ए-हक़, अपने अस्ल रहबर, और अपनी दीनदार रहनुमाई से राब्ता मज़बूत करो, वरना फ़िक्रि शिकस्त के बाद अमली ग़ुलामी तुम पर मुसल्लत कर दी जाएगी। जो क़ौम अपने अहले-इल्म और रहबरान-ए-दीन से कट जाती है, वह आख़िरकार अपने दुश्मनों की तख़्ती पर सिर्फ़ एक कमज़ोर मोहरा बनकर रह जाती है। मुसलमान एक जिस्म के मानिन्द् है और उसी तरह से एक दूसरे के दर्द, तकलीफ और मजबूरी को समझे।
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