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Alexander the Great vs Umar Farooq: Who Was the True Ruler in History?

Leadership Across Eras: Comparing Alexander and Umar Farooq.

Alexander the Great or Umar Farooq — The Real Authority?
From Conqueror to Caliph: A Tale of Two Leaders.
The Legacy of Alexander the Great.
Power, Faith, and Influence: Who Truly Held Authority?
यरूशलम की अमानत, अवाम की राहत—उमर र.अ. की विरासत।
सीरत जो राह दिखाए: उमर र.अ. का इमान, इंसाफ और इख़लास।
अल‑फ़ारूक़: हक़‑ओ‑बातिल में फ़र्क
निज़ाम‑ए‑अदल और बिटुल‑माल
यरूशलम की अमानतदार सुलह
खुली इबादत और दलेरी
हजरत उमर फ़ारूक़ र.अ.: इमान, इंसाफ और रहमत की मिसाल—खुली इबादत, मजबूत निज़ाम‑ए‑अदल और अमानतदार हुकूमत की कहानी।
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अद्ल की पहचान: अल‑फ़ारूक़ उमर र.अ.—जहाँ ताक़त रहमत बन गई।
जब इख़लास, अद्ल और अमानत एक शख्सियत में जमा हों, उसे दुनिया ‘अल‑फ़ारूक़’ कहती है—यह है उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु। मदीना की गलियों से रात की निगरानी और अवाम के आँसू पोंछने का मन्ज़र यह थी उमर र.अ. की हुकूमत।

हयात‑ए‑सहाबा में हजरत उमर फ़ारूक़ रज़ि अल्लाहु अन्हु कि ज़िंदगि इमान, अद्ल (न्याय) और अमानतदारी की रोशनी है—दूसरे खलीफ़ा के तौर पर 634–644 ईस्वी में हुकुमत करते हुए उन्होंने इस्लामी हुकूमत को इदारे, इनसाफ और रहमदिली का मिसाल बना दिया।  मक्‍का के क़ुरैश से ताल्लुक रखने वाले उमर र.अ. ने इस्लाम कबूल करने के बाद खुलेआम इबादत का हौसला दिया, अल‑फ़ारूक़ का खिताब पाया और यरूशलम की अमानती तहफ़्फ़ुज़ व अवाम की खिदमत से दिल जीते। 

हज़रत उमर इब्न अल‑खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु का नाम अद्ल, जिम्मेदारी और खालिस तौहीद की पहचान है; वही अल‑फ़ारूक़ जिनके बारे में रिवायत में आता है कि हक़‑ओ‑बातिल में फ़र्क़ करने का लक़ब अता हुआ। इस्लाम की दावती तारीख़ में उनका किरदार इख़लास, दलेरी और निज़ाम‑ए‑हुकूमत की इस्लामी बुनियादों को अमली शक्ल देने का नायाब नमूना है।

नसब, इस्लाम कबूल करना और अल‑फ़ारूक़ का लक़ब  
उमर र.अ. क़ुरैश के बनू अदी से थे; जिहालत के दौर में इस्लाम की मुख़ालिफ़त की, फिर 616 ई. के क़रीब इस्लाम लाए और खुलेआम काबा में नमाज़ पढ़कर मुसलमानों के हौसले बुलंद किए—यहीं से अल‑फ़ारूक़ की फ़ितरी सख़्ती और इंसाफ की मिज़ाज पनाह दीन की ख़िदमत में लग गई। सहाबा की गवाही में उनके इस्लाम लाने को “ग़लबा” और “फ़त्ह” कहा गया, जिससे हरम में खुली इबादत का रास्ता आसान पड़ा।
  
उमर र.अ. की ज़िंदगी साफ़, सादा और सुन्नत‑पसंद नज़र आती है—रियासत में वहशी तामझाम नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, जवाबदेही और अमानत। उनकी सीरत में शिर्क के तमाम आसार से बेरुखी, तक़वा और ‘उबूदिय्यत को अव्वल दर्जा, और इज्तिहाद में नबी करीम स.अ. की सुन्नत को मिज़ान बनाने की मिसालें मिलती हैं।

खिलाफत और निज़ाम‑ए‑अदल  
खिलाफत संभालते ही उन्होंने बैतुल‑माल की हिफाज़त, क़ज़ा‑ओ‑कज़ा (जुडिशियरी) की तहज़ीब, दीवानात (रजिस्ट्रियाँ) और हिसाबदेही की बुनियादी इदारे क़ायम कीं, ताकि रेआया का हक़ मेहफूज़ रहे। गवर्नरों की मुद्दत‑ए‑इख़्तियार मुय्यन रखना, रियासती कारकुनों की जवाबदेही लेना और अवाम की शिकायतें रात में खुद सुनना—ये तमाम अमल उनकी अद्ल‑ओ‑रहमत का मुजस्सम बयान हैं।

फौजी फतूहात और रियासत‑ए‑मदीना की वुसअत  
उमर र.अ. के दौर में रिद्दा के बाद नज़्म‑ओ‑नसक़ मजबूत हुआ और फिर मशरिक़‑ओ‑मग़रिब में फतूहात के दरवाज़े खुले; मगर सुन्नत के मुताबिक नसबुल‑ऐन मक़सद दीन‑ए‑हक़ की बुलंदी और अवाम की जान‑ओ‑माल की हिफाज़त रहा। तख्त‑ओ‑ताज की शोहरत नहीं, बल्कि “अमीर‑अल‑मुमिनीन” के तौर पर एक सादा,  इमानदारी, रहमत‑आमेज़ हुकूमत उनकी पहचान बनी।

अख़लाक़ी सरपरस्ती: रात की निगरानी, दिन का इंसाफ  
सीरत‑ए‑उमर में रातों को गलियों की गश्त, मुहताजों की ख़बरगीरी और बैतुल‑माल से पहले अपनी जेब से ख़िदमत—यह सब सुन्नत‑पसंद अख़लाक़ की झलक है। उनके दौर में ‘उमर का “दर्रा” बाज़ औक़ात नफ़्स‑ए‑मुतअद्दी और ख़िलाफ‑ए‑निज़ाम अमल पर रोक की तावील बना, मगर वह खुद अपने आपको उसी मिज़ान पर तौलते—यही असल अदालत है।

हिजरी कैलेंडर और इदारती इस्लाहात  
उमर र.अ. के ज़ेरे निगरानी हिजरी सनत की ताख़्तीब हुई, ताकि उम्मत का इदारती, माली और क़ानुनी निज़ाम वक़्त‑ओ‑हवादिस से हमआहंग रहे—यह सादगी और मक़ासिद पर तवज्जो का रौशन नमूना है। इदारों की बुनियाद, दीवानात की तर्तीब और गवर्नेंस के उसूल आज भी इस्लामी पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की रहनुमाई करते हैं।

यरूशलम और अहले‑किताब के हुक़ूक़  
क़ुद्स में अमानती सुलह और गैर‑मुस्लिम रैयत के हुक़ूक़ की क़ानूनी ज़मानत उमर र.अ. की शफ़क़त‑ए‑हाकिम और अद्ल‑ए‑इस्लामी की बेनज़ीर मिसाल है—जंग नहीं, अमानत। यह रवैया उसूल “अद्ल, अहद की पाबंदी और जुल्म से इन्कार” के साथ पूरी तरह हमआहंग है।

विरासत और सबक  
उमर र.अ. की विरासत तीन क़िस्त में सिमटती है: तौहीद, अद्ल और अमानत—
जहाँ लीडरशिप नफ़्स की ताबेदारी नहीं, बल्कि शरीअत की पाबंदी बनती है। 
आज की मुस्लिम सोसाइटी के लिए सबक यह कि निज़ाम‑ए‑हुक्मरानी की असल रूह सुन्नत के मुताबिक़ ज़िम्मेदारी, जवाबदेही और अवाम की ख़िदमत है—ना कि शौकत, शोहरत या तअस्सुब।
"अगर फ़रात् (दजला नदी) के किनारे एक कूत्ता का बच्चा भी भूख से मर जाए तो उसके बारे मे उमर (रजी अल्लाहु अनहु) से हिसाब लिया जायेगा।" यह क़ौल है इस्लाम के दूसरे खलीफा हज़रत उमर फारूक रजी अल्लाहु अनहु का

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Who Truly Held Authority?
दुनिया का असली हुक्मरान कौन?—सिकंदर या उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु | एक गहरा तारीख़ी मुक़ाबला

तारीख़-ए-इंसानियत में दो नाम अक्सर ज़ेहन में टकराते नज़र आते हैं—एक तरफ़ दुनिया के कई हिस्सों को अपनी तलवार और जंगी जुनुनो से जीत लेने वाला "सिकंदर-ए-आज़म" और दूसरी तरफ़ वो शख़्सियत जिसने इंसानियत को ऐसा निज़ाम दिया जो आज तक इनसाफ़ और अद्ल़ का मिशाल बना हुआ है—अमीर-उल-मुमिनीन, हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु

दुनिया की तारीख़ जब भी हुक्मरानों का ज़िक्र करती है, दो नाम अपनी पूरी शान के साथ सामने आते हैं—सिकंदर (Alexander the Great) और हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु, इस्लाम के दूसरे खलीफ़ा।
एक ने तलवार से सरहदें फ़तह कीं, और दूसरे ने इंसाफ़ से दिलों की दुनिया जीती।
यही वजह है कि लोग आज भी पूछते हैं—असल हुक्मरान कौन था?
वो जिसने जमीनें लीं, या वो जिसने इंसानियत को नए उसूल दिए?
सिकंदर—तलवार का बादशाह, मगर नियामत के बग़ैर

सिकंदर मकदूनिया का बादशाह था—बहादुर, जंगजू, और फ़तह का दीवाना।
उसने यूनान से लेकर मिस्र और ईरान तक अपना लोहा मनवाया। Alexander the Great की जंगी  मंसूबे आज भी मिलिट्री किताबों में मिशाल हैं।

लेकिन उसकी तमाम फ़तहों के बावजूद एक कमी साफ़ दिखती है.
उसके पास कोई मुस्तकिल (स्थायी) निज़ाम नहीं था।

ज़मीनें तो जीतीं, मगर लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने वाला कोई प्रशासन, कोई welfare system, कोई न्याय व्यवस्था—कुछ भी स्थापित न कर सका।
उसके मरते ही उसका पूरा सलतनत बिखर गया।
मानो फ़तहें उसके साथ ही दफ़्न हो गई हों।
कभी-कभी लगता है कि सिकंदर का ताज चमक तो बहुत रहा था, मगर उसके अन्दर् स्थायित्व की रोशनी कम थी

उमर फ़ारूक़—इंसाफ़ का वो सूरज जिसने दुनिया को रोशन किया

"अगर फ़रात् (दजला नदी) के किनारे एक कूत्ता का बच्चा भी भूख से मर जाए तो उसके बारे मे उमर (रजी अल्लाहु अनहु) से हिसाब लिया जायेगा।" यह क़ौल है इस्लाम के दूसरे खलीफा हज़रत उमर फारूक रजी अल्लाहु अनहु का।

अब ध्यान दीजिए उस शख़्सियत पर जिसे दुनिया “The Greatest Administrator in History” कहती है 
हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु।

उनके दौर में इस्लामी फ़तहें बढ़ीं, लेकिन उनका असल कमाल यह नहीं था कि उन्होंने मुल्क जीते।

उनकी असली पहचान यह थी कि उन्होंने इंसाफ़, बराबरी और अमन पर खड़ी एक ऐसी हुकूमत बनाई, जिसने दुनिया के प्रशासनिक ढांचे को हमेशा के लिए बदल दिया।
उनकी गश्तें, उनकी रातें, उनका फक़ीरों के लिए रोना—
ये सब दिखाते हैं कि उनकी हुक्मरानी ज़ुल्म को मिटाने और इंसानियत को उठाने के लिए थी।

उन्होंने दुनिया को दिए:

  • अदालतों का साफ़ और पारदर्शी निज़ाम
  • वेल्फेयर स्टेट का पहला माडल
  • पुलिस और फ़ौजी रजिस्ट्रेशन सिस्टम
  • Census की बुनियाद
  • सड़कें, डाक, और प्रशासनिक विभाग
  • गरीबों, बुजुर्गों, यतीम बच्चों और गैर-मुस्लिम रियाया के लिए सुरक्षा.
यानी उमर फ़ारूक़ ने एक मॉडर्न, इंसाफ़ और बराबरी वाला हुकूमत पहली बार दुनिया के सामने पेश किया

सिकंदर की तलवार बनाम उमर का इंसाफ़

फ़तह का तरीका

  • सिकंदर ने फ़तह तलवार से की।

  • उमर ने फ़तह इंसाफ़, रहमत और उसूलों से की।

तलवारें जंग जीतती हैं,
उसूल दुनिया जीतते हैं।

  • सिकंदर ने मुल्कों को जीता, मगर नफ़्स, लालच और ग़ुस्से पर काबू न पाया।
  • उमर  ने अपने नफ़्स को जीता, और फिर दुनिया को इंसाफ़ से रोशन किया।

कहावत है:

“जिसने खुद को जीत लिया, उसने दुनिया को जीत लिया।”
और ये मुकाम उमर र.ज़. को हासिल था।

सरहदें और दिलों की सरहदें

  • सिकंदर की फ़तहों की सीमाएँ नक्शों में बदलती थीं,
  • उमर की फ़तहों की सीमाएँ इंसानी दिलों में बसीं।

नक्शे मिट जाते हैं,
दिलों की महब्बतें नहीं।

लोगों के दिलों में जगह

  • सिकंदर से लोग डरते थे।
  • उमर से लोग मोहब्बत करते थे।

डर सर झुकाता है,
मोहब्बत दिल झुकाती है।

हुकूमत का असर

  • सिकंदर की हुकूमत उसके मरते ही टूट गई।
  • उमर की हुकूमत सदियों तक दुनिया के निज़ाम पर असर डालती रही।

सिकंदर की फ़तहें मिट्टी में दफ़्न,
उमर का इंसाफ़ आज भी जिंदा।

ताज की उम्र और उसूलों की उम्र
  • सिकंदर का ताज उसकी कब्र के साथ दफ़्न हुआ।
  • उमर फ़ारूक़ के उसूल आज भी ज़िन्दा हैं—अदालतों में, वेल्फेयर स्टेट में, संसदीय नज़्म में, और इंसाफ़ी मिज़ाज में।
हुक्मरानी का मक़सद
  • सिकंदर का मक़सद दुनिया हासिल करना था,
  • उमर का मक़सद दुनिया को रौशन करना था।

एक ने ख़ुद को दुनिया पर साबित किया,
दूसरे ने दुनिया को इंसाफ़ पर क़ायम किया।

दुनिया का असली हुक्मरान कौन?

अगर हुक्मरान वह है जो तलवार से जमीनें ले ले.
तो हाँ, सिकंदर का नाम लिया जाएगा।

लेकिन अगर हुक्मरान वह है जो इंसाफ़ से दिलों को बदल दे, मुआशारे को रौशन कर दे, और सदियों तक चलने वाला निज़ाम दे—  तारीख़ गवाही देती है कि असली बादशाही सिर्फ़ जमीनें जीतने से नहीं मिलती—इंसाफ़ और अमन क़ायम करने से मिलती है
इसीलिए अमन का ताज, इंसाफ़ की तलवार और बराबरी का तराज़ू—ये तीनों मिलकर जिस शख़्स के सर रखे गए, वो हैं:

अमीर-उल-मुमिनीन हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु।
क्योंकि
सिकंदर ने दुनिया को हिलाया था,
उमर ने दुनिया को सँवारा था।
जो दुनिया सँवार दे, उससे बड़ा हुक्मरान कोई नहीं।

तारीख़ की रहगुज़र पर दो साया हमेशा से ठहरा हुआ है—एक सिकंदर की तलवार का और दूसरा उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के इंसाफ़ का।
एक ने दुनिया जीती, मगर नज़र-ए-इनायत गुम रही; दूसरे ने इंसाफ़ को ताज पहनाया और दिलों की दुनिया रोशन कर दी।
जब असल हुक्मरान की तलाश होती है, तो ज़मीनों की फ़तह नहीं, इंसाफ़ की रोशनी देखी जाती है—और वही रोशनी अमीर-उल-मुमिनीन के दौर से आज तक चमक रही है।


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